7 साल विदेश में पसीना बहाकर माँ को भेजे लाखों रुपये, वापस लौटा तो देखा माँ मेरे बंगले में राज कर रही थी और बेकसूर पत्नी-बेटा नाले किनारे झुग्गी में… जानिए उस लिफ़ाफ़े का खौफ़नाक सच!

भाग 1
मेरे पीछे टैक्सी का इंजन बंद हो चुका था। ड्राइवर मेरा बैग सड़क किनारे रखकर चला गया।
सामने बदबूदार नाला बह रहा था। उसके ठीक किनारे बाँस, टीन और नीली पन्नी से ढकी एक छोटी-सी झुग्गी खड़ी थी। और उस झुग्गी के बाहर, गीली मिट्टी पर मेरी पत्नी प्रिया बैठी थी। उसके पास आठ साल का हमारा बेटा आरव फटी हुई चप्पल में सुई-धागा पिरोने की कोशिश कर रहा था।
जब मैं सात साल पहले विदेश गया था, तब प्रिया के गाल भरे हुए थे। उसके चेहरे पर हमेशा एक हल्की-सी मुस्कान रहती थी। लेकिन आज मेरे सामने जो औरत बैठी थी, उसकी कलाई इतनी पतली हो चुकी थी कि उसकी पुरानी काँच की चूड़ियाँ कोहनी तक ढलक रही थीं।
आरव ने मुझे देखा। उसके नन्हे हाथों में पकड़ी चप्पल छूट गई। वह झुग्गी के भीतर भागा।
— मम्मी, पापा आ गए!
उसकी आवाज़ सुनकर प्रिया बाहर आई। उसने मुझे देखा।
उसने मेरा नाम नहीं लिया। कोई सवाल नहीं पूछा। बस अपनी सूखी आँखों से मुझे देखती रही।
मैं दो कदम आगे बढ़ा।
मेरी नज़र अपने साफ-सुथरे जूतों पर गई, फिर उसके कीचड़ में सने नंगे पैरों पर। मैंने हाथ बढ़ाकर उसे छूना चाहा, लेकिन वह आधा कदम पीछे हट गई।
वह आधा कदम मेरे सीने में किसी भारी पत्थर की तरह लगा।
आरव उसके पीछे से झाँक रहा था। मैंने उसे आखिरी बार तब गोद में लिया था जब वह सिर्फ एक साल का था।
मैं घुटनों के बल कीचड़ में बैठ गया।
— आरव… यहाँ आओ बेटा।
वह झिझका। उसने प्रिया की साड़ी का किनारा कसकर पकड़ लिया।
— आप सच में मेरे पापा हो?
मेरी आवाज़ गले में ही अटक गई। मैंने बस सिर हिला दिया।
वह धीरे-धीरे मेरे पास आया। उसने अपनी छोटी-सी बाँहें मेरी गर्दन के चारों तरफ लपेट दीं। जब मेरी हथेलियाँ उसकी पीठ पर पड़ीं, तो मुझे उसकी कमीज़ के नीचे रीढ़ की हड्डी के एक-एक हिस्से का अहसास हुआ। मेरा कलेजा मुँह को आ गया।
सुबह जब मैं अपने गाँव पहुँचा था, तो मेरा दिल खुशी से उछल रहा था। जयपुर से करीब चालीस किलोमीटर दूर मेरे पुराने मकान की जगह अब दो मंजिला शानदार बंगला खड़ा था।
सफेद संगमरमर का आँगन।
सागौन का भारी दरवाज़ा।
ऊपर बालकनी में शीशे की रेलिंग।
मेरी माँ ने मुख्य दरवाज़े पर खड़े होकर गर्व से कहा था—
— देखा विक्रम? तेरा कमाया एक-एक रुपया मैंने सही जगह लगाया है।
मैंने माँ की बात पर यकीन कर लिया था। फिर मैंने चारों तरफ देखा।
— माँ, प्रिया और आरव कहाँ हैं?
माँ ने हाथ में पकड़ा पानी का गिलास मेज पर रखा और अपनी नज़रें फेर लीं।
— बाहर गई है।
मेरी भाभी मीना तुरंत बोल पड़ी—
— उसे तो लौटने में काफी देर हो जाएगी।
दोनों के जवाबों में अजीब-सी घबराहट थी। लेकिन असली झटका मुझे तब लगा जब मैं अपने पुराने कमरे में गया।
वहाँ मेरे भाई राकेश और भाभी मीना का कब्जा था। अलमारी में मीना की महँगी साड़ियाँ ठँसी हुई थीं। आरव का कोई खिलौना वहाँ नहीं था। प्रिया की एक भी तस्वीर दीवार पर नहीं थी।
यहाँ तक कि आँगन में वह नई मोटरसाइकिल खड़ी थी जो मैंने विदेश जाने से पहले प्रिया के नाम पर खरीदी थी। उसकी चाबी मीना की उँगलियों में घूम रही थी।
मैंने पूछा—
— यह गाड़ी तुम्हारे पास कैसे?
मीना भाभी हँस दीं।
— घर की चीज़ घर में ही तो है।
माँ ने आगे आकर ठंडे स्वर में कहा—
— विक्रम, तुम सात साल बाहर रहे हो। घर हमने संभाला है। यहाँ किस चीज़ पर किसका हक है, यह तुम्हें तय करने की जरूरत नहीं है।
रात भर मैं अपने ही बनाए बंगले के एक ठंडे कमरे में करवटें बदलता रहा।
सुबह छह बजे मैं चुपचाप घर से बाहर निकला। गली के मोड़ पर मुझे पड़ोस की शर्मा काकी मिल गईं। उन्होंने मुझे देखा, फिर पीछे खड़े बंगले को देखा।
— तू प्रिया से मिल लिया विक्रम?
— काकी, वह कहाँ है? घर पर कोई कुछ बता नहीं रहा।
काकी ने मुझे अपने छोटे-से बरामदे में बैठाया। उनकी आँखों में उदासी थी।
— चार महीने पहले मीना ने रोना-धोना शुरू किया कि उसके दो लाख रुपये गायब हो गए हैं। बिना किसी सबूत के, बिना पुलिस को बुलाए, सीधा इल्जाम प्रिया पर लगा दिया गया।
— और माँ ने क्या कहा?
— तुम्हारी माँ ने उसी रात प्रिया का हाथ पकड़ा और घर से बाहर निकाल दिया। आरव रोता रहा, तुम्हारी माँ के पैर पकड़ता रहा कि ‘दादी हमें मत निकालो’, लेकिन दरवाज़ा मुँह पर बंद कर दिया गया।
— उसने मुझे फोन क्यों नहीं किया काकी?
— उसका फोन उसी रात छीन लिया गया था। तुम्हारी माँ सबको यही कहती थीं कि विदेश में तेरे काम पर असर पड़ेगा।
मैं गुस्से से काँप रहा था।
मैं तुरंत उस झुग्गी में पहुँचा जहाँ प्रिया रह रही थी। प्रिया ने मुझे अंदर बैठाया।
— तुमने किसी और के फोन से मुझे खबर क्यों नहीं की प्रिया?
प्रिया ने गैस चूल्हे की लौ कम की।
— मैंने किया था। पहली बार काकी के फोन से किया, तो तुम्हारी माँ ने उठाया। बोलीं तुम काम पर हो। दूसरी बार भाभी ने उठाया और गालियाँ देकर फोन काट दिया।
प्रिया ने कोने में रखे एक पुराने संदूक से कपड़े हटाए। नीचे एक टूटी स्क्रीन वाला फोन था और उसके साथ एक भूरा लिफाफा। लिफाफे पर तहसील दफ़्तर की नीली मुहर लगी थी।
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाना चाहा, लेकिन प्रिया ने मेरी कलाई पकड़ ली।
— अभी नहीं।
— क्यों?
— पहले घर जाओ। अपनी माँ की आँखों में आँखें डालकर सिर्फ एक सवाल पूछो।
— क्या सवाल?
— उनसे पूछो कि जिस दिन मुझे घर से निकाला गया, उससे ठीक तीन दिन पहले उन्होंने मुझसे किस कागज़ पर दस्तखत करवाए थे?
मैं दोपहर में वापस बंगले पहुँचा।
माँ हॉल में बैठी हिसाब की डायरी देख रही थीं। राकेश अखबार पढ़ रहा था और मीना सोफे पर बैठी टीवी देख रही थी।
मैंने मुख्य दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया।
— माँ, प्रिया को निकालने से तीन दिन पहले आपने उससे किस कागज़ पर दस्तखत लिए थे?
माँ के हाथ में पकड़ी कलम एक पल के लिए रुकी। फिर उन्होंने सहज होने का नाटक करते हुए पन्ना पलट दिया।
— कोई कागज़ नहीं था।
मीना उठी।
— भैया, आप उस चोर औरत की बातों में—
— तुम चुप रहो!
मैंने माँ की तरफ देखा।
— माँ, आखिरी बार पूछ रहा हूँ। सच बताइए।
माँ ने डायरी बंद की। उनकी आवाज़ में कड़वाहट आ गई।
— मुझे सफाई देने की जरूरत नहीं है। वह औरत चोर है और इस घर की चौखट दोबारा पार नहीं करेगी!
मैंने दीवार पर लगी तख्ती को देखा, जिस पर लिखा था—’लक्ष्मी निवास’।
मैंने गहरा सांस लिया और दरवाज़ा खोल दिया।
— ठीक है। कल सुबह प्रिया और आरव इसी घर में आएँगे।
मीना चिल्लाई—
— हम उन्हें अंदर नहीं आने देंगे!
मैंने पलटकर कहा—
— कल दरवाज़ा कौन खोलता है और कौन बाहर जाता है, यह सुबह देख लेंगे।
(भाग 1 समाप्त… असली खेल तो अगली सुबह शुरू होने वाला था, जिसकी सच्चाई मेरा पूरा वजूद हिलाने वाली थी…)
भाग 2
मैं बंगले से बाहर निकला तो मेरी टाँगें काँप रही थीं।
सात साल। पूरे सात साल मैंने अमेरिका की कड़कड़ाती ठंड में, डबल शिफ्ट में काम किया था। अपनी भूख मारी, अपने शौक मारे, हर महीने अपनी कमाई का नब्बे फीसदी हिस्सा माँ के बैंक खाते में भेजा।
मुझे लगता था कि मैं अपने परिवार के लिए एक महल बना रहा हूँ। लेकिन मुझे क्या पता था कि जिस महल की नींव में मेरा पसीना लगा था, उसी की छत के नीचे मेरी पत्नी और बेटे के लिए दो गज़ ज़मीन भी नहीं बची थी।
शाम के ढलते ही मैं वापस उस नाले किनारे बनी झुग्गी में पहुँच गया।
प्रिया चूल्हे पर एल्युमिनियम के एक काले पड़े बर्तन में चावल उबाल रही थी। आरव एक टूटी हुई चटाई पर बैठा अपनी पुरानी किताब के पन्ने चिपका रहा था।
मुझे झुग्गी के दरवाज़े पर खड़ा देखकर प्रिया चौंकी।
— तुम यहाँ क्यों आए हो? वापस बंगले पर जाओ।
मैंने अपना भारी सूटकेस झुग्गी के कोने में रख दिया और ज़मीन पर बैठ गया।
— जहाँ मेरी पत्नी और मेरा बेटा सोएंगे, आज रात मैं भी वहीं सोऊँगा।
प्रिया ने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन उसने अपना चेहरा चूल्हे के धुएँ की तरफ घुमा लिया।
आरव धीरे से चलकर मेरे पास आया। उसने अपनी छोटी-सी उँगली से मेरी शर्ट का बटन पकड़ा।
— पापा, क्या आप फिर से हमें छोड़कर चले जाओगे?
उस आठ साल के बच्चे का यह मासूम सवाल मेरे सीने में आर-पार हो गया। मैंने उसे खींचकर अपनी छाती से लगा लिया।
— कभी नहीं बेटा। अब तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।
रात के नौ बजे, जब आरव चटाई पर सो गया, तो झुग्गी में सिर्फ नाले के बहते पानी की आवाज़ और मोमबत्ती की फड़फड़ाहट बाकी रह गई।
मैंने संदूक की तरफ इशारा किया।
— प्रिया, अब मुझे बताओ। उस लिफ़ाफ़े में क्या है? और माँ ने किस कागज़ पर दस्तखत करवाए थे?
प्रिया ने संदूक खोला। उसने वह भूरा लिफ़ाफ़ा निकाला और मेरे हाथ में थमा दिया।
— तुम्हारे विदेश जाने के तीसरे साल में, तुम्हारे पिताजी के नाम की जो गाँव वाली पुरानी ज़मीन थी, उसका मुआवजा सरकार से मिलने वाला था। तुम्हारी माँ ने मुझसे कहा कि यह कागज़ सरकारी दफ़्तर में जमा होना है ताकि तुम्हारे और आरव के नाम पर फिक्स्ड डिपॉजिट हो सके।
— फिर?
— मैंने तुम्हारी माँ पर भरोसा किया। मैं अनपढ़ तो नहीं हूँ, लेकिन अपनों पर अंधा विश्वास करती थी। मैंने कागज़ों पर दस्तखत कर दिए। लेकिन दस्तखत करने के दो दिन बाद मुझे शक हुआ। मैंने शर्मा काकी के बेटे को बुलाकर उन कागज़ों की फोटोकॉपी दिखाई, जो मैंने चुपके से अपने पास रख ली थी।
मेरी उँगलियाँ लिफ़ाफ़ा खोलते हुए काँप रही थीं।
मैंने अंदर से कागज़ निकाले। मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में जब मैंने उन कानूनी पन्नों को पढ़ा, तो मेरा खून जम गया।
वह कोई फिक्स्ड डिपॉजिट का कागज़ नहीं था।
वह एक ‘हक़त्याग पत्र’ (Relinquishment Deed) था। उस कागज़ के मुताबिक, प्रिया ने अपने और आरव के नाम पर मौजूद पुश्तैनी ज़मीन का सारा हक अपने जेठ यानी मेरे बड़े भाई राकेश के नाम ट्रांसफर कर दिया था!
इतना ही नहीं, उस दस्तावेज़ में एक शर्त यह भी लिखी थी कि इस ज़मीन पर बनने वाले नए बंगले यानी ‘लक्ष्मी निवास’ का मालिक भी राकेश और उसकी पत्नी मीना ही होंगे!
मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया।
— यह… यह तो सरासर धोखा है प्रिया!
— धोखा सिर्फ यही नहीं है विक्रम।
प्रिया की आवाज़ एकदम शांत थी, लेकिन उस शांति में सालों का दर्द छुपा था।
— जब उन्हें मुझसे दस्तखत मिल गए, तो उन्हें समझ आ गया कि तुम्हारे लौटने पर सच सामने आ जाएगा। इसलिए उन्होंने चाल चली। भाभी ने अपने दो लाख रुपये गायब होने का नाटक किया। उन्होंने मुझ पर चोरी का इल्जाम लगाया ताकि गाँव वालों की नज़र में मैं गुनहगार बन जाऊँ। उन्होंने सोचा कि जब तुम वापस आओगे, तो वे तुमसे कहेंगे कि तुम्हारी पत्नी चोर थी, इसलिए उसे घर से निकाल दिया।
मैंने लिफ़ाफ़े के अंदर से कुछ और कागज़ निकाले। वहाँ बैंक के पासबुक की फोटोकॉपियाँ भी थीं।
— यह सब तुम्हारे पास कहाँ से आया?
— जिस दिन उन्होंने मुझे घर से निकाला, मैं सीधे पुलिस स्टेशन या वकील के पास नहीं गई। मैं जानती थी कि तुम्हारे बिना मेरी बात कोई नहीं सुनेगा। शर्मा काकी के बेटे की मदद से मैंने तहसील दफ़्तर में एक शिकायत दर्ज कराई। मैंने उस हक़त्याग पत्र पर रोक (Stay Order) लगवाई।
प्रिया ने मेरी आँखों में देखा।
— विक्रम, तुम्हारी माँ और भाई ने सिर्फ तुम्हारा पैसा नहीं छीना, उन्होंने तुम्हारा वजूद छीन लिया। जो बंगला खड़ा है, उसकी रजिस्ट्री में तुम्हारा नाम कहीं नहीं है। सब कुछ राकेश के नाम पर है।
मैं सन्न रह गया।
सात साल तक मैं दिन-रात अमेरिका में पसीना बहाता रहा। मैंने अपने स्वास्थ्य की परवाह नहीं की। हर महीने जो लाखों रुपये भेजे, माँ ने वे सारे पैसे राकेश के खाते में ट्रांसफर किए और घर की रजिस्ट्री राकेश के नाम करवा दी!
मेरी माँ… जिन्हें मैं भगवान की तरह पूजता था, उन्होंने मेरे ही परिवार की बलि चढ़ा दी ताकि अपने बड़े बेटे का भविष्य संवार सकें।
मेरी छाती में एक अजीब-सी घुटन होने लगी। रोना आ रहा था, लेकिन आँखों से आँसू नहीं निकल रहे थे। सिर्फ एक आग जल रही थी।
— प्रिया, तुमने मुझे फोन पर यह सब क्यों नहीं बताया?
— मैं कैसे बताती विक्रम? जब भी मैं किसी के फोन से तुम्हें मिलाती, तुम्हारी माँ फोन काट देती थीं। उन्होंने गाँव में यह अफवाह फैला दी थी कि मैं किसी और के साथ भाग गई हूँ। अगर शर्मा काकी ना होतीं, तो शायद मैं आरव को लेकर किसी ट्रेन के आगे कूद गई होती…
प्रिया की आवाज़ टूट गई। वह घुटनों में सिर छिपाकर रोने लगी।
मैंने उसके काँपते कंधों को पकड़ा।
— नहीं प्रिया। अब रोने की बारी हमारी नहीं है।
मैंने घड़ी देखी। रात के बारह बज रहे थे।
मैंने अपने फोन से जयपुर के एक नामी वकील को फोन लगाया, जो मेरे पुराने दोस्त का भाई था। मैंने उसे पूरी बात बताई और सारे दस्तावेज़ों की तस्वीरें वॉट्सऐप कीं।
वकील ने कागज़ देखने के बाद कहा—
— विक्रम, तुम्हारे पास विदेश से भेजे गए पैसों की सारी बैंक स्टेटमेंट्स हैं?
— हाँ, मेरे पास मेरे अमेरिकी बैंक खाते का ऑनलाइन एक्सेस है। हर ट्रांसफर का रिकॉर्ड है।
— तो सुनो। हक़त्याग पत्र में एक बहुत बड़ी कानूनी खामी है। प्रिया ने दस्तखत के साथ-साथ अपनी उँगली का जो निशान लगाया था, वह तहसील के रिकॉर्ड से मैच नहीं कर रहा क्योंकि उस कागज़ पर गवाह के तौर पर सिर्फ राकेश के आदमियों के दस्तखत हैं। यह सीधा-सीधा धोखाधड़ी और जालसाज़ी का मामला है। सुबह नौ बजे मैं पुलिस और तहसील अधिकारी के साथ तुम्हारे बंगले पर पहुँच रहा हूँ।
मैंने फोन रखा।
मेरी पूरी रात जागते हुए बीती। मैं अपनी ज़िंदगी के उन सात सालों को याद करता रहा जो मैंने गँवा दिए थे।
सुबह के सात बजे।
सूरज की पहली किरण नाले के गंदे पानी पर पड़ी। मैंने आरव को उठाया। उसके मुँह पर पानी के छींटे मारे।
— चलो बेटा।
प्रिया ने झिझकते हुए पूछा—
— हम कहाँ जा रहे हैं?
— अपने हक की लड़ाई लड़ने।
हम तीनों झुग्गी से निकले। गाँव के लोग सुबह-सुबह नल से पानी भर रहे थे। जब उन्होंने मुझे, प्रिया और आरव को एक साथ बंगले की तरफ पैदल चलते देखा, तो फुसफुसाहट शुरू हो गई।
दस मिनट में हम बंगले के लोहे के बड़े फाटक के सामने खड़े थे।
गाँव के दर्जनों लोग हमारे पीछे जमा हो चुके थे। शर्मा काकी भी वहीं खड़ी थीं।
मैंने फाटक को ज़ोर से खटखटाया।
अंदर से राकेश बाहर आया। उसके पीछे मीना और माँ भी थीं।
जब उन्होंने देखा कि बाहर पूरा गाँव जमा है और मैं प्रिया और आरव का हाथ पकड़कर खड़ा हूँ, तो राकेश का चेहरा पीला पड़ गया।
मीना ने आगे आकर चिल्लाना शुरू किया—
— विक्रम! तुम इस चोर औरत को लेकर यहाँ क्यों आए हो? हमने कल रात ही कह दिया था कि यह इस घर में कदम नहीं रखेगी!
मैंने अपनी आवाज़ को एकदम शांत रखा।
— यह घर मेरा है भाभी।
माँ ने कड़ककर कहा—
— यह घर तेरा नहीं है विक्रम! यह घर मेरे बड़े बेटे राकेश का है। कागज़ात देख ले जाकर। तूने सिर्फ पैसे भेजे थे, घर हमने बनाया है।
गाँव के लोग आपस में बातें करने लगे।
माँ को लगा कि वह जीत रही हैं। उन्होंने अपनी छाती पर हाथ रखा और दुहाई देने लगीं—
— देखो गाँव वालों! सात साल विदेश क्या रह आया, अपनी बूढ़ी माँ को आँखें दिखा रहा है। इस कुलटा औरत के बहकावे में आकर अपनी माँ और भाई पर शक कर रहा है!
तभी सड़क पर दो गाड़ियाँ आकर रुकीं।
एक गाड़ी से जयपुर के तहसीलदार और पुलिस सब-इंस्पेक्टर उतरे। दूसरी गाड़ी से मेरा वकील उतरा।
पुलिस को देखकर राकेश के माथे पर पसीना आ गया।
वकील ने सीधे आगे बढ़कर तहसीलदार के दस्तखत वाला एक नोटिस निकाला और माँ के हाथ में थमा दिया।
— श्रीमती सावित्री देवी, आपके बड़े बेटे राकेश के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाज़ी और ज़मीन के कागज़ात में हेरफेर करने का मामला दर्ज किया गया है।
मीना घबरा गई।
— कैसा मामला? कैसा फ्रॉड? यह घर हमारा है!
वकील ने एक मोटी फाइल खोली।
— यह विक्रम के अमेरिकी बैंक खाते की पिछले सात साल की स्टेटमेंट है। इसमें साफ दिख रहा है कि इस बंगले को बनाने के लिए 85 लाख रुपये विक्रम के खाते से सावित्री देवी के खाते में ट्रांसफर हुए। और उसी दिन सावित्री देवी के खाते से यह पैसा राकेश के खाते में भेजा गया।
वकील ने गाँव वालों की तरफ मुड़कर कहा—
— कानून की नज़र में, बेनामी संपत्ति अधिनियम के तहत, अगर पैसा एक इंसान का लगा है और संपत्ति दूसरे के नाम पर धोखे से करवाई गई है, तो वह सीधा-सीधा वित्तीय अपराध (Financial Fraud) है।
राकेश काँपने लगा।
— विक्रम… तू अपने भाई को पुलिस से पकड़वाएगा?
मैंने अपने भाई की आँखों में देखा। उन आँखों में कोई पछतावा नहीं था, सिर्फ पकड़े जाने का डर था।
— राकेश, तुमने मेरी गैरमौजूदगी में मेरी पत्नी को भूखा मारा। मेरे आठ साल के बच्चे को नाले किनारे झुग्गी में सोने पर मजबूर किया। उस वक्त तुम्हें याद नहीं आया कि मैं तुम्हारा भाई हूँ?
माँ ने आगे आकर मेरा हाथ पकड़ना चाहा।
— विक्रम! मेरी बात सुन बेटा! मैंने जो किया तेरे भले के लिए किया। यह औरत…
मैंने माँ का हाथ बहुत आदर से, लेकिन मजबूती से पीछे हटा दिया।
— माँ, आपने मुझे जन्म दिया है, मैं आपकी इस बात का ताउम्र अहसान मानूँगा। लेकिन आपने उस औरत का जीवन नरक बना दिया जो अपना सब कुछ छोड़कर मेरे भरोसे इस घर में आई थी। आपने मेरे बेटे के मुँह से निवाला छीना है।
तहसीलदार ने राकेश से कहा—
— आपके पास दो ही रास्ते हैं। या तो आप अभी इस संपत्ति का मालिकाना हक विक्रम और उसकी पत्नी प्रिया के नाम ट्रांसफर करने के दस्तावेज़ों पर दस्तखत करें, वरना आपको और आपकी पत्नी को धोखाधड़ी के जुर्म में अभी जेल जाना होगा।
मीना रोने लगी। उसने तुरंत राकेश का बाज़ू पकड़ा।
— दस्तखत कर दो! मुझे जेल नहीं जाना!
राकेश ने काँपते हाथों से पुलिस के सामने स्टाम्प पेपर पर दस्तखत कर दिए।
बंगले की चाबियाँ तहसीलदार ने मेरे हाथ में दीं।
गाँव वाले तालियाँ बजाने लगे। शर्मा काकी की आँखों में खुशी के आँसू थे।
माँ ज़मीन पर बैठ गई। मीना और राकेश अपना सामान समेटने के लिए अंदर भागे।
सबको लगा कि कहानी खत्म हो गई। सबको लगा कि अब मैं उस आलीशान बंगले में अपनी पत्नी और बच्चे के साथ आराम से रहूँगा।
लेकिन मैंने जो किया, उसने वहाँ खड़े हर इंसान को सन्न कर दिया।
मैंने बंगले की चाबियाँ लीं और उन्हें शर्मा काकी के हाथ में रख दिया।
प्रिया ने हैरान होकर मुझे देखा।
— विक्रम? यह क्या कर रहे हो?
मैंने प्रिया का हाथ थामा और आरव को अपनी गोद में उठा लिया।
— प्रिया, जिस मकान की नींव अपनों के धोखे, झूठ और तुम्हारी बेबसी के आँसुओं पर रखी गई हो, मैं उस मकान में एक दिन भी नहीं रह सकता। यह बंगला अब गाँव के अनाथ बच्चों और बेसहारा औरतों के लिए एक आश्रम बनेगा। शर्मा काकी इसकी देखरेख करेंगी।
मैंने अपने भाई और माँ की तरफ देखा।
— माँ, इस बंगले का एक-एक कमरा आपकी लालच की गवाही देता है। आप इसमें रहिए या जहाँ जाना है जाइए। लेकिन मेरा कमाया हुआ एक भी रुपया अब इस घर में नहीं आएगा।
मैंने अपना सूटकेस उठाया।
प्रिया ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब कोई दर्द नहीं था। सिर्फ एक गहरा मान और भरोसा था।
— हम कहाँ जाएँगे विक्रम?
मैंने मुस्कुराकर आरव के सिर पर हाथ फेरा।
— शहर चलेंगे प्रिया। छोटा-सा किराया का मकान लेंगे। मैं अपनी मेहनत से दोबारा शुरुआत करूँगा। जहाँ सच होगा, जहाँ तुम होगी और जहाँ आरव की मुस्कान होगी… वही मेरा असली घर होगा।
हम तीनों गाँव की कच्ची सड़क पर आगे बढ़ गए।
पीछे वह दो मंजिला ‘लक्ष्मी निवास’ खड़ा था, जो अब एक खाली, बेजान ढाँचे से ज़्यादा कुछ नहीं था। और सामने हमारी नई ज़िंदगी का रास्ता था, जो भले ही कठिन था, लेकिन उस पर छल-कपट का कोई साया नहीं था।
