रोहन के पिता, जिनका नाम देवेन्द्र सूरी था, भीड़ को हटाते हुए तेज़ी से हमारी तरफ़ आए।
हॉल में मौजूद लगभग 300 मेहमानों की नज़रें अब हम पर थीं।
शहनाई की आवाज़ बंद हो चुकी थी।
माहौल में सिर्फ़ फुसफुसाहट थी।
देवेन्द्र जी मेरे पास आकर रुक गए।
उनकी आँखों में अविश्वास था।
उन्होंने हाथ जोड़ लिए।
“कमला बहन? आप यहाँ?”
मैंने देवेन्द्र जी को देखा।
20 साल पुराना चेहरा मेरी आँखों के सामने तैर गया।
वह चेहरा जो कभी मुफ़्लिसी और लाचारी से भरा हुआ करता था।
रोहन ने आगे बढ़कर अपने पिता का हाथ पकड़ा।
“पापा, क्या यह वही कमला शर्मा हैं?”
देवेन्द्र जी ने भारी आवाज़ में कहा—
“हाँ रोहन, यह वही देवी हैं जिनकी वजह से आज हम ज़िंदा हैं और इस मुकाम पर हैं।”
रिया चुपचाप खड़ी थी।
उसकी आँखें ज़मीन पर टिकी थीं।
चेहरे का सारा घमंड गायब हो चुका था।
रोहन ने भीड़ की तरफ़ मुड़कर तेज़ आवाज़ में कहा—
“आज से 20 साल पहले, जब मेरे पापा का सारा कारोबार डूब गया था, तब हम जयपुर के एक छोटे से किराए के कमरे में रहते थे।”
“खाने तक के पैसे नहीं थे।”
“पापा बीमार थे और इलाज के लिए 50,000 रुपये की सख़्त ज़रूरत थी।”
“हमारे अपने रिश्तेदारों ने दरवाज़े बंद कर लिए थे।”
रोहन ने मेरी तरफ़ इशारा किया।
“उस वक्त इस महिला ने, जो हमारे पड़ोस में सिलाई का काम करती थी, अपनी दुकान की इकलौती मशीन और अपनी माँ का दिया सारा सोना गिरवी रखकर मेरे पापा का इलाज कराया था।”
“इतना ही नहीं, इन्होंने ही पापा को दोबारा छोटा सा कपड़े का काम शुरू करने के लिए पैसे दिए थे।”
हॉल में खड़े लोग एक-दूसरे को देखने लगे।
रोहन की बातें सुनकर मेहमानों में कानाफूसी शुरू हो गई।
देवेन्द्र जी ने कहा—
“कमला बहन, जब मेरा काम चंडीगढ़ में चल पड़ा, तो मैं आपको ढूँढ़ने जयपुर आया था।”
“लेकिन आपका वह मकान बिक चुका था और आप कहीं चली गई थीं।”
“मैं पिछले 15 सालों से आपका कर्ज़ उतारने के लिए ढूँढ़ रहा था।”
रोहन ने रिया की तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में गुस्सा और निराशा थी।
“रिया, शादी तय होने के बाद जब मैंने तुमसे तुम्हारी माँ के बारे में पूछा था, तो तुमने क्या कहा था?”
“तुमने कहा था कि तुम्हारी माँ बचपन में ही गुज़र चुकी हैं और तुम्हारा इस दुनिया में कोई नहीं है।”
रिया की ज़बान बंद थी।
वह कुछ बोलने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे।
रोहन ने अपनी जेब से अपना फोन निकाला।
“मुझे समझ नहीं आ रहा था कि तुम अपनी माँ को क्यों छिपा रही थीं।”
“लेकिन अब मुझे समझ आ रहा है।”
“तुम अपनी उस माँ से शर्माती थीं जिसने तुम्हें इस काबिल बनाया?”
मैंने रोहन का हाथ पकड़ा।
“बेटा, छोड़ो इन बातों को।”
“आज तुम्हारी शादी का दिन है।”
“शुभ काम में यह सब मत करो।”
“मैं तो बस यह नथ देने आई थी।”
मैंने अपने हाथ का लाल मखमली डिब्बा खोला।
उसमें वही सोने की पुरानी नथ चमक रही थी।
देवेन्द्र जी ने वह नथ देखी तो उनकी आँखें फिर भर आईं।
“यह वही नथ है ना बहन, जिसे आपने 20 साल पहले मेरे इलाज के लिए गिरवी रखने की कोशिश की थी?”
मैंने धीरे से सिर हिलाया।
“यह रिया की नानी की थी।”
“रिया को बचपन से पसंद थी।”
“बस यही देने आई थी, अब मैं चलती हूँ।”
“रुकिए माँ!” रोहन ने कहा।
उसने ‘माँ’ शब्द इतनी ज़ोर से कहा कि पूरा हॉल गूँज उठा।

रोहन रिया के करीब गया।
“रिया, तुम सिर्फ़ झूठी नहीं हो, तुम एहसानफ़रामोश भी हो।”
“जिस माँ ने दिन-रात सिलाई करके तुम्हें इस कॉलेज तक पहुँचाया, जिस माँ के त्याग की वजह से मेरा परिवार आज ज़िंदा है, तुमने उसी माँ को अपनी ज़िंदगी से मिटा दिया?”
रिया ने रोहन का हाथ पकड़ने की कोशिश की।
“रोहन, मेरी बात सुनो!”
“मैं डर गई थी!”
“मुझे लगा तुम्हारे घर वाले इतने अमीर हैं, अगर उन्हें पता चलेगा कि मेरी माँ एक मामूली दर्जी हैं, तो यह शादी टूट जाएगी!”
रोहन ने अपना हाथ पीछे खींच लिया।
“हमारे घर में पैसे की कमी हो सकती थी रिया, लेकिन सोच की कमी कभी नहीं थी।”
“पापा ने मुझे हमेशा सिखाया कि उस इंसान का सम्मान करो जो मुश्किल में काम आए।”
“और तुमने उसी इंसान को मरे हुए बता दिया?”
तभी देवेन्द्र जी ने आगे बढ़कर अपने कोट की जेब से एक कागज़ निकाला।
वह एक पुराना लिफ़ाफ़ा था।
देवेन्द्र जी ने कहा—
“रिया, तुम कहती हो कि तुम डर गई थीं?”
“तो फिर यह क्या है?”
उन्होंने वह कागज़ खोला।
वह एक कानूनी लेटर था जो 6 महीने पहले का था।
देवेन्द्र जी ने कहा—
“6 महीने पहले, जब शादी की बात पक्की भी नहीं हुई थी, तब मैंने जयपुर में कमला बहन की पुरानी दुकान का पता लगा लिया था।”
“मैंने अपने वकील के ज़रिए उस पते पर एक पत्र भेजा था।”
“उस पत्र में मैंने लिखा था कि मैं अपनी कुल संपत्ति का 20 प्रतिशत हिस्सा कमला बहन के नाम कर रहा हूँ, क्योंकि उन्हीं की बदौलत आज मैं इस मुकाम पर हूँ।”
पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया।
देवेन्द्र जी ने रिया की तरफ़ देखा।
“वह पत्र कमला बहन के घर पहुँचा था।”
“लेकिन कमला बहन को वह पत्र कभी नहीं मिला।”
“क्योंकि वह पत्र रिया ने खुद रिसीव किया था।”
रिया का चेहरा एकदम सफ़ेद पड़ गया।
रोहन ने चौंकाने वाली नज़र से रिया को देखा।
“क्या? रिया, तुम्हें 6 महीने पहले से पता था कि पापा मेरी माँ को ढूँढ़ रहे हैं?”
देवेन्द्र जी ने कहा—
“हाँ रोहन।”
“रिया ने मेरे वकील को फोन करके कहा था कि उसकी माँ अब सिलाई का काम नहीं करतीं और वे बीमार रहती हैं, इसलिए संपत्ति के सारे कागज़ात सीधे उसके नाम पर ट्रांसफर किए जाएँ।”
“वकील को शक हुआ, तो उसने मुझे बताया।”
“लेकिन मैंने सोचा कि बेटी ही तो है, माँ के लिए ही कर रही होगी।”
“मुझे नहीं पता था कि यह लड़की अपनी ही माँ को धोखे में रख रही है और उसे मृत घोषित कर चुकी है!”
यह सुनकर मेरे पैर काँपने लगे।
मुझे अपनी ही बेटी पर यकीन नहीं हो रहा था।
जिस बेटी को मैंने छाती से लगाकर पाला, वह मेरे नाम की संपत्ति हड़पने और मुझे अपनी ज़िंदगी से हटाने की साजिश कर रही थी?
रिया घुटनों के बल बैठ गई।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
“माँ… मुझे माफ कर दो…”
“रोहन, मुझे एक मौका दो… मैंने यह सब सिर्फ़ अपने भविष्य के लिए किया…”
रोहन ने नीचे बैठकर उसकी तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में कोई दया नहीं थी।
“भविष्य?” रोहन ने कहा।
“जो इंसान अपनी माँ का सम्मान नहीं कर सकता, वह किसी के परिवार की इज़्ज़त क्या करेगा?”
“जो लड़की अपने स्वार्थ के लिए अपनी ज़िंदा माँ को मार सकती है, वह मेरे साथ कभी वफ़ादार नहीं हो सकती।”
रोहन ने अपनी शेरवानी से सेहरा उतारा और टेबल पर रख दिया।
“पंडित जी, यह शादी नहीं होगी।”
हॉल में हड़कंप मच गया।
रिया के कुछ रिश्तेदार आगे आए।
“रोहन बेटा, गुस्सा थूक दो! लोग क्या कहेंगे? सब रिश्तेदार आए हुए हैं!”
देवेन्द्र जी ने हाथ उठाकर सबको चुप करा दिया।
“जो लोग अपनी माँ का सौदा करते हैं, उनसे रिश्ता जोड़ना हमारे संस्कारों में नहीं है।”
“आज अगर यह शादी होती भी, तो मेरी बहन कमला मंडप में सबसे आगे बैठतीं, छिपकर कोने में नहीं।”
रोहन मेरे पास आया।
उसने झुककर मेरे पैर छू लिए।
“माँ, मुझे माफ कर दीजिए कि आपको इस हॉल के कोने में बैठना पड़ा।”
“आज से आप इस घर की सबसे बड़ी सदस्य हैं।”
मैंने रोहन को उठाया।
“बेटा, ऐसा मत करो। शादी तोड़ना सही नहीं है।”
रोहन ने मुस्कुराकर कहा—
“माँ, शादी दो परिवारों का मिलन होती है।”
“जहाँ सच और सम्मान न हो, वहाँ कोई रिश्ता नहीं टिक सकता।”
रिया रोती रही, गिड़गिड़ाती रही।
लेकिन रोहन और उसके पिता ने अपना फैसला नहीं बदला।
देवेन्द्र जी ने तुरंत अपने मैनेजर को बुलाया और निर्देश दिया—
“हॉल का सारा खर्च हमारी तरफ से भरा जाएगा।”
“और कमला बहन के लिए गाड़ी तैयार करो।”
रोहन ने मेरा हाथ थामा।
“माँ, चलिए घर चलते हैं।”
मैंने पीछे मुड़कर रिया को देखा।
वह मंडप के पास अकेली बैठी रो रही थी।
उसके महंगे कपड़े और गहने अब बेकार लग रहे थे।
जिस झूठी शान के लिए उसने अपनी माँ को ठुकराया था, वही शान आज उसके हाथ से छिन चुकी थी।
मैंने लाल मखमली डिब्बा टेबल पर रख दिया।
वह नथ अब भी वहीं चमक रही थी।
मैं रोहन और देवेन्द्र जी के साथ बाहर निकल आई।
गाड़ी में बैठते ही देवेन्द्र जी ने कहा—
“बहन जी, अब आपको सिलाई की दुकान चलाने की ज़रूरत नहीं है।”
“आपका जो हक 20 साल से रुका हुआ था, वह आज आपको मिलेगा।”
मैंने खिड़की से बाहर देखा।
जयपुर की सड़कें वैसी ही थीं।
लेकिन मेरी दुनिया बदल चुकी थी।
मुझे समझ आ गया था कि गरीबी कपड़ों या काम से नहीं होती, गरीबी सोच और नीयत से होती है।
मैंने अपनी बेटी को सब कुछ दिया था, बस सही संस्कार नहीं दे पाई थी।
लेकिन आज मुझे एक ऐसा बेटा मिल गया था, जिसने बिना किसी खून के रिश्ते के भी मुझे माँ का दर्जा दिया था।
