आज सुबह करीब 11 बजे, अनन्या शर्मा चार महीने की लंबी बिज़नेस ट्रिप के बाद अचानक अपने घर लौट आई।
उसने न तो अपने पति विवेक शर्मा को फोन किया था, न ही अपने बेटे आरव को बताया था कि वह आज लौट रही है।
अपने हाथ में पकड़े कपड़े के थैले में वह कुछ ताज़ी सब्ज़ियाँ, थोड़ा-सा मांस और वे चीज़ें लाई थी जो उसके पति और बेटे दोनों को बहुत पसंद थीं।
वह बस उनके लिए कुछ गरमागरम बनाना चाहती थी।
ठीक वैसे ही…
जैसे वह पहले बनाया करती थी।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अचानक अनन्या को कुछ अजीब महसूस हुआ।
पूरी बिल्डिंग असामान्य रूप से शांत थी।
न टीवी की आवाज़।
न संगीत।
न किसी के चलने की आहट।
कुछ भी नहीं।
वह तीसरी मंज़िल पर पहुँची और अपने फ्लैट के सामने रुक गई।
उसने दरवाज़े पर हल्की दस्तक दी।
ठक… ठक…
कोई जवाब नहीं आया।
उसने इस बार थोड़ा ज़ोर से खटखटाया।
ठक… ठक… ठक…
फिर भी अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई।
अनन्या ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“ये दोनों कहाँ चले गए…?”
वह कुछ पल दरवाज़े के सामने खड़ी रही।
सुबह के लगभग 11 बज चुके थे।
इस समय तक विवेक ऑफिस के लिए निकल जाता था और आरव कॉलेज के लिए।
लेकिन आज घर के अंदर ऐसी खामोशी थी जैसे वहाँ कई दिनों से कोई रहा ही न हो।
आख़िरकार अनन्या ने अपना बैग खोला और घर की चाबी ढूँढ़ने लगी।
चार महीने से उसने वह चाबी इस्तेमाल नहीं की थी, इसलिए उसे ढूँढ़ने में कुछ समय लग गया।
आख़िरकार चाबी मिल गई।
उसने ताला खोला।
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
सबसे पहले जिस चीज़ ने उसे चौंकाया, वह था घर का असाधारण रूप से साफ़ और व्यवस्थित होना।
उसने सोचा था कि चार महीने तक अकेले रहने के कारण घर बिखरा हुआ मिलेगा।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं था।
सोफ़ा बिल्कुल व्यवस्थित था।
टेबल पर एक भी कागज़ नहीं पड़ा था।
फर्श चमक रहा था।
रसोई भी बिल्कुल साफ़ थी।
अनन्या ने राहत की साँस ली।
“लगता है विवेक ने घर संभाल लिया…”
उसने अपने हाथों में पकड़े थैले मेज़ पर रखे।
और तभी उसकी नज़र दरवाज़े के पास पड़ी एक चीज़ पर गई।
महिलाओं की एक जोड़ी जूती।
नाज़ुक।
हल्की एड़ी वाली।
दीवार के सहारे रखी हुई।
अनन्या वहीं जम गई।
वे उसकी नहीं थीं।
इस बात का यकीन उसे तुरंत हो गया।
वह कभी ऐसी जूती नहीं पहनती थी।
उसकी पसंद हमेशा सादी और आरामदायक चप्पलों या फ्लैट जूतों की थी।
लेकिन ये जूती…
किसी दूसरी महिला की थी।
उसके मन में अचानक एक अजीब-सा विचार आया।
“क्या ये दोनों मेरे लिए कोई सरप्राइज़ प्लान कर रहे हैं?”
वह धीरे-धीरे जूतियों के पास गई।
उन्हें उठाया।
ध्यान से देखा।
वे बिल्कुल नई नहीं थीं।
उनके आगे की तरफ़ हल्की खरोंचें थीं।
किसी ने उन्हें कई बार पहना था।
और सबसे अजीब बात—
उनका डिज़ाइन बिल्कुल अनन्या की पसंद जैसा नहीं था।
उसका गला सूख गया।
“ये किसकी हैं…?”
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
वह धीरे-धीरे कमरे के भीतर आगे बढ़ी।
हर कदम पिछले कदम से छोटा महसूस हो रहा था।
जैसे ज़मीन कभी भी उसके पैरों के नीचे से खिसक सकती हो।
फिर उसकी नज़र सामने वाले गलियारे पर पड़ी।
मास्टर बेडरूम का दरवाज़ा आधा खुला था।
अनन्या उसके पास पहुँची।
उसने दरवाज़े को धीरे से धक्का दिया।
“कौन…?”
उसकी आवाज़ कमरे में गूँजी।
और फिर…
वह रुक गई।
कमरे की खिड़की से आती सुबह की रोशनी बिस्तर पर टेढ़ी-मेढ़ी परछाइयाँ बना रही थी।
चादरें अस्त-व्यस्त थीं।
और वहाँ…
दो लोग थे।
अनन्या की साँस अटक गई।
पहले तो उसे समझ ही नहीं आया कि वह क्या देख रही है।
कुछ ठीक नहीं था।
वह एक कदम और आगे बढ़ी।
कमरे की खामोशी अब सिर्फ़ खामोशी नहीं रह गई थी।
वह किसी भारी बोझ की तरह उसके सीने पर दबाव डाल रही थी।
“कौन है वहाँ…?”
कोई जवाब नहीं आया।
फिर उसकी नज़र एक छोटी-सी चीज़ पर पड़ी।
बस एक छोटी-सी बात।
लेकिन उतनी ही काफ़ी थी।
अनन्या के हाथ काँपने लगे।
उसने अनजाने में एक और कदम बढ़ाया।
अचानक उसे साँस लेने में मुश्किल होने लगी।
और उसी पल…
उसे समझ आ गया कि वह क्या देखने वाली थी।
कमरे की हवा जैसे बिजली से भर गई थी।
अनन्या के हाथों के रोंगटे खड़े हो गए।
उसकी आँखें सामने पड़े लो-प्रोफाइल गद्दे पर जमी थीं।
वहाँ जो आदमी लेटा था, वह उसका पति था—
विवेक।
उसका चेहरा शांत था।
इतना शांत कि अनन्या के भीतर उठ रहे तूफ़ान के बिल्कुल उलट।
लेकिन उसके बगल में मौजूद दूसरी शख्सियत ने उसकी पूरी दुनिया को हिला दिया।
वह कोई दूसरी महिला नहीं थी।
वह उन जूतियों की मालकिन भी नहीं थी।
वह था—
उनका बेटा आरव।
दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल पास लेटे हुए थे।
बाहर की दुनिया में वे पिता और बेटा थे।
लेकिन इस कमरे में वे बस दो ऐसे इंसान दिखाई दे रहे थे जो किसी गहरे, अनकहे दर्द में एक-दूसरे से चिपके हुए थे।
अनन्या ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया।
उसके गले से निकलने वाली आवाज़ आधी चीख थी और आधी सिसकी।
कुछ मिनट पहले तक जिस साफ़-सुथरे घर को देखकर उसे खुशी हुई थी, अब वही घर उसे किसी झूठे मंच जैसा लग रहा था।
जैसे वह घर नहीं…
किसी खत्म हो चुकी ज़िंदगी का संग्रहालय हो।
फर्श पर बिखरे कपड़ों के ढेर अब उसे काले धब्बों जैसे दिखाई दे रहे थे।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
“विवेक…?”
कोई जवाब नहीं मिला।
दोनों की साँसों की धीमी आवाज़ ही कमरे में सुनाई दे रही थी।
तभी अनन्या को एहसास हुआ कि दरवाज़े के पास रखी वे जूतियाँ किसी सरप्राइज़ का हिस्सा नहीं थीं।
वे किसी पुराने जीवन की निशानी थीं।
शायद विवेक ने उन्हें सिर्फ़ इसलिए संभालकर रखा था ताकि उसे लगे कि इस घर में अब भी किसी तरह का सामान्य जीवन बचा हुआ है।
अनन्या के भीतर गुस्सा, दर्द और भ्रम सब एक साथ उमड़ पड़े।
वह आगे बढ़ी।
तभी विवेक की आँखें धीरे-धीरे खुलीं।
एक पल के लिए अनन्या ने वही आदमी देखा जिससे उसने शादी की थी।
वही आदमी जो दस वर्षों तक हर सोमवार उसे फूल भेजा करता था।
लेकिन अगले ही पल विवेक की नज़र दरवाज़े पर खड़ी अनन्या पर पड़ी।
उसने उसे देखा।
और उसके चेहरे पर शर्म से ज़्यादा…
एक गहरी थकान थी।
जैसे वह पिछले चार महीनों से किसी ऐसी चीज़ का इंतज़ार कर रहा था जिससे वह बच नहीं सकता था।
उसने आरव के कंधे पर अपना हाथ रखा।
एक सहज, सुरक्षात्मक हरकत।
लेकिन अनन्या के लिए वही हरकत उसके घुटनों को कमजोर करने के लिए काफ़ी थी।
विवेक ने धीमी आवाज़ में कहा—
“तुम इतनी जल्दी घर आ गईं…”
अनन्या ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी नज़र अब भी उसके हाथ में पकड़ी उन जूतियों पर थी।
उसने उन्हें नीचे गिरा दिया।
धप्प।
उस छोटी-सी आवाज़ ने जैसे उनके विवाह का आख़िरी दरवाज़ा भी बंद कर दिया।
अनन्या ने महसूस किया—
यह सुबह किसी नए जीवन की शुरुआत नहीं थी।
यह उस त्रासदी पर पड़ा हुआ एक तेज़ प्रकाश था जो बहुत पहले शुरू हो चुकी थी।
वह पीछे मुड़ी।
मेज़ पर रखी सब्ज़ियाँ और मांस अब भी वहीं पड़े थे।
वह उन्हें गरम खाना बनाना चाहती थी।
लेकिन कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें दोबारा गरम नहीं किया जा सकता।
भाग 3
गलियारा अचानक पहले से कहीं लंबा लग रहा था।
ठंडा।
खाली।
जैसे वह उसे निगल रहा हो।
अनन्या ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
वह देख भी नहीं सकती थी।
विवेक का आरव के कंधे पर रखा हाथ उसके दिमाग में जलती हुई तस्वीर की तरह चिपक गया था।
वह रसोई में पहुँची।
मेज़ पर रखे खाने के थैले अभी भी वहीं थे।
मांस के कागज़ पर नमी जमा होने लगी थी।
सब्ज़ियाँ गर्म कमरे में धीरे-धीरे मुरझा रही थीं।
अनन्या ने उन थैलों को देखा।
उसका दिमाग उन सभी सवालों का जवाब ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा था जिनका कोई जवाब नहीं था।
फिर उसने उन जूतियों को उठाया।
उनके अगले हिस्से पर मौजूद खरोंचों को देखा।
अगर वे उसकी नहीं थीं…
और अगर विवेक और आरव के बीच वैसा कुछ नहीं था जैसा उसने पहले सोचा था…
तो फिर—
वह महिला कौन थी जिसकी मौजूदगी इन जूतियों में छिपी हुई थी?
तभी पीछे से आवाज़ आई।
“अनन्या…”
वह पलटी।
विवेक दरवाज़े पर खड़ा था।
उसने जल्दी से एक ढीला-सा गाउन पहन लिया था।
बाल बिखरे हुए थे।
चेहरा थका हुआ था।
वह किसी अपराधी जैसा नहीं दिख रहा था।
वह एक ऐसे आदमी जैसा लग रहा था जो चार महीने से अपनी साँस रोककर बैठा था और अब उसके पास साँस रोककर रखने की ताकत खत्म हो चुकी थी।
अनन्या ने जूतियाँ ऊपर उठाईं।
उसकी आवाज़ बेहद शांत थी।
“ये किसकी हैं?”
विवेक ने कुछ पल उसे देखा।
फिर उसकी आँखें झुक गईं।
“तुम्हारी बहन की।”
अनन्या के चेहरे का रंग उड़ गया।
“मेरी बहन की?”
विवेक ने धीरे से कहा—
“हाँ। तुम्हारे जाने के बाद मुझे स्टोर रूम में ये मिली थीं। मैं उन्हें यहाँ ले आया।”
“क्यों?”
विवेक की आवाज़ टूट गई।
“क्योंकि मुझे… घर में किसी और के चलने की आवाज़ याद आती थी।”
अनन्या कुछ नहीं बोली।
“मुझे उस परिवार की याद आती थी जो कभी हमारा था।”
कमरे में कुछ पल तक सिर्फ़ खामोशी रही।
फिर अनन्या ने धीमे से कहा—
“लेकिन मेरी बहन को गुज़रे पाँच साल हो चुके हैं।”
विवेक ने आँखें बंद कर लीं।
“मुझे पता है।”
अनन्या का दिल और भारी हो गया।
फिर उसने पूछा—
“और आरव?”
उसकी आवाज़ काँप गई।
“वह तुम्हारे साथ उस कमरे में क्यों था?”
विवेक एक कदम आगे बढ़ा।
अनन्या तुरंत पीछे हट गई।
उसकी पीठ रसोई के ठंडे संगमरमर से जा लगी।
विवेक ने काँपती आवाज़ में कहा—
“आरव सो नहीं पा रहा था।”
अनन्या की आँखें भर आईं।
“जब से तुम गई हो, उसके पुराने बुरे सपने फिर शुरू हो गए।”
विवेक ने गहरी साँस ली।
“उसे उस हादसे के सपने आते हैं।”
“हर रात।”
“कभी-कभी वह रात के तीन बजे मेरे कमरे में आ जाता था। काँप रहा होता था। डरा हुआ।”
विवेक की आँखों में आँसू आ गए।
“मैं उसे वापस उसके कमरे में नहीं भेज पाया।”
वह कुछ पल रुका।
“उसे मेरे पास रहने से ही सुरक्षित महसूस होता था।”
फिर उसने धीमे से कहा—
“हम तुम्हारे साथ दिल का धोखा नहीं छिपा रहे थे, अनन्या।”
उसकी आवाज़ टूट रही थी।
“हम यह छिपा रहे थे कि तुम्हारे बिना हम दोनों टूट चुके हैं।”
अनन्या ने उसकी ओर देखा।
विवेक ने कहा—
“तुम हमेशा चाहती थीं कि यह घर परफेक्ट रहे।”
“साफ़।”
“व्यवस्थित।”
“शांत।”
“लेकिन जिस दिन तुमने उस विमान में बैठकर इस घर का दरवाज़ा बंद किया…”
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“…उसी दिन यह घर अंदर से टूटने लगा था।”
अनन्या ने गलियारे की तरफ़ देखा।
आरव वहाँ खड़ा था।
उसके शरीर पर एक कंबल लिपटा हुआ था।
आँखें लाल थीं।
चेहरा खाली।
वह किसी सामान्य बेटे जैसा नहीं लग रहा था।
वह किसी ऐसे इंसान जैसा लग रहा था जिसने बहुत लंबे समय से डर के साथ जीना सीखा हो।
और तभी अनन्या को समझ आया।
घर का इतना साफ़ होना व्यवस्था की निशानी नहीं था।
वह ठहराव की निशानी था।
विवेक और आरव ने घर को साफ़ रखा था क्योंकि वे उसमें जी नहीं रहे थे।
वे बस किसी तरह दिन काट रहे थे।
अँधेरे में बैठे हुए।
एक-दूसरे का सहारा बने हुए।
उसका इंतज़ार करते हुए।
लेकिन फिर भी…
उन दोनों के बीच बनी वह गहरी दुनिया अनन्या को बाहर कर चुकी थी।
यही बात उसे सबसे ज़्यादा चोट पहुँचा रही थी।
उन्होंने उसकी जगह किसी और को नहीं दी थी।
लेकिन उन्होंने उसके बिना जीना सीख लिया था।
भले ही वह जीना बेहद टूटा हुआ था।
अनन्या ने मेज़ पर रखे खाने को देखा।
वह घर की देखभाल करने वाली पत्नी बनकर लौटी थी।
माँ बनकर लौटी थी।
उसे लगा था कि एक गरम खाना सब कुछ फिर से ठीक कर देगा।
लेकिन अब उसे समझ आ चुका था—
उन्हें सिर्फ़ उसके बनाए खाने की ज़रूरत नहीं थी।
उन्हें उस अनन्या की ज़रूरत थी जो चार महीने पहले इस घर से निकली थी।
और वह अनन्या अब शायद वापस नहीं आ सकती थी।
अनन्या ने संगमरमर के ठंडे काउंटर पर अपना हाथ रखा।
उसके भीतर अचानक एक अजीब-सी शांति उतर आई।
“मैं आज रात यहाँ नहीं रुक सकती।”
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
विवेक कुछ कहने ही वाला था।
लेकिन अनन्या ने उसकी ओर नहीं देखा।
उसने अपनी चाबियाँ उठाईं।
खाने के थैले उठाए।
वह उन्हें वहीं छोड़ना नहीं चाहती थी।
शायद इसलिए क्योंकि उन्हें छोड़ना ऐसा लगता जैसे वह अपने ही शरीर का कोई हिस्सा पीछे छोड़ रही हो।
वह दरवाज़े से बाहर निकल गई।
सीढ़ियाँ उतरते हुए बिल्डिंग की वही खामोशी फिर उसके पीछे चली आई।
लेकिन इस बार वह उसे डरा नहीं रही थी।
अब वह खामोशी ईमानदार थी।
शहर की सड़कों पर गाड़ियों की आवाज़ें थीं।
लोग अपने काम पर जा रहे थे।
दुकानें खुली थीं।
ज़िंदगी चल रही थी।
अनन्या अपनी कार में बैठी।
तीन गलियाँ दूर जाकर उसने कार रोक दी।
इंजन बंद था।
हीटर की आख़िरी बची गर्मी उसके चेहरे से टकरा रही थी।
बगल वाली सीट पर खाने का थैला पड़ा था।
उस रात के उस खाने का स्मारक…
जो कभी बना ही नहीं।
अनन्या ने रियर-व्यू मिरर में अपना चेहरा देखा।
उसे सामने एक अजनबी महिला दिखाई दी।
चार महीने पहले वह एक परिवार की मज़बूत नींव बनकर घर से निकली थी।
आज वह उसी घर की ऐसी गवाह बनकर लौटी थी जिसे वह अब अपना कहने में भी हिचक रही थी।
उसने पिछले एक घंटे को अपने दिमाग में दोहराया।
धीरे-धीरे हर चीज़ का अर्थ बदलने लगा।
वह कमरा पाप का स्थान नहीं था।
वह दो टूटे हुए लोगों का आश्रय था।
वे जूतियाँ किसी प्रेमिका का प्रमाण नहीं थीं।
वे एक ऐसे आदमी की बेबस कोशिश थीं जो सामान्य परिवार की एक पुरानी याद को वापस बुलाना चाहता था।
वह खामोशी शांति नहीं थी।
वह दो लोगों की उस घुटी हुई साँस की आवाज़ थी जो महीनों से किसी ऐसे पल का इंतज़ार कर रहे थे जो कभी आया ही नहीं।
अनन्या ने खाने के थैले से एक सेब निकाला।
लाल।
चमकदार।
बिल्कुल सही।
उसने उसे कसकर पकड़ा।
फिर धीरे से वापस रख दिया।
उसने सोचा—
क्या वह वापस ऊपर चली जाए?
क्या वह अपना कोट उतार दे?
क्या वह चूल्हा जलाए?
क्या वह ऐसे व्यवहार करे जैसे उसने कुछ देखा ही नहीं?
क्या वह खुद को समझा दे कि घर का साफ़ होना खुशी की निशानी था?
लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकती थी।
क्योंकि अब उसे सच पता था।
आप फर्श को कितना भी चमका लें, टूटते हुए घर की हवा को साफ़ नहीं कर सकते।
अनन्या ने कार की चाबी घुमाई।
डैशबोर्ड पर समय चमका—
22:15
एक घंटा बीत चुका था।
सिर्फ़ एक घंटे में उसकी बीस साल की बनाई हुई ज़िंदगी जैसे किसी पुरानी फ़ाइल में बंद कर दी गई थी।
वह किसी होटल की तरफ़ नहीं गई।
वह वापस घर भी नहीं गई।
वह बस गाड़ी चलाती रही।
सड़क की लाइटें एक के बाद एक उसके ऊपर से गुजरती रहीं।
हर रोशनी उसे उस कमरे में लगी घड़ी की याद दिला रही थी।
21:12:403
एक ऐसा पल जो समय में जम गया था।
एक ऐसा पल जब एक पत्नी ने खुद को अपने ही घर में एक अजनबी की तरह पाया था।
अनन्या ने खाली कार में धीरे से कहा—
“शायद हम सब ऐसे अजनबी हैं… जो बस एक-दूसरे के नाम जानते हैं।”
तभी उसके फोन पर एक संदेश आया।
विवेक:
“दरवाज़ा खुला है। हमेशा से खुला था।”
अनन्या ने कुछ सेकंड तक संदेश देखा।
फिर उसे डिलीट कर दिया।
उसने कार की खिड़की नीचे कर दी।
ठंडी हवा तेजी से अंदर आई।
उसने खाने की थैलियों की खुशबू को पीछे छोड़ दिया।
उसने उस घर की बची हुई महक को भी अपने भीतर से निकाल देना चाहा।
वह भाग नहीं रही थी।
इस बार…
वह बस पहली बार अपनी ज़िंदगी की गति से चल रही थी।
पीछे तीसरी मंज़िल के उस सफेद कमरे में दो लोग अब भी अँधेरे में बैठे थे।
एक-दूसरे से बँधे हुए।
अपने साझा दर्द से जुड़े हुए।
ऐसे दर्द से जिसे अनन्या अब ठीक नहीं कर सकती थी।
और उसके सामने…
सिर्फ़ सड़क थी।
अँधेरी।
लंबी।
अनिश्चित।
और डरावनी।
लेकिन शायद पहली बार…
वह सड़क आज़ाद भी थी।
