मेरी मरीज 103.8 डिग्री बुखार, बैंगनी पड़ती उँगलियों और एक महीने पुराने प्लास्टर के साथ अस्पताल पहुँची थी। उस प्लास्टर के नीचे एक ऐसा भयावह सच छिपा था, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। लेकिन उसका पति मेरी आँखों में देखकर बिल्कुल शांत स्वर में बोला—“बस फ्लू है।”
जिस पल मैंने कहा कि मैं उसका प्लास्टर काटकर खोलने वाली हूँ, उसके चेहरे का सारा आत्मविश्वास घबराहट में बदल गया।
और तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं कुछ ऐसा उजागर करने वाली थी, जिसे वह हर कीमत पर छिपाना चाहता था।
उस स्ट्रेचर के कमरे में पहुँचने से पहले ही बदबू मेरी नाक तक पहुँच गई थी।
वह गंध मीठी, धातु जैसी और सड़ी हुई थी। अस्पताल की साफ-सुथरी हवा को चीरती हुई इतनी तेज थी कि नर्सिंग स्टेशन पर खड़ी दो नर्सों ने भी चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
मैं डॉ. सारा शर्मा हूँ।
आठ वर्षों से मैं आपातकालीन चिकित्सा विभाग में काम कर रही थी और इतने वर्षों में मैंने एक बात सीखी थी—
सबसे खतरनाक मरीज हमेशा शोर और अफरा-तफरी के बीच नहीं आते।
कभी-कभी वे बिल्कुल चुपचाप आते हैं।
उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति लेकर आता है जो बार-बार कहता रहता है—
“सब ठीक है।”
“बत्तीस साल की महिला,” हमारे स्टाफ नर्स मनीष ने जल्दी-जल्दी कहा। “बुखार 103.8 डिग्री, हार्ट रेट लगभग 140, ब्लड प्रेशर गिर रहा है। ठीक से प्रतिक्रिया भी नहीं दे पा रही।”
फिर उसकी नजर ट्रॉमा रूम नंबर 2 की तरफ गई।
“उनका पति लगातार कह रहा है कि फ्लू है,” उसने धीमी आवाज में कहा। “लेकिन मैडम… उनका हाथ देखिए।”
मैं तुरंत अंदर चली गई।
और उसी क्षण मेरी मेडिकल प्रवृत्ति ने खतरे की घंटी बजा दी।
बिस्तर पर एमिली मेहरा बेहद कमजोर हालत में पड़ी थी।
उसके होंठ फटे हुए थे।
चेहरा अंदर धँसा हुआ था।
और त्वचा पर वह डरावनी सफेदी थी, जिसे मैं उन मरीजों में देख चुकी थी जिनका शरीर किसी ऐसी लड़ाई से गुजर रहा होता है जिसे वह लगभग हार चुका होता है।
उसका दायाँ हाथ उँगलियों से लेकर कोहनी के ऊपर तक फाइबरग्लास के प्लास्टर में बंद था।
प्लास्टर गंदा और दागदार था।
और उसके नीचे की त्वचा इतनी सूज चुकी थी कि प्लास्टर मांस में दबता हुआ दिखाई दे रहा था।
उसकी उँगलियाँ बैंगनी पड़ चुकी थीं।
उँगलियों के सिरे नीले होने लगे थे।
मैंने धीरे से एक उँगली दबाई और रंग वापस आने का इंतजार किया।
रंग वापस नहीं आया।
“यह प्लास्टर कितने समय से लगा है?” मैंने पूछा।
कमरे के कोने में खड़ा एक आदमी धीरे-धीरे मेरी तरफ देखने लगा।
वह था एमिली का पति—डेनियल मेहरा।
उसके हाथ में कॉफी का कप था।
महँगी जैकेट।
सलीके से बने बाल।
चमकते जूते।
वह ऐसा लग रहा था जैसे किसी सामान्य मेडिकल चेकअप के लिए आया हो, न कि अपनी पत्नी को जानलेवा हालत में देख रहा हो।
“लगभग एक महीने से,” उसने बिल्कुल सहजता से कहा। “एमिली बहुत अनाड़ी है। सीढ़ियों से गिर गई थी।”
उसने कॉफी का एक घूँट लिया।
“आज सुबह इसे बुखार था। शायद मौसम बदलने की वजह से वायरल हो गया है।”
मैंने उसे घूरकर देखा।
फिर एमिली के बिगड़ते हुए शरीर की तरफ देखा।
“मिस्टर मेहरा, आपकी पत्नी की हालत बेहद गंभीर है।”
मैंने सख्त आवाज में कहा।
“उसके शरीर में गंभीर संक्रमण के संकेत हैं। मुझे यह प्लास्टर तुरंत हटाना होगा। अगर संक्रमण फैल चुका है तो उसका हाथ तक खो सकता है। और अगर यह पूरे शरीर में फैल गया, तो उसकी जान भी जा सकती है।”
मुझे डर की उम्मीद थी।
लेकिन उसके चेहरे पर डर नहीं आया।
उसका चेहरा कठोर हो गया।
“नहीं,” डेनियल ने तीखे स्वर में कहा। “उसके ऑर्थोपेडिक डॉक्टर ने कहा है कि इसे दो हफ्ते और लगा रहने देना है। उसे एंटीबायोटिक दीजिए और हम घर चले जाएँगे।”
उसकी आवाज में चिंता नहीं थी।
नियंत्रण था।
और उसी क्षण मुझे समझ आ गया—
यह कोई सामान्य मेडिकल इमरजेंसी नहीं थी।
क्योंकि उस प्लास्टर के नीचे जो कुछ था, डेनियल मेहरा नहीं चाहता था कि मैं उसे देखूँ।
एमिली ने धीमी आवाज में कराहते हुए आँखें खोलीं।
“डेनियल…”
वह तुरंत उसकी तरफ मुड़ा।
“मैं यहीं हूँ, जान।”
एमिली ने उसकी तरफ देखा।
लेकिन उसकी आँखों में कुछ अनिश्चित था।
फिर उसकी नजर मेरी तरफ चली गई।
“प्लीज़…”
उसकी आवाज मुश्किल से सुनाई दे रही थी।
मैं उसके पास झुकी।
“एमिली, मुझे बताओ तुम्हारे हाथ के साथ क्या हुआ था?”
डेनियल ने उसके जवाब देने से पहले ही बोल दिया।
“वह गिर गई थी।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“मैंने एमिली से पूछा है।”
उसका जबड़ा कस गया।
एमिली ने निगलने की कोशिश की।
“मैं…”
उसने आँखें बंद कर लीं।
“ठीक है,” मैंने धीरे से कहा। “अभी तुम्हें सब कुछ समझाने की जरूरत नहीं है। बस मुझे बताओ—क्या यह प्लास्टर इतने समय तक लगा रहना था?”
कुछ सेकंड तक कोई आवाज नहीं आई।
फिर एमिली ने फुसफुसाकर कहा—
“नहीं।”
डेनियल का चेहरा बदल गया।
यह गुस्सा नहीं था।
यह डर था।
असली डर।
मनीष ने भी उसे देख लिया।
“मैडम,” उसने धीमे से कहा, “हमें तुरंत आगे बढ़ना चाहिए।”
मैंने सिर हिलाया।
“ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स शुरू करो। दो बड़े IV लगाओ। अगर इलाज में देरी न हो तो एंटीबायोटिक से पहले ब्लड कल्चर लो। लैब्स, लैक्टेट, किडनी फंक्शन, कोएगुलेशन प्रोफाइल। ऑर्थोपेडिक्स और सर्जरी टीम को बुलाओ।”
मनीष तुरंत काम में लग गया।
मैंने प्लास्टर काटने वाली मशीन उठाई।
डेनियल मेरे सामने आकर खड़ा हो गया।
“आप गलती कर रही हैं।”
“पीछे हटिए।”
“उसे उसके ऑर्थोपेडिक डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।”
“प्लास्टर हटाने के बाद डॉक्टर उसे देख सकते हैं।”
“आप नहीं जानतीं कि इसके नीचे क्या है।”
उसके शब्द कमरे में ठहर गए।
मैंने उसे घूरकर देखा।
उसे भी नहीं पता था कि उसके नीचे क्या है।
कम से कम वह यही दिखाना चाहता था।
“बिल्कुल,” मैंने कहा। “इसीलिए इसे हटाना जरूरी है।”
मशीन चल पड़ी।
उसकी कंपन कमरे में गूँजने लगी।
एमिली दर्द से सिहर उठी।
“बस थोड़ा और,” मैंने कहा। “हम लगभग पहुँच गए हैं।”
प्लास्टर का पहला हिस्सा खुला।
और तुरंत कमरे में एक भयानक बदबू फैल गई।
मनीष ने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
मैंने नहीं किया।
प्लास्टर के नीचे त्वचा सूजी हुई और बदरंग थी।
फाइबरग्लास कई जगह मांस में दब गया था।
उँगलियाँ बुरी तरह सूजी थीं।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण चीज वह नहीं थी जो मैंने देखी।
बल्कि वह थी जो मुझे दिखाई नहीं दे रही थी।
किसी सामान्य फ्रैक्चर के बाद ठीक हो रहे मरीज में जिस साफ-सुथरी सर्जिकल ड्रेसिंग की उम्मीद होती है, वह वहाँ नहीं थी।
उसकी जगह उसके बाजू पर एक खराब तरीके से ढका हुआ घाव था।
और वह घाव पूरे फोरआर्म तक फैला हुआ था।
मेरे पेट में अजीब-सी बेचैनी हुई।
“किसी और डॉक्टर को अंदर बुलाओ,” मैंने कहा।
नर्स ने तुरंत सर्जिकल टीम को बुलाया।
डेनियल एक कदम पीछे हट गया।
एमिली छत की तरफ देख रही थी।
“एमिली,” मैंने नरम आवाज में पूछा, “क्या तुम्हारी सर्जरी हुई थी?”
उसने धीरे से कहा—
“हाँ।”
“कब?”
वह चुप रही।
डेनियल ने जवाब दिया।
“तीन हफ्ते पहले।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“किस अस्पताल में?”
वह झिझका।
“सेंट मैरी हॉस्पिटल, मुंबई।”
“किस सर्जन ने ऑपरेशन किया?”
एक और झिझक।
“डॉ. रोहित वर्मा।”
मैं उस नाम को जानती थी।
और मुझे सेंट मैरी हॉस्पिटल का ऑर्थोपेडिक विभाग भी अच्छी तरह मालूम था।
कुछ मेल नहीं खा रहा था।
“सर्जिकल ड्रेसिंग कहाँ है?”
डेनियल का चेहरा कठोर हो गया।
“प्लास्टर बदला गया था।”
“कब?”
“पिछले हफ्ते।”
“किसने बदला?”
“मेरी पत्नी की अपॉइंटमेंट थी।”
“कहाँ?”
उसने जवाब नहीं दिया।
एमिली ने बहुत धीमे कहा—
“घर पर।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“किसने बदला?”
उसकी नजर अपने पति पर चली गई।
डेनियल ने दूसरी तरफ देख लिया।
“एमिली,” मैंने कहा, “मुझे सच बताना जरूरी है। इसलिए नहीं कि किसी को सजा मिलेगी। बल्कि इसलिए कि हमें सही इलाज करना है।”
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
“डेनियल ने बदला था।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“तुमने अपनी पत्नी का प्लास्टर घर पर बदला?”
“वह मेरी मदद कर रहा था,” एमिली ने तुरंत कहा। “वह मेरी मदद करना चाहता था।”
डेनियल के कंधे थोड़े ढीले पड़े।
“उसके सर्जन ने हमें निर्देश दिए थे।”
“लिखित निर्देश?”
“मेरे पास अभी नहीं हैं।”
मैंने फिर एमिली के हाथ की तरफ देखा।
बहुत सारे सवाल थे।
एक महीने पुराना प्लास्टर।
सर्जरी का घाव।
घर पर बदला गया प्लास्टर।
खतरनाक संक्रमण।
और एक पति जो मरीज को देखने से पहले ही एक कहानी तैयार करके लाया था।
“इमेजिंग कराओ,” मैंने कहा।
डेनियल ने सिर हिलाया।
“उसके सर्जन ने पहले ही कर दी थी।”
“मैं यह नहीं पूछ रही कि पिछले महीने क्या हुआ था। मैं पूछ रही हूँ कि इस समय क्या हो रहा है।”
नर्स पहली लैब रिपोर्ट लेकर वापस आई।
“मैडम।”
मैं मुड़ी।
उसके चेहरे ने ही सब बता दिया।
“क्या?”
“व्हाइट ब्लड सेल बहुत ज्यादा हैं। लैक्टेट बढ़ा हुआ है। क्रिएटिनिन भी बढ़ा है।”
मैंने सिर हिलाया।
“फ्लूइड्स शुरू करो।”
एमिली का ब्लड प्रेशर फिर गिर गया।
डेनियल कुर्सी पर बैठ गया।
पहली बार जब से वह अस्पताल आया था, वह पति जैसा दिखा।
किसी स्थिति को नियंत्रित करने वाला आदमी नहीं।
बस अपनी पत्नी को खोने से डरा हुआ आदमी।
उसने एमिली का हाथ पकड़ लिया।
“प्लीज़ इसे बचा लीजिए।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“हम पूरी कोशिश करेंगे।”
उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं।
“वह मेरे पास जो कुछ भी है, वही है।”
एमिली ने आँखें खोलीं।
“नहीं…”
डेनियल ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
एमिली ने फुसफुसाकर कहा—
“तुम्हारे पास… घर है।”
उसका चेहरा जम गया।
मैंने यह बात अनदेखी करने का फैसला किया।
अभी ज्यादा जरूरी उसकी जान थी।
सर्जिकल टीम पहुँच गई।
डॉ. पटेल ने उसके हाथ की जाँच की।
उन्होंने प्लास्टर देखा।
फिर घाव।
फिर मेरी तरफ देखा।
“कितने समय से?”
“पति के अनुसार लगभग एक महीने से।”
डॉ. पटेल ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“और सर्जरी?”
“तीन हफ्ते पहले।”
“कहाँ?”
“सेंट मैरी, मुंबई।”
“किसने ऑपरेशन किया?”
“डॉ. रोहित वर्मा।”
डॉ. पटेल का चेहरा गंभीर हो गया।
“अजीब है।”
“क्यों?”
“मुझे याद नहीं कि वर्मा ने ऐसा कोई केस किया हो।”
डेनियल तुरंत बोला—
“रिकॉर्ड ट्रांसफर होने में समय लगता है।”
“बिल्कुल,” डॉ. पटेल ने कहा।
लेकिन उनकी आवाज में विश्वास नहीं था।
उन्होंने एमिली की उँगलियों की जाँच की।
“हमें पूरा प्लास्टर हटाना होगा।”
डेनियल खड़ा हो गया।
“नहीं।”
डॉ. पटेल ने उसकी तरफ देखा।
“मिस्टर मेहरा, आपकी पत्नी के प्लास्टर के नीचे गंभीर संक्रमण हो सकता है। जितनी देर होगी, खतरा उतना बढ़ेगा।”
डेनियल ने एमिली की तरफ देखा।
“एमिली?”
उसने आँखें बंद कर लीं।
“हटा दीजिए।”
उसके कंधे झुक गए।
“ठीक है।”
बाकी प्लास्टर भी हटा दिया गया।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
इसलिए नहीं कि दृश्य डरावना था।
बल्कि इसलिए कि वह बेहद दुखद था।
यह कोई पुरानी, ठीक होती हुई चोट नहीं थी।
घाव को ठीक होने का मौका ही नहीं मिला था।
टाँके दिखाई दे रहे थे।
कुछ ढीले पड़ चुके थे।
आसपास का ऊतक बुरी तरह सूजा हुआ था।
घाव से तरल निकल रहा था।
और बाजू पर एक हल्की-सी बदरंग रेखा अपेक्षा से कहीं दूर तक जा रही थी।
डॉ. पटेल ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“इसकी सर्जरी करनी पड़ेगी।”
डेनियल ने निगलते हुए पूछा—
“किस तरह की?”
“घाव को खोलकर संक्रमित ऊतक साफ करना होगा। अंदर क्या मिलता है, उसके आधार पर आगे तय करेंगे।”
“क्या इसका हाथ काटना पड़ेगा?”
डॉ. पटेल ने सावधानी से कहा—
“अभी हम यह नहीं कह सकते।”
डेनियल ने आँखें बंद कर लीं।
एमिली रोने लगी।
मैं उसके पास गई।
“हम सब कुछ करेंगे जो संभव है।”
उसने मेरी तरफ देखा।
“डॉक्टर…”
“हाँ?”
“क्या मैं आपको कुछ बता सकती हूँ?”
“बिल्कुल।”
उसने डेनियल की तरफ देखा।
वह फर्श को देख रहा था।
“मैं सीढ़ियों से नहीं गिरी थी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
डेनियल ने धीरे-धीरे सिर उठाया।
एमिली ने कहा—
“मैं रसोई में गिरी थी।”
मैंने इंतजार किया।
“यह कोई बहुत बड़ी गिरावट नहीं थी। मेरा पैर फिसला और मैं गलत तरीके से गिर गई।”
“उससे भी गंभीर फ्रैक्चर हो सकता है,” मैंने कहा।
उसने सिर हिलाया।
“मुझे पता है।”
“फिर सबको सीढ़ियों वाली बात क्यों बताई?”
उसकी नजर डेनियल की तरफ चली गई।
“क्योंकि… बीमा कंपनी ने सवाल पूछे थे।”
मैंने भौंहें चढ़ाईं।
“कौन से सवाल?”
“उन्होंने पूछा था चोट कैसे लगी।”
“और?”
“उन्होंने कहा कि अगर यह दुर्घटना थी तो क्लेम पूरी तरह स्वीकार नहीं हो सकता।”
डेनियल ने धीमी आवाज में कहा—
“उन्होंने ऐसा नहीं कहा था।”
एमिली ने उसकी तरफ देखा।
“तुमने मुझसे कहा था।”
“मैं तुम्हारी रक्षा कर रहा था।”
“किससे?”
वह चुप हो गया।
मैंने महसूस किया कि शायद यह सिर्फ एक भयानक रहस्य नहीं था।
शायद यह कई छोटी-छोटी गलतियों की कहानी थी।
एक मिस्ड अपॉइंटमेंट।
एक गलत समझा गया निर्देश।
घर पर बदला गया प्लास्टर।
बढ़ता हुआ घाव।
और अब एक गंभीर रूप से बीमार महिला।
लेकिन फिर भी कुछ बात मुझे परेशान कर रही थी।
डॉ. पटेल ने घाव के टाँकों को फिर से देखा।
“सारा।”
“क्या?”
“यह सामान्य फ्रैक्चर की सर्जरी जैसा क्लोजर नहीं है।”
मैंने करीब जाकर देखा।
“मतलब?”
“चीरा जितना होना चाहिए, उससे लंबा है।”
मैंने डेनियल की तरफ देखा।
उसके चेहरे से रंग उड़ गया था।
एमिली ने फुसफुसाकर कहा—
“एक और प्रक्रिया हुई थी।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“कौन-सी?”
उसने सिर हिलाया।
“मुझे नहीं पता।”
डेनियल बोला—
“कुछ जटिलता हो गई थी।”
“कौन-सी?”
“यह थोड़ा जटिल है।”
“इसीलिए हम पूछ रहे हैं।”
उसने माथा रगड़ा।
“सर्जन ने कहा था कि हल्का संक्रमण है।”
“कब?”
“लगभग दो हफ्ते पहले।”
“फिर इसे भर्ती क्यों नहीं किया गया?”
“उन्होंने कहा एंटीबायोटिक काफी होगी।”
“कौन-सी एंटीबायोटिक?”
डेनियल चुप रहा।
मैंने एमिली की तरफ देखा।
“याद है?”
“कुछ सफेद रंग की गोली थी।”
मनीष ने दवाओं की सूची देखी।
“कोई एंटीबायोटिक दर्ज नहीं है।”
मैं डेनियल की तरफ मुड़ी।
“क्या उसने दवा ली थी?”
“हाँ।”
“कौन-सी?”
“मुझे नहीं पता।”
मैंने उसे देखा।
जब भी सवाल सामान्य था, वह जवाब देता था।
जैसे ही मैं किसी ठोस जानकारी पर पहुँचती—
वह रुक जाता।
तभी उसकी जेब में रखा फोन बजा।
उसने जल्दी से फोन उठा लिया।
“कौन है?” मैंने पूछा।
“ऑफिस।”
“सुबह पाँच बजे?”
“मेरे कुछ क्लाइंट विदेश में हैं।”
वह बाहर चला गया।
मैं उसके पीछे नहीं गई।
मैं वापस एमिली के पास गई।
“सर्जरी के बाद क्या हुआ था?”
उसने थकी हुई आवाज में कहा—
“उन्होंने कहा था कि एक हफ्ते बाद वापस आना।”
“तुम गई थीं?”
“हाँ।”
“कहाँ?”
वह झिझकी।
“डॉ. वर्मा के क्लिनिक।”
“फिर?”
“उन्होंने कहा घाव ठीक दिख रहा है।”
“फिर?”
एमिली ने दरवाजे की तरफ देखा।
“डेनियल ने कहा कि प्लास्टर बहुत कस रहा है।”
मैंने सिर हिलाया।
“उसने उसे ढीला करने की कोशिश की?”
“हाँ।”
“नहीं खुला?”
“नहीं।”
“फिर उसने नया प्लास्टर लगा दिया?”
एमिली ने सिर हिलाया।
“उसने कहा था कि उसने अस्पताल में ऐसा करते देखा है।”
“कोई मेडिकल प्रोफेशनल मौजूद था?”
“नहीं।”
मेरे भीतर गुस्सा उठने लगा।
लेकिन एमिली का चेहरा माफी माँगता हुआ लग रहा था।
“वह मेरी मदद करना चाहता था।”
“मैं मानती हूँ।”
उसने आँखें बंद कर लीं।
“मैं अस्पताल वापस नहीं जाना चाहती थी क्योंकि…”
“क्यों?”
“पैसों की वजह से।”
उस जवाब ने कमरे का माहौल बदल दिया।
उसने मेरी तरफ देखा।
“हम पहले से ही कर्ज में थे।”
डेनियल वापस कमरे में आया।
मैंने उसकी तरफ देखा।
“एमिली कह रही है कि पैसों की वजह से वह वापस नहीं आना चाहती थी।”
उसने नजरें झुका लीं।
“वह बहुत चिंता करती है।”
“नहीं,” एमिली ने कहा। “मैं नहीं करती।”
डेनियल उसके पास बैठ गया।
“एमिली, हम सब संभाल लेंगे।”
उसने उसकी तरफ देखा।
“तुम हमेशा यही कहते हो।”
उसकी आवाज में गुस्सा नहीं था।
सिर्फ थकान थी।
सर्जिकल टीम उसे ऑपरेशन थिएटर ले जाने की तैयारी करने लगी।
मैंने डेनियल से कहा कि वह बाहर आए।
वह अनिच्छा से मेरे साथ आया।
कॉरिडोर में शांति थी।
मैंने धीमी आवाज में कहा—
“मिस्टर मेहरा, आपको समझना होगा कि आपकी पत्नी गंभीर हालत में है। मुझे बीमा, प्लास्टर, पैसे या किसने क्या किया, इससे कोई मतलब नहीं। अभी मेरा एक ही उद्देश्य है—उसका हाथ और उसकी जान बचाना।”
“मैं समझता हूँ।”
“तो हमें पूरी जानकारी दीजिए।”
“मैंने सब बता दिया।”
“नहीं।”
उसने मेरी तरफ देखा।
“आपने हमें टुकड़ों में जानकारी दी है।”
वह चुप रहा।
“क्या छिपा रहे हैं?”
उसकी नजर ट्रॉमा रूम की तरफ गई।
“कुछ नहीं।”
“फिर आपने प्लास्टर हटाने से रोकने की कोशिश क्यों की?”
उसने सिर झुका लिया।
कुछ क्षण बाद बोला—
“क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि कोई उसे देखे।”
“क्या?”
उसने हाथों को आपस में रगड़ा।
“मुझे नहीं पता।”
यह उसका अब तक का सबसे ईमानदार जवाब था।
मैंने आवाज नरम कर ली।
“डेनियल, अगर आपसे गलती हुई है तो हमें बताइए। अगर एमिली से हुई है तो बताइए। अगर सर्जन से हुई है तो बताइए। इससे अभी हमारे इलाज पर असर पड़ेगा।”
उसकी आँखें भर आईं।
“मैं डर गया था।”
“किस बात से?”
“मुझे लगा वे मुझे दोष देंगे।”
“किस बात के लिए?”
उसने धीरे से कहा—
“मैंने प्लास्टर बदला था।”
“मुझे पता है।”
“मुझे लगा मैं इसे ठीक कर सकता हूँ।”
“जब दर्द बढ़ा तो आपको उसे वापस डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए था।”
“मुझे पता है।”
“जब बुखार आया?”
“मैंने सोचा फ्लू है।”
“आपको घाव के बारे में पता था।”
उसने सिर हिलाया।
“मुझे पता था कि कुछ सही नहीं है।”
“फिर आपने फ्लू क्यों कहा?”
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
“क्योंकि मुझे समझ नहीं आया कि और क्या कहूँ।”
वह जवाब मेरे मन में रह गया।
इसलिए नहीं कि इससे उसकी गलती माफ हो जाती थी।
नहीं।
बल्कि इसलिए कि डर कभी-कभी सामान्य लोगों से भी भयानक फैसले करवा देता है।
नाटकीय नहीं।
छोटे फैसले।
ऐसे फैसले जो उस समय मामूली लगते हैं।
जब तक बहुत देर नहीं हो जाती।
एक घंटे बाद डॉ. पटेल वापस आए।
“वह ऑपरेशन से बाहर आ गई है।”
मैंने राहत की साँस ली।
“कितनी गंभीर स्थिति थी?”
“गंभीर थी, लेकिन इलाज संभव है। सर्जिकल साइट के आसपास संक्रमित ऊतक था। हमने उसे साफ कर दिया। हाथ में अभी भी रक्त प्रवाह है।”
“यह अच्छी बात है।”
“हाँ।”
“कल्चर?”
“रिपोर्ट आनी बाकी है।”
मैंने सिर हिलाया।
“कोई हार्डवेयर?”
“हाँ।”
“क्या वह संक्रमित दिखा?”
“अभी स्पष्ट नहीं है। आगे पता चलेगा।”
मैंने लंबे चीरे के बारे में सोचा।
“कुछ असामान्य मिला?”
डॉ. पटेल थोड़ी देर चुप रहे।
“हमें मेडिकल ट्यूबिंग का एक छोटा टुकड़ा मिला।”
मैंने भौंहें सिकोड़ लीं।
“ट्यूबिंग?”
“लगभग दो इंच।”
“ड्रेन?”
“संभवतः।”
“क्या वह वहाँ होना चाहिए था?”
“यही पता लगाना होगा।”
मैंने गहरी साँस ली।
अगली सुबह एमिली होश में थी।
उसका बुखार कम हो चुका था।
“डेनियल?” उसने पूछा।
“यहीं है।”
मैंने उसके पास जाकर उसकी हालत देखी।
“तुम कैसी महसूस कर रही हो?”
“जैसे एक साल से सो रही थी।”
मैं मुस्कुराई।
“गंभीर संक्रमण के बाद ऐसा महसूस हो सकता है।”
उसने मेरी तरफ देखा।
“डॉक्टर… क्या मैं आपसे एक बात पूछ सकती हूँ?”
“बिल्कुल।”
“क्या मेरा हाथ बच जाएगा?”
“अभी हम आशावादी हैं।”
उसने आँखें बंद कर लीं।
“भगवान का शुक्र है।”
फिर उसने डेनियल की तरफ देखा।
“मुझे उसे बताना होगा।”
डेनियल ने कोई जवाब नहीं दिया।
“किस बारे में?” मैंने पूछा।
एमिली ने मेरी तरफ देखा।
“जिस डॉक्टर ने मेरा ऑपरेशन किया था, वह डॉ. रोहित वर्मा नहीं था।”
डेनियल का चेहरा बदल गया।
“क्या?”
एमिली ने सिर हिलाया।
“मुझे लगा था वही हैं।”
“तो कौन था?”
“मुझे नहीं पता।”
“तुम्हें कैसे नहीं पता?”
“मुझे बेहोश किया गया था।”
डेनियल धीरे-धीरे बैठ गया।
“एमिली…”
वह बोलती रही।
“डेनियल ने मुझे बताया था कि डॉ. वर्मा ही ऑपरेशन करेंगे।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
उसने फर्श की तरफ देखा।
एमिली ने कहा—
“क्योंकि डॉ. वर्मा को वहाँ होना था।”
“होना था?”
उसने सिर हिलाया।
“डेनियल ने सब कुछ तय किया था।”
मैंने डेनियल की तरफ देखा।
“ऑपरेशन वास्तव में कहाँ हुआ?”
उसकी चुप्पी ही जवाब थी।
कुछ सेकंड बाद उसने फुसफुसाकर कहा—
“नॉर्थब्रिज सर्जिकल सेंटर, पुणे।”
मैं उस जगह का नाम जानती थी।
एक छोटा निजी सर्जिकल सेंटर।
मुझे यह भी पता था कि हाल ही में उसे एक बड़े मेडिकल ग्रुप ने खरीदा था।
“डॉ. वर्मा की जगह किसने ऑपरेशन किया?”
डेनियल ने धीरे से कहा—
“डॉ. अमित राणा।”
“क्यों?”
“डॉ. वर्मा उपलब्ध नहीं थे।”
“फिर एमिली को क्यों नहीं बताया?”
“मैंने सोचा था बताया है।”
एमिली ने सिर हिलाया।
“नहीं बताया था।”
मैंने डेनियल की तरफ देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे लगा वह मना कर देगी।”
“आपने उससे बिना पूछे फैसला किया?”
उसने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
उसकी आवाज बहुत धीमी थी।
“मैंने गलती की।”
एमिली की आँखों में आँसू आ गए।
“मुझे सच से बचाने के नाम पर तुमने मुझसे मेरी अपनी जिंदगी के फैसले छीन लिए।”
डेनियल ने कुछ नहीं कहा।
मैंने उस कमरे से बाहर निकलते हुए सोचा—
रहस्य बदल चुका था।
यह सिर्फ पति द्वारा की गई गलती की कहानी नहीं थी।
अब सवाल यह था—
असल में एमिली का ऑपरेशन किसने किया था?
और किसी ने सर्जन का नाम छिपाने की कोशिश क्यों की?
उसी दोपहर अस्पताल को नॉर्थब्रिज से रिकॉर्ड मिले।
डॉ. अमित राणा ने ही एमिली का ऑपरेशन किया था।
डॉ. रोहित वर्मा उस दिन मौजूद नहीं थे।
रिकॉर्ड में गलती से किसी दूसरे डॉक्टर का नाम दर्ज हो गया था।
लेकिन फिर भी एक सवाल बचा था।
डॉ. राणा का नाम सही तरीके से क्यों नहीं लिखा गया?
और घर पर प्लास्टर बदलने की नौबत क्यों आई?
जाँच आगे बढ़ी तो सच धीरे-धीरे सामने आने लगा।
नॉर्थब्रिज ने डेनियल को मौखिक निर्देश दिए थे।
डेनियल ने उन निर्देशों को गलत समझ लिया था।
क्लिनिक ने मान लिया कि अस्पताल फॉलो-अप करेगा।
अस्पताल ने मान लिया कि नॉर्थब्रिज करेगा।
बीमा कंपनी की मंजूरी में देरी हुई।
डॉक्टर ने दवा इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भेजी, लेकिन फार्मेसी ने उसे ऐसे स्टोर पर भेज दिया जहाँ डेनियल शायद ही कभी जाता था।
किसी एक गलती ने एमिली की हालत खराब नहीं की थी।
छोटी-छोटी गलतियों की एक लंबी श्रृंखला ने उसे यहाँ तक पहुँचाया था।
और उस श्रृंखला में डेनियल ने सवाल पूछना बंद कर दिया था।
क्योंकि उसे डर था कि जवाब बहुत महँगा पड़ेगा।
दो हफ्ते बाद एमिली को अस्पताल से छुट्टी मिल गई।
उसकी रिकवरी धीमी थी।
उसे फिर से साधारण काम सीखने पड़े।
कप पकड़ना।
कमीज़ के बटन लगाना।
चाबी घुमाना।
वह फिजिकल थेरेपी से नफरत करती थी।
“मैंने सोचा था अस्पताल लोगों को ठीक करते हैं,” उसने एक फॉलो-अप के दौरान मुझसे कहा।
“करते हैं।”
“तो ठीक होने में इतना दर्द क्यों होता है?”
“क्योंकि तुम्हारे शरीर को काम करना पड़ता है।”
वह मुस्कुराई।
“आपके पास हर सवाल का जवाब होता है।”
“डॉक्टर होने का नुकसान है।”
उसकी हालत धीरे-धीरे सुधरती गई।
डेनियल ज्यादातर अपॉइंटमेंट पर उसके साथ आता।
शुरुआत में वह हर काम में दखल देता था।
फिर एमिली ने उसे कई बार रोकना शुरू किया।
और धीरे-धीरे वह रुक गया।
उसने मदद करने से पहले पूछना सीख लिया—
“क्या तुम्हें मेरी मदद चाहिए?”
बजाय इसके कि वह बिना पूछे उसकी मदद करने लगे।
यह छोटा बदलाव था।
लेकिन उनकी जिंदगी अब छोटे बदलावों से ही बन रही थी।
तीन महीने बाद एमिली अंतिम जाँच के लिए अस्पताल आई।
उसका हाथ पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ था।
शायद कभी पूरी तरह सामान्य होता भी नहीं।
लेकिन अब वह अपनी उँगलियाँ हिला सकती थी।
गाड़ी चला सकती थी।
आंशिक रूप से काम पर लौट चुकी थी।
और सबसे महत्वपूर्ण—
वह अपने मेडिकल फैसले खुद लेने लगी थी।
डेनियल कॉरिडोर में उसका इंतजार कर रहा था।
“कैसी है?” उसने मुझसे पूछा।
“बहुत अच्छी।”
उसके चेहरे पर मुस्कान आई।
“वह खुद आपको बताएगी।”
एमिली कमरे से बाहर आई।
“मैं कैसी रही?”
“बहुत अच्छी।”
उसने डेनियल की तरफ देखा।
“आज डिनर?”
“तुम्हारी पसंद।”
एमिली ने भौंह उठाई।
“मेरी पसंद?”
“बिल्कुल।”
वह मुस्कुराई।
“तुम सीख रहे हो।”
“हाँ।”
दोनों साथ-साथ कॉरिडोर में आगे बढ़ गए।
मैं उन्हें तब तक देखती रही जब तक वे मोड़ के पीछे गायब नहीं हो गए।
उनकी कहानी का अंत परफेक्ट नहीं था।
असल जिंदगी शायद ही कभी परफेक्ट होती है।
अभी भी बिल थे।
अपॉइंटमेंट थे।
फिजिकल थेरेपी थी।
मुश्किल बातचीत थी।
और भरोसा था जिसे एक-एक फैसले के साथ फिर से बनाना था।
लेकिन कभी-कभी मजबूती किसी बड़े बदलाव की तरह दिखाई नहीं देती।
कभी-कभी वह इस रूप में दिखाई देती है कि एक पति आखिरकार अपनी पत्नी से पूछता है—
“तुम क्या चाहती हो?”
कभी वह इस रूप में दिखाई देती है कि एक मरीज डरकर लिफाफा छिपाने के बजाय उसे खोलती है।
कभी वह सिर्फ तीन शब्द होते हैं—
“मुझसे गलती हुई।”
और कभी-कभी शरीर के पूरी तरह ठीक होने से बहुत पहले ही असली उपचार शुरू हो जाता है।
एक सप्ताह बाद मुझे एमिली का हाथ से लिखा हुआ एक छोटा-सा पत्र मिला।
वह बहुत लंबा नहीं था।
उसने नर्सों को धन्यवाद दिया।
डॉ. पटेल को धन्यवाद दिया।
मुझे धन्यवाद दिया।
और अंत में उसने लिखा—
“जब मैं अस्पताल आई थी, मुझे लगा था कि उस प्लास्टर के नीचे सबसे भयानक चीज संक्रमण है।
मैं गलत थी।
संक्रमण कहानी का सिर्फ एक हिस्सा था।
उसके नीचे उन सारी बातों का बोझ छिपा था जिन्हें कहने से हम डरते रहे।
और अजीब बात यह है कि जिस दिन हमने आखिरकार सच बोलना शुरू किया, उसी दिन से हम ठीक होना शुरू हुए।
मैंने वह पत्र संभालकर रख लिया।
इसलिए नहीं कि मुझे लगता है हर मुश्किल कहानी का अंत खूबसूरत होता है।
बल्कि इसलिए कि एमिली ने मुझे एक ऐसी बात याद दिलाई जिसे कभी-कभी चिकित्सा की दुनिया भी भूल जाती है।
हम घावों का इलाज करते हैं।
हम संक्रमण का इलाज करते हैं।
हम टूटी हुई हड्डियाँ जोड़ते हैं।
लेकिन इंसानों को सच की भी जरूरत होती है।
उन्हें सवाल पूछने की आजादी चाहिए।
और कभी-कभी, किसी भी दवा से ज्यादा, उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो उनसे कह सके—
“तुम्हें यह सब अकेले नहीं सहना है।”
