अगले 3 दिन रिया के लिए किसी बुरे सपने की तरह बीते।
वह सुबह से शाम तक नई नौकरी की तलाश में एक दुकान से दूसरी दुकान भटकती रही।
हर जगह से उसे निराशा हाथ लगी।
उसकी मां की दवाइयां खत्म हो रही थीं और मकान मालिक ने भी किराए के लिए तकादा करना शुरू कर दिया था।
चौथे दिन सुबह 11 बजे, रिया के फोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आई।
कॉल “रॉयल हेरिटेज ज्वैलर्स” के मुख्य कार्यालय से थी।
दूसरी तरफ से अधिकारी ने कहा, “रिया जी, आपको तुरंत बांद्रा वाले शोरूम में पहुंचना है। कंपनी के चेयरमैन खुद आए हैं और आपकी मौजूदगी अनिवार्य है।”
रिया घबरा गई।
उसे लगा कि नीता ने शायद उस दिन के नुकसान का आरोप लगाकर उस पर कोई कानूनी कार्रवाई करने की योजना बनाई है।
फिर भी, उसने खुद को संभाला और बांद्रा शोरूम की ओर निकल पड़ी।
जब रिया शोरूम पहुंची, तो वहां का नजारा बिल्कुल बदला हुआ था।
शोरूम के बाहर 5 काली मर्सिडीज गाड़ियां खड़ी थीं।
अंदर नीता और बाकी सारे कर्मचारी एक लाइन में हाथ जोड़े खड़े थे।
सभी के चेहरे पर खौफ साफ दिखाई दे रहा था।
शोरूम के केंद्र में स्थित मुख्य सोफे पर वही वृद्ध महिला बैठी थीं।
लेकिन इस बार उनके कपड़े साधारण नहीं, बल्कि बेहद कीमती रेशमी साड़ी के थे।
उनके बगल में 28 साल का एक रोबीला युवक खड़ा था, जिसने महंगे इटैलियन सूट में खुद को ढाल रखा था।
वह युवक कोई और नहीं, बल्कि भारत की सबसे बड़ी डायमंड कंपनी “सिंघानिया ग्रुप” का मालिक और उस ज्वैलरी शोरूम का असली मालिक, कबीर सिंघानिया था।
और वह वृद्ध महिला कोई आम औरत नहीं, बल्कि श्रीमती सावित्री सिंघानिया थीं—पूरे ग्रुप की पेट्रोन।
रिया को देखते ही नीता ने तुरंत आगे बढ़कर कहा, “सर, यही वह लड़की है जिसने उस दिन अनुशासन तोड़ा था। मैंने इसे उसी दिन नौकरी से निकाल दिया था।”
कबीर सिंघानिया ने नीता को एक ठंडी नजर से देखा।
नीता की आवाज वहीं दब गई।
सावित्री देवी मुस्कुराईं और उन्होंने रिया को अपने पास आने का इशारा किया।
“आओ बेटी, रिया। आगे आओ,” सावित्री देवी ने कहा।
रिया संकोच करते हुए आगे बढ़ी।
कबीर ने आगे बढ़कर रिया के सामने एक फाइल रखी और बहुत ही विनम्रता से कहा, “रिया जी, मेरी दादी जी 3 दिन पहले इस शोरूम में बिना बताए आई थीं। वह देखना चाहती थीं कि हमारे सबसे बड़े शोरूम में आम लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।”
कबीर ने टेबल पर एक पेनड्राइव रखी और उसे शोरूम की बड़ी एलईडी स्क्रीन से कनेक्ट कर दिया।

स्क्रीन पर उस दिन का सीसीटीवी फुटेज चलने लगा।
फुटेज में साफ दिख रहा था कि कैसे नीता ने सावित्री देवी का अपमान किया था।
कैसे नीता ने उन्हें बाहर निकालने की धमकी दी थी।
और फिर फुटेज में वह पल आया जब रिया ने सावित्री देवी को पानी दिया, उन्हें सम्मान से बिठाया, 1 घंटे तक पूरी ईमानदारी से 10 सेट दिखाए।
और सबसे अंत में, स्क्रीन पर वह दृश्य दिखा जब रिया ने अपनी जेब से अपना आखिरी 20 रुपये का नोट निकालकर सावित्री देवी की हथेली पर रख दिया था।
पूरे शोरूम में गहरा सन्नाटा छा गया।
नीता का चेहरा पीला पड़ चुका था।
कबीर ने नीता की तरफ घूमकर कहा, “मैनेजर नीता, आपने हमारी कंपनी के सबसे बड़े नियम का उल्लंघन किया है। हमारी कंपनी पैसों से नहीं, ग्राहकों के सम्मान और इंसानियत से चलती है।”
नीता कांपते हुए बोली, “सर… मुझे माफ कर दीजिए। मुझे नहीं पता था कि यह हमारी बड़ी मैडम हैं। अगर मुझे पता होता…”
“अगर आपको पता होता, तो आप नाटक करतीं!” कबीर ने नीता की बात काटते हुए कहा।
“आपने एक बुजुर्ग महिला का सिर्फ इसलिए अपमान किया क्योंकि उनके कपड़े साधारण थे। और आपने एक ईमानदार कर्मचारी को सिर्फ इसलिए निकाल दिया क्योंकि उसने इंसानियत दिखाई।”
कबीर ने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला और नीता के हाथ में थमा दिया।
“यह आपका टर्मिनेशन लेटर है। आपको इसी वक्त ‘रॉयल हेरिटेज ज्वैलर्स’ से बर्खास्त किया जाता है। इतना ही नहीं, आपकी बदतमीजी और दुर्भावनापूर्ण रवैये के कारण आपको इस इंडस्ट्री की किसी भी दुकान में काम नहीं मिलेगा।”
नीता रोने लगी और सावित्री देवी के पैर पकड़ने के लिए आगे बढ़ी।
लेकिन सुरक्षा गार्डों ने उसे तुरंत रोक दिया और नीता को शोरूम से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
बाकी कर्मचारी डर के मारे सिर झुकाए खड़े थे।
इसके बाद, सावित्री देवी अपनी कुर्सी से उठीं।
उन्होंने अपने पर्स से वही 20 रुपये का नोट निकाला, जो रिया ने उन्हें दिया था।
उस नोट को उन्होंने एक कांच के फ्रेम में मढ़वा कर रखा हुआ था।
सावित्री देवी ने रिया का हाथ अपने दोनों हाथों में लिया और कहा, “बेटी, उस दिन तुमने मुझे सिर्फ 20 रुपये नहीं दिए थे। तुमने मुझे यह भरोसा दिया था कि इस मतलबी दुनिया में आज भी सच्चे और साफ दिल के लोग मौजूद हैं।”
सावित्री देवी ने कबीर की तरफ देखा और सिर हिलाया।
कबीर ने एक दूसरी फाइल रिया के सामने बढ़ाई।
“रिया जी, यह आपका नियुक्ति पत्र है। आज से आप इस बांद्रा शोरूम की नई रीजनल मैनेजर हैं।”
रिया की आंखें फटी की फटी रह गईं, “सर… मैं? लेकिन मेरे पास इतना अनुभव नहीं है…”
कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा, “अनुभव सिखाया जा सकता है रिया जी, लेकिन ईमानदारी, धैर्य और इंसानियत किसी कॉलेज में नहीं सिखाई जाती। आपकी तनख्वाह पहले से 5 गुना ज्यादा होगी, और आपकी मां के इलाज का पूरा खर्च ‘सिंघानिया फाउंडेशन’ उठाएगा।”
रिया की आंखों से आंसू छलक पड़े।
वह कुछ बोल नहीं पा रही थी।
सावित्री देवी ने रिया के सिर पर हाथ रखा और कहा, “अच्छे कर्मों का फल देर से मिलता है बेटी, लेकिन जब मिलता है, तो वह इंसान की पूरी जिंदगी बदल देता है।”
रिया ने झुककर सावित्री देवी के चरण छुए।
उस दिन शोरूम में मौजूद हर एक कर्मचारी को यह समझ आ गया था कि ऊंचे पद और महंगे गहने इंसान को बड़ा नहीं बनाते, बल्कि उसकी नीयत और उसका व्यवहार ही उसकी असली पहचान होती है।
रिया ने जो 20 रुपये का नोट निस्वार्थ भाव से दिया था, उसने आज उसकी किस्मत का दरवाजा हमेशा के लिए खोल दिया था।
