मेरे पिता ने कोमा में पड़े एक अरबपति से मेरी शादी करा दी—फिर मेरी आवाज़ सुनते ही उसने अपनी आँखें खोल लीं।//

मेरे पिता ने मेरी शादी कोमा में पड़े अरबपति से कर दी—फिर मेरी आवाज़ सुनते ही उसने आँखें खोल दीं!

जिस दिन मेरे पिता ने मुझे एक सौदे की तरह शादी के लिए सौंप दिया, उस दिन मैं एक ऐसे अरबपति के पास खड़ी थी जिसने नौ महीने से एक शब्द भी नहीं बोला था।

सब कहते थे कि वह मेरी आवाज़ नहीं सुन सकता।

सब कहते थे कि वह कभी होश में नहीं आएगा।

लेकिन जिस रात मैं पहली बार उसके साथ अकेली हुई और मैंने उससे दिल की बात कही, तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

और उस हवेली में मौजूद हर इंसान घबरा उठने वाला था।

दिल्ली की उस आलीशान हवेली के पूजा-मंडप में सुबह-सुबह गेंदे और चमेली के फूलों की खुशबू फैली हुई थी।

महंगे इत्र की खुशबू और फूलों की महक के बीच मैं लाल रंग की उधार ली हुई शादी की साड़ी में खड़ी थी।

मेरे सामने मेरा होने वाला पति व्हीलचेयर पर बैठा था।

अर्जुन मल्होत्रा।

मल्होत्रा साम्राज्य का अरबपति वारिस।

उसके काले बाल करीने से संवारे गए थे।

उसके हाथ उसकी गोद में बिल्कुल स्थिर पड़े थे।

उसके पीछे एक नर्स खड़ी थी, जैसे उसके लिए सांस लेना भी किसी निगरानी का हिस्सा हो।

उसने मेरी तरफ नहीं देखा।

न कोई प्रतिक्रिया।

न कोई हरकत।

क्योंकि अर्जुन मल्होत्रा पिछले नौ महीनों से कोमा में था।

मेरे पिता ने मेरे कान के पास झुककर फुसफुसाया,

“बोलो।”

मेरा गला सूख गया।

मैंने अर्जुन की तरफ देखा।

फिर बहुत धीमी आवाज़ में कहा,

“मैं… स्वीकार करती हूँ।”

उन शब्दों ने मुझे शादी से ज्यादा किसी जेल की सजा जैसे महसूस कराए।

पंडित ने मुस्कुराकर मंत्र पढ़े।

मेहमानों ने औपचारिक तालियाँ बजाईं।

और उसी क्षण मैं श्रीमती अर्जुन मल्होत्रा बन गई।

किसी ने दूल्हे को वरमाला के बाद गले नहीं लगाया।

कोई उसे चूम भी नहीं सकता था।

क्योंकि वह होश में ही नहीं था।

शादी खत्म होते ही अर्जुन को व्हीलचेयर पर बाहर ले जाया गया।

मैं मंडप के नीचे खड़ी रही और सोचती रही कि मेरी जिंदगी आखिर कब एक कारोबारी सौदे में बदल गई।

बाहर निकलते ही मेरे पिता मेरे पास आए।

“तुमने बिल्कुल सही किया।”

मैं कड़वाहट से हँसी।

“मतलब एक ऐसे आदमी से शादी करके जो अपनी मर्जी बता भी नहीं सकता?”

मेरे पिता का चेहरा सख्त हो गया।

“इससे हमारा परिवार बच जाएगा।”

हमारा परिवार।

जब भी मेरे पिता को मुझसे कुछ करवाना होता था, वह यही शब्द इस्तेमाल करते थे।

तीन हफ्ते पहले उन्होंने मुझे दिल्ली के हमारे छोटे से किराए के घर में बैठाकर यह पूरा सौदा समझाया था।

मल्होत्रा परिवार की ट्रस्ट की शर्त थी कि अर्जुन को अपने तीसवें जन्मदिन से पहले शादी करनी होगी।

अगर ऐसा नहीं हुआ, तो कंपनी का नियंत्रण उसके चचेरे भाई को मिल सकता था।

और अगर मैं अर्जुन से शादी कर लेती…

तो हमारे सारे कर्ज खत्म हो जाते।

बैंक का कर्ज।

घर का किराया।

मां के इलाज के पुराने बिल।

हर उधारी।

सब खत्म।

मैंने उस दिन पूछा था,

“आप चाहते हैं कि मैं कोमा में पड़े एक अजनबी से शादी कर लूं?”

मेरे पिता ने सिर झुका लिया था।

“मैं चाहता हूँ कि मेरी गलतियों की कीमत तुम मत चुकाओ।”

उस समय मुझे उन पर विश्वास था।

लेकिन अब…

दिल्ली के बाहरी इलाके में यमुना के किनारे बनी मल्होत्रा हवेली के सामने खड़ी होकर मुझे यकीन नहीं था कि उन्होंने मुझे बचाया था या किसी और जाल में धकेल दिया था।

हवेली घर कम और किसी साम्राज्य का किला ज्यादा लग रही थी।

ऊंचे लोहे के गेट।

संगमरमर की सीढ़ियां।

क्रिस्टल के झूमर।

लंबे गलियारे।

हर चीज मुझे बता रही थी कि मैं यहां की नहीं हूँ।

हवेली में मेरा स्वागत करने वाला पहला व्यक्ति अर्जुन का चचेरा भाई करण मल्होत्रा था।

वह संगमरमर के खंभे से टिककर खड़ा था और मुझे ऐसे देख रहा था जैसे मैं कोई नई खरीदी हुई चीज हूँ।

“तो तुम ही दुल्हन हो।”

उसकी नजरों में कुछ ऐसा था जिससे मेरी त्वचा सिहर गई।

तभी पीछे से एक ठंडी आवाज आई।

“अगर देखना खत्म हो गया हो तो रास्ते से हटो।”

सीढ़ियों से एक बुजुर्ग महिला नीचे उतर रही थीं।

सफेद रेशमी साड़ी।

मोती की माला।

कठोर चेहरा।

वह थीं—

सावित्री मल्होत्रा।

अर्जुन की दादी।

मल्होत्रा साम्राज्य की असली मुखिया।

उन्होंने मुझे सिर से पैर तक देखा।

“ठीक है।”

मैं समझ नहीं पाई कि यह मंजूरी थी या चेतावनी।

उन्होंने मुड़कर कहा,

“चलो। तुम्हें अपने पति से ठीक से मिलवाती हूँ।”

अर्जुन का कमरा देखकर मैं हैरान रह गई।

मुझे अस्पताल जैसा अंधेरा कमरा देखने की उम्मीद थी।

लेकिन वहां बड़ी-बड़ी खिड़कियों से सुबह की रोशनी भीतर आ रही थी।

खिड़की के बाहर यमुना चमक रही थी।

बिस्तर के पास ताजे फूल रखे थे।

धीमी शास्त्रीय संगीत की धुन चल रही थी।

कमरा जीवंत लग रहा था।

सिर्फ अर्जुन नहीं।

वह सफेद तकियों पर बिल्कुल स्थिर लेटा था।

सावित्री ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हारी पत्नी आ गई है,” उन्होंने ठंडी आवाज में कहा। “अब कम से कम हमें शर्मिंदा मत करना।”

कोई जवाब नहीं आया।

वह चली गईं।

मैं पहली बार अर्जुन के साथ अकेली रह गई।

कुछ मिनट तक मैं कुछ नहीं बोली।

फिर हल्की हँसी मेरे होंठों से निकल गई।

“तकनीकी रूप से… हम दोनों में से सिर्फ एक ही हिल नहीं रहा।”

कोई प्रतिक्रिया नहीं।

मैं बिस्तर के पास बैठ गई।

“मुझे नहीं पता कि तुम मेरी आवाज सुन सकते हो या नहीं।”

कुछ नहीं।

“मुझे यह भी नहीं पता कि मैं तुमसे बात क्यों कर रही हूँ।”

मॉनिटर की आवाज लगातार चलती रही।

मैंने गहरी सांस ली।

“मेरी मां की मौत दो साल पहले हुई थी।”

मेरी आवाज टूट गई।

“और सच कहूं तो… मुझे लगता है उन्हें यह शादी बिल्कुल पसंद नहीं आती।”

मेरी आंखों में आंसू भर आए।

“मैं यह शादी नहीं करना चाहती थी।”

मैंने उसकी तरफ देखा।

“लेकिन मुझे नहीं पता था कि अपने परिवार को कैसे बचाऊं।”

कमरे में खामोशी बनी रही।

फिर…

मैंने कुछ महसूस किया।

बहुत हल्की सी हरकत।

मैं जम गई।

धीरे से मैंने अर्जुन के हाथ की तरफ देखा।

उसकी एक उंगली हिली थी।

मेरी सांस रुक गई।

मैं इंतजार करती रही।

फिर उसकी पलकों में कंपन हुआ।

और नौ महीनों में पहली बार…

अर्जुन मल्होत्रा की आंखें खुलने लगीं।

उसकी पलकें कांप रही थीं, जैसे उन्हें खोलने में उसकी बची हुई सारी ताकत लग रही हो।

मैंने सांस रोक ली।

एक पल के लिए मुझे लगा कि शायद थकान, डर और तनाव ने मिलकर मेरे दिमाग को भ्रम दिखा दिया है।

फिर उसकी आंखें खुल गईं।

वे धूसर थीं।

लेकिन उनमें बेहोशी नहीं थी।

उनमें दर्द था।

भ्रम था।

और फिर…

उसकी नजर धीरे-धीरे छत से खिड़की तक गई।

फिर मेरी तरफ आकर रुक गई।

मेरी कुर्सी फर्श पर घिसट गई।

“अर्जुन?”

उसकी नजर मेरे चेहरे पर टिक गई।

मैं डॉक्टर को बुलाने के लिए मुड़ने ही वाली थी कि उसके होंठ हिले।

कोई आवाज नहीं निकली।

उसने दोबारा कोशिश की।

इस बार सिर्फ हल्की सी सांस बाहर आई।

मैंने बेडसाइड टेबल पर रखा पानी उठाने की कोशिश की, फिर रुक गई।

मुझे नहीं पता था कि उसे पानी पीने की अनुमति है या नहीं।

मैं नहीं जानती थी कि उसे हिलाने से उसकी हालत खराब हो सकती है।

“मैं किसी को बुलाती हूँ।”

तभी उसकी उंगलियां कंबल पर हिलीं।

हरकत कमजोर थी।

लेकिन जानबूझकर थी।

अचानक उसका हाथ मेरी कलाई के चारों ओर बंद हो गया।

मैंने नीचे देखा।

उसकी पकड़ किसी बच्चे के हाथ से ज्यादा मजबूत नहीं थी।

लेकिन उसने मुझे रोक दिया।

अर्जुन ने मेरी तरफ देखा।

उसकी आंखों में अचानक घबराहट थी।

“मत…”

आवाज इतनी धीमी थी कि मुझे लगा मैंने शायद गलत सुना।

मैं उसके और करीब झुकी।

“क्या?”

उसका गला दर्द से हिला।

“डॉक्टर… मत… बुलाओ।”

मॉनिटर तेजी से बीप करने लगा।

मेरे अंदर डर दौड़ गया।

“तुम्हें डॉक्टर चाहिए।”

उसकी उंगलियां थोड़ी और कस गईं।

उसकी आंखें दरवाजे की तरफ गईं।

फिर मेरी तरफ।

“अभी नहीं।”

उसकी आंखों में ऐसा डर था कि कमरे का तापमान जैसे अचानक गिर गया।

यह भ्रम नहीं था।

यह डर था।

तभी दरवाजा खुल गया।

नर्स दवाइयों की ट्रे लेकर अंदर आई।

उसने मुझे देखा।

फिर बिस्तर की तरफ देखा।

उसके हाथ से ट्रे गिर गई।

कांच की एक शीशी फर्श पर गिरी और कुर्सी के नीचे लुढ़क गई।

“मिस्टर मल्होत्रा?”

अर्जुन की उंगलियां मेरी कलाई से छूट गईं।

उसकी आंखें बंद हो गईं।

नर्स तेजी से उसके पास पहुंची।

उसने मॉनिटर देखा, उसकी गर्दन छुई और फिर उसकी एक पलक उठाई।

“मिस्टर मल्होत्रा, क्या आप मेरी आवाज सुन सकते हैं?”

कोई जवाब नहीं।

वह फिर बिल्कुल शांत हो गया था।

लेकिन मैं जानती थी कि मैंने क्या देखा था।

और मैं जानती थी कि मैंने क्या सुना था।

नर्स ने तुरंत कॉल बटन दबाया।

कुछ ही मिनटों में शांत कमरा डॉक्टरों और मेडिकल उपकरणों की आवाजों से भर गया।

दो डॉक्टर पहुंचे।

एक दूसरी नर्स मशीनें लेकर आई।

मुझे दीवार की तरफ कर दिया गया।

“आवाज पर प्रतिक्रिया।”

“जानबूझकर की गई हरकत संभव है।”

“हृदय गति बढ़ी हुई है।”

“पुतलियों की प्रतिक्रिया सामान्य है।”

एक डॉक्टर मेरी तरफ मुड़ा।

“क्या हुआ?”

मैंने मुंह खोला।

फिर मुझे अर्जुन का चेहरा याद आया।

डॉक्टर मत बुलाओ।

अभी नहीं।

मैंने सावधानी से कहा,

“उसने आंखें खोली थीं। उसने मेरी तरफ देखा।”

“क्या उसने कुछ कहा?”

सवाल हवा में लटक गया।

मैंने अर्जुन की तरफ देखा।

उसका चेहरा फिर शांत था।

बहुत शांत।

“नहीं,” मैंने झूठ बोला। “मुझे नहीं लगता।”

डॉक्टर ने मुझे कुछ सेकंड देखा।

फिर पूछा,

“उसके होश में आने से ठीक पहले आप क्या कर रही थीं?”

“उससे बात।”

“किस बारे में?”

“मेरी मां। मेरी शादी। मेरा परिवार।”

“क्या आपने उसे छुआ था?”

“मैंने उसका हाथ पकड़ा था।”

डॉक्टर ने नर्स की तरफ देखा।

“सब कुछ दर्ज करो। अतिरिक्त स्कैन करवाओ।”

उसी समय दरवाजा फिर खुला।

सावित्री मल्होत्रा सबसे पहले अंदर आईं।

करण उनके पीछे था।

जैसे ही सावित्री ने डॉक्टरों को अर्जुन के आसपास देखा, उनके चेहरे की सारी कठोरता गायब हो गई।

उसकी जगह ऐसी उम्मीद आ गई जिसे देखकर मुझे पहली बार लगा कि शायद वह अर्जुन से सच में प्यार करती हैं।

“क्या हुआ?”

नर्स पीछे हटी।

“मिस्टर मल्होत्रा में चेतना के संकेत मिले हैं।”

सावित्री ने कुर्सी पकड़ ली।

“क्या वह जागा?”

“कुछ क्षण के लिए।”

“क्या उसने बात की?”

डॉक्टर ने मेरी तरफ देखा।

“श्रीमती मल्होत्रा कह रही हैं कि उसने बात नहीं की।”

करण की नजर मेरे चेहरे पर गई।

वह मुस्कुराया।

लेकिन उसकी मुस्कान में जरा भी गर्माहट नहीं थी।

“क्या शानदार संयोग है।”

मैंने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“नौ महीने तक कोई प्रतिक्रिया नहीं।”

उसने अर्जुन की तरफ देखा।

“और जिस दिन उसकी शादी होती है, उसी दिन वह आंखें खोल देता है।”

सावित्री ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

“अभी नहीं, करण।”

“मैं सिर्फ कह रहा हूं कि समय काफी दिलचस्प है।”

“तुम्हारा भाई होश में आ रहा है।”

“और मैं बहुत खुश हूं।”

उसका स्वर कुछ और कह रहा था।

डॉक्टर अर्जुन को हवेली के निचले हिस्से में बने निजी मेडिकल सेंटर में ले जाने लगे।

जब वे उसे मेरे पास से लेकर गुजरे, मैंने उसकी बंद पलकों के नीचे हल्की सी हरकत देखी।

वह अभी भी जाग रहा था।

वह अभी भी सुन रहा था।

सावित्री लिफ्ट के दरवाजे बंद होने तक उसे देखती रहीं।

फिर मेरी तरफ मुड़ीं।

“तुमने उससे ठीक-ठीक क्या कहा?”

मैंने डॉक्टर को बताई सारी बातें दोहराईं।

उन्होंने मेरी आंखों में देखा।

“और उसके बाद?”

“उसकी उंगली हिली।”

“और कुछ?”

मैं चुप हो गई।

करण ने तुरंत मेरी झिझक देख ली।

“तुम हमसे क्या छिपा रही हो?”

“बस करो,” सावित्री बोलीं।

“मैं सामान्य सवाल पूछ रहा हूं।”

“तुम बहुत कम सामान्य सवाल पूछते हो।”

करण का चेहरा तन गया।

वह जेब में हाथ डालकर वहां से चला गया।

कुछ देर तक सावित्री और मैं अकेले खड़े रहे।

फिर उन्होंने धीमी आवाज में कहा,

“मेरे पोते को पहले हफ्ते में ही मर जाना चाहिए था।”

मैंने उनकी तरफ देखा।

“डॉक्टरों ने हमें मानसिक रूप से तैयार रहने को कहा था। लेकिन अर्जुन हमेशा से जिद्दी रहा है।”

उन्होंने लिफ्ट की तरफ देखा।

“महीने गुजरते गए। फिर भी वह नहीं गया।”

उनकी आवाज नरम हो गई।

“शायद तुम पहली नई वजह हो जिसके लिए उसने वापस आने का फैसला किया।”

मैं असहज हो गई।

“मैंने कुछ नहीं किया।”

“तुमने उससे बात की।”

“दूसरे लोगों ने भी उससे बात की है।”

“लेकिन ईमानदारी से नहीं।”

उन्होंने मेरी तरफ देखा।

“इस घर में ईमानदारी वफादारी से भी दुर्लभ है।”

फिर वह चली गईं।

उस शाम पूरी हवेली का माहौल बदल गया।

नौकर बंद दरवाजों के पीछे फुसफुसा रहे थे।

फोन लगातार बज रहे थे।

लाइब्रेरी में बैठकें चल रही थीं।

दिल्ली के एक बड़े न्यूरोलॉजिस्ट को तुरंत बुलाया गया।

ऐसा लग रहा था जैसे पूरी हवेली महीनों से अर्जुन की एक हरकत का इंतजार कर रही थी।

मुझे अर्जुन के कमरे के सामने वाला कमरा दिया गया।

वह कमरा मेरे पिता के पूरे किराए के घर से बड़ा था।

मेरी छोटी सी अटैची विशाल अलमारी के सामने मजाक जैसी लग रही थी।

अलमारी खोली तो उसमें मेरी पसंद और मेरे नाप के कपड़े पहले से रखे थे।

मैंने एक गहरे नीले रंग की साड़ी की आस्तीन छुई।

किसी ने मेरे यहां आने से पहले ही मेरे लिए कपड़े चुन रखे थे।

यह विचार मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

मैंने दरवाजा खोला।

मेरे पिता बाहर खड़े थे।

कुछ क्षणों के लिए उनके चेहरे पर राहत दिखाई दी।

फिर वह कमरे में आए और दरवाजा बंद कर दिया।

“मुझे पता चला।”

“कि अर्जुन जागा?”

उन्होंने सिर हिलाया।

“उसने क्या कहा?”

सवाल बहुत जल्दी आया।

मैंने उन्हें देखा।

“डॉक्टरों ने कहा कि उसने कुछ नहीं कहा।”

“मैंने पूछा उसने तुमसे क्या कहा।”

“उसने कुछ नहीं कहा।”

मेरे पिता मेरे चेहरे को उसी तरह पढ़ने लगे जैसे वह कभी कर्ज वसूलने वाले लोगों के सामने अपने झूठ का असर जांचते थे।

“तुम झूठ बोल रही हो।”

मेरे भीतर गुस्सा भर गया।

“आज सुबह आपने मेरी शादी एक अजनबी से कर दी और अब मुझ पर झूठ बोलने का आरोप लगा रहे हैं?”

“मैं तुम्हें बचाने की कोशिश कर रहा हूं।”

“किससे?”

उन्होंने आवाज धीमी की।

“यह परिवार वैसा नहीं है जैसा दिखाई देता है।”

मैं कड़वाहट से हँसी।

“और यह बात आपको उनका पैसा लेने से पहले पता चली थी या बाद में?”

उनका चेहरा कस गया।

“यह समझौता आसान होना था।”

“इसमें कुछ भी आसान नहीं है।”

“ट्रस्ट का हस्तांतरण होने तक तुम शादीशुदा रहोगी। तुम्हारे सारे कर्ज खत्म होंगे। तुम्हें आर्थिक सुरक्षा मिलेगी। अर्जुन इलाज में रहेगा।”

“आप उसके बारे में ऐसे बात कर रहे हैं जैसे वह कोई कागज हो।”

मेरे पिता ने नजरें फेर लीं।

“मल्होत्रा परिवार ने मुझे यही समझाया था।”

“और अब वह जाग सकता है।”

“हां।”

उस एक शब्द में खुशी से ज्यादा डर था।

मैंने बाहें बांध लीं।

“आपको डर क्यों लग रहा है?”

“नहीं लग रहा।”

“आपने यह भी नहीं पूछा कि वह ठीक है या नहीं। आपने सबसे पहले पूछा कि उसने मुझसे क्या कहा।”

मेरे पिता खिड़की के पास चले गए।

बाहर शाम की रोशनी यमुना पर फैल रही थी।

उन्होंने कहा,

“मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि ताकतवर परिवार अपने लोगों को बचाने के लिए किसी को भी कुर्बान कर सकते हैं।”

“आप मुझसे क्या छिपा रहे हैं?”

उन्होंने जवाब नहीं दिया।

“पापा।”

उनके कंधे झुक गए।

“कई साल पहले मैंने मल्होत्रा समूह की एक कंपनी के लिए अकाउंटिंग का काम किया था।”

मैं चौंक गई।

“आपने मुझे कभी नहीं बताया।”

“यह जरूरी नहीं था।”

“अब है।”

“वह सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट का काम था।”

“क्या आप अर्जुन को जानते थे?”

“नहीं।”

जवाब तुरंत आया।

बहुत तुरंत।

“क्या हुआ था?”

“कुछ नहीं।”

“आपका कारोबार डूब गया। हमारा घर चला गया। मां अपनी जिंदगी के आखिरी साल में पैसों की चिंता करती रहीं। और अब वही परिवार, जिसके लिए आपने कभी काम किया था, अचानक हमारे सारे कर्ज खत्म करने को तैयार है—सिर्फ इसलिए कि मैं उनके बेहोश वारिस से शादी करूं।”

मेरे पिता मेरी तरफ मुड़े।

“प्रस्ताव एक वकील के जरिए आया था।”

“यह जवाब नहीं है।”

“मेरे पास यही जवाब है।”

कुछ पल हम एक-दूसरे को देखते रहे।

मैं अपने पिता से प्यार करती थी।

इसीलिए उनके झूठ ज्यादा दर्द दे रहे थे।

बचपन में उन्होंने मुझे साइकिल चलाना सिखाया था।

जब मैं गिरती थी तो वह मेरे पीछे दौड़ते थे।

वह हर रविवार नाश्ता बनाने की कोशिश करते और हर बार पराठे जला देते।

मां के बीमार होने के बाद उन्होंने अस्पताल की कुर्सियों पर रातें गुजारी थीं।

लेकिन दुख ने उन्हें बदल दिया था।

या शायद दुख ने सिर्फ उनके अंदर छिपे उस इंसान को सामने ला दिया था जिसे मैं देखने से बचती रही थी।

“आप घर जाइए,” मैंने कहा।

उनका चेहरा कठोर हो गया।

“यह तुम्हारा घर नहीं है।”

मैंने दरवाजा खोलते हुए कहा,

“नहीं। लेकिन आपने यह जरूर सुनिश्चित कर दिया कि मैं अपने घर वापस भी न जा सकूं।”

वह कुछ क्षण चुप रहे।

फिर बोले,

“इस घर में जो दिखे, उस पर तुरंत विश्वास मत करना।”

मैं लगभग हँस पड़ी।

“अभी तो मुझे किसी पर भी विश्वास नहीं है।”

वह चले गए।

मैंने अपनी शादी की अंगूठी देखी।

साधारण प्लैटिनम की पतली अंगूठी।

कुछ छोटे हीरे।

सुंदर।

ठंडी।

स्थायी।

तभी सामने वाले कमरे से हल्की आवाज आई।

मैं उठी।

अर्जुन का दरवाजा थोड़ा खुला था।

मेडिकल टीम एक घंटे पहले अपने परीक्षण खत्म कर चुकी थी।

गलियारा शांत था।

मैं धीरे-धीरे अर्जुन के कमरे में गई।

बेड के पास एक लैंप जल रहा था।

अर्जुन उसी तरह लेटा था।

नर्स दरवाजे के पास टैबलेट पढ़ रही थी।

उसने मेरी तरफ देखा।

“श्रीमती मल्होत्रा।”

“वह कैसा है?”

“स्थिर।”

“क्या टेस्ट में कुछ पता चला?”

“डॉक्टर कल परिवार से बात करेंगे।”

मैं लगभग कहने वाली थी—

अब मैं भी उसका परिवार हूं।

लेकिन शब्द मेरे मुंह तक आकर रुक गए।

“क्या मैं उसके पास बैठ सकती हूं?”

नर्स ने कुछ पल सोचा।

“बिल्कुल।”

मैं बिस्तर के पास बैठ गई।

करीब बीस मिनट तक मैंने कुछ नहीं कहा।

खिड़की से बाहर यमुना पर चांदनी टूटे हुए चांदी के टुकड़ों की तरह चमक रही थी।

फिर मैं अर्जुन के करीब झुकी।

“मुझे पता है तुम जाग रहे हो।”

कोई हरकत नहीं।

“जब नर्स अंदर आई थी, मैंने देखा था कि तुमने आंखें बंद कर ली थीं।”

उसकी सांस सामान्य रही।

“तुमने मुझे किसी को बुलाने से मना किया था।”

कुछ नहीं।

मैंने नर्स की तरफ देखा।

उसका ध्यान टैबलेट पर था।

मैंने धीमी आवाज में कहा,

“अगर तुम नाटक कर रहे हो तो मेरे लिए यह बहुत मुश्किल बना रहे हो।”

अर्जुन की छोटी उंगली हिली।

एक बार।

मेरे अंदर राहत और डर एक साथ उमड़ पड़े।

“क्या तुम मेरी बात समझ सकते हो?”

उसकी उंगली फिर हिली।

एक बार।

“हां?”

फिर एक हल्की हरकत।

“क्या तुम अपनी आंखें खोल सकते हो?”

कुछ नहीं हुआ।

मैंने इंतजार किया।

फिर उसकी पलकें धीरे-धीरे उठीं।

वह बेहद थका हुआ लग रहा था।

उसकी नजर नर्स की तरफ गई।

मैंने फुसफुसाकर कहा,

“वह तुम्हें यहां से नहीं देख सकती।”

उसके होंठ हिले।

मैं इतनी करीब झुकी कि उसकी सांस सुन सकूं।

“नाम…”

“मेरा नाम?”

हल्की पलक झपकी।

“मैं अनन्या हूं।”

उसने मुझे देखा।

“अनन्या शर्मा।”

मैंने अपनी अंगूठी की तरफ देखा।

“या अब शायद अनन्या मल्होत्रा।”

उसके होंठ का एक कोना हल्का सा उठा।

पूरी मुस्कान नहीं थी।

लेकिन उसके करीब थी।

“तुम्हें पता है कि हमारी शादी हो चुकी है?”

उसने कुछ पल आंखें बंद कीं।

फिर मेरी अंगूठी की तरफ देखा।

“तो इसका मतलब हां है।”

उसने बोलने की कोशिश की।

मैंने स्पंज पर थोड़ा पानी लगाया और सावधानी से उसके होंठों को छुआ।

उसकी आंखों में आभार दिखाई दिया।

“मैं डॉक्टर को क्यों नहीं बुला सकती?”

उसकी नजर फिर नर्स की तरफ गई।

फिर कमरे के ऊपरी कोने में लगी सुरक्षा कैमरे की तरफ।

मैंने भी वहां देखा।

एक छोटा काला कैमरा सीधे बेड की तरफ था।

“तुम्हें लगता है कोई तुम्हें देख रहा है?”

उसकी उंगली ने एक बार कंबल पर थपकी दी।

“हां।”

“कौन?”

उसके होंठ हिले।

मैं समझ नहीं पाई।

“क्या?”

उसने दोबारा कोशिश की।

“पता… नहीं।”

उसने बोलने की कोशिश की तो सांस तेज हो गई।

मैंने इंतजार किया।

“क्या तुम्हारा एक्सीडेंट हुआ था?”

उसका चेहरा बदल गया।

अखबारों में महीनों से एक ही कहानी छपी थी—

भारी बारिश में अर्जुन मल्होत्रा की कार दिल्ली-देहरादून मार्ग के एक पहाड़ी मोड़ पर नियंत्रण से बाहर हो गई थी और पत्थर की सुरक्षा दीवार से टकरा गई थी।

उसने एक बार उंगली हिलाई।

हां।

“क्या तुम्हें याद है?”

उसकी उंगली स्थिर रही।

फिर दो बार हिली।

मैंने मान लिया कि इसका मतलब नहीं था।

“क्या उससे पहले की कोई बात याद है?”

एक बार।

“हां।”

उसकी आंखें तेज हो गईं।

“क्या कोई तुम्हारे साथ था?”

उसने कुछ पल सोचा।

फिर एक बार उंगली हिलाई।

मेरी त्वचा सिहर उठी।

“रिपोर्ट में तो लिखा था कि तुम अकेले थे।”

उसका हाथ कंबल के नीचे हिला।

उसकी उंगलियां बेचैनी से कांपीं।

“कागज।”

मैंने चारों तरफ देखा।

नर्स अभी भी टैबलेट पढ़ रही थी।

मैंने अपना पर्स खोला और एक रसीद और पेन निकाला।

कागज उसके हाथ के नीचे रखा।

उसकी उंगलियां पेन पकड़ने की कोशिश कर रही थीं।

पहली रेखा मुश्किल से बनी।

उसने फिर कोशिश की।

एक अक्षर उभरा।

म।

फिर दूसरा।

ी।

उसका हाथ फिसल गया।

मैंने कागज संभाला।

उसने फिर लिखा।

मीरा।

मैं नाम को देखती रह गई।

“मीरा कौन है?”

मॉनिटर की आवाज अचानक बदल गई।

अर्जुन की आंखें चौड़ी हो गईं।

मेरे पीछे नर्स खड़ी थी।

“श्रीमती मल्होत्रा, उन्हें आराम की जरूरत है।”

मैंने रसीद मोड़कर अपनी हथेली में छिपा ली।

“उसने आंखें खोली थीं।”

नर्स आगे आई।

“मिस्टर मल्होत्रा?”

अर्जुन फिर बिल्कुल शांत था।

नर्स ने उसकी नब्ज देखी।

“हृदय गति बढ़ी हुई है। आपको बाहर जाना चाहिए।”

“लेकिन वह जाग रहा था।”

“हो सकता है उसे कुछ क्षणों के लिए आंशिक चेतना मिल रही हो। ज्यादा उत्तेजना उसकी रिकवरी को प्रभावित कर सकती है।”

उसकी आवाज में कुछ गलत नहीं था।

फिर भी उसके व्यवहार का समय मुझे परेशान कर रहा था।

मैं दरवाजे की तरफ बढ़ी।

“श्रीमती मल्होत्रा?”

मैं मुड़ी।

उसकी नजर मेरी बंद मुट्ठी पर थी।

“आपने कुछ गिरा दिया।”

फर्श पर पेन पड़ा था।

मैंने पेन उठा लिया।

रसीद मेरी हथेली में छिपी रही।

अपने कमरे में जाकर मैंने दरवाजा लॉक किया।

फिर रसीद खोली।

उस पर एक ही नाम था—

मीरा।

मैंने फोन निकाला और पुराने समाचार खोजने शुरू किए।

अर्जुन के एक्सीडेंट से जुड़े कई लेख मिले।

एक तस्वीर में अर्जुन के साथ करण और सावित्री खड़े थे।

उसके दूसरी तरफ लाल बालों वाली एक महिला थी।

कैप्शन था—

डॉ. मीरा अय्यर, मल्होत्रा फाउंडेशन की मेडिकल रिसर्च निदेशक।

मैंने तस्वीर बड़ी की।

वह करीब तीस साल की लग रही थी।

संयमित।

बुद्धिमान।

उसका हाथ अर्जुन की बांह पर था।

फिर मुझे दूसरा लेख मिला।

डॉ. मीरा अय्यर ने मल्होत्रा फाउंडेशन से इस्तीफा दिया।

इस्तीफे की वजह—व्यक्तिगत कारण।

वह देश से बाहर चली गई थी।

न कोई इंटरव्यू।

न कोई विदाई बयान।

न कोई बाद की जानकारी।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

“कौन?”

“सावित्री।”

मैंने दरवाजा खोला।

वह दो कप चाय लेकर अंदर आईं।

“मुझे लगा तुम अभी जाग रही होगी।”

मैंने व्यंग्य से कहा,

“क्या आप हर उस लड़की के लिए चाय लाती हैं जो आपके बेहोश पोते से शादी कर ले?”

उन्होंने एक कप मेरी तरफ बढ़ाया।

“सिर्फ उनके लिए जो उसे आंखें खोलने पर मजबूर कर दें।”

मैंने कप लिया।

फिर पूछा,

“डॉ. मीरा अय्यर कौन हैं?”

उनका हाथ कुछ पल हवा में रुक गया।

बहुत छोटी सी प्रतिक्रिया थी।

लेकिन साफ थी।

“तुमने यह नाम कहां सुना?”

“एक लेख में।”

“कौन सा?”

“फाउंडेशन वाला।”

उन्होंने चाय रख दी।

“मीरा डॉक्टर और रिसर्चर थी।”

“क्या वह अर्जुन के करीब थी?”

“वे साथ काम करते थे।”

“मैंने यह नहीं पूछा।”

उनकी आंखें फिर ठंडी हो गईं।

“तुम मेरे पोते को एक दिन से भी कम समय से जानती हो।”

“और मुझे पहले ही कहा जा चुका है कि किसी पर भरोसा मत करना।”

“किसने कहा?”

मैंने जवाब नहीं दिया।

सावित्री उठीं।

“मीरा अर्जुन के एक्सीडेंट के बाद फाउंडेशन छोड़ गई।”

“क्यों?”

“उसने कहा काम बहुत ज्यादा हो गया था।”

“क्या आपने उस पर विश्वास किया?”

सावित्री खिड़की की तरफ चली गईं।

“कानूनी इस्तीफे के लिए विश्वास की जरूरत नहीं होती।”

मैंने उनकी परछाईं को शीशे में देखा।

“क्या एक्सीडेंट की रात वह अर्जुन के साथ थी?”

सावित्री मुड़ीं।

“तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो?”

“क्योंकि रिपोर्ट में लिखा है कि अर्जुन अकेला था। लेकिन टाइमलाइन में अंतर है।”

मैंने कहा,

“वह रात दस बजे दिल्ली में एक डिनर से निकला था। एक्सीडेंट आधी रात के बाद दर्ज हुआ। रास्ता मुश्किल से एक घंटे का है।”

पहली बार सावित्री की आंखों में मेरे लिए सम्मान दिखाई दिया।

फिर वह गायब हो गया।

“तुम्हें शादी के पहले दिन अपने पति की जांच-पड़ताल शुरू नहीं करनी चाहिए।”

मैंने कहा,

“मैंने उससे डेट करके शादी शुरू नहीं की।”

उनके चेहरे पर क्षणभर हल्की मुस्कान आई।

फिर उन्होंने कहा,

“मीरा और अर्जुन के बीच फाउंडेशन के रिसर्च बजट को लेकर मतभेद थे। अफवाह थी कि दोनों के बीच निजी संबंध भी थे। लेकिन अर्जुन ने मुझसे कभी ऐसी बात नहीं की।”

“क्या मीरा एक्सीडेंट के बाद उससे मिलने आई थी?”

“एक बार।”

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।”

वही जवाब।

कुछ नहीं।

यह वही वाक्य था जिसका इस्तेमाल लोग तब करते हैं जब बहुत कुछ हुआ हो लेकिन उन्होंने उसके बारे में बात न करने की कसम खाई हो।

सावित्री दरवाजे तक पहुंचीं।

मैंने पूछा,

“क्या आपने मुझे चुना था?”

वह रुक गईं।

“शादी के लिए।”

“मैंने उस व्यवस्था को मंजूरी दी थी।”

“क्यों?”

“तुम्हारे परिवार ने जरूरी शर्तें पूरी की थीं।”

“कौन सी शर्तें?”

उन्होंने कहा,

“तुम अविवाहित थीं। तुम्हारा कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। तुम मीडिया या किसी प्रतिस्पर्धी कारोबारी समूह से जुड़ी नहीं थीं।”

“ऐसे हजारों लोग हैं।”

“हां।”

“फिर मैं ही क्यों?”

उन्होंने मेरी आंखों में देखा।

“क्योंकि अर्जुन तुम्हें पहले देख चुका था।”

कमरा जैसे घूम गया।

“क्या?”

“तीन साल पहले मल्होत्रा फाउंडेशन ने दिल्ली-एनसीआर में एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शुरू किया था। तुम वहां स्वयंसेवक थीं।”

मुझे वह केंद्र याद था।

मेरी मां ने अपनी बीमारी के शुरुआती दिनों में वहीं इलाज कराया था।

मैं खर्च कम करने के लिए रिसेप्शन पर काम करती थी।

सावित्री बोलीं,

“अर्जुन एक बार वहां आया था। तुमने उससे बात की थी।”

“मुझे याद नहीं।”

“उसे याद था।”

“आपको कैसे पता?”

“क्योंकि उसी शाम उसने अपने सहायक से तुम्हारा नाम पता करने को कहा था।”

मेरे होंठ सूख गए।

“क्यों?”

“उसने मुझे कभी नहीं बताया।”

“यह समझ में नहीं आता।”

“अभी बहुत सी चीजें समझ में नहीं आ रही हैं।”

वह दरवाजा खोलकर बोलीं,

“तुम्हारे पिता ने तुम्हें यह विश्वास दिलाया कि तुम्हारा चयन संयोग था। ऐसा नहीं था।”

वह चली गईं।

मैं पूरी रात नहीं सोई।

सुबह तक मैं उस स्वास्थ्य केंद्र की हर छोटी बात याद करने की कोशिश करती रही।

डॉक्टर।

मरीज।

दान देने वाले लोग।

काले सूट पहने कारोबारी।

लेकिन अर्जुन का चेहरा मुझे याद नहीं आया।

शायद हमने सिर्फ तीस सेकंड बात की थी।

शायद मैंने उसे विजिटर बैज दिया था।

फिर भी…

वह मुझे तीन साल बाद कैसे याद रख सकता था?

सुबह के नाश्ते की मेज पर करण पहले से बैठा था।

बीस लोगों के बैठने जितनी लंबी मेज के एक छोर पर बैठकर वह वित्तीय खबरें पढ़ रहा था।

“गुड मॉर्निंग, कजिन-इन-लॉ।”

मैंने कॉफी डाली।

“क्या तुम हमेशा मुझे यही बुलाओगे?”

“जब तक इससे बेहतर नाम नहीं मिल जाता।”

मैं उसके सामने बैठ गई।

“सावित्री कहां हैं?”

“न्यूरोलॉजिस्ट के साथ।”

“और अर्जुन?”

“अभी भी चमत्कार और मेडिकल अनिश्चितता के बीच फंसा हुआ है।”

मैंने उसे देखा।

“तुम खुश नहीं लग रहे कि वह ठीक हो सकता है।”

करण ने टैबलेट नीचे रख दिया।

“मैं बहुत खुश हूं।”

“तुम्हारे चेहरे से पता नहीं चलता।”

“तुम मुझे चौबीस घंटे से भी कम समय से जानती हो।”

“यह हर किसी का पसंदीदा बचाव है।”

एक नौकर हमारे बीच टोस्ट रखकर चला गया।

करण पीछे झुका।

“अर्जुन का जागना बहुत कुछ बदल देता है।”

“कंपनी?”

“ट्रस्ट।”

“तो तुम्हारा नियंत्रण चला जाएगा।”

उसका चेहरा कठोर हो गया।

“मेरा कभी नियंत्रण था ही नहीं। मेरे पास सिर्फ जिम्मेदारी थी।”

“क्या फर्क है?”

“जब अर्जुन का एक्सीडेंट हुआ, कंपनी के हजारों कर्मचारी अपनी सैलरी का इंतजार कर रहे थे। कॉन्ट्रैक्ट रुक नहीं सकते थे। फैसले लेने जरूरी थे। सावित्री यह मानने को तैयार नहीं थीं कि अर्जुन कभी वापस नहीं आएगा। इसलिए उन्होंने सब कुछ अस्थायी रूप से रोक दिया।”

“और मेरी शादी तुम्हें उसकी जगह लेने से रोकती है।”

“शादी ट्रस्ट को नया स्थायी चेयरमैन नियुक्त करने से रोकती है।”

“और वह चेयरमैन तुम होते।”

“संभवतः।”

उसकी ईमानदारी ने मुझे चौंका दिया।

“तुम सोचते हो मैंने अर्जुन से पैसे के लिए शादी की।”

“क्या ऐसा नहीं है?”

मैंने कॉफी की तरफ देखा।

करण की आवाज थोड़ी नरम हुई।

“यह अपमान नहीं था।”

“मुझे तो ऐसा ही लगा।”

“अधिकांश सच तब अपमान जैसा लगता है जब उसे बहुत जल्दी बोल दिया जाए।”

मैं उठ खड़ी हुई।

“सावधान रहो। एक दिन कोई तुम्हारे बारे में भी सच बोल सकता है।”

पहली बार उसके चेहरे का आत्मविश्वास डगमगाया।

फिर वह मुस्कुराया।

“तुम सावित्री के अनुमान से ज्यादा दिलचस्प हो।”

मैं जाने लगी तो उसने कहा,

“अपने पिता से श्रीवर्धन होल्डिंग्स के बारे में पूछना।”

मैं रुक गई।

“वह क्या है?”

“तुम्हारे पिता जानते होंगे।”

मेरे पिता जानते थे।

मैंने फोन किया।

कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

“तुम्हें यह नाम किसने बताया?”

“करण ने।”

“उससे दूर रहो।”

“श्रीवर्धन होल्डिंग्स क्या है?”

“एक निवेश कंपनी।”

“क्या आपने वहां काम किया था?”

“कुछ समय।”

“आपने कहा था कि आपने मल्होत्रा की कंपनी में काम किया।”

“वह मल्होत्रा समूह की आंशिक स्वामित्व वाली कंपनी थी।”

“आपने वहां क्या किया?”

“अनन्या, यह फोन पर बताने वाली बात नहीं है।”

“तो वापस आइए।”

“नहीं।”

उनका जवाब शांत लेकिन दृढ़ था।

“क्यों?”

“क्योंकि सावित्री ने साफ कर दिया था कि शादी के बाद मेरा काम खत्म हो गया।”

“मेरा काम खत्म नहीं हुआ।”

“मुझे पता है।”

उनकी आवाज में दर्द था।

मैंने आंखें बंद कीं।

“क्या अर्जुन श्रीवर्धन होल्डिंग्स से जुड़ा था?”

“हां।”

“क्या हुआ था?”

मेरे पिता ने लंबी सांस ली।

“मुझे कई खातों में गड़बड़ियां मिली थीं। पैसे फर्जी कंपनियों के जरिए घूम रहे थे। कई भुगतान अर्जुन के नाम से अधिकृत दिखाए गए थे।”

“क्या वे गैरकानूनी थे?”

“मुझे नहीं पता। यही समस्या थी।”

“क्या आपने किसी को बताया?”

“मैंने अर्जुन के कार्यालय से संपर्क किया।”

“फिर?”

“उन्होंने पूरी रिपोर्ट तैयार करने को कहा।”

“क्या आपने की?”

“हां।”

“फिर उसका क्या हुआ?”

कुछ देर खामोशी रही।

“एक व्यक्ति उसे लेने आया। मैंने रिपोर्ट उसे दे दी।”

“कौन?”

“मुझे उसका पूरा नाम कभी पता नहीं चला।”

मेरी पकड़ फोन पर कस गई।

“क्या वह मीरा थी?”

“मुझे नहीं पता।”

“वह कैसी दिखती थी?”

“लाल बाल। तीस साल के आसपास। उसने कहा कि वह सीधे अर्जुन के लिए काम करती है।”

मेरे कमरे की दीवारें अचानक बहुत करीब लगने लगीं।

“पापा, यह कब हुआ था?”

“अर्जुन के एक्सीडेंट से करीब तीन हफ्ते पहले।”

“और रिपोर्ट देने के बाद?”

“मेरा कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया गया। छह महीने बाद श्रीवर्धन होल्डिंग्स बर्बाद हो गई। गायब पैसों का दोष मुझ पर डाल दिया गया।”

“इसलिए हमने सब कुछ खो दिया?”

“हां।”

“आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

“तुम्हारी मां मर रही थीं।”

“तो आपने मुझे यह विश्वास करने दिया कि सब मेरी वजह से खराब कारोबारी फैसलों के कारण हुआ?”

“गलत फैसले मैंने लिए थे। मैंने गलत लोगों पर भरोसा किया।”

“और अब आपने उन्हीं लोगों पर दोबारा भरोसा किया।”

“नहीं,” उन्होंने कहा।

फिर उनकी आवाज टूट गई।

“मुझे लगा यह शादी तुम्हें उनसे दूर रखेगी।”

मैंने फोन लगभग गिरा दिया।

“आपने मेरी शादी उसी परिवार में इसलिए कर दी ताकि मैं उसी परिवार से बच सकूं?”

“तुम्हारे पास अर्जुन का नाम होता। कानूनी सुरक्षा होती। कंपनी से अलग तुम्हारे लिए आर्थिक समझौता होता।”

“लेकिन वह बेहोश था।”

“इसीलिए यह व्यवस्था सुरक्षित लगी।”

सच्चाई ने मुझे भीतर तक हिला दिया।

“आपको उम्मीद नहीं थी कि वह जागेगा।”

“किसी को नहीं थी।”

“लेकिन वह जाग गया।”

मेरे पिता की आवाज टूट गई।

“अनन्या, मेरी बात सुनो। श्रीवर्धन के बारे में अर्जुन से तब तक कुछ मत पूछना जब तक यह न देख लो कि कमरे में कौन मौजूद है।”

लाइन कट गई।

मैं मुड़ी।

सावित्री दरवाजे पर खड़ी थीं।

मुझे पता ही नहीं चला था कि वह कब आईं।

“आपने कितना सुना?”

“काफी।”

“क्या आपको पता था कि मेरे पिता ने श्रीवर्धन में काम किया था?”

“हां।”

“गायब पैसे के बारे में?”

“हां।”

“क्या अर्जुन जानता था?”

“मेरा विश्वास है कि एक्सीडेंट से पहले वह यही पता लगाने की कोशिश कर रहा था।”

मैंने उन्हें देखा।

“फिर मुझे क्यों चुना?”

सावित्री ने दरवाजा बंद कर दिया।

“छह महीने पहले मेरे वकील के पास एक लिफाफा आया था।”

उन्होंने अपनी जेब से एक छोटी पीतल की चाबी निकाली।

“उसमें अर्जुन के हाथ से लिखे निर्देश थे।”

“क्या निर्देश?”

“अगर वह अपने तीसवें जन्मदिन के आसपास भी बेहोश रहे तो शादी की व्यवस्था पूरी की जाए।”

मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा।

“उसने यह सब पहले से तय किया था?”

“उसने इसकी संभावना के लिए योजना बनाई थी।”

“और मेरे साथ?”

सावित्री ने मेरी तरफ देखा।

“उसने तुम्हारा नाम लिखा था।”

मैं कुछ पल बोल ही नहीं पाई।

“यह असंभव है।”

“हस्ताक्षर प्रमाणित किए गए हैं।”

“लेकिन मैं उसे मुश्किल से जानती थी।”

“शायद वह तुम्हें तुमसे ज्यादा जानता था।”

“आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”

“क्योंकि मुझे पिछले सप्ताह तक यकीन नहीं था कि वह पत्र असली है। और मैं यह भी देखना चाहती थी कि तुम्हारा पिता तुम्हें सच बताएगा या नहीं।”

“उसने नहीं बताया।”

“नहीं।”

“लिफाफे में और क्या था?”

“यह चाबी।”

उन्होंने वह चाबी मेरी हथेली पर रख दी।

पीतल की छोटी सी चाबी।

उस पर खुदा था—

314

“यह किसका ताला खोलती है?”

“मुझे नहीं पता।”

“आप चाहती हैं कि मैं इस पर विश्वास करूं?”

“मैं छह महीने से पता लगाने की कोशिश कर रही हूं।”

“फिर मुझे क्यों दे रही हैं?”

“क्योंकि अर्जुन के पत्र में लिखा था कि यह चाबी उसकी पत्नी को दी जाए।”

तभी दरवाजा खुला।

न्यूरोलॉजिस्ट अंदर आए।

“श्रीमती मल्होत्रा… अर्जुन फिर से जाग गया है।”

हम दोनों तुरंत उसके कमरे की तरफ भागे।

इस बार अर्जुन की आंखें हमारे अंदर आते ही खुली हुई थीं।

डॉक्टर ने कहा,

“एक बार पलक झपकाना मतलब हां। दो बार मतलब नहीं।”

अर्जुन ने हर सवाल का जवाब दिया।

“क्या तुम्हें अपना नाम पता है?”

एक पलक।

“क्या तुम्हें पता है तुम कहां हो?”

एक पलक।

“क्या तुम अपनी दादी को पहचानते हो?”

एक पलक।

सावित्री ने बेड को पकड़ लिया।

डॉक्टर पीछे हटे ताकि मैं उसके पास जा सकूं।

अर्जुन ने मेरी तरफ देखा।

उसकी आंखों में पहचान थी।

सिर्फ किसी अजनबी को पहचानने की अस्पष्ट कोशिश नहीं।

पहचान।

“क्या तुम अनन्या को जानते हो?”

एक पलक।

मेरा गला भर आया।

“कैसे?”

अर्जुन ने हाथ हिलाया।

डॉक्टर ने उसके सामने लिखने का बोर्ड रखा।

कई प्रयासों के बाद उसने पेन पकड़ लिया।

धीरे-धीरे उसने तीन शब्द लिखे—

उसके पास है।

सभी की नजरें मेरी तरफ गईं।

“किसके पास?” डॉक्टर ने पूछा।

अर्जुन ने मेरी बंद मुट्ठी की तरफ देखा।

मैंने अपनी हथेली खोली।

पीतल की चाबी उसमें थी।

मॉनिटर तेजी से बीप करने लगा।

सावित्री का चेहरा सफेद पड़ गया।

“तुम जानते हो यह चाबी क्या खोलती है?”

एक पलक।

“कहां?”

उसने दोबारा लिखना शुरू किया।

अक्षर टेढ़े थे।

लेकिन पढ़े जा सकते थे।

सेंट्रल स्टेशन।

“नई दिल्ली रेलवे स्टेशन?”

एक पलक।

“लॉकर?”

एक पलक।

“नंबर 314?”

एक पलक।

डॉक्टर ने बोर्ड पकड़ लिया।

“अब काफी है।”

अर्जुन ने विरोध किया।

उसने आखिरी बार पेन चलाया।

एक शब्द उभरा—

मीरा।

सावित्री ने डॉक्टर की तरफ देखा।

“उसे आराम करने दें।”

लेकिन अर्जुन का हाथ मेरी तरफ बढ़ा।

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मीरा के बारे में क्या?”

उसके होंठ हिले।

इस बार आवाज थोड़ी साफ थी।

“उसने… झूठ बोला।”

“किस बारे में?”

उसकी आंखें सावित्री की तरफ गईं।

फिर खुले दरवाजे की तरफ।

वहां करण खड़ा था।

अर्जुन की उंगलियां मेरी हथेली में कस गईं।

उसने मुझे देखा।

“एक्सीडेंट… मेरे लिए नहीं था।”

कमरा शांत हो गया।

करण के चेहरे का रंग उड़ गया।

अर्जुन ने बड़ी मुश्किल से एक और सांस ली।

“अनन्या…”

“मैं यहां हूं।”

उसने मेरी आंखों में देखा।

“कार… तुम्हारी थी।”

भाग 3 — आखिरी सच

अर्जुन के शब्द उसके मुंह से निकलने के बाद भी कमरे में जैसे ठहरे रहे।

“कार तुम्हारी थी।”

मैं उसे देखती रही।

“यह असंभव है। मेरे पास उस समय कार थी ही नहीं।”

अर्जुन की उंगलियां मेरी हथेली में हिलीं।

करण एक कदम आगे आया।

उसके चेहरे से अब भी रंग गायब था।

“वह क्या कहना चाहता है?”

सावित्री ने उसकी तरफ देखा।

“हम यही पता लगा रहे हैं।”

न्यूरोलॉजिस्ट ने अर्जुन के सामने बोर्ड रखा।

उसने एक शब्द लिखा—

सेंटर।

मैं उसके करीब झुकी।

“स्वास्थ्य केंद्र?”

एक पलक।

दिल्ली-एनसीआर का वह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र।

वही जगह जहां मेरी मां का इलाज हुआ था।

वही जगह जहां सावित्री ने कहा था कि अर्जुन ने मुझे पहली बार देखा था।

अचानक मुझे एक छोटी सी चांदी रंग की कार याद आई।

वह स्वास्थ्य केंद्र की कार थी।

स्वयंसेवक उससे दवाइयां और मरीजों को लाते-ले जाते थे।

मैंने उसे कई बार चलाया था।

मेरे मुंह से निकला,

“सेंटर की एक सिल्वर हैचबैक थी।”

अर्जुन ने एक बार पलक झपकाई।

“वही कार?”

एक पलक।

करण का चेहरा कठोर हो गया।

“पुलिस रिपोर्ट में तो अर्जुन की अपनी कार लिखी है।”

सावित्री ने उसे देखा।

“क्या तुमने पूरी रिपोर्ट पढ़ी थी?”

“मैं अस्पताल और कंपनी दोनों संभाल रहा था।”

“यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है।”

करण ने जबड़ा भींच लिया।

“नहीं। मैंने आधिकारिक सारांश पढ़ा था।”

अर्जुन ने फिर लिखा—

बदली गई।

मैंने पूछा,

“तुम अपनी कार में नहीं थे?”

एक पलक।

“तुम स्वास्थ्य केंद्र की कार चला रहे थे?”

एक पलक।

कमरे में जैसे हवा ही खत्म हो गई।

तीन हफ्ते पहले मेरे पिता ने श्रीवर्धन होल्डिंग्स में गड़बड़ी पकड़ी थी।

उन्होंने रिपोर्ट एक लाल बालों वाली महिला को दी थी।

उसी समय अर्जुन स्वास्थ्य केंद्र आया था।

और एक्सीडेंट की रात वह उसी स्वास्थ्य केंद्र की कार चला रहा था।

वही कार जिसे मैं अक्सर चलाती थी।

मैंने धीरे से पूछा,

“एक्सीडेंट तुम्हारे लिए नहीं था?”

अर्जुन की आंखों में घबराहट बढ़ गई।

उसने लिखा—

रिपोर्ट।

“श्रीवर्धन?”

एक पलक।

“मेरे पिता की रिपोर्ट?”

एक पलक।

सावित्री ने बेड पकड़ा।

“अर्जुन… कार में कौन होना चाहिए था?”

उसकी नजर मेरी तरफ लौट आई।

मुझे जवाब लिखे जाने से पहले ही समझ आ गया।

उसने लिखा—

मैं।

मेरे सीने में ठंड उतर गई।

सालों से मुझे लगता था कि हमारा परिवार कर्ज, बीमारी और मेरे पिता की गलतियों की वजह से बर्बाद हुआ था।

लेकिन अब पता चल रहा था कि किसी ने शायद मुझे डराने या नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी क्योंकि उन्हें लगता था कि मेरे पास एक ऐसी रिपोर्ट थी जिसके बारे में मुझे कुछ पता ही नहीं था।

करण ने सिर हिलाया।

“यह उस आदमी की कल्पना है जो नौ महीने से कोमा में था।”

अर्जुन की आंखें उसकी तरफ गईं।

दोनों चचेरे भाइयों के बीच कुछ ऐसा गुजरा जिसे मैं समझ नहीं पाई।

आरोप नहीं।

पहचान।

न्यूरोलॉजिस्ट आगे आए।

“बस।”

जब बोर्ड हटाया गया, अर्जुन की ताकत खत्म हो रही थी।

उसकी आंखें बंद होने लगीं।

लेकिन मेरा हाथ छोड़ने से पहले उसकी उंगलियों ने मेरी हथेली पर तीन अंक बनाए।

तीन।

एक।

चार।

चाबी।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन।

लॉकर 314।

मैंने चाबी जेब में रख ली।

सावित्री ने देख लिया।

करण ने भी।

लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा।

कुछ देर बाद करण ने मुझे रोक लिया।

“तुम उस चाबी के भरोसे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन नहीं जा सकती।”

“क्यों?”

“अगर वहां किसी ने सबूत छिपाए हैं तो संभव है कि वह जगह अब भी निगरानी में हो।”

“तो पुलिस को बुलाते हैं।”

करण ने कहा,

“और उन्हें क्या बताएंगे? कि तुम्हारा कोमा से जागा पति रेलवे स्टेशन के एक लॉकर का नाम लिख रहा है?”

सावित्री ने कहा,

“उसने यह भी कहा कि दुर्घटना अनन्या के लिए थी।”

करण ने उनकी तरफ देखा।

“आप उस पर विश्वास करती हैं?”

“मैं अर्जुन पर विश्वास करती हूं।”

“यही आपकी कमजोरी रही है।”

सावित्री का चेहरा कठोर हो गया।

“मेरी कमजोरी?”

करण ने कहा,

“आपने पूरी जिंदगी माना कि इस परिवार में सही काम सिर्फ अर्जुन कर सकता है।”

उसकी आवाज में वर्षों की कड़वाहट थी।

“जब वह लापरवाह था, आपने उसे बहादुर कहा। जब वह नियम तोड़ता था, आपने उसे सिद्धांतवादी कहा। जब मैंने उसके एक्सीडेंट के बाद कंपनी संभाली, आपने मुझे हमेशा अस्थायी आदमी समझा।”

सावित्री चुप रहीं।

करण ने कहा,

“अब वह आंखें खोलता है और मेरे हर फैसले पर शक होने लगता है।”

मैंने पूछा,

“क्या तुम्हारे फैसले श्रीवर्धन से जुड़े थे?”

उसका चेहरा बंद हो गया।

“नहीं।”

“क्या तुम मेरे पिता को जानते थे?”

“नाम जानता था।”

“शादी से पहले?”

“हां।”

“फिर बताया क्यों नहीं?”

“सावित्री ने मुझे श्रीवर्धन के बारे में तब तक कुछ न बोलने को कहा था जब तक अर्जुन होश में न आ जाए।”

मैंने सावित्री की तरफ देखा।

उनकी खामोशी ही जवाब थी।

मेरे भीतर गुस्सा भर गया।

“आपने मुझे चाबी दी। मेरे पिता के बारे में बताया। फिर भी चाहती थीं कि मैं इस घर में अंधी बनकर रहूं?”

“मैं यह जानने की कोशिश कर रही थी कि किस पर भरोसा किया जा सकता है।”

“आप हमेशा भरोसे की बात करती हैं जैसे भरोसा बाकी लोगों का कर्तव्य हो।”

सावित्री की आंखों में दर्द आया।

मैंने कहा,

“मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन जा रही हूं।”

करण मेरे सामने आ गया।

“यह बेवकूफी होगी।”

“एक अजनबी से शादी करना भी बेवकूफी थी। लगता है यह आपके परिवार की परंपरा है।”

“यह खेल नहीं है, अनन्या।”

“मुझे पता है।”

मेरी आवाज कांप रही थी लेकिन मैंने उसे नीचे नहीं किया।

“मेरी मां अपनी जिंदगी के आखिरी साल में इलाज के खर्च को लेकर डरती रहीं। मेरे पिता ने गायब पैसों की रिपोर्ट करके सब कुछ खो दिया। अर्जुन मरते-मरते बचा। और किसी ने शायद मेरे नाम से जुड़ी कार पर हमला किया क्योंकि उन्हें लगता था कि मेरे पास वह जानकारी है जिसके बारे में मुझे खुद पता नहीं था।”

मैंने जेब में रखी चाबी पर हाथ रखा।

“मैं अब यह स्वीकार नहीं करूंगी कि दूसरे लोग तय करें कि मुझे अपनी जिंदगी का कौन सा सच जानना चाहिए।”

करण कुछ देर मुझे देखता रहा।

फिर बोला,

“ठीक है।”

“क्या?”

“मैं तुम्हारे साथ चलूंगा।”

सावित्री ने तुरंत कहा,

“नहीं।”

करण ने उनकी तरफ देखे बिना कहा,

“उसे कंपनी के रिकॉर्ड समझने वाला कोई चाहिए। और अनन्या को किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो लॉकर में मौजूद चीजों को पहचान सके।”

सावित्री ने पूछा,

“तुम चाहते हो कि हम तुम पर भरोसा करें?”

“नहीं।”

करण ने कहा,

“मैं चाहता हूं कि आप मेरे अगले कदम को देखकर फैसला करें।”

उस जवाब ने सबको चुप कर दिया।

मैंने अर्जुन के कमरे की तरफ देखा।

उसने अपनी पत्नी को उस चाबी पर भरोसा किया था, जबकि उसे पता भी नहीं था कि वह कभी जागेगा या नहीं।

और वह पत्नी…

मैं थी।

“मेरे पिता भी हमारे साथ आएंगे।”

करण ने सिर हिलाया।

सावित्री ने कहा,

“और एक स्वतंत्र वकील।”

इस बार किसी ने विरोध नहीं किया।

दो घंटे बाद हम चारों नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के एक शांत हिस्से में खड़े थे।

ऊंची छत।

भागते हुए यात्री।

चाय की आवाजें।

घोषणाएं।

हजारों लोगों के बीच हमारा राज अजीब लग रहा था।

मेरे पिता वही सूट पहने हुए थे जो उन्होंने मेरी शादी में पहना था।

जब उन्होंने करण को देखा तो उनका चेहरा बदल गया।

“तुम।”

करण रुक गया।

“आप मुझे याद करते हैं?”

मेरे पिता की आंखें सिकुड़ गईं।

“रिपोर्ट देने के बाद तुम श्रीवर्धन आए थे।”

सावित्री ने करण की तरफ देखा।

करण ने कहा,

“मुझे खातों की जांच के लिए भेजा गया था।”

“तुमने कहा था कि चोरी का कोई सबूत नहीं है।”

“आपके दिए रिकॉर्ड में नहीं था।”

“तुमने मेरी रिपोर्ट को लापरवाही कहा था।”

“मैंने उसे अधूरा कहा था।”

“तुमने मेरी प्रतिष्ठा बर्बाद कर दी।”

करण की आवाज धीमी हुई।

“मैं गलत था।”

मेरे पिता उसे देखते रहे।

माफी से सब ठीक नहीं हुआ।

लेकिन हवा बदल गई।

करण ने कहा,

“उस समय सभी ट्रांसफर अर्जुन के डिजिटल अप्रूवल के साथ दिखाई दे रहे थे। मुझे लगा आपके पिता अपनी गलतियों से बचने के लिए वरिष्ठ प्रबंधन पर आरोप लगा रहे हैं।”

मैंने पूछा,

“बाद में?”

“बाद में मुझे दोहरी लेजर फाइलें मिलीं।”

“फिर आपने उनका नाम साफ क्यों नहीं किया?”

“क्योंकि वे रिकॉर्ड गायब हो गए।”

मेरे पिता ने कड़वी हंसी हंसी।

“कितना सुविधाजनक।”

करण ने सीधा जवाब दिया,

“हां।”

एक स्वतंत्र वकील हमारे साथ थी—अदिति मेहरा

उसने कहा,

“अगर इस लॉकर में अपराध का सबूत है तो कोई भी चीज बिना दस्तावेज और कानूनी प्रक्रिया के नहीं छुई जाएगी।”

हम लॉकर नंबर 314 तक पहुंचे।

छोटा सा पीतल का ताला।

मैंने चाबी डाली।

पहले वह नहीं घुमा।

मैंने जोर लगाया।

क्लिक।

दरवाजा खुल गया।

अंदर एक पुराना चमड़े का बैग था।

बस।

अदिति ने पहले उसकी तस्वीरें लीं।

फिर दस्ताने पहनकर उसे बाहर निकाला।

बैग के अंदर वित्तीय दस्तावेज थे।

मेरे पिता ने पहला कागज देखते ही कहा,

“ये मूल ट्रांसफर रिकॉर्ड हैं।”

करण ने पन्ना देखा।

“इनमें अर्जुन का डिजिटल अप्रूवल है।”

“लेकिन हस्ताक्षर नहीं।”

करण ने कई पन्ने पलटे।

“तुम सही हो।”

फिर अदिति ने एक छोटा रिकॉर्डिंग डिवाइस निकाला।

उसके नीचे एक बंद लिफाफा था।

उस पर मेरा नाम लिखा था।

अनन्या शर्मा।

मेरे पिता की सांस रुक गई।

मैंने लिखावट देखी।

वह मेरी मां की थी।

कुछ पल के लिए स्टेशन गायब हो गया।

मुझे अपनी मां की रसोई याद आई।

नीली शॉल।

दवाइयों की गंध।

मेरे लिए छोड़े छोटे-छोटे नोट—

आज बहादुर रहना।

पहुंचकर फोन करना।

मुझे तुम पर गर्व है।

मेरी उंगलियां कांप रही थीं।

“मां ने मुझे यह क्यों लिखा होगा?”

किसी के पास जवाब नहीं था।

सील नहीं टूटी थी।

मैंने लिफाफा खोला।

अंदर एक कागज और एक तस्वीर थी।

तस्वीर में मेरी मां स्वास्थ्य केंद्र के बाहर अर्जुन और डॉ. मीरा के साथ खड़ी थीं।

तस्वीर की तारीख—

अर्जुन के एक्सीडेंट से तीन हफ्ते पहले।

मैंने पत्र खोला।

मेरी प्यारी अनन्या,

अगर तुम यह पत्र पढ़ रही हो तो इसका मतलब है कि कुछ बहुत गलत हुआ है।

तुम्हें लगता है कि मैं अर्जुन मल्होत्रा से सिर्फ एक बार मिली थी।

सच यह है कि मैं उससे कई बार मिली थी।

वह स्वास्थ्य केंद्र इसलिए आया था क्योंकि फाउंडेशन के मेडिकल प्रोग्राम में ऐसे उपकरणों का भुगतान दिखाया जा रहा था जो कभी पहुंचे ही नहीं।

मुझे यह इसलिए पता चला क्योंकि उन्हीं उपकरणों की कीमत मेरे इलाज के बिलों में भी दिखाई दे रही थी।

पहले मुझे लगा कि यह गलती है।

फिर तुम्हारे पिता ने बताया कि उन्हें श्रीवर्धन होल्डिंग्स से जुड़े कुछ संदिग्ध भुगतान मिले हैं।

हमें नहीं पता था कि दोनों बातें जुड़ी हुई हैं।

जब तक अर्जुन हमसे अकेले मिलने नहीं आया।

अनन्या, तुम्हारे पिता ने हमारा भविष्य लापरवाही से बर्बाद नहीं किया।

उन्होंने लोगों को बचाने की कोशिश की थी।

मैंने ही उनसे कहा था कि तुम्हें सच न बताएं क्योंकि तुम पहले ही बहुत कुछ झेल रही थीं।

यह मेरी गलती थी।

कभी-कभी चुप्पी सुरक्षा जैसी लगती है, जबकि वह सिर्फ डर होती है।

अर्जुन को शक था कि उसके परिवार की कंपनियों के भीतर कोई चैरिटी के पैसों का इस्तेमाल कर रहा है।

डॉ. मीरा अय्यर ने सबूत इकट्ठा करने में उसकी मदद करने की पेशकश की।

हमने उस पर भरोसा किया।

फिर अर्जुन को पता चला कि मीरा ने तुम्हारे पिता की रिपोर्ट की कॉपी बना ली है।

उसे डर था कि तुम्हें दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

एक्सीडेंट की रात अर्जुन ने स्वास्थ्य केंद्र की कार ली क्योंकि उसे शक था कि उसकी अपनी कार का पीछा किया जा रहा है।

तुम अगले दिन उसी कार को चलाने वाली थीं।

अर्जुन को डर था कि जो लोग निगरानी कर रहे हैं, वे समझेंगे कि रिपोर्ट तुम्हारे पास है।

इसलिए उसने खुद को निशाना बना दिया।

अगर यह पत्र तुम्हें अर्जुन देता है, तो इसका मतलब है कि उसने तुम्हें सुरक्षित रखने में सफलता पाई।

अपने पिता से नफरत मत करना।

मैंने ही उनसे वादा करवाया था।

और यह मत सोचना कि अर्जुन ने तुम्हें दया के कारण चुना।

उसे तुम्हारी पहली मुलाकात याद थी।

तुम एक बुजुर्ग मरीज की दवा के लिए फार्मेसी में बहस कर रही थीं।

तुम तब तक वहां से नहीं हटीं जब तक उस महिला की दवा का रास्ता नहीं निकला।

बाद में अर्जुन ने मुझसे कहा था—

ज्यादातर लोग किसी ताकतवर व्यक्ति से बात करते समय अपनी आवाज बदल लेते हैं।

तुमने तो यह भी नहीं देखा कि वह तुम्हारे पीछे खड़ा था।

उसे तुम्हारी यह जिद पसंद आई।

मुझे भी।

जो कुछ भी हो…

याद रखना—

हमारी जिंदगी सिर्फ उन चीजों से तय नहीं होती जो हमसे छीन ली गईं।

हमारी जिंदगी उन चीजों से भी तय होती है जिन्हें हम दूसरों को वापस देने का चुनाव करते हैं।

तुम्हारी मां।

पत्र के आखिरी शब्द तक पहुंचते-पहुंचते मेरी आंखों से आंसू बहने लगे।

मेरे पिता ने अपना चेहरा ढक लिया।

“उसने यह लिखा था?”

मैंने सिर हिलाया।

वह दूसरी तरफ मुड़ गए।

उनके कंधे कांप रहे थे।

मेरा गुस्सा खत्म नहीं हुआ।

लेकिन उसका रूप बदल गया।

उन्होंने मुझसे झूठ बोला था।

उन्होंने मेरे लिए फैसले किए थे जिनका अधिकार उन्हें नहीं था।

लेकिन उन फैसलों के पीछे मेरी मां से किया गया एक वादा भी था।

मैं उनके पास गई।

उन्होंने कहा,

“मुझे तुम्हें सच बता देना चाहिए था।”

“हां।”

“मैं सही समय का इंतजार करता रहा।”

“ऐसा कोई सही समय था ही नहीं।”

उन्होंने आंखें बंद कर लीं।

“मैंने सोचा अगर मैं सारे कर्ज खत्म कर दूं तो शायद यह चुप्पी सही साबित हो जाएगी। फिर शादी का प्रस्ताव आया और मैंने खुद को समझाया कि शायद तुम्हारी मां भी यही चाहती।”

“मां चाहती थीं कि मुझे सच पता हो।”

“अब मुझे पता है।”

मैंने उन्हें गले लगा लिया।

सब कुछ माफ नहीं हुआ था।

लेकिन शायद माफी की शुरुआत कहीं से तो करनी थी।

तभी अदिति ने कहा,

“अभी और भी कुछ है।”

उसने रिकॉर्डिंग डिवाइस फोन से जोड़ा।

एक महिला की आवाज सुनाई दी।

मीरा।

“अगर तुम यह रिकॉर्डिंग सुन रहे हो, अर्जुन, तो इसका मतलब है कि मैं तुमसे मिल नहीं पाई।”

उसकी आवाज संयमित थी लेकिन उसमें डर छिपा था।

“मैंने यह सब अपनी मर्जी से शुरू नहीं किया था। फाउंडेशन की रिसर्च शाखा का फंड रोक दिया गया था। मैंने अस्थायी रूप से कुछ निष्क्रिय खातों से पैसे लिए थे, यह सोचकर कि ग्रांट आने पर वापस कर दूंगी।”

फिर उसने कहा,

“लेकिन तब विक्रम सेठी को पता चला।”

सावित्री का चेहरा अचानक बदल गया।

उन्होंने धीमे से कहा,

“विक्रम… मल्होत्रा समूह का मुख्य कानूनी अधिकारी था।”

रिकॉर्डिंग जारी रही।

“उसने मुझे धमकी दी कि अगर मैंने उसकी मदद नहीं की तो वह मुझे सबके सामने फंसा देगा। धीरे-धीरे पैसे रिसर्च से हटकर निजी खातों में जाने लगे।”

“जब देवेंद्र शर्मा ने गड़बड़ी पकड़ी, मैंने उनकी रिपोर्ट की कॉपी बनाई और मूल रिपोर्ट विक्रम को दे दी।”

मेरे पिता बैठ गए।

मीरा की आवाज कांप रही थी।

“मैंने खुद को समझाया कि मैं फाउंडेशन बचा रही हूं। सच यह है कि मैं खुद को बचा रही थी।”

फिर उसने कहा,

“अर्जुन ने मेरा सामना किया। मैंने विक्रम के खिलाफ सबूत देने की हामी भरी।”

एक लंबी खामोशी।

फिर उसकी आवाज टूटी।

“विक्रम को पता चल गया कि अर्जुन कौन सी कार चलाने वाला है।”

मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा।

“हमला अनन्या को डराने के लिए था। विक्रम को लगता था कि उसके पास उसके पिता की रिपोर्ट है।”

मेरी उंगलियां कांपने लगीं।

“उसने किसी आदमी को स्वास्थ्य केंद्र की कार को सड़क से हटाने का आदेश दिया था। उसे नहीं पता था कि अर्जुन उस कार में होगा।”

मीरा ने कहा,

“जब मुझे पता चला कि अर्जुन मर नहीं गया है, मैं पुलिस के पास जाना चाहती थी। लेकिन विक्रम ने उन मरीजों को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी जिनके रिकॉर्ड उसके पास थे।”

“मैं देश छोड़कर चली गई क्योंकि मैं डर गई थी।”

फिर उसने कहा,

“लॉकर 314 में मूल ट्रांसफर रिकॉर्ड हैं। विक्रम के निर्देशों की कॉपी है। और नंदिनी शर्मा का पत्र भी है।”

मैंने अपनी मां के पत्र को कसकर पकड़ा।

“अगर तुम जागो तो कंपनी के अंदर के वकीलों पर भरोसा मत करना। किसी पर भरोसा मत करना जो कहे कि परिवार को इसे अंदर ही अंदर सुलझाना चाहिए।”

फिर मीरा ने आखिरी बात कही।

“और यह मत मानना कि करण इसमें शामिल था। वह भी श्रीवर्धन की जांच कर रहा था। विक्रम ने उसके एक्सेस क्रेडेंशियल का इस्तेमाल करके ऐसा दिखाया कि ट्रांसफर करण ने मंजूर किए थे।”

रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

स्टेशन का शोर फिर सुनाई देने लगा।

सावित्री ने करण की तरफ देखा।

“तुम्हें डुप्लीकेट लेजर के बारे में पता था।”

“हां।”

“फिर तुमने कुछ कहा क्यों नहीं?”

“मैं सबूत ढूंढ रहा था।”

“तुमने मुझे तुम्हारे ऊपर शक करने दिया।”

करण की आंखों में दर्द था।

“आपने कभी यह नहीं पूछा कि मैं निर्दोष हूं या नहीं। आपने सिर्फ पूछा कि मैं अपनी बेगुनाही साबित कर सकता हूं या नहीं।”

सावित्री चुप रहीं।

करण बोला,

“नौ महीने तक मैंने कंपनी को संभाला। हर फैसला इस आधार पर तौला गया कि अर्जुन होता तो क्या करता। मुझे लगा अगर मैं विक्रम के रिकॉर्ड खुद ढूंढ लूं तो शायद एक दिन आप मुझे सिर्फ उपयोगी व्यक्ति नहीं, परिवार का हिस्सा मानेंगी।”

सावित्री की आवाज नरम हुई।

“तुम हमेशा परिवार का हिस्सा थे।”

करण ने सिर हिलाया।

“नहीं। अर्जुन था। मैं सिर्फ काम करता रहा।”

सावित्री की आंखों में आंसू आ गए।

“मैंने तुम्हारे साथ गलत किया।”

करण ने कोई जवाब नहीं दिया।

लेकिन पहली बार उसके चेहरे पर माफी की संभावना दिखाई दी।

अदिति ने दस्तावेज समेटे।

“अब यह मामला सीबीआई और ईडी को सौंपा जाएगा।”

सावित्री ने सिर हिलाया।

“कोई निजी समझौता नहीं।”

“कोई अंदरूनी जांच नहीं।”

करण ने कहा,

“सब कुछ कानूनी तरीके से।”

कुछ ही घंटों में लॉकर 314 का पूरा सामान आधिकारिक कब्जे में चला गया।

विक्रम सेठी को आधी रात से पहले दिल्ली के एक निजी एयरपोर्ट से गिरफ्तार कर लिया गया।

वित्तीय दस्तावेज, मीरा की रिकॉर्डिंग और सुरक्षा रिकॉर्ड उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत थे।

दो दिन बाद मीरा को दुबई में खोज लिया गया।

उसने भारत लौटकर जांच में सहयोग करने की सहमति दी।

उसकी गवाही से पता चला कि विक्रम ने अर्जुन के एक्सीडेंट के बाद भ्रम का फायदा उठाकर रिकॉर्ड मिटाए, मेरे पिता की प्रतिष्ठा खराब की और मल्होत्रा बोर्ड पर दबाव बनाया।

जिस ड्राइवर ने स्वास्थ्य केंद्र की कार को सड़क से धक्का दिया था, उसे सिर्फ एक मामूली दुर्घटना करवाने के पैसे दिए गए थे।

उसे नहीं पता था कि कार में अर्जुन था।

सच्चाई कोई फिल्मी षड्यंत्र नहीं थी।

न ही सिर्फ एक आदमी की बुराई।

वह डर, लालच, चुप्पी और लगातार किए गए छोटे-छोटे समझौतों की श्रृंखला थी।

और शायद यही उसे सबसे ज्यादा दर्दनाक बनाता था।

मेरे पिता का नाम सार्वजनिक रूप से साफ हो गया।

श्रीवर्धन होल्डिंग्स के गायब पैसों का पता लगाया गया।

जिन स्वास्थ्य कार्यक्रमों और चैरिटी को नुकसान हुआ था, उन्हें मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू हुई।

करण ने कंपनी के अस्थायी नियंत्रण से खुद को अलग कर लिया।

जांच में यह साबित होने के बाद कि ट्रांसफर उसने मंजूर नहीं किए थे, बोर्ड ने उसे वापस आने को कहा।

लेकिन उसने स्थायी चेयरमैन बनने से इनकार कर दिया।

उसने इसके बजाय कंपनी की सत्ता को स्वतंत्र नेतृत्व परिषद, कर्मचारियों और बाहरी नैतिक अधिकारियों में बांटने का प्रस्ताव दिया।

उसने कहा,

“अब खून के रिश्ते को योग्यता समझने का समय खत्म होना चाहिए।”

सावित्री ने उसका समर्थन किया।

इसके बदले उन्हें बोर्ड के तीन पुराने सहयोगियों को खोना पड़ा।

उन्होंने फिर भी अपना फैसला नहीं बदला।

अर्जुन की रिकवरी अखबारों की सुर्खियों से कहीं धीमी थी।

लोग उसके “चमत्कारी जागने” की कहानी पढ़ते थे।

लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि कुछ सुबह वह चम्मच तक नहीं उठा पाता था।

वे नहीं जानते थे कि फिजियोथेरेपी के बाद उसका शरीर कांपता था।

वे नहीं जानते थे कि रात में एक्सीडेंट के सपने उसे फिर डरा देते थे।

मैं हवेली में ही रही।

पहले मैंने खुद से कहा कि जांच के कारण रहना जरूरी है।

फिर डॉक्टरों ने कहा कि मैं अर्जुन की याददाश्त की एक्सरसाइज में मदद कर सकती हूं।

कुछ समय बाद मैंने खुद को कोई बहाना देना बंद कर दिया।

करीब छह हफ्ते बाद एक शाम मुझे वह हवेली के कांच वाले बगीचे में मिला।

वह व्हीलचेयर पर बैठा बारिश देख रहा था।

पास में चलने वाला फ्रेम रखा था।

मैंने कहा,

“आप भाग निकले।”

उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“कुछ समय के लिए।”

“क्या सुरक्षा को बुलाऊं?”

“उन्हें पता है।”

“इससे तो पूरा ड्रामा खराब हो गया।”

वह मुस्कुराया।

यह पहली पूरी मुस्कान थी जो मैंने उसे अस्पताल के बाद दी थी।

मैं उसके पास बैठ गई।

कुछ देर हम बारिश सुनते रहे।

फिर उसने कहा,

“तुमने पत्र पढ़ा।”

“हां।”

“मुझे नहीं पता था उसमें क्या लिखा है।”

“फिर भी तुम उसे साथ लेकर घूम रहे थे।”

“मीरा ने उस रात अलग होने से पहले मुझे वह बैग दिया था। मुझे लगा कोई मेरा पीछा कर रहा है, इसलिए मैंने उसे लॉकर में रख दिया।”

“तुमने स्वास्थ्य केंद्र की कार क्यों ली?”

“तुम्हारी मां ने बताया था कि अगले दिन तुम उसे चलाने वाली हो।”

मैंने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें लगा कोई मेरे पीछे आएगा।”

“मुझे लगा विक्रम को लगता है कि तुम्हारे पिता ने तुम्हें रिपोर्ट की कॉपी दी है।”

“इसलिए तुमने खुद को निशाना बना दिया।”

“मैंने योजना बनाई थी कि कार स्टेशन पर छोड़कर सुरक्षा अधिकारी से मिलूंगा।”

“लेकिन मीरा ने मिलने की जगह बदल दी।”

उसने सिर हिलाया।

“उसने कहा कि उसके पास सबूत है। मैंने उस पर भरोसा किया।”

“क्या उसने तुम्हें धोखा दिया?”

अर्जुन ने बारिश की तरफ देखा।

“शायद वह डर गई थी।”

“क्या तुमने उसे माफ कर दिया?”

“अभी नहीं पता।”

यह शायद उसका सबसे ईमानदार जवाब था।

फिर उसने मुझसे पूछा,

“क्या तुमने अपने पिता को माफ किया?”

“एक साथ नहीं।”

“समझदारी है।”

“लेकिन बहुत उलझा हुआ लगता है।”

“समझदारी वाली चीजें अक्सर उलझी होती हैं।”

मैं मुस्कुरा दी।

फिर वह सवाल मेरे सामने आ गया जिसे मैं इतने समय से टाल रही थी।

“तुमने शादी की व्यवस्था में मेरा नाम क्यों लिखा था?”

अर्जुन ने नजरें फेर लीं।

पहली बार वह घबराया हुआ लगा।

“वह पत्र तभी दिया जाना था अगर मैं अपने तीसवें जन्मदिन के आसपास भी बेहोश रहता।”

“यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है।”

उसने गहरी सांस ली।

“स्वास्थ्य केंद्र में तुमसे मिलने के बाद मैंने पूछा था कि तुम कौन हो।”

“सावित्री ने बताया।”

“तुम फार्मेसी में बहस कर रही थीं।”

“मैं बहस नहीं कर रही थी।”

“तुमने तीन सरकारी विभागों में शिकायत करने की धमकी दी थी।”

“दवा मंजूर थी।”

वह मुस्कुराया।

“तुम बहुत डरावनी थीं।”

मैं अपनी हंसी रोक नहीं पाई।

फिर उसने कहा,

“बाद में तुम्हारी मां ने मुझे तुम्हारे बारे में छोटी-छोटी बातें बताईं।”

“जैसे?”

“कि तुम घर जाने के लिए लंबा रास्ता चुनती थीं क्योंकि रास्ते में एक बेकरी थी जो बची हुई रोटियां आश्रम को देती थी।”

मेरी आंखें भर आईं।

“मां ने तुम्हें यह सब बताया?”

“उन्हें तुम्हारे बारे में बात करना बहुत पसंद था।”

वह कुछ पल चुप रहा।

“जब मैंने यह योजना बनाई, मुझे कंपनी के बाहर से किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जिस पर विक्रम का नियंत्रण न हो।”

“और जिसे सावित्री डरा न सकें।”

मैंने कहा,

“इस आखिरी बात का सबूत अभी बाकी है।”

वह हंसा।

“नहीं। वह साबित हो चुका है।”

मैं भी हंस पड़ी।

फिर उसका चेहरा गंभीर हो गया।

“मुझे पता था कि यह शादी अन्यायपूर्ण थी।”

“तुम बेहोश थे।”

“लेकिन व्यवस्था मैंने पहले की थी।”

“हां।”

“मैंने यह भी लिखा था कि तुम चाहो तो शादी से इनकार कर सकती हो। तुम्हें आर्थिक सुरक्षा शादी के बिना भी मिलती।”

मैं चौंकी।

“मेरे पिता ने यह नहीं बताया।”

“मुझे पता है।”

उसने नीचे देखा।

“मुझे माफ करना, अनन्या।”

उसकी माफी में कोई मांग नहीं थी।

न मुझे उसे सांत्वना देने की उम्मीद।

सिर्फ जिम्मेदारी थी।

मैंने उस आदमी को देखा जिसे मैंने पहली बार सफेद चादरों के नीचे बिल्कुल शांत पड़ा देखा था।

उस आदमी को जिसने मुझे बचाने के लिए खुद को निशाना बनाया था।

उस आदमी को जिसने अपनी जिंदगी और मेरी जिंदगी के बीच एक ऐसा समझौता बनाया था जिसे वह खुद कभी देखने की उम्मीद नहीं कर रहा था।

“अब क्या होगा?” मैंने पूछा।

“फैसला तुम्हारा होना चाहिए।”

“और तुम क्या चाहते हो?”

उसने मेरी आंखों में देखा।

“अपनी पत्नी से सच में मिलने का मौका।”

मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई।

“तुम उससे मिल चुके हो।”

“नहीं।”

उसने धीरे से कहा,

“मैं दिल्ली के स्वास्थ्य केंद्र की एक स्वयंसेवक से मिला था। फिर मैं एक ऐसी पत्नी के पास जागा जिसने डॉक्टर से झूठ बोला क्योंकि मैंने उससे ऐसा करने को कहा था।”

“तुम्हें वह याद है?”

“हर सेकंड।”

“तुम मुश्किल से बोल पा रहे थे।”

“फिर भी मैं प्रभावित था।”

मैंने नजरें झुका लीं।

अर्जुन ने मेरी अंगूठी को छुआ।

“तुम चाहो तो जा सकती हो।”

मैंने उसकी तरफ देखा।

“ट्रस्ट में बदलाव कर दिया गया है। तुम्हारे पिता के कर्ज हमारी शादी की वजह से नहीं, कानूनी मुआवजे से खत्म होंगे। तुम इस परिवार की कुछ भी ऋणी नहीं हो।”

“और अगर मैं रुकूं?”

उसकी आवाज धीमी हुई।

“तो हम शुरुआत से शुरू करेंगे।”

एक हफ्ते बाद अर्जुन ने बारह कदम चले।

पूरा परिवार कमरे में खड़ा था।

सावित्री दीवार के पास खड़ी थीं।

करण दरवाजे पर हाथ बांधे खड़ा था।

मेरे पिता एक पेपर कप में कॉफी लिए हुए थे जिसे उन्होंने छुआ तक नहीं।

अर्जुन ने वॉकर पकड़ा।

फिजियोथेरेपिस्ट उसके पास थी।

“एक कदम।”

उसने दाहिना पैर आगे बढ़ाया।

फिर बायां।

तीसरे कदम पर उसके कंधे कांपने लगे।

सातवें पर उसके माथे पर पसीना था।

दसवें पर कमरे में किसी की सांस नहीं चल रही थी।

बारहवें कदम पर उसने कुर्सी पकड़ ली।

सावित्री खिड़की की तरफ मुड़ीं और आंखें पोंछ लीं।

करण आगे आया।

“तुम्हें हमेशा दर्शक पसंद थे।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुम आए।”

“सिर्फ तुम्हारी खराब तकनीक की अफवाह की पुष्टि करने।”

दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

फिर अर्जुन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

करण ने उसे देखा।

“तुम जानते थे कि मैं श्रीवर्धन की जांच कर रहा था।”

“मुझे शक था।”

“फिर तुमने लॉकर के बारे में मुझे नहीं बताया।”

“मुझे किसी पर इतना भरोसा नहीं था।”

करण की आंखों में दर्द आया।

“यह कोई अच्छी बात नहीं है।”

“नहीं।”

अर्जुन ने हाथ आगे रखा।

“मुझे माफ करना।”

करण ने सावित्री की तरफ देखा।

फिर मेरी तरफ।

फिर उसने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“तुम्हारी पकड़ कमजोर है।”

“मैं नौ महीने कोमा में था।”

“बहाने अभी से।”

लेकिन उसने उसका हाथ तुरंत नहीं छोड़ा।

तीन महीने बाद मल्होत्रा फाउंडेशन ने दिल्ली-एनसीआर के उस स्वास्थ्य केंद्र को नए नियमों के साथ दोबारा खोला।

अब किसी एक परिवार के सदस्य के पास उसके फंड पर पूरा नियंत्रण नहीं था।

मेरे पिता वित्तीय निगरानी समिति में शामिल हुए।

मैंने उनसे कहा,

“अपना नाम साफ हो जाना पर्याप्त नहीं है। आपको उस इंसान से बेहतर बनना होगा जो सच बोलने से पहले पकड़े जाने का इंतजार करता है।”

उन्होंने सिर हिलाया।

“मैं सीख रहा हूं।”

“मैं भी।”

मीरा भारत लौट आई।

उसने जांच में सहयोग किया।

उसे पेशेवर और कानूनी परिणाम भुगतने पड़े, लेकिन उसकी गवाही से उन मरीजों की रक्षा हुई जिनके रिकॉर्ड विक्रम ने दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किए थे।

पहली सुनवाई से पहले उसने मुझसे मिलने की इच्छा जताई।

हम वकीलों के सामने एक छोटे से कमरे में बैठे।

वह पहले से ज्यादा उम्रदराज लग रही थी।

उसने कहा,

“मैंने माफी मांगने की बात सौ बार तैयार की है।”

मैंने कहा,

“तो अभी मत दोहराओ। सच बोलो।”

उसने हाथ कसकर जोड़ लिए।

“मैं डर गई थी।”

“मुझे पता है।”

“मैं खुद से कहती रही कि विक्रम रिसर्च बर्बाद कर देगा। फिर मैंने खुद से कहा कि वह मरीजों को नुकसान पहुंचाएगा। हर बार जब मैंने उसकी मदद की, मैंने अपने लिए कोई नया बहाना बना लिया।”

उसने मेरी तरफ देखा।

“तुम्हारी मां मुझे समझ गई थीं।”

“उन्होंने क्या कहा था?”

“उन्होंने कहा था कि साहस फैसला लेने से पहले नहीं आता। साहस उस फैसले की वजह से आता है।”

यह बिल्कुल मेरी मां जैसा था।

मीरा ने मेज पर एक छोटी सी चीज रखी।

वह स्वास्थ्य केंद्र का पुराना विजिटर बैज था।

उस पर मेरा नाम था।

“अर्जुन ने इसे अपनी पहली यात्रा के बाद संभालकर रखा था।”

मैंने उसे उठाया।

“उसने मेरा बैज रखा था?”

“उसने कहा था कि इससे उसे याद रहता है कि जिद कभी-कभी उपयोगी भी होती है।”

मेरी हंसी निकल गई।

मीरा की आंखों में आंसू आ गए।

“मुझे माफ कर दो, अनन्या।”

मैंने उससे यह नहीं कहा कि सब ठीक है।

क्योंकि सब ठीक नहीं था।

लेकिन मैंने इतना जरूर कहा,

“उम्मीद है कि अब तुम जो करोगी, वह उस गलती से बड़ा होगा जो तुमने तब की थी।”

वह रोते हुए सिर हिला गई।

यह पूरी माफी नहीं थी।

लेकिन शायद एक दरवाजा था।

वसंत तक अर्जुन बिना सहारे चलने लगा।

उस दिन को एक साल हो चुका था जब उसने पहली बार मेरी आवाज सुनकर आंखें खोली थीं।

उसने मुझे स्वास्थ्य केंद्र के आंगन में बुलाया।

वहां पेड़ लगाए गए थे।

बेंचें थीं।

फूलों की क्यारियां थीं।

मरीज और उनके परिवार खिड़कियों से बाहर देख रहे थे।

अर्जुन एक छोटे से गुलमोहर के पेड़ के नीचे खड़ा था।

उसने गहरे रंग का सूट पहना था लेकिन टाई नहीं।

मैंने उसे देखते ही कहा,

“तुम कुछ संदिग्ध लग रहे हो।”

उसने कहा,

“कहा जाता है यह पारिवारिक गुण है।”

“क्या किया है?”

“कुछ लापरवाही।”

“यह भी पारिवारिक गुण है।”

उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।

हम आंगन के बीच गए।

ईंटों के रास्ते में एक छोटा सा पत्थर लगा था।

उस पर लिखा था—

नंदिनी शर्मा स्मृति उद्यान

नीचे लिखा था—

उन सभी लोगों के लिए जिन्होंने तैयार होने से पहले साहस चुन लिया।

मेरी सांस रुक गई।

“तुमने यह किया?”

“अकेले नहीं।”

गुलमोहर के पीछे से मेरे पिता बाहर आए।

सावित्री फूल लेकर उनके पीछे थीं।

करण भी वहां था, ऐसा चेहरा बनाए जैसे उसे किसी भावुक समारोह में आने के लिए मजबूर किया गया हो।

आंगन में डॉक्टर, नर्स, मरीज, स्वयंसेवक और फाउंडेशन के कर्मचारी खड़े थे।

अर्जुन मेरी तरफ मुड़ा।

“एक साल पहले एक कानूनी दस्तावेज ने हमें पति-पत्नी बना दिया था।”

भीड़ में हल्की हंसी हुई।

“वह व्यावहारिक था। जटिल था। और पूरी तरह गलत क्रम में हुआ।”

मैंने कहा,

“बहुत उदार बयान है।”

वह मुस्कुराया।

“मुझे लगा इस बार क्रम ठीक कर देते हैं।”

उसने जेब में हाथ डाला।

मैंने सोचा वह नई अंगूठी निकालेगा।

लेकिन उसने वही पुरानी प्लैटिनम अंगूठी निकाली जो मैंने पहली शादी से पहनी थी।

मैंने अपनी खाली उंगली देखी।

“तुमने मेरी शादी की अंगूठी चुरा ली?”

“उधार ली है।”

मैंने पिता की तरफ देखा।

उन्होंने मासूम चेहरा बना लिया।

करण की तरफ देखा।

वह मुस्कुरा रहा था।

अर्जुन ने अंगूठी मेरी तरफ बढ़ाई।

“अनन्या शर्मा, मैं तुम्हें ऐसी जिंदगी का वादा नहीं कर सकता जिसमें कोई राज न हो। लोग बहुत अपूर्ण हैं।”

आंगन बिल्कुल शांत हो गया।

“लेकिन मैं वादा करता हूं कि डर को सुरक्षा का नाम देकर कभी चुप नहीं रहूंगा।”

“मैं पूछूंगा, अनुमान नहीं लगाऊंगा।”

“और जब सच तुम्हारे लिए मेरे बारे में सब कुछ बदल दे, तब भी मैं तुम्हें सच बताऊंगा।”

उसकी आवाज हल्की कांप रही थी।

“और हर दिन इस बात के लिए आभारी रहूंगा कि जब मैं दुनिया में वापस लौटा, तो पहली आवाज जो मैंने सुनी… वह तुम्हारी थी।”

मेरी आंखें भर आईं।

वह सावधानी से एक घुटने पर बैठ गया।

मैं तुरंत झुकी।

“अर्जुन, तुम्हारी फिजियोथेरेपिस्ट तुम्हें मार डालेगी।”

उसने कहा,

“वह तुम्हारे पीछे खड़ी है।”

मैंने पीछे देखा।

फिजियोथेरेपिस्ट मुस्कुरा रही थी।

“उसने अभ्यास किया है।”

मैं वापस अर्जुन की तरफ मुड़ी।

वह अंगूठी लिए मुझे देख रहा था।

“क्या तुम मुझसे शादी करोगी?”

मैं हंस पड़ी।

“हम पहले से शादीशुदा हैं।”

“तो इस बार अपनी मर्जी से करोगी?”

मेरी आंखों से आंसुओं के साथ हंसी निकल गई।

मैंने पिता की तरफ देखा।

वह खुलकर रो रहे थे।

सावित्री का हाथ करण की बांह पर था।

मेरी मां के नाम वाला उद्यान हमारे सामने था।

वही स्वास्थ्य केंद्र जहां हमारी जिंदगी के इतने लोग कभी एक-दूसरे को जाने बिना मिले थे।

फिर मैंने अर्जुन की तरफ देखा।

“हां।”

वह मुस्कुराया।

“हां?”

“हां।”

उसने अंगूठी मेरी उंगली में पहना दी।

पूरा आंगन तालियों से गूंज उठा।

लेकिन उस शोर के बीच मुझे अपनी मां के पत्र की पंक्तियां याद आईं—

हमारी जिंदगी सिर्फ उन चीजों से तय नहीं होती जो हमसे छीन ली गईं। हमारी जिंदगी उन चीजों से भी तय होती है जिन्हें हम दूसरों को वापस देने का चुनाव करते हैं।

थोड़ी देर बाद, छोटे से समारोह और तस्वीरों के बाद मैं सावित्री को उस स्मृति-पट्टिका के पास अकेली खड़ी मिली।

मैंने पूछा,

“आप मेरी मां को जानती थीं?”

“थोड़ा।”

“फिर आपने मुझे कभी नहीं बताया?”

उन्होंने फूलों की तरफ देखते हुए कहा,

“उन्होंने मुझसे कहा था कि जब तक अर्जुन असफल न हो, मैं हस्तक्षेप न करूं।”

“किसमें असफल?”

“वापस लौटने में।”

मैंने उन्हें देखा।

“उन्हें शादी की योजना के बारे में पता था?”

“पूरी जानकारी नहीं। लेकिन अर्जुन ने उन्हें बताया था कि अगर जांच खतरनाक हुई तो वह तुम्हारी रक्षा करेगा।”

सावित्री ने अपने बैग से एक मुड़ा हुआ कागज निकाला।

“एक और नोट था।”

बाहर मेरी मां की लिखावट थी।

सावित्री के लिए।

मैंने कागज खोला।

सावित्री,

अर्जुन सोचता है कि वह अनन्या की रक्षा कर रहा है क्योंकि अनन्या उसे याद दिलाती है कि उसके संसार के बाहर भी अच्छे लोग हैं।

वह गलत है।

वह उसकी रक्षा इसलिए कर रहा है क्योंकि अनन्या उसे उस इंसान की याद दिलाती है जो वह खुद बनना चाहता है।

अगर वह कभी यह भूल जाए…

तो उसे वापस उसके पास भेज देना।

नंदिनी

मैंने वह पंक्तियां दो बार पढ़ीं।

फिर आंगन की तरफ देखा।

अर्जुन मेरे पिता के साथ खड़ा था और मरीजों के लिए नई परिवहन योजना के बारे में सुन रहा था।

करण उनके पास खड़ा हर तीसरे आंकड़े को सुधार रहा था।

मीरा का पुराना विजिटर बैज मेरी साड़ी की जेब में था।

अब वह उस गलती की निशानी नहीं था जिसने सब कुछ बर्बाद किया था।

वह इस बात का सबूत था कि कभी-कभी सबसे छोटा पल भी किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है।

अर्जुन ने दूर से मुझे देखा।

उसकी नजर सीधे मेरी नजर से मिली।

फिर उसने पिता से विदा ली और मेरी तरफ चल पड़ा।

न कोई व्हीलचेयर।

न वॉकर।

न किसी का सहारा।

सिर्फ अर्जुन।

धीरे-धीरे लेकिन पूरी तरह अपने पैरों पर।

वह मेरे पास आकर रुका।

“मां ने तुम्हें क्या दिया?”

मैंने वह नोट मोड़कर उसके सीने पर रख दिया।

“रास्ता।”

“कहां जाने का?”

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

“घर।”

हमारे पीछे गुलमोहर के फूल हवा में हिले।

स्वास्थ्य केंद्र के दरवाजे खुले।

एक परिवार साथ-साथ बाहर आया।

अर्जुन ने हमारे जुड़े हाथों को देखा।

फिर मेरी अंगूठी को।

“क्या तुम्हें अब भी लगता है कि हमारी शादी एक भयानक विचार थी?”

मैंने पूछा,

“पहली वाली?”

“हां।”

“बिल्कुल।”

वह हंसा।

“और दूसरी?”

मैं उसके और करीब हुई।

“मुझसे पचास साल बाद पूछना।”

वह मुस्कुराया।

“पूछूंगा।”

और पहली बार…

एक ऐसी जिंदगी के बाद जो रहस्यों, झूठ और डर से भरी रही थी…

हम दोनों को भविष्य के किसी सच से डर नहीं लग रहा था।

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