PART 2
मैंने कपड़े के नीचे से पर्ची निकाली और प्रधान अधिकारी के सामने रख दी।
—नीलामी बंद करने का लिखित आदेश है तो दिखाइए।
उसने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे उसे इस उत्तर की आशा नहीं थी। उसके पीछे खड़े दो कर्मचारी बार-बार भीड़ देख रहे थे। करीब तीन सौ लोग चौक में जमा हो चुके थे। दुकानों की छतों पर भी चेहरे दिखाई दे रहे थे।
अधिकारी ने दाँत भींचकर कहा—
—आप जानते हैं यह किसकी वस्तु है?
मैंने जूती की ओर देखा।
—इसीलिए तो सार्वजनिक नीलामी हो रही है।
—इसे ढक दीजिए। अभी।
मेरे भीतर भी डर था। हाथ की उँगलियाँ पर्ची के किनारे पर कस गई थीं। मैं जानता था कि हैदराबाद मेरा नगर नहीं था। यहाँ हर चौकी, हर दफ्तर और हर सरकारी आदमी अंततः महल की ओर देखता था। यदि वे मुझे उठाकर धर्मशाला पहुँचा देते, तो मेरे पास शिकायत करने वाला भी कोई नहीं था।
फिर मेरी नजर उस बूढ़े मोची पर पड़ी। वह अब भी जूती की एड़ी देख रहा था। चाँदी का धागा धूप में चमका। कल दरबार में वह निशान केवल सजावट लगा था। इस समय वह किसी हस्ताक्षर जैसा लग रहा था—ऐसा हस्ताक्षर जिसे मिटाने के लिए पूरी जूती मिटानी पड़ती।
मैंने प्रधान अधिकारी से कहा—
—हुजूर ने इसे मुझे स्वयं दिया है। बेचने के लिए। उनके दफ्तर ने इसकी पर्ची दी है। यदि आप कहें कि यह शाही जूती नहीं है, तो मैं नीलामी रोक दूँगा।
भीड़ एकदम शांत हो गई।
अधिकारी की आँखें एड़ी पर टिक गईं। वह निशान पहचानता था। उसके होंठ खुले, पर आवाज नहीं निकली।
बूढ़ा मोची थोड़ा आगे आया।
उसने हाथ जोड़कर कहा—
—मैं बीस साल महल के लिए जूते सीता रहा हूँ। यह चिह्न केवल निजाम के निजी जोड़ों पर बनता है।
किसी ने पीछे से पूछा—
—तो पर्ची में क्या लिखा है?
यही वह प्रश्न था जिसका हम सब इंतजार कर रहे थे। मैं भी। मुंशी ने कल तीन पंक्तियाँ लिखी थीं, पर मैंने जानबूझकर उन्हें नहीं पढ़ा था। मुझे केवल इतना भरोसा था कि लाल मुहर के नीचे दरबार अपने शब्द से पीछे नहीं हट सकता। फिर भी उस कागज में कोई ऐसी बात भी हो सकती थी जो नीलामी को रोक दे।
मैंने पर्ची उठाई। लाल मोम ठंडा होकर कठोर हो चुका था। अंगूठे के हल्के दबाव से मोड़ खुला। कागज पर स्याही कुछ जगह गहरी, कुछ जगह हल्की थी। ऊपर तारीख थी। नीचे मुंशी के हस्ताक्षर। बीच की तीन पंक्तियाँ मैंने पहले मन में पढ़ीं।
मेरी छाती के भीतर अटका साँस धीरे से निकला।
मैंने पर्ची शिवप्रसाद को दी।
—ऊँची आवाज में पढ़ो। एक शब्द भी मत बदलना।
उसके हाथ काँप रहे थे। उसने गला साफ किया और पढ़ा—
—“आज दरबार-ए-आला से पंडित मदन मोहन मालवीय को उनके प्रस्तावित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय हेतु दान में निजाम की एक प्रयुक्त शाही जूती दी गई, जिसे बेचकर प्राप्त पूरी राशि विश्वविद्यालय कोष में जमा की जाएगी।”
नीचे लिखा था—
—“दान वापस नहीं लिया जाएगा।”
प्रधान अधिकारी का चेहरा ढीला पड़ गया।
दरबार में जिस जूती से मुझे छोटा किया गया था, बाजार में उसी जूती के नीचे निजाम की अपनी मुहर लगी थी।
कुछ पल किसी ने कुछ नहीं कहा। फिर भीड़ के बीच से किसी के सिक्के खनके। सामने खड़े कपड़ा व्यापारी जमनादास ने अपनी थैली मेज पर रख दी।
उसने ऊँची आवाज में कहा—
—मेरी पहली बोली पाँच सौ रुपये।
शिवप्रसाद ने मेरी ओर देखा। उस समय पाँच सौ रुपये भी हमारे लिए बड़ी रकम थी। पत्थर वाले का भुगतान निकल सकता था। मैं सिर हिला पाता, उससे पहले दाईं ओर इत्र की दुकान के मालिक अब्दुल वहीद ने हाथ उठा दिया।
—सात सौ।
पीछे से आवाज आई—
—एक हजार।
लोग मुड़े। यह बोली महल के अधिकारी के साथ आए कर्मचारी ने लगाई थी। उसने शायद जूती वापस लेने का रास्ता समझ लिया था। प्रधान अधिकारी ने उसे बहुत हल्का-सा संकेत किया।
मैंने मेज के किनारे रखी छोटी पीतल की कटोरी उठाई और लकड़ी पर बजाई।
—नीलामी सबके लिए खुली है। हर बोली दर्ज होगी। भुगतान के बाद रसीद दी जाएगी।
शिवप्रसाद ने नीली बही खोल ली। पहले पन्ने पर समय लिखा—दस बजकर बारह मिनट। फिर नाम और रकम।
अब्दुल वहीद ने कहा—
—बारह सौ।
जमनादास ने तुरंत उत्तर दिया—
—पंद्रह सौ।
महल के कर्मचारी ने कहा—
—दो हजार।
भीड़ में हलचल हुई। दो हजार रुपये में उस समय कई छोटे मकान खरीदे जा सकते थे। पर जूती अब चमड़े का टुकड़ा नहीं रही थी। हर नई बोली के साथ वह उस वाक्य का मोल बनती जा रही थी जो दरबार में बोला गया था—“इसे बेच लो।”
प्रधान अधिकारी ने मुझे अलग ले जाने की कोशिश की।
वह करीब आया और धीमे स्वर में बोला—
—पंडित जी, बात बढ़ाना किसी के हित में नहीं है। दो हजार स्वीकार कीजिए और इसे हमें दे दीजिए।
मैंने भी धीमे स्वर में कहा—
—बात मैंने नहीं बढ़ाई। बोली बढ़ रही है।
—आप निजी समझौता कर सकते हैं।
—यह दान विश्वविद्यालय के नाम है। निजी समझौता मैं किस अधिकार से करूँ?
उसकी नजर पर्ची पर गई। उसमें लिखी अंतिम पंक्ति शायद उसे भीतर तक चुभ रही थी। दान वापस नहीं लिया जाएगा। यदि जूती बलपूर्वक ले जाई जाती, तो बाजार में खड़े तीन सौ लोग जानते कि शाही दान वापस लिया गया। यदि वे बोली लगाते, रकम विश्वविद्यालय को जाती। दोनों रास्ते अब हमारे नहीं, उनके चुनाव थे।
वह गाड़ी की ओर लौट गया। उसके एक कर्मचारी ने छोटा कागज लिखा और घुड़सवार को दिया। घोड़ा उत्तर की ओर दौड़ गया।
नीलामी चलती रही।
एक सर्राफ ने ढाई हजार कहा। महल की ओर से तीन हजार आया। जमनादास ने साढ़े तीन हजार कर दिया। वह हर बोली के बाद अपनी मूँछ सहलाता, पर उसकी आँखें जूती पर नहीं, मेरे पीछे रखे उस छोटे संदूक पर थीं जिसमें चंदे की रसीदें रखी थीं।
मैंने पूछा—
—आप इतनी बड़ी रकम क्यों लगा रहे हैं?
उसने कंधा उचकाया।
—मेरी बेटी को पढ़ना है। बनारस दूर है, पर रास्ता कहीं से तो खुलेगा।
बस इतना कहकर उसने फिर हाथ उठा दिया।
—चार हजार।
अब्दुल वहीद इस बार चुप था। मैंने सोचा उसकी सीमा आ गई। फिर उसने दुकान के भीतर खड़े अपने बेटे को बुलाया। लड़का एक लकड़ी की पेटी लेकर आया। अब्दुल ने पेटी खोली, चाँदी के सिक्कों की पंक्तियाँ दिखीं।
उसने कहा—
—चार हजार पाँच सौ। मेरे पिता अरबी और गणित पढ़ाते थे। कहते थे, ज्ञान पर नाम की मुहर नहीं लगती।
उसने आगे कुछ नहीं कहा।
भीड़ में खड़े कुछ लोगों ने ताली बजाई, पर मैंने कटोरी फिर बजाई। यह सभा नहीं थी। हमें ऐसी उत्तेजना से बचना था जो नीलामी को झगड़े में बदल दे। एक क्षण की गड़बड़ी महल को पूरा अवसर दे सकती थी।
मैंने साफ स्वर में कहा—
—यहाँ किसी व्यक्ति या किसी समुदाय के विरुद्ध कुछ नहीं कहा जाएगा। हम केवल विश्वविद्यालय के लिए बोली ले रहे हैं। जिसे बोली लगानी है, रकम और नाम बताए।
आवाजें शांत हो गईं।
ग्यारह बजे दूसरा घुड़सवार आया। उसने प्रधान अधिकारी को महल का संदेश दिया। अधिकारी ने पढ़ते ही जूती की ओर देखा, फिर अपने कर्मचारी को संकेत किया।
कर्मचारी ने कहा—
—पाँच हजार।
जमनादास ने उत्तर दिया—
—पाँच हजार पाँच सौ।
—छह हजार।
—साढ़े छह।
—सात।
रकम इतनी तेजी से बढ़ी कि शिवप्रसाद को नाम लिखने में कठिनाई होने लगी। उसकी कलम से स्याही का छोटा धब्बा पन्ने पर गिरा। उसने कपड़े से सोखा, फिर अगली पंक्ति लिखी। मैं उसके कंधे के ऊपर से बही देख रहा था। हर अंक मुझे ईंट, पुस्तक, मेज और छात्रावास की खिड़की में बदलता दिख रहा था।
मेरे भीतर एक दूसरी चिंता भी उठ रही थी। क्या हम अपमान का तमाशा बना रहे थे? विश्वविद्यालय का जन्म किसी की सार्वजनिक लज्जा पर होना चाहिए या लोगों के विश्वास पर? जूती ने बाजार खींच लिया था, लेकिन भवन केवल उत्सुकता से नहीं बनता। उसके लिए लंबे समय का भरोसा चाहिए।
मैंने नीलामी दस मिनट के लिए रोकी।
प्रधान अधिकारी तुरंत आगे आया।
—अच्छा किया। अब वस्तु सौंप दीजिए।
मैंने कहा—
—मैं एक शर्त जोड़ रहा हूँ।
—आप शर्त नहीं जोड़ सकते।
—मैं बोली की बात कर रहा हूँ। सबसे ऊँची बोली लगाने वाले का नाम विश्वविद्यालय की दान-बही में लिखा जाएगा। वस्तु चाहे वह अपने पास रखे, चाहे महल को लौटा दे।
यह सुनकर बाजार की हवा जैसे बदल गई। अब जो जूती खरीदता, वह केवल निजाम की चीज नहीं खरीदता; वह विश्वविद्यालय की पहली कठिन घड़ी में अपना नाम लिखाता।
पीछे खड़ी एक बुजुर्ग महिला ने अपने पोते से कुछ कहा। लड़का आगे आया और मेरी मेज पर पाँच रुपये रख गया।
उसने कहा—
—हम बोली नहीं लगा सकते। इसे अलग चंदे में लिख लीजिए।
शिवप्रसाद ने दूसरी बही खोल दी।
उसके बाद जैसे चौक में एक और नीलामी शुरू हो गई—जूती की नहीं, अपनी सामर्थ्य की। कोई दो रुपये देने लगा, कोई ग्यारह, कोई पचास। एक फल बेचने वाले ने दिन की पहली कमाई रख दी। एक रिक्शा खींचने वाले ने चार आने दिए। किसी ने नाम लिखवाया, किसी ने मना कर दिया।
महल का अधिकारी यह सब देखता रहा। अब यदि वह जूती लेकर चला भी जाता, तो बाजार खाली नहीं होता।
बारह बजे तक जूती की बोली दस हजार पार कर गई और छोटे चंदे का संदूक भी भरने लगा। धूप सीधी सिर पर थी। शिवप्रसाद के माथे से पसीना बही पर टपकने वाला था। अब्दुल वहीद ने अपनी दुकान से कपड़े की छतरी मँगाकर हमारे ऊपर लगवा दी। जमनादास ने पानी के घड़े रखवा दिए। दोनों कुछ देर पहले एक-दूसरे के सामने बोली लगा रहे थे; अब एक सिक्के गिन रहा था और दूसरा रसीदों को हवा में सुखा रहा था।
मैंने उस दृश्य को देखा और पहली बार सुबह से मेरी पकड़ ढीली हुई। शायद विश्वविद्यालय की पहली कक्षा किसी भवन में नहीं, इसी बाजार में लग रही थी। कोई शिक्षक नहीं था, फिर भी लोग सीख रहे थे कि एक साझा काम के सामने अपनी पहचान छोटी की जा सकती है।
तभी महल की बड़ी गाड़ी आई। इस बार उसके साथ कोई घुड़सवार नहीं था। गाड़ी से वही दुबला मुंशी उतरा जिसने पर्ची लिखी थी। नीली जिल्द वाली बही आज भी उसके सीने से लगी थी।
प्रधान अधिकारी उसे किनारे ले गया। दोनों में कुछ देर धीमी बात हुई। मुंशी ने सिर हिलाया, फिर मेरे पास आया।
उसने कहा—
—हुजूर आपसे अकेले बात करना चाहते हैं। गाड़ी तैयार है।
भीड़ में हल्की बेचैनी हुई। शिवप्रसाद ने तुरंत मेरा हाथ पकड़ लिया।
—अभी मत जाइए। नीलामी अधूरी है।
मुंशी ने उसकी ओर देखा।
—नीलामी रोकने का आदेश नहीं है। प्रधान अधिकारी यहाँ रहेगा। पंडित जी लौटकर इसे पूरा कर सकते हैं।
मैंने पूछा—
—पर्ची का क्या होगा?
—वह आपके पास रहेगी।
—जूती?
—मेज पर रहेगी। सबके सामने।
मैंने शिवप्रसाद को दोनों बहियाँ दीं।
—हर रकम दर्ज करना। बिना रसीद एक पैसा मत लेना। और अगर मैं दो घंटे में न लौटूँ…
वह मेरी बात काटकर बोला—
—तो?
मैंने बाजार की ओर देखा।
—तो नीलामी नियत समय पर पूरी करना।
गाड़ी के भीतर मोटे परदे लगे थे। बाहर का बाजार कुछ ही क्षण में आवाजों से धुँधली गूँज बन गया। रास्ते भर मुंशी चुप बैठा रहा। उसकी बही घुटनों पर थी। मैं जानना चाहता था कि उसने वह अंतिम पंक्ति क्यों लिखी—दान वापस नहीं लिया जाएगा। निजाम ने उसे लिखने को कहा था या उसने अपने दफ्तर की सामान्य भाषा के अनुसार जोड़ दिया था? पर मैंने पूछा नहीं। कभी-कभी एक आदमी का छोटा-सा नियम बड़े आदमी के अहंकार से अधिक शक्तिशाली हो जाता है।
महल पहुँचा तो कल वाला दरबार नहीं लगा था। मुझे एक लंबे कमरे में ले जाया गया। खिड़कियों के परदे भीतर से बंद थे। मेज पर वही हरे काँच वाला दीया रखा था, पर दिन के उजाले में बुझा हुआ। निजाम अकेले नहीं थे। दो मंत्री और कोषाध्यक्ष भी मौजूद थे।
निजाम ने बैठने का संकेत नहीं किया।
उन्होंने सामने रखी पर्ची की नकल उठाई और पूछा—
—आपने मेरे दान की नीलामी लगा दी?
मैंने कहा—
—आपने बेचने को कहा था।
—आप समझते हैं इससे मेरी प्रतिष्ठा बढ़ रही है?
मैंने उत्तर देने से पहले उनके चेहरे को देखा। कल उनमें जो खिलंदड़ा तिरस्कार था, वह नहीं था। आज वे नाराज थे, लेकिन उससे अधिक चौकन्ने। उन्हें पहली बार उस विश्वविद्यालय की चिंता नहीं थी; उन्हें अपने नाम की थी। मैं यह जानता था। फिर भी मैं उन्हें अपमानित करके धन लेना नहीं चाहता था। ऐसा धन भवन खड़ा कर सकता था, संबंध नहीं।
मैंने धीरे से कहा—
—प्रतिष्ठा जूती से न बढ़ती है, न घटती है। वह इस बात से बनती है कि देने वाला अपने दिए हुए के साथ क्या करता है।
एक मंत्री ने कुर्सी पर करवट बदली। निजाम की उँगली मेज पर पड़ी पर्ची की नकल पर चली गई।
उन्होंने कहा—
—बाजार में अभी कितनी बोली है?
—जब मैं निकला, दस हजार से ऊपर।
कोषाध्यक्ष ने सिर उठाया। शायद उसे इतनी रकम की आशा नहीं थी।
निजाम ने पूछा—
—यदि मैं उससे अधिक दे दूँ तो जूती लौट आएगी?
—यदि आपकी बोली सबसे ऊँची हुई तो वह आपकी होगी। लेकिन रकम विश्वविद्यालय को जाएगी और रसीद आपके नाम बनेगी।
—और यह भीड़?
—उसे बताया जाएगा कि आपने नीलामी जीती।
उन्होंने मेरी ओर सीधा देखा।
—आप मेरी हार को जीत कहेंगे?
मैं चुप रहा। बड़े कमरों में कई बार मौन ही वह जगह बनाता है जहाँ आदमी अपनी बात पहली बार स्वयं सुनता है।
निजाम उठकर बंद खिड़की तक गए। उन्होंने परदा थोड़ा हटाया। बाहर महल का आँगन दिख रहा था। धूप में एक सेवक फव्वारे के पास पीतल की रेलिंग साफ कर रहा था। निजाम ने परदा छोड़ दिया।
उन्होंने पूछा—
—इस विश्वविद्यालय में केवल हिंदू पढ़ेंगे?
यह प्रश्न कल पूछा जाता तो शायद मैं लंबा उत्तर देता। आज मैंने केवल कहा—
—नाम उसकी जड़ बताएगा। दरवाजा उसकी नीयत बताएगा। योग्य विद्यार्थी आएगा तो उससे पहले उसका धर्म नहीं पूछा जाएगा।
—और आधुनिक विज्ञान?
—वह भी पढ़ाया जाएगा। भारतीय ज्ञान भी। दोनों को एक-दूसरे से डराकर नहीं रखा जाएगा।
उन्होंने कोषाध्यक्ष की ओर देखा।
—अब तक कितना धन चाहिए?
मैंने वास्तविक कमी बताई। रकम सुनकर एक मंत्री ने गहरी साँस ली। निजाम ने कोई भाव नहीं दिखाया। उन्होंने मेज की दराज खोली, एक छोटा कागज निकाला और कुछ लिखने लगे। कल उनकी जूती मेरी ओर आई थी; आज उनकी कलम कागज पर चल रही थी। कमरे में केवल नोक की खरखराहट थी।
उन्होंने कागज कोषाध्यक्ष को दिया।
कोषाध्यक्ष ने पढ़ा और चौंककर उनकी ओर देखा।
—हुजूर, क्या पूरी रकम…
निजाम ने हाथ उठा दिया।
—जो लिखा है, वही।
फिर उन्होंने मुंशी को बुलाया।
—दो पर्चियाँ बनाओ। पहली नीलामी की बोली के लिए। दूसरी अलग दान के लिए। जूती की कीमत और विश्वविद्यालय की कीमत एक खाते में मत लिखना।
मेरे भीतर कुछ थम गया। मुझे अभी रकम नहीं पता थी। कागज कोषाध्यक्ष के हाथ में उलटा था। सिर्फ उसकी उँगलियों का कसाव दिख रहा था। यही दूसरा बंद कागज था, लेकिन इस बार मैं उसे बाजार तक बंद नहीं रखना चाहता था।
मैंने पूछा—
—क्या मैं रकम जान सकता हूँ?
निजाम ने कहा—
—नीलामी की अंतिम बोली जितनी भी हो, महल उससे पाँच हजार अधिक देगा। उसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय के लिए पच्चीस हजार रुपये अलग दिए जाएँगे। निर्माण का पूरा ब्यौरा हर छह महीने में भेजना होगा।
कमरे में बैठे किसी आदमी ने ताली नहीं बजाई। कोई मुस्कुराया भी नहीं। कोषाध्यक्ष ने बस आदेश की नकल बनानी शुरू कर दी। उसी सन्नाटे में मुझे समझ आया कि निर्णय उतर चुका है।
निजाम ने मेरी ओर देखा।
—बाजार में यह मत कहना कि मैं डर गया।
मैंने कहा—
—मैं वही कहूँगा जो पर्ची में लिखा होगा।
उनके मुँह के कोने पर बहुत हल्की रेखा आई। पूरी मुस्कान नहीं। शायद उन्हें पहली बार अपनी ही बात याद आई—मेरी बात ही सच मानी जाएगी। अब सच कागज पर लिखा जा रहा था, दोनों के सामने।
मुंशी ने पहली पर्ची पढ़ी। उसमें लिखा था कि महल सार्वजनिक नीलामी की सर्वोच्च बोली से पाँच हजार अधिक देकर जूती खरीदेगा और पूरी रकम विश्वविद्यालय कोष में जाएगी। दूसरी पर्ची में अलग दान, भुगतान की तारीख और निर्माण-विवरण की शर्त थी। दोनों पर मुहर लगी। इस बार मैंने हर शब्द पढ़कर ही कागज मोड़ा।
निजाम ने जाते समय कहा—
—पंडित जी।
मैं रुका।
उन्होंने मेज पर उँगली से एक छोटा चक्र बनाया।
—कल मैंने आपको कम आँका था। विश्वविद्यालय को नहीं। यह अंतर लिखने की जरूरत नहीं है।
मैंने पर्चियाँ जेब में रखीं।
—कुछ अंतर लिखे नहीं जाते, हुजूर। आगे के काम में दिखाई देते हैं।
मैं गाड़ी से बाजार लौटा तो दोपहर के दो बज रहे थे। भीड़ कम होने के बजाय और बढ़ गई थी। छतरी के नीचे शिवप्रसाद की पगड़ी ढीली हो चुकी थी। उसने मुझे देखते ही बही उठाई।
—अंतिम बोली चौदह हजार है। जमनादास जी की। महल ने अभी आगे नहीं बढ़ाया।
प्रधान अधिकारी मेरी जेब की ओर देख रहा था। मैंने मेज पर चढ़कर हाथ उठाया। चौक धीरे-धीरे शांत हुआ।
मैंने कहा—
—नीलामी की वर्तमान सबसे ऊँची बोली चौदह हजार रुपये है। महल ने लिखित रूप में उससे पाँच हजार अधिक देने का प्रस्ताव दिया है। इसलिए अंतिम बोली उन्नीस हजार रुपये हुई।
शिवप्रसाद की कलम हवा में रुक गई। जमनादास ने एक क्षण आँखें बंद कीं, फिर सबसे पहले ताली बजाई। अब्दुल वहीद ने उसका हाथ पकड़कर ऊपर उठा दिया। भीड़ में आवाज फैल गई।
मैंने उन्हें शांत होने दिया। फिर दूसरी पर्ची खोली।
—जूती की रकम से अलग, निजाम ने विश्वविद्यालय के निर्माण हेतु पच्चीस हजार रुपये और देने का आदेश दिया है। हिसाब हर छह महीने में महल को भेजा जाएगा।
इस बार चौक में जो हुआ, वह किसी एक आदमी की विजय जैसा नहीं था। पाँच रुपये देने वाली बुजुर्ग महिला रो नहीं रही थी; वह अपने पोते की पीठ सीधी कर रही थी। फल वाला खाली टोकरी उठाकर मुस्कुरा रहा था। बूढ़ा मोची जूती की एड़ी पर बने निशान को आखिरी बार देख रहा था। जमनादास ने अपनी चौदह हजार की बोली वापस जेब में नहीं रखी।
वह मेरे पास आया और बोला—
—मैं नीलामी नहीं जीत पाया। रकम फिर भी विश्वविद्यालय को दूँगा। मेरी बेटी के नाम से लिखिए।
अब्दुल वहीद ने कहा—
—और मेरी चार हजार पाँच सौ की बोली भी चंदा मानी जाए। मेरे पिता के नाम से।
प्रधान अधिकारी ने पहली बार मुझे नमस्कार किया। उसने जूती दोनों हाथों से उठाई, सफेद कपड़े में लपेटी और महल की गाड़ी में रख दी। कल वही जूती बिना जोड़ी के दरबार से निकली थी। आज वह दो बहियों, सैकड़ों छोटी रसीदों और कई नए दानदाताओं के नाम छोड़कर लौट रही थी।
हमने शाम छह बजे तक सिक्के गिने। छोटे चंदे से नौ सौ से अधिक रुपये निकले। कुछ रसीदें दो आने की थीं, कुछ सौ रुपये की। शिवप्रसाद हर नाम साफ अक्षरों में लिख रहा था। जहाँ दाता ने नाम बताने से मना किया, वहाँ उसने केवल लिखा—“हैदराबाद का एक विद्यार्थी।”
मैंने पूछा—
—विद्यार्थी क्यों?
वह मुस्कुराया।
—क्योंकि जिसने ज्ञान के लिए दिया, वह उम्र चाहे जो हो, सीखने वालों में ही है।
रात को धर्मशाला लौटे तो मेज खाली थी। सफेद कपड़े पर जूती की धूल का हल्का निशान बचा था। मैंने उसे झाड़ा नहीं। उसी पर दोनों शाही पर्चियाँ रखीं और हिसाब मिलाया। नीलामी, अलग दान, जमनादास, अब्दुल वहीद और बाजार के छोटे चंदे—एक दिन में इतनी रकम जुड़ गई थी जितनी हम कई सप्ताह में नहीं जुटा पाए थे।
फिर भी सबसे बड़ी बात रकम नहीं थी। अगले तीन दिनों में हैदराबाद के दूसरे हिस्सों से लोग आने लगे। किसी ने कहा कि उसने बाजार की घटना सुनी। किसी ने पर्ची पढ़ी। किसी ने पूछा कि विश्वविद्यालय में पुस्तकालय होगा या नहीं। एक विद्यालय की पाँच शिक्षिकाएँ अपना एक दिन का वेतन लेकर आईं। दो युवकों ने कहा कि वे निर्माण के लिए श्रम देंगे।
निजाम का पहला भुगतान नियत तारीख पर आया। उसके साथ एक संक्षिप्त पत्र था। उसमें कोई क्षमा-याचना नहीं थी, कोई प्रशंसा भी नहीं। केवल आदेश का उल्लेख और यह प्रश्न था कि विज्ञान विभाग की योजना कब तैयार होगी। मैंने उसी शाम उत्तर भेजा।
छह महीने बाद हमने निर्माण का पूरा ब्यौरा भेजा—कितनी ईंटें खरीदीं, मजदूरी में कितना गया, पुस्तकालय के लिए कितना बचा। शिवप्रसाद ने उस खाते के पहले पन्ने पर जूती नहीं बनाई। उसने लाल स्याही से केवल दो शब्द लिखे—“हैदराबाद दान।”
वर्षों बाद जब मैं बनारस के उस परिसर में सुबह-सुबह चला, अधबनी इमारतों पर धूप पड़ रही थी। कहीं हथौड़ों की आवाज थी, कहीं विद्यार्थी पेड़ के नीचे पुस्तक खोले बैठे थे। मेरे साथ एक युवा प्राध्यापक चल रहा था। उसने हँसते हुए पूछा—
—क्या यह सच है कि एक जूती ने विश्वविद्यालय बनवा दिया?
मैं रुक गया। सामने मजदूर छात्रावास की खिड़की में पत्थर जमा रहा था। पास ही दो विद्यार्थी एक ही पुस्तक के अलग-अलग पन्ने पढ़ रहे थे।
मैंने कहा—
—नहीं। एक जूती ने केवल लोगों को रोककर देखने पर मजबूर किया था। विश्वविद्यालय उन हाथों ने बनाया जिन्होंने उसके बाद अपनी मुट्ठी खोली।
उस दिन की लाल मुहर वाली पर्ची लंबे समय तक मेरी बही में रही। जूती महल लौट गई, पर उसके बदले आया धन ईंटों में बदल गया। जमनादास की बेटी आगे पढ़ी। अब्दुल वहीद के पिता का नाम दान-सूची में दर्ज हुआ। पाँच रुपये देने वाली महिला का नाम हमें कभी नहीं मिला।
और निजाम?
उनकी दूसरी किस्त के साथ इस बार एक पंक्ति और आई थी—“हिसाब प्राप्त हुआ; कार्य जारी रखा जाए।”
मैंने वह पंक्ति पढ़ी, पर्ची मोड़ी और अगली ईंट के भुगतान पर हस्ताक्षर कर दिए।
जिस आदमी ने कहा था कि बाहर केवल उसकी बात सच मानी जाएगी, अंत में उसी ने अपने शब्द लिखित हिसाब के नीचे रख दिए थे।
