शाम के 6 बज चुके थे।
सूरज ढल रहा था और मोहल्ले में हलचल बढ़ गई थी।
सुनीता आंटी के घर के बाहर विकास भैया की कार आकर रुकी।
विकास भैया ऑफिस से थके-हारे घर लौटे थे।
घर में दाखिल होते ही सुनीता आंटी ने मोर्चा संभाल लिया।
चाय का कप टेबल पर रखते ही सुनीता आंटी बोलने लगीं।
“देख लो विकास, अपनी मां के कारनामे देख लो!”
“सुबह से पूरे मोहल्ले में मेरी थू-थू करवा रखी है।”
विकास भैया ने माथे का पसीना पोंछा।
“क्या हो गया मम्मी? सुबह-सुबह क्या हुआ?”
सुनीता आंटी ने जोर-जोर से बोलना शुरू किया ताकि बाहर बैठे लोग भी सुन सकें।
“तुम्हारी मां को इस उम्र में द्वारकाधीश जाना है!”
“10,000 रुपये मांग रही हैं मुझसे।”
“मैंने मना किया तो पूरे मोहल्ले के सामने मुंह बनाकर बैठ गईं।”
“कहती हैं कि उन्हें अपनी सहेलियों के साथ जाना ही है।”
विकास भैया ने शांत स्वर में कहा, “मम्मी, अगर वे जाना चाहती हैं तो चले जाने दीजिए ना।”
“10,000 रुपये कोई बहुत बड़ी बात तो नहीं है।”
यह सुनते ही सुनीता आंटी भड़क गईं।
“बड़ी बात नहीं है? तुम कमाते हो तो तुम्हें पैसे आसान लगते हैं!”
“कल को कोई और मांग करेंगी, फिर क्या करोगे?”
“घर में बहु-बेटे की कोई इज्जत है या नहीं?”
“इस उम्र में घर में बैठकर पूजा-पाठ करने के बजाय घूमने का शौक चढ़ा है!”
स्नेहा भी अपनी मां के पास आकर खड़ी हो गई।
“हां पापा, मम्मी सही कह रही हैं।”
“दादी को इस उम्र में घर पर ही रहना चाहिए।”
“सब सहेलियां मिलकर पैसे बर्बाद कर रही हैं।”
तभी कौशल्या जी पार्क से वापस घर में दाखिल हुईं।
उनके कपड़े धूल से सने थे और चेहरे पर थकान थी।
वे हाथ में वही पुराना थैला लिए चुपचाप अपने कमरे की तरफ बढ़ने लगीं।
सुनीता आंटी ने उनका रास्ता रोक लिया।
“आ गईं आप? कह दिया न विकास से भी, एक रुपया नहीं मिलेगा आपको!”
“अपनी उम्र का लिहाज कीजिए थोड़ा!”
“हमारे पैसों पर ऐश करना बंद कीजिए!”
कौशल्या जी रुकीं।
उन्होंने सुनीता आंटी की तरफ देखा।
उनकी आंखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरा अफसोस था।
कौशल्या जी ने कहा, “सुनीता, मैंने कभी तुमसे अपने अधिकार से ज्यादा कुछ नहीं मांगा।”
“यह मेरी आखिरी इच्छा थी कि मैं अपनी बचपन की सहेलियों के साथ तीर्थ कर आऊं।”
सुनीता आंटी हंस पड़ीं।
“आखिरी इच्छा? हर साल आपकी एक नई आखिरी इच्छा निकल आती है!”

“पैसे हम बहाएं और नाम आपका हो!”
“अगर इतना ही घूमने का शौक है तो अपने पैसे से जाइए!”
“आपके पति कौन सा हमारे लिए खजाना छोड़ गए थे?”
कौशल्या जी ने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने अपने हाथ में पकड़ा हुआ जूट का थैला टेबल पर रख दिया।
थैले की ज़िप खोली और उसमें से एक पुरानी, पीली पड़ चुकी पासबुक और कुछ कानूनी कागज बाहर निकाले।
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।
सुनीता आंटी ने चिढ़कर कहा, “ये क्या कचरा फैला रही हैं आप?”
कौशल्या जी ने कागजात विकास भैया की तरफ बढ़ा दिए।
“विकास, जरा यह कागज अपनी पत्नी और बेटी को पढ़कर सुनाओ।”
विकास भैया ने उलझन में वे कागज हाथ में लिए।
जैसे-जैसे विकास भैया कागज पढ़ते गए, उनके चेहरे का रंग बदलने लगा।
सुनीता आंटी ने पूछा, “क्या है इसमें विकास? क्यों टाइम बर्बाद कर रहे हो?”
विकास भैया की आवाज कांपने लगी।
उन्होंने अपनी पत्नी सुनीता की तरफ देखा।
“मम्मी… तुम्हें पता है यह घर किसके नाम पर है?”
सुनीता आंटी चौंकी। “क्या मतलब? यह घर तुम्हारे पापा के नाम पर था, जो अब तुम्हारे नाम पर है।”
विकास भैया ने सिर हिलाया।
“नहीं मम्मी। यह घर और बाजार वाली 3 दुकानें… सब मां के नाम पर हैं।”
“पापा ने अपनी पूरी जायदाद मां के नाम वसीयत की थी।”
यह सुनते ही सुनीता आंटी के होश उड़ गए।
स्नेहा भी हैरान होकर कागजों को देखने लगी।
विकास भैया ने आगे पढ़ना शुरू किया।
“और जिस बैंक अकाउंट से हर महीने हमारे घर का 50,000 रुपये खर्चा आता है…”
“वह पापा की पेंशन और दुकानों का किराया है, जो सीधे मां के खाते में आता है।”
“हम जिस गाड़ी में घूमते हैं, उसकी किस्त भी इसी खाते से जाती है।”
कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक साफ सुनाई दे रही थी।
कौशल्या जी ने शांत आवाज में कहा।
“सुनीता, तुमने कहा कि मैं तुम्हारे पैसों पर ऐश कर रही हूं?”
“पिछले 12 सालों से इस घर का एक-एक खर्चा मेरे पति की कमाई और मेरी पेंशन से चल रहा है।”
“तुम्हारे पति का बिजनेस जब 5 साल पहले डूबने की कगार पर था…”
“तब मैंने अपनी दुकानें गिरवी रखकर 15 लाख रुपये का लोन लिया था।”
“वह लोन आज भी मेरे बैंक खाते से कट रहा है।”
विकास भैया ने अपना सिर शर्म से झुका लिया।
वे घुटनों के बल अपनी मां के सामने बैठ गए।
“मां… मुझे माफ कर दो। मुझे नहीं पता था कि आपने हमारे लिए इतना कुछ किया है।”
कौशल्या जी ने विकास के सिर पर हाथ रखा।
“बेटा, मैंने कभी इन कागजों को दिखाने की जरूरत महसूस नहीं की।”
“क्योंकि मुझे लगता था कि यह मेरा परिवार है।”
“लेकिन आज जब मेरी ही बहु और पोती ने मुझे 10,000 रुपये के लिए पूरे मोहल्ले में नीचा दिखाया…”
“तो मुझे अहसास हुआ कि खामोश रहना अब मेरी सहनशीलता नहीं, मेरी कमजोरी बन गया है।”
सुनीता आंटी के पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं थे।
उनका चेहरा शर्म से लाल हो चुका था।
जो औरतें चाय पीने आई थीं, वे भी आपस में फुसफुसाने लगीं।
“देखो तो सही, बेचारी सास के टुकड़ों पर पल रही थीं और उसी को आंखें दिखा रही थीं।”
“कितनी नीच हरकत है!”
सुनीता आंटी की नजरें जमीन में गड़ गईं।
स्नेहा चुपचाप पीछे हट गई।
सुनीता आंटी ने कांपते हाथों से अपनी अलमारी से 20,000 रुपये निकाले।
वे रोते हुए कौशल्या जी के पैरों में बैठ गईं।
“मां जी… मुझे माफ कर दीजिए।”
“मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई।”
“मैं नहीं जानती थी… मुझे लगा कि आप हमारे पैसों पर…”
कौशल्या जी ने पैसे लेने से साफ मना कर दिया।
उन्होंने कागजात वापस अपने थैले में रखे।
कौशल्या जी ने कहा, “पैसे मेरे पास अपने बहुत हैं सुनीता।”
“मुझे तुमसे पैसे नहीं, सिर्फ थोड़ा सा सम्मान चाहिए था।”
“लेकिन तुमने साबित कर दिया कि रिश्तों की कीमत तुम्हारी नजर में सिर्फ पैसों से तय होती है।”
कौशल्या जी ने अपनी छड़ी उठाई।
“मैं कल सुबह ही द्वारकाधीश जा रही हूं।”
“और इस बार मैं अपने पैसों से जाऊंगी।”
“वापस आने के बाद मैं तय करूंगी कि इस घर में कौन रहेगा और कौन नहीं।”
“क्योंकि यह घर मेरा है।”
विकास भैया ने आंसू पोंछते हुए कहा, “मां, मैं आपके साथ चलूंगा। मुझे सेवा करने का एक मौका दीजिए।”
कौशल्या जी ने कहा, “नहीं विकास, तुम अपना घर संभालो।”
“मैं अपनी सहेलियों के साथ ही जाऊंगी।”
“जिन्होंने मुझे कभी बोझ नहीं समझा।”
अगली सुबह 6 बजे।
गली में एक ट्रैवल एजेंट की गाड़ी आकर रुकी।
कौशल्या जी अपना छोटा सा बैग लेकर बाहर निकलीं।
उनकी सहेलियां गाड़ी में बैठकर उनका इंतजार कर रही थीं।
सबके चेहरे पर खुशी थी।
सुनीता आंटी और स्नेहा दरवाजे पर खड़ी होकर सब देख रही थीं।
लेकिन इस बार उनकी आंखों में घमंड नहीं, बल्कि पछतावा था।
मोहल्ले के लोग कौशल्या जी को विदा करने बाहर आए थे।
कौशल्या जी ने मुस्कुराकर सबको हाथ जोड़ा।
वे सम्मान के साथ गाड़ी में बैठीं और गाड़ी द्वारकाधीश के रास्ते पर आगे बढ़ गई।
सुनीता आंटी को समझ आ चुका था कि किसी की खामोशी को उसकी बेबसी समझने की भूल सबसे भारी पड़ती है।
