“माँ, बीमारी का नाटक कुछ दिन और करो”—दरवाज़े के पीछे खड़ी मैं सुनती रही, जबकि मेरे पति को यकीन था कि घर भी जाएगा और मैं भी//

PART 2

रात के दस बजकर बारह मिनट पर हमारी कार सिविल लाइंस की उस पुरानी सड़क पर मुड़ी जहाँ मेरी नानी की कोठी थी।

दिसंबर की ठंडी हवा में पेड़ों की परछाइयाँ दीवार पर हिल रही थीं।

मैं पीछे की सीट पर बैठी थी।

देवेंद्र अंकल सामने।

उनके साथ उनकी सहयोगी निधि चौहान।

विवान अपनी कार में हमारे पीछे आ रहा था।

मैंने उसे आने से मना नहीं किया था।

अब मैं चाहती थी कि वह हर दरवाज़ा खुलते हुए देखे।

नानी की कोठी मैंने लगभग चार महीने से नहीं खोली थी।

लोहे का फाटक चरमराया।

बरामदे की पीली बत्ती जलते ही वही पुरानी गंध आई।

लकड़ी।

बंद कमरों की नमी।

और नानी के इस्तेमाल किए चंदन वाले साबुन की बहुत हल्की-सी महक, जो शायद सिर्फ मेरी याद में बची थी।

मैं कुछ पल दरवाज़े पर खड़ी रही।

पाँच साल में विवान यहाँ शायद बीस बार आया था।

लेकिन उस रात वह घर को किसी रिश्तेदार की तरह नहीं देख रहा था।

वह सीधे सीढ़ियों की तरफ देख रहा था।

मैंने यह बात पहली बार महसूस की।

देवेंद्र अंकल ने जूते उतारते हुए कहा—

—ऊपर चलो।

विवान ने तुरंत पूछा—

—ऊपर क्यों?

अंकल रुके।

—तुम्हें तो पता होना चाहिए।

विवान चुप हो गया।

हम दूसरी मंजिल पर पहुँचे।

वहाँ तीन कमरे थे।

नानी का कमरा।

मेरी माँ का पुराना कमरा।

और सबसे आखिर में छोटी पुस्तकालय।

नानी जीवन के आखिरी वर्षों में उसी पुस्तकालय में घंटों बैठती थीं।

देवेंद्र अंकल ने मुझसे पूछा—

—चाबी।

मैंने गुच्छा निकाला।

पीतल की पुरानी चाबी हथेली पर रखते ही मेरी नज़र फिर १७ पर गई।

अचानक एक बहुत मामूली याद भीतर से उठी।

मैं चौदह साल की थी।

नानी इस कमरे की अलमारी साफ कर रही थीं।

मैंने मजाक में पूछा था—

—आप हर जरूरी चीज़ क्यों छिपाकर रखती हैं?

उन्होंने बिना मेरी तरफ देखे कहा था—

—जरूरी चीज़ छिपाती नहीं हूँ। सही हाथ आने तक रोककर रखती हूँ।

उस समय मैं हँसकर चली गई थी।

अब वही वाक्य कमरे में मेरे साथ खड़ा था।

अंकल ने पुस्तकालय की सबसे पुरानी अलमारी के नीचे हाथ डाला।

लकड़ी की एक पतली पट्टी बाहर आई।

उसके पीछे पीतल का ताला था।

ताले पर वही संख्या थी।

१७।

मैंने चाबी लगाई।

पहली बार नहीं खुली।

दूसरी बार हल्का दबाव दिया।

क्लिक की आवाज़ आई।

मेरी उँगलियाँ कुछ पल वहीं रुक गईं।

मैंने पीछे देखा।

विवान का चेहरा पीला था।

मैंने छोटी लकड़ी की चौखट खींची।

भीतर दीवार में धँसी लोहे की तिजोरी दिखाई दी।

देवेंद्र अंकल ने लाल लिफाफा मेरी ओर बढ़ाया।

—अब इसे खोलो।

मैंने लिफाफे की डोरी खोली।

सबसे ऊपर नानी का पत्र था।

उसके नीचे कई पुराने दस्तावेज़।

एक तस्वीर।

और एक छोटी डायरी।

मैंने पत्र उठाया।

पहली पंक्ति पढ़ते ही मेरी आँखें वहीं टिक गईं।

आर्या, अगर देवेंद्र यह पत्र तुम्हें दे रहे हैं, तो शायद जिस बात से मैं डरती थी, वह तुम्हारे सामने आ चुकी है।

मैंने आगे पढ़ना रोक दिया।

विवान अचानक बोला—

—पुराने कागज़ों से शादी नहीं चलती, आर्या।

मैंने उसकी तरफ देखा।

—मेरी शादी किससे चल रही थी?

उसके पास उत्तर नहीं था।

मैंने पत्र फिर खोला।

नानी ने लिखा था कि वर्ष २०११ में विवान के पिता, राजीव मल्होत्रा, का निर्माण व्यवसाय लगभग बंद होने की स्थिति में पहुँच गया था।

बैंकों ने नई रकम देने से इनकार कर दिया था।

तब नानी ने उन्हें तीन करोड़ अस्सी लाख रुपये दिए थे।

यह कोई उपहार नहीं था।

एक लिखित व्यावसायिक समझौता था।

रकम के बदले राजीव मल्होत्रा ने अपनी कंपनी के बत्तीस प्रतिशत प्रवर्तक हिस्से सुरक्षा के रूप में रखे थे।

समझौते में साफ लिखा था—

अगर पाँच वर्ष के भीतर रकम वापस नहीं की गई, तो वे हिस्से नानी द्वारा बनाए गए न्यास के अधिकार में चले जाएँगे।

नीचे हस्ताक्षर थे।

राजीव मल्होत्रा।

कमला मेहरा।

दो गवाह।

और देवेंद्र पाठक।

मैंने सिर उठाया।

—यह सच है?

देवेंद्र अंकल ने कहा—

—एक-एक पन्ना पंजीकृत है।

विवान तुरंत बोल पड़ा—

—पापा ने रकम लौटा दी थी।

अंकल ने दूसरी फाइल निकाली।

—नहीं।

—आप झूठ बोल रहे हैं।

—२०१६ में तुम्हारे पिता ने छह महीने और माँगे थे। २०१७ में उन्होंने लिखित रूप में माना कि रकम नहीं चुका सकते।

निधि ने अगला दस्तावेज़ मेरे सामने रखा।

उसमें कंपनी के बत्तीस प्रतिशत हिस्से नानी के न्यास को हस्तांतरित करने की पुष्टि थी।

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

मैंने पूछा—

—न्यास किसका है?

देवेंद्र अंकल ने मेरी तरफ देखा।

—लाभार्थी तुम हो।

कमरे में कुछ नहीं हिला।

यहाँ तक कि विवान भी नहीं।

मैंने दस्तावेज़ फिर देखा।

मेरे नाम के सामने लिखा था—

आर्या मेहरा।

एकमात्र लाभार्थी।

मैं कुर्सी पर बैठ गई।

विवान की कंपनी।

वह कंपनी जिसके बारे में वह हर बार कहता था—

—व्यापार की बातें तुम नहीं समझोगी।

जिस कार्यालय की वार्षिक बैठकों में मुझे कभी नहीं बुलाया गया।

जिसके नाम पर उसने मुझे कई बार बताया कि मल्होत्रा परिवार ने तीन पीढ़ियों से सब कुछ अपने दम पर बनाया है।

उस कंपनी का लगभग एक तिहाई हिस्सा पिछले नौ साल से नानी के बनाए न्यास में था।

मेरे लिए।

मैंने धीमे से पूछा—

—फिर किसी ने इसे इस्तेमाल क्यों नहीं किया?

देवेंद्र अंकल ने उत्तर दिया—

—तुम्हारी नानी चाहती थीं कि राजीव मल्होत्रा के रहते कंपनी अस्थिर न हो। उन्होंने मतदान अधिकार इस्तेमाल नहीं किए। लेकिन हिस्सेदारी वैध रही।

मैंने विवान की तरफ देखा।

—तुम्हें पता था?

वह तुरंत बोला—

—नहीं।

अंकल ने मेज़ से पुरानी डायरी उठा ली।

उन्होंने एक पन्ना खोला।

—छह साल पहले, सत्रह नवंबर को, एक युवक मेरे कार्यालय आया था।

विवान का जबड़ा कस गया।

अंकल पढ़ते रहे—

—उसने पूछा कि अगर कमला मेहरा के निधन के बाद उनकी नातिन शादी कर ले, तो क्या पति उसकी संपत्ति पर अधिकार जता सकता है।

मैंने कुछ नहीं कहा।

अंकल ने अगली पंक्ति पढ़ी—

—उसने विशेष रूप से सिविल लाइंस की कोठी के बारे में पूछा। और यह भी पूछा कि घर खाली होने के बाद उसमें रखे निजी अभिलेख किसके अधिकार में होंगे।

मुझे अचानक विवान से पहली मुलाकात याद आई।

छह साल पहले।

एक मित्र की जन्मदिन की पार्टी।

विवान ने बातचीत के पहले बीस मिनट में पूछा था—

—तुम दिल्ली में अकेली रहती हो?

फिर—

—तुम्हारे माता-पिता?

और थोड़ी देर बाद—

—नानी के बाद वह पुराना घर कौन संभालता है?

मैंने उस समय सोचा था वह मेरी जिंदगी में दिलचस्पी ले रहा है।

मैं कुर्सी की पीठ से टिक गई।

कुछ यादें बहुत देर बाद अपमान बनती हैं।

विवान ने आगे बढ़कर कहा—

—एक पुराने कार्यालय में कोई भी किसी का नाम लिख सकता है।

देवेंद्र अंकल शांत रहे।

उन्होंने डायरी के नीचे रखा एक पन्ना निकाला।

वह उनके कार्यालय का आगंतुक पत्र था।

नाम—

विवान राजीव मल्होत्रा।

फोन नंबर वही जिसे वह आज भी इस्तेमाल करता था।

नीचे उसके हस्ताक्षर।

मैंने कागज़ से नज़र उठाई।

विवान अब मुझे नहीं देख रहा था।

मैंने पूछा—

—तुम मुझसे मिलने से पहले मेरी संपत्ति की जानकारी निकाल रहे थे?

वह बोला—

—बात वैसी नहीं है।

—कैसी है?

—पापा ने मुझे पुराने विवाद के बारे में बताया था। मैं बस समझना चाहता था।

—फिर मुझे क्यों नहीं बताया?

उसने आवाज़ ऊँची की—

—क्योंकि उसका हमारी शादी से कोई संबंध नहीं था।

मैंने सामने पड़े कागज़ों को देखा।

फिर उसकी आँखों में।

—आज मेरी नानी की कोठी बेचने से इसका संबंध कैसे हो गया?

वह चुप रहा।

देवेंद्र अंकल ने तस्वीर मेरे सामने सरका दी।

वर्ष २०११ की तस्वीर थी।

नानी एक मेज़ पर बैठी थीं।

उनके सामने राजीव मल्होत्रा।

साथ में दो और लोग।

मेज़ पर वही समझौता था।

तस्वीर के पीछे नानी ने सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—

जिस दिन पैसे चरित्र से बड़े हो जाएँ, उस दिन कागज़ रिश्तों से ज्यादा भरोसेमंद हो जाते हैं।

मैंने तस्वीर वापस रख दी।

उस रात नानी का वह वाक्य पहली बार मुझे कठोर नहीं लगा।

सिर्फ थका हुआ लगा।

मैंने पत्र का आखिरी हिस्सा पढ़ा।

नानी ने लिखा था कि विवान की पूछताछ के बाद उन्हें पहली बार संदेह हुआ था।

उन्होंने मुझे रोकने की कोशिश नहीं की।

उन्होंने लिखा था—

अगर आर्या उससे प्रेम करती है, तो मैं अपने डर के कारण उसका जीवन तय नहीं करूँगी।

लेकिन यदि कभी वही युवक उसे घर बेचने के लिए मजबूर करे, देवेंद्र उसे सब कुछ बता देंगे।

मैंने पत्र धीरे से मेज़ पर रख दिया।

मेरे भीतर जो अंतिम भ्रम बचा था, वह वहीं खत्म हो गया।

लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं थी।

मैंने विवान से पूछा—

—आज जिस कंपनी को घर बेचा जा रहा था, आरएस शहरी निवेश, वह किसकी है?

उसने तुरंत कहा—

—खरीदार की।

निधि चौहान ने अपनी फाइल खोली।

—इसके दो निदेशक हैं।

विवान ने पहली बार उनकी तरफ देखा।

निधि ने पहला नाम पढ़ा—

—रोहित सहगल।

फिर दूसरा—

—रिया सहगल।

मेरे कानों में अस्पताल का वह एक नाम फिर गूँजा।

रिया।

देवेंद्र अंकल ने कहा—

—कंपनी छह महीने पहले बनी है।

निधि ने अगला पन्ना पलटा।

—पंजीकृत कार्यालय वही मुंबई वाला पता है जहाँ रिया सहगल किराए पर रहती हैं।

विवान अचानक मेरी तरफ मुड़ा—

—आर्या, तुम्हें समझ नहीं आ रहा। यह सिर्फ निवेश की व्यवस्था थी।

मैंने पूछा—

—किसके लिए?

—हमारे लिए।

—कौन से हमारे लिए?

उसने होंठ भींच लिए।

मैंने फोन निकाला।

अस्पताल से निकलते समय मैंने जो रिकॉर्डिंग सुरक्षित की थी, वह स्क्रीन पर थी।

विवान की नजर फोन पर पड़ी।

पहली बार मुझे लगा उसे समझ आया कि अस्पताल के दरवाज़े के बाहर मैं कितनी देर खड़ी थी।

उसने बहुत धीमे पूछा—

—तुमने कितना सुना?

मैंने उत्तर दिया—

—इतना कि अब बाकी सुनने की जरूरत नहीं है।

उस रात मैं विवान के साथ ग्रेटर कैलाश वापस नहीं गई।

मैं नानी की कोठी में रुकी।

सुबह पाँच बजे तक नींद नहीं आई।

कभी छत देखती।

कभी पीतल की चाबी।

कभी नानी का पत्र।

सबसे ज्यादा दर्द रिया का नहीं था।

न माँ की बीमारी का नाटक।

न चौदह करोड़ का सौदा।

सबसे ज्यादा वही छह साल पुराना आगंतुक पत्र चुभ रहा था।

हमारी पहली मुलाकात से पहले वह मेरा नाम जानता था।

मेरा घर जानता था।

नानी के दस्तावेज़ों के बारे में जानता था।

फिर भी उसने पहली मुलाकात में मुस्कुराकर हाथ बढ़ाते हुए कहा था—

—मुझे लगता है हम पहली बार मिल रहे हैं।

सुबह साढ़े सात बजे मेरी आँख लगी।

नौ बजे घंटी से नींद खुली।

बाहर सविता जी थीं।

अकेली।

न ऑक्सीजन।

न व्हीलचेयर।

न कमजोर आवाज़।

उन्होंने अंदर आते ही कहा—

—तुम घर क्यों नहीं आई?

मैंने रास्ता छोड़ दिया।

वह बैठक में बैठीं।

उनकी नजर मेज़ पर पड़े दस्तावेज़ों पर गई।

फिर बोलीं—

—पुरानी बातों में मत पड़ो।

मैं सामने बैठ गई।

—आपकी तबीयत कैसी है?

उनके चेहरे पर एक क्षण कुछ आया और चला गया।

—ठीक नहीं है।

—मुंबई जाना है?

—डॉक्टर जैसा कहेंगे।

मैंने उनके सामने अस्पताल से आया बिल रखा।

कल रात उनके मोबाइल पर अस्पताल का अंतिम विवरण आया था। उसका छायाचित्र विवान ने परिवार वाले समूह में भेज दिया था।

कुल राशि—

अट्ठाईस हजार चार सौ रुपये।

न कोई विशेष प्रक्रिया।

न मुंबई भेजने की सलाह।

न पैंसठ लाख का अनुमान।

सविता जी ने कागज़ नहीं छुआ।

मैंने पूछा—

—पैंसठ लाख किस डॉक्टर ने माँगे थे?

उन्होंने मेरी तरफ देखा।

—विवान ने बताया था।

—आपने उससे पूछा नहीं?

—बेटा माँ के लिए कर रहा था।

मैं कुछ सेकंड उन्हें देखती रही।

फिर फोन मेज़ पर रखा।

अस्पताल वाली रिकॉर्डिंग चलाने की जरूरत नहीं पड़ी।

उन्होंने खुद आँखें फेर लीं।

मैंने कहा—

—रिया के बारे में कब से जानती हैं?

वह चौंकीं नहीं।

यही जवाब था।

कुछ देर बाद बोलीं—

—पुरुषों से गलतियाँ हो जाती हैं।

मैंने सिर हिलाया।

—घर बेचने की योजना गलती थी?

चुप्पी।

—झूठी बीमारी?

चुप्पी।

—मेरी नानी के घर को रिया की कंपनी को बेचना?

उनकी आँखें मेरी तरफ लौटीं।

उन्होंने धीमे कहा—

—विवान को उसका अधिकार चाहिए था।

मैंने पहली बार हँसी जैसी कोई आवाज़ निकाली।

—उसका?

सविता जी ने कहा—

—तुम उसकी पत्नी हो।

—थी।

वह मेरी बात सुनकर स्थिर हो गईं।

मैंने स्पष्ट कहा—

—कल तक मुझे तय करना था कि घर बचाऊँ या परिवार। आज वह समस्या नहीं है।

उन्होंने पूछा—

—मतलब?

—परिवार बचा ही नहीं है।

मैं उठ गई।

उन्होंने पीछे से कहा—

—तलाक देकर कहाँ जाओगी? अकेली औरत के लिए पैसा सब कुछ नहीं होता।

मैं दरवाज़े तक पहुँची।

फिर मुड़ी।

—शायद इसीलिए आपने अपने बेटे को पैसे के लिए शादी करने दी।

इस बार मैं रुकी नहीं।

अगले तीन दिन विवान लगातार फोन करता रहा।

पहले गुस्सा।

फिर समझाना।

फिर डर।

चौथे दिन उसने संदेश भेजा—

मैं मानता हूँ गलती हुई। एक बार बैठकर बात कर लेते हैं। कंपनी और पुराने समझौते को शादी के बीच मत लाओ।

मैंने उत्तर नहीं दिया।

देवेंद्र अंकल ने उसी दिन न्यास की ओर से मल्होत्रा निर्माण समूह को औपचारिक सूचना भेजी।

नानी के बत्तीस प्रतिशत हिस्सों पर अब लाभार्थी के निर्देश के अनुसार मतदान अधिकार इस्तेमाल किए जाएँगे।

अगली सुबह विवान स्वयं कोठी आया।

उसने अंदर आते ही कहा—

—तुम समझती नहीं हो इससे क्या होगा।

मैंने पूछा—

—क्या होगा?

उसने दोनों हाथ मेज़ पर रख दिए।

—कंपनी की बैंक सीमा अगले महीने नवीनीकृत होनी है। हिस्सेदारी पर विवाद दिखा तो निवेशक पीछे हट जाएँगे।

—विवाद नहीं है।

—आर्या!

—दस्तावेज़ पंजीकृत हैं। तुम्हारे पिता के हस्ताक्षर हैं। न्यास नौ साल से हिस्सेदार है। विवाद तुम्हारे परिवार ने अपने मन में बनाया था।

उसका चेहरा लाल पड़ गया।

कुछ सेकंड बाद उसकी आवाज़ बदल गई।

—ठीक है। पैसे चाहिए?

मैं उसे देखती रही।

उसने कुर्सी खींची।

—घर मत बेचो। बत्तीस प्रतिशत हिस्से भी रखो। बस मतदान अधिकार इस्तेमाल मत करो। मैं तुम्हें हर साल लाभांश दिला दूँगा।

मैंने पूछा—

—और रिया?

उसने पलक झपकाई।

—उसकी चिंता मत करो।

—तुम्हारा बच्चा?

उसने तुरंत नज़र हटा ली।

मैं समझ गई।

जिस आदमी ने मेरे सामने पत्नी को रकम में बदला था, अब दूसरी महिला को भी समस्या की तरह देख रहा था।

मैंने कहा—

—तुम्हें किसी इंसान से प्यार नहीं है, विवान। तुम्हें बस वह पसंद है जो उस समय तुम्हारे काम आ सके।

वह खड़ा हो गया।

—यह सब देवेंद्र ने तुम्हारे दिमाग में भरा है।

मैंने कोई उत्तर नहीं दिया।

कभी-कभी चुप्पी वह जगह होती है जहाँ दूसरा आदमी पहली बार अपनी आवाज़ साफ सुनता है।

अगले सोमवार कंपनी की विशेष बैठक थी।

मैं वहाँ पहली बार गई।

चौदहवीं मंजिल।

काँच की दीवारें।

लंबी मेज़।

बारह कुर्सियाँ।

पाँच साल की शादी में विवान ने कभी मेरा परिचय उन लोगों से नहीं कराया था।

उस दिन देवेंद्र अंकल मेरे साथ थे।

कमरे में मुख्य वित्त अधिकारी, दो स्वतंत्र निदेशक, विवान के चाचा संजय मल्होत्रा और तीन बड़े निवेशक बैठे थे।

सविता जी भी आईं।

विवान ने शायद उन्हें भावनात्मक दबाव के लिए बुलाया था।

बैठक शुरू होते ही उसने कहा—

—यह एक पारिवारिक गलतफहमी है। मेरी पत्नी निजी नाराज़गी को व्यापार में ला रही है।

मैंने पहली बार बोलने से पहले कमरे को देखा।

किसी को मेरी कहानी नहीं चाहिए थी।

उन्हें तथ्य चाहिए थे।

मेरे पास दोनों थे।

देवेंद्र अंकल ने मूल हिस्सेदारी दस्तावेज़ मेज़ पर रखे।

फिर २०१७ की हस्तांतरण पुष्टि।

फिर कंपनी की पुरानी रसीदें।

मुख्य वित्त अधिकारी ने दस मिनट कागज़ देखे।

उन्होंने विवान के चाचा की तरफ देखा।

—इनकी प्रतियाँ पुराने अभिलेख में हैं।

विवान उनकी तरफ मुड़ा।

—आपको पहले से पता था?

उन्होंने भारी आवाज़ में कहा—

—तुम्हारे पिता ने कहा था मामला परिवार के भीतर सुलझ चुका है।

देवेंद्र अंकल बोले—

—सुलझा नहीं था। सिर्फ दबाया गया था।

विवान ने मेरी तरफ इशारा किया—

—ठीक है। वह हिस्सेदार है। इससे यह साबित नहीं होता कि मैंने कुछ गलत किया।

मैंने पहली बार फोन मेज़ पर रखा।

रिकॉर्डिंग चलाई।

उसकी आवाज़ कमरे में गूँजी—

—माँ, बस चार-पाँच दिन और। आर्या अब पूरी तरह तैयार है।

फिर सविता जी की आवाज़।

फिर पैंसठ लाख।

फिर कोठी।

फिर मेरे तलाक की योजना।

फिर रिया।

मैंने स्क्रीन बंद कर दी।

कोई कुछ नहीं बोला।

विवान ने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैं वह पत्नी नहीं रही जिसे वह घर में समझा सकता था।

मैंने निधि को इशारा किया।

उन्होंने आरएस शहरी निवेश के दस्तावेज़ सामने रखे।

रिया सहगल का नाम।

उसका पता।

फिर उस सौदे का मसौदा जिसमें भुगतान के बाद रकम का एक बड़ा हिस्सा सविता जी के खाते में जाने का अलग निर्देश तैयार किया गया था।

मुख्य वित्त अधिकारी ने पूछा—

—इस खरीदार का कंपनी से क्या संबंध है?

विवान बोला—

—कोई नहीं।

निधि ने अगला पन्ना रखा।

पिछले छह महीने में आरएस शहरी निवेश को मल्होत्रा समूह की एक सहयोगी इकाई से तीन बार भुगतान हुआ था।

परामर्श शुल्क के नाम पर।

कुल इकतीस लाख।

इस बार विवान तुरंत बोला—

—यह सामान्य व्यापार है।

किसी ने उसका साथ नहीं दिया।

संजय मल्होत्रा कुर्सी से पीछे हट गए।

उन्होंने सिर्फ इतना कहा—

—तुमने कंपनी की रकम अपनी निजी व्यवस्था में लगाई?

विवान चुप रहा।

वही क्षण था।

नानी का पत्र नहीं।

मेरी रिकॉर्डिंग भी नहीं।

मेरे लिए फैसला उस समय पूरा हुआ जब विवान ने किसी एक आदमी की आँख में देखकर भी नहीं कहा कि उसने ऐसा नहीं किया।

वह सिर्फ बचने की भाषा बोलता रहा।

रकम किस शीर्षक से गई।

कौन सा नियम सीधे लागू नहीं होता।

किस कागज़ की व्याख्या दूसरी हो सकती है।

गलत नहीं किया—

यह वह एक वाक्य था जो वह नहीं बोल पाया।

बैठक लगभग दो घंटे चली।

अंत में स्वतंत्र निदेशकों ने विवान के वित्तीय अधिकार तत्काल रोकने का प्रस्ताव रखा।

न्यास के बत्तीस प्रतिशत मत मेरे निर्देश पर प्रस्ताव के पक्ष में गए।

दो बड़े निवेशकों ने भी समर्थन किया।

संजय मल्होत्रा ने आँखें बंद करके हाथ उठा दिया।

प्रस्ताव पारित हो गया।

विवान ने मेरी तरफ देखा।

जिस कंपनी के नाम पर उसने मुझे पाँच साल छोटा महसूस कराया था, उसी कंपनी के कमरे में पहली बार उसकी कुर्सी उससे बड़ी लग रही थी।

बैठक के बाद सविता जी बाहर मेरे पीछे आईं।

उन्होंने कहा—

—तुमने अपने पति को सबके सामने छोटा कर दिया।

मैंने चलना नहीं रोका।

उन्होंने फिर कहा—

—तुम चाहती तो घर की बात घर में रख सकती थीं।

मैं मुड़ी।

—घर की बात घर में रहती, अगर आपके बेटे ने घर बेचने के लिए बीमारी न बनाई होती।

उनकी आँखें नीचे चली गईं।

मैं चली गई।

रिया से मेरी मुलाकात उसके दो दिन बाद हुई।

उसने खुद फोन किया था।

हम कनॉट प्लेस के एक शांत कैफे में मिले।

वह मेरी कल्पना से अलग लगी।

न आत्मविश्वास।

न जीत।

बस थकी हुई।

उसने बैठते ही कहा—

—मुझे नहीं पता था कि बीमारी झूठी है।

मैंने कहा—

—लेकिन घर के सौदे का पता था।

उसने सिर झुका लिया।

—हाँ।

—कंपनी तुम्हारे नाम पर क्यों बनाई गई?

उसने पानी का गिलास पकड़ा।

—विवान ने कहा था कि शादी टूटने के बाद सीधे उसके नाम संपत्ति लेना ठीक नहीं लगेगा।

मैंने कुछ नहीं कहा।

उसने मेरी तरफ देखा।

—उसने कहा था आप दोनों वैसे भी अलग होने वाले हैं।

यह वाक्य मैंने पहले भी बहुत कहानियों में सुना था।

अब वह मेरी मेज़ पर बैठा था।

रिया ने आगे कहा—

—मुझे लगा कोठी उसकी पारिवारिक व्यवस्था का हिस्सा है।

मैंने पूछा—

—और अब?

उसने अपने बैग से कुछ कागज़ निकाले।

—मैं कंपनी से इस्तीफा दे रही हूँ। आरएस शहरी निवेश में अपने हिस्से भी बंद कर रही हूँ।

मैंने कागज़ नहीं छुए।

वह कुछ क्षण चुप रही।

फिर बोली—

—कल रात उसने मुझे फोन करके कहा कि अगर मैं पूछताछ में कोई बात कहूँ तो बताऊँ कि पूरी योजना मेरी थी।

मेरी उँगलियाँ कप पर रुक गईं।

मैंने उसकी तरफ देखा।

वह हल्के से हँसी।

लेकिन वह हँसी खुशी की नहीं थी।

—शायद मुझे अब समझ आया कि उसने आपके साथ क्या किया।

उस दिन मैं रिया को माफ करने नहीं गई थी।

न उसे दोष देने।

उसकी कहानी अब मेरी जिंदगी का केंद्र नहीं थी।

विवान ने हम दोनों को अलग-अलग भविष्य दिखाया था।

और दोनों भविष्य में सबसे जरूरी आदमी वही था।

मैं उठी।

रिया ने पीछे से पूछा—

—आप उसे वापस लेंगी?

मैंने पलटकर कहा—

—जिस आदमी को मैं वापस ले सकती थी, वह शायद कभी था ही नहीं।

तीन सप्ताह बाद मैंने विवाह समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी।

विवान ने पहले विरोध किया।

फिर समझौते की कोशिश की।

उसने नानी की कंपनी हिस्सेदारी छोड़ने के बदले शादी बचाने का प्रस्ताव दिया।

मैंने पढ़कर कागज़ वापस कर दिया।

उसे अब भी लगता था हर चीज़ का एक मूल्य लिखा जा सकता है।

घर।

कंपनी।

पत्नी।

माँ की बीमारी।

प्रेमिका।

यहाँ तक कि माफी भी।

सविता जी ने दो बार मेरे रिश्तेदारों को फोन किया।

कहा मैं छोटी बात को बड़ा बना रही हूँ।

लेकिन बात अब फैल चुकी थी।

कंपनी के निदेशक जानते थे।

परिवार के वरिष्ठ लोग जानते थे।

संपत्ति दलाल ने अपना बयान दे दिया था कि खरीदार विवान ने स्वयं तय किया था।

बैंक ने संदिग्ध संबंधित भुगतानों की आंतरिक समीक्षा शुरू कर दी।

विवान को प्रबंध निदेशक का पद छोड़ना पड़ा।

संजय मल्होत्रा को अंतरिम जिम्मेदारी मिली।

जिस केबिन में विवान ने मेरी फोटो कभी नहीं रखी थी, एक महीने बाद वहाँ उसकी नामपट्टी भी नहीं थी।

घर नहीं बिका।

चौदह करोड़ बीस लाख का वह अनुबंध कभी प्रभावी ही नहीं हुआ।

क्योंकि एक और बात नानी ने पहले ही तय कर रखी थी।

कोठी मेरी व्यक्तिगत संपत्ति नहीं थी जिसे कोई मुझे भावनात्मक दबाव में हस्ताक्षर करवाकर बेच सके।

वह कमला मेहरा परिवार न्यास की संपत्ति थी।

मैं उसकी जीवनभर की लाभार्थी थी।

लेकिन किसी भी बिक्री के लिए मेरे साथ न्यासी देवेंद्र पाठक की लिखित अनुमति आवश्यक थी।

जिस कागज़ पर उस रात विवान मुझे हस्ताक्षर करवाना चाहता था, वह मेरे हस्ताक्षर के बाद भी घर नहीं बेच सकता था।

यह सुनकर मैंने देवेंद्र अंकल से पूछा था—

—नानी ने मुझे बताया क्यों नहीं?

उन्होंने कहा—

—क्योंकि वह नहीं चाहती थीं कि तुम हर रिश्ते को शक की नजर से देखो।

मैं बहुत देर चुप रही।

फिर पूछा—

—और अगर कोई मुझे कभी मजबूर ही न करता?

अंकल मुस्कुराए।

—तो तुम्हें शायद कभी जानने की जरूरत नहीं पड़ती।

छह महीने बाद मैंने कोठी की मरम्मत शुरू करवाई।

लेकिन उसे बेचने के लिए नहीं।

नीचे वाले हिस्से को मैंने छोटे कार्यस्थलों में बदल दिया।

ऊपर नानी का कमरा वैसा ही रहने दिया।

पुस्तकालय की वह दीवार भी।

सिर्फ तिजोरी खाली कर दी।

दस्तावेज़ अब बैंक के सुरक्षित अभिलेख में थे।

एक शाम बढ़ई ने पीतल का पुराना ताला बदलने के लिए पूछा—

—मैडम, इसे निकाल दूँ? अब इसका कोई काम नहीं है।

मैंने ताले पर उभरा १७ देखा।

फिर वही छोटी चाबी।

मैंने सिर हिला दिया।

—नहीं। रहने दीजिए।

उस रात पहली बार मुझे संख्या का पूरा अर्थ पता चला।

सत्रह नवंबर।

वही दिन जब विवान पहली बार देवेंद्र अंकल के कार्यालय गया था।

वही दिन जिसके बाद नानी ने न्यास के नियम बदलवाए थे।

वही दिन जब उन्होंने शायद मेरे लिए वह सुरक्षा तैयार करनी शुरू की थी जिसका मतलब मुझे छह साल बाद समझ आया।

मैंने पीतल की चाबी वापस अपने गुच्छे में लगा ली।

अब वह किसी तिजोरी की चाबी नहीं थी।

वह उस एक गलती की याद थी जो मैंने लंबे समय तक प्रेम समझकर संभाली थी।

एक वर्ष बाद मल्होत्रा समूह ने नानी के न्यास से समझौते का प्रस्ताव रखा।

पुराना कर्ज, लाभांश और हिस्सेदारी की नई संरचना।

मैंने व्यापारिक सलाहकारों के साथ बैठकर फैसला किया।

बत्तीस प्रतिशत में से कुछ हिस्सा कंपनी को उचित मूल्य पर वापस दिया गया।

बाकी न्यास के पास रहा।

मुझे कंपनी चलाने की कोई इच्छा नहीं थी।

मुझे सिर्फ यह सुनिश्चित करना था कि कोई दोबारा यह न मान सके कि मेरे नाम पर रखी चीज़ का फैसला मुझसे पूछे बिना किया जा सकता है।

विवान से मेरी आखिरी मुलाकात उसी प्रक्रिया के अंतिम दिन हुई।

वह पहले से दुबला लग रहा था।

महँगा सूट वही था।

लेकिन फोन लगातार बज नहीं रहा था।

लोग उसके आसपास खड़े नहीं थे।

हम एक बैठक कक्ष के बाहर आमने-सामने हुए।

उसने कुछ सेकंड बाद कहा—

—मैंने तुम्हें कभी नुकसान पहुँचाने के बारे में नहीं सोचा था।

मैंने उसे देखा।

एक साल पहले शायद मैं इस वाक्य का अर्थ खोजती।

अब नहीं।

मैंने पूछा—

—फिर तुमने क्या सोचा था?

वह चुप रहा।

मैंने खुद ही उत्तर दे दिया—

—तुमने सोचा था मुझे पता नहीं चलेगा।

उसकी आँखें नीचे चली गईं।

मैं आगे बढ़ गई।

उसने पीछे से मेरा नाम लिया—

—आर्या।

मैं रुकी।

उसने कहा—

—अगर वह रात अस्पताल में तुम दरवाज़ा खोल देतीं, शायद सब अलग होता।

मैंने पलटकर देखा।

शायद वह सच कह रहा था।

अगर मैं उस कमरे में घुसकर चिल्लाती…

वह इनकार करता।

उसकी माँ बीमार होने का अभिनय करती।

मैं रिया का नाम लेती।

वह मुझे शक करने वाली पत्नी कहता।

मैं रोती।

वह मुझे शांत होने को कहता।

और शायद अगले दिन किसी दूसरे तरीके से वही सौदा मेरे सामने रख देता।

मैंने कहा—

—हाँ। अलग होता।

वह मेरी तरफ देखने लगा।

मैंने दरवाज़ा खोला।

फिर आखिरी बार कहा—

—इसलिए अच्छा हुआ मैंने वह दरवाज़ा नहीं खोला।

मैं बाहर आ गई।

उस शाम सिविल लाइंस की कोठी पहुँची तो बरामदे में धूप की आखिरी पट्टी पड़ी थी।

मैंने नानी की पुरानी कुर्सी बाहर रखवाई।

चाय बनाई।

और कई महीनों बाद बिना किसी कागज़, फोन या आवाज़ की रिकॉर्डिंग के वहाँ बैठी रही।

घर वैसा ही था।

दीवारों पर हल्की दरारें।

पुराना लकड़ी का दरवाज़ा।

सीढ़ियों की तीसरी पायदान अब भी थोड़ा शोर करती थी।

कुछ भी नया नहीं था।

फिर भी पहली बार लगा यह घर मुझे नानी से मिला ही नहीं था।

उन्होंने इसे मेरे लिए बचाकर भी रखा था।

उस रात अस्पताल के दरवाज़े के बाहर मेरे हाथ में सिर्फ खाने का डिब्बा था।

मुझे लगा था मैं सब कुछ खोने वाली हूँ।

पति।

परिवार।

घर।

जिस जीवन पर पाँच साल खर्च किए।

लेकिन कई बार आदमी उसी दिन गरीब नहीं होता जब उससे कुछ छीन लिया जाए।

कई बार वह तब गरीब होता है जब सच सामने होने के बाद भी वह उसी झूठ को बचाता रहे।

विवान ने चौदह करोड़ का घर चाहा था।

फिर मेरी नानी की हिस्सेदारी।

फिर अपनी कंपनी की कुर्सी।

फिर रिया।

अंत में उसे सबसे ज्यादा जरूरत अपनी बनाई हुई छवि की थी।

और वही उसके हाथ से सबसे पहले चली गई।

मैंने कुछ नहीं छीना।

मैंने सिर्फ हस्ताक्षर नहीं किए।

बाकी सब उसने खुद खो दिया।

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