भाग 2 “उस रात मैंने USB ड्राइव खोली”//

मैं अस्पताल में अपने पति की देखभाल कर रही थी। उसका एक भयानक सड़क हादसा हुआ था। तभी एक नर्स ने चुपके से मेरी हथेली में एक USB ड्राइव रख दी और फुसफुसाकर कहा, “इसे घर जाकर देखना… और उसके बाद अकेले मत रहना।”

मैंने कोई हंगामा नहीं किया। उसके परिवार के सामने मुस्कुराती रही, USB अपने पास रख ली और उस रात का इंतज़ार किया।

मुझे नहीं पता था कि उस रिकॉर्डिंग में जो मैं देखने वाली थी, वह मेरे पति के कथित हादसे को एक बहुत बड़ी साजिश में बदल देगा।

PART 1

“इसे घर जाकर देखिए… और इसे देखने के बाद अपने पति के साथ अकेली मत रहिए।”

अस्पताल के गलियारे के बीच उस नर्स ने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया और मेरी हथेली में एक USB ड्राइव रख दी।

मुझे कुछ पूछने का मौका भी नहीं मिला।

“कृपया, मिसेज़ शर्मा… इसे यहाँ मत खोलिए,” उसने फुसफुसाते हुए कहा और राजीव के कमरे की तरफ देखा। “और किसी को मत बताइए कि यह मैंने आपको दिया है।”

इसके बाद वह ऐसे चली गई जैसे हमारे बीच कभी कोई बातचीत हुई ही न हो।

मैं वहीं खड़ी रह गई।

सुबह के 7:40 बजे थे।

मेरे पति राजीव शर्मा को सड़क दुर्घटना हुए लगभग दो हफ्ते हो चुके थे। हादसा मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर हुआ था, जब उसकी SUV एक तेज़ रफ्तार ट्रक से टकरा गई थी।

डॉक्टरों की शुरुआती जांच में उसकी रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर पाया गया था, लेकिन स्पाइनल कॉर्ड को कोई स्पष्ट नुकसान नहीं दिखा था।

फिर भी राजीव लगातार कहता था कि उसे अपने पैरों में लगभग कोई संवेदना महसूस नहीं होती।

वह खड़ा नहीं हो सकता था।

और उसका दाहिना हाथ इतना दर्द करता था कि वह अपने पास रखे गिलास तक को नहीं उठा सकता था।

डॉक्टर बहुत सावधानी से बात करते थे।

लेकिन मैं पहले ही अपनी पूरी जिंदगी को बिखरता हुआ देखने लगी थी।

मैं चौंतीस साल की थी और एक बड़ी लॉजिस्टिक्स कंपनी में अकाउंट्स मैनेजर के रूप में काम करती थी।

नंबरों और हिसाब-किताब की समस्याएँ सुलझाना मेरे लिए आसान था।

लेकिन कोई भी एक्सेल शीट मुझे यह नहीं बता सकती थी कि मैं राजीव की लंबी थेरेपी का खर्च कैसे उठाऊँगी, घर कैसे संभालूँगी, अपने सात साल के बेटे आरव की देखभाल कैसे करूँगी और साथ-साथ अपनी नौकरी भी कैसे बचाऊँगी।

कई रातों तक मैं राजीव के अस्पताल के बिस्तर के पास रखी कुर्सी पर सोती रही।

उसकी बहन निशा हर दिन अस्पताल आती थी।

अजीब बात यह थी कि वह हमेशा डॉक्टरों के राउंड शुरू होने से कुछ मिनट पहले ही पहुँच जाती थी।

“तुम भी बीमार पड़ जाओगी,” वह अक्सर मुझसे कहती।

“तुम्हें यह स्वीकार करना होगा कि राजीव शायद दोबारा काम न कर पाए। अब सारी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर आने वाली है।”

उसकी माँ सविता देवी उससे भी ज्यादा कठोर थीं।

वह मुझे ऐसे देखती थीं जैसे मैं पहले ही एक पत्नी के रूप में असफल हो चुकी हूँ।

एक दोपहर उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए कहा,

“यही समय होता है जब एक औरत साबित करती है कि वह अपने पति से सच में प्यार करती है।”

राजीव चुप रहता।

उसके चेहरे पर हमेशा दुख और बेबसी का भाव रहता।

और कमरे में मौजूद हर व्यक्ति जैसे इंतज़ार कर रहा था कि मैं बिना कोई सवाल किए अपनी पूरी जिंदगी अपने पति के नाम कर दूँ।

और शायद मैं ऐसा कर भी देती।

अगर उस सुबह कुछ अजीब न हुआ होता।

रात के 11:40 बजे राजीव का फोन अचानक चमका।

मैं जाग रही थी।

स्क्रीन बंद होने से पहले मेरी नजर एक नोटिफिकेशन पर पड़ी।

“ऑर्डर कन्फर्म हो गया है। आपका डिलीवरी पार्टनर रास्ते में है।”

अगली सुबह राजीव ने मुझसे अपना फोन माँगा।

“जान… मैं वहाँ तक हाथ नहीं पहुँचा पा रहा। मेरा हाथ बहुत दर्द कर रहा है।”

मैंने बिना कुछ कहे उसका फोन उसे दे दिया।

लेकिन उसी शाम, जब कमरे में निशा, उसकी माँ और एक डॉक्टर मौजूद थे, मैं खुद को रोक नहीं पाई।

मैंने सीधे राजीव से पूछा,

“राजीव, तुमने कल रात 11:40 बजे क्या ऑर्डर किया था?”

उसके चेहरे का रंग बदल गया।

“क्या?”

“खाने का। तुम्हारे फोन पर नोटिफिकेशन आया था कि डिलीवरी वाला रास्ते में है।”

निशा तुरंत अपनी जगह से उठ खड़ी हुई।

“अरे, शर्मा! वह बीमार है! क्या तुम सच में एक नोटिफिकेशन को लेकर उससे पूछताछ करोगी?”

“मैं सिर्फ सवाल पूछ रही हूँ।”

मैंने अपने पति की आँखों में देखा।

“अगर तुम अपने से सिर्फ बीस सेंटीमीटर दूर रखा गिलास भी नहीं उठा सकते थे… तो फिर खाना ऑर्डर कैसे किया?”

राजीव ने नजरें फेर लीं।

“शायद वह कोई पुराना नोटिफिकेशन होगा।”

मैंने बहस नहीं की।

उस रात मैंने अपने फोन में एक नोट बनाया।

“रात 11:40 — खाने का ऑर्डर।”

फिर उसके नीचे मैंने एक और बात लिखी।

“राजीव का व्यवहार।”

मैंने पिछले कुछ दिनों की हर छोटी चीज़ को याद करना शुरू किया।

जब भी डॉक्टर, नर्स या परिवार का कोई सदस्य कमरे में आता, राजीव लगातार दर्द से कराहता।

लेकिन जब कमरे में सिर्फ मैं और वह होते…

लगभग कभी नहीं।

मैंने उसे ध्यान से देखना शुरू कर दिया।

निशा हमेशा मेडिकल राउंड शुरू होने से पहले पहुँचती थी।

जब कोई कमरे में प्रवेश करता, राजीव कराहने लगता।

और जैसे ही दरवाजा बंद होता…

उसकी साँसें सामान्य हो जातीं।

एक रात मैं आरव के साथ खाना खाने के लिए घर चली गई।

मैंने सामने रखे सूप को चम्मच से हिलाया, लेकिन मेरा मन खाने का बिल्कुल नहीं था।

तभी आरव ने अचानक पूछा,

“मम्मी… पापा अभी भी बीमार हैं?”

मैंने उसकी तरफ देखा।

“हाँ बेटा। क्यों?”

आरव कुछ देर तक अपनी प्लेट को देखता रहा।

फिर धीमी आवाज़ में बोला,

“क्योंकि मैंने उन्हें उस दिन चलते हुए देखा था।”

मेरे हाथ वहीं रुक गए।

मेरी रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ गई।

“क्या मतलब… चलते हुए?”

आरव ने मेरी तरफ देखा।

“जब आप बाथरूम गई थीं। रात का समय था। पापा बिस्तर से उठे थे।”

मैं कुछ बोल नहीं पाई।

वह आगे बोला,

“वह दरवाजे तक चले… फिर वापस बिस्तर पर जाकर लेट गए।”

मैंने खुद को संभालते हुए कहा,

“आरव, शायद तुमने सपना देखा होगा।”

उसने कंधे उचका दिए।

“मैं सो नहीं रहा था, मम्मी।”

मैंने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया।

मुझे लगा शायद थकान की वजह से एक बच्चे ने कुछ गलत देख लिया होगा।

मुझे तब नहीं पता था कि उसी पल मैंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती कर दी थी।

 

भाग 2

“उस रात मैंने USB ड्राइव खोली”

मैं उस रात घर वापस आई तो आरव सो चुका था। उसके कमरे में गई, उसे अच्छे से कंबल ओढ़ाया और उसके माथे पर चूमा। वह बच्चा था, लेकिन उसकी आँखों में जो बात मैंने देखी थी, वह किसी बड़े की तरह थी। शायद वह सच में कुछ देखा था। शायद मैंने गलत किया था कि मैंने उस पर विश्वास नहीं किया।

लेकिन उस रात मेरे पास इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण काम था।

मैंने USB ड्राइव को अपने बैग से निकाला। वह छोटी सी, साधारण सी ड्राइव थी, जैसी हम ऑफिस में इस्तेमाल करते हैं। उस पर कोई लेबल नहीं था, कोई निशान नहीं था। बस एक साधारण काली USB ड्राइव।

मैंने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया, पर्दे खींचे और लैपटॉप खोला। मेरे हाथ काँप रहे थे। मुझे नहीं पता था कि उस ड्राइव में क्या होगा। शायद कुछ ऐसा जो मेरी ज़िंदगी बदल दे। शायद कुछ ऐसा जो मुझे और भी अंधेरे में धकेल दे।

लेकिन मुझे जानना था।

मैंने USB लगाई। कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ। फिर एक फोल्डर खुला। उसका नाम था – “राजीव शर्मा – सच”

मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। मैंने फोल्डर खोला। उसमें तीन फाइलें थीं। एक ऑडियो रिकॉर्डिंग, एक वीडियो क्लिप और एक टेक्स्ट दस्तावेज़।

मैंने पहले टेक्स्ट दस्तावेज़ खोला।

“मिसेज़ शर्मा,

अगर आप यह पढ़ रही हैं, तो इसका मतलब है कि आपने मेरी बात मानी और इस USB को घर ले आई हैं। मैं वह नर्स हूँ जिसने आपको यह दिया। मेरा नाम अंजलि है। मैं इस अस्पताल में पिछले पाँच सालों से काम कर रही हूँ।

मैं आपको कुछ बताने जा रही हूँ जो मुझे पता है। लेकिन इससे पहले, मैं आपसे एक विनती करती हूँ – कृपया इस संदेश को पढ़ने के बाद अपने पति के पास अकेली न जाएँ। और अपने बेटे को उनके पास अकेला न छोड़ें।

आपके पति राजीव शर्मा जिस हादसे की बात कर रहे हैं, वह हादसा वाकई हुआ था। लेकिन उनकी चोटें उतनी गंभीर नहीं हैं जितनी वे दिखा रहे हैं।

मैंने उन्हें अस्पताल में कई बार अकेले में चलते देखा है। जब कोई नहीं देखता, तो वे बिस्तर से उठते हैं, बाथरूम जाते हैं, कभी-कभी तो वॉर्ड के दूसरे छोर तक चलकर आते हैं। लेकिन जैसे ही कोई आता है, वे दर्द से कराहने लगते हैं और बिस्तर पर लेट जाते हैं।

मैंने यह बात किसी को नहीं बताई। क्योंकि मुझे डर था कि मेरी नौकरी चली जाएगी। लेकिन फिर मैंने कुछ और देखा – कुछ ऐसा जिसने मुझे अपनी चुप्पी तोड़ने पर मज़बूर कर दिया।

आपकी सास और आपकी ननद – सविता देवी और निशा – वे आपके पति की चोटों के बारे में जानती हैं। वे जानती हैं कि वह चल सकता है। और वे इस बारे में आपसे कुछ नहीं कह रही हैं।

इससे भी बड़ी बात – आपके पति का हादसा कोई साधारण सड़क दुर्घटना नहीं थी। उस ट्रक को जानबूझकर उनकी गाड़ी से टकराया गया था।

मुझे यह कैसे पता? क्योंकि हादसे के अगले दिन, मैंने अपने एक दोस्त से बात की जो उस एक्सप्रेसवे पर टोल प्लाज़ा पर काम करता है। उसने मुझे बताया कि हादसे से पहले की रात, एक काली SUV बिना नंबर प्लेट के उस टोल प्लाज़ा से गुज़री थी। उस SUV के ड्राइवर ने टोल नहीं भरा, वह सीधा बैरियर तोड़कर भाग गया।

और उस रात जब आपके पति का हादसा हुआ, उसी एक्सप्रेसवे पर एक काली SUV फिर से देखी गई – इस बार उस पर नंबर प्लेट थी, लेकिन वह प्लेट किसी और गाड़ी की थी।

मैंने आपके पति के कमरे में एक रात ड्यूटी के दौरान उनकी बात सुनी। वे फोन पर किसी से कह रहे थे, “हाँ, काम हो गया। अब बस वह USB मिल जाए।”

मुझे नहीं पता उस USB में क्या है जिसकी वे बात कर रहे थे। लेकिन मुझे डर है कि आपके हाथ में जो USB है, शायद उसी की वे तलाश कर रहे हैं।

कृपया, इस USB को सुरक्षित रखें। इसमें मैंने कुछ और सबूत डाले हैं – वीडियो क्लिप्स जो मैंने अपने फोन से रिकॉर्ड की हैं, जिनमें आपके पति चलते हुए दिख रहे हैं। और एक ऑडियो रिकॉर्डिंग जो मैंने उनके कमरे में छिपे माइक से की है।

मुझे नहीं पता कि इस पूरी साजिश का मकसद क्या है। लेकिन मुझे यह ज़रूर पता है – आप खतरे में हैं। आपका बेटा खतरे में है।

जब तक आप इस सच्चाई से पर्दा न उठा लें, तब तक किसी पर भरोसा न करें। अपने पति पर भी नहीं।

  • अंजलि

  • मैंने वह पत्र तीन बार पढ़ा। हर बार मेरे हाथ और ज़्यादा काँपने लगे। मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। मैंने कुर्सी पर बैठकर गहरी साँस ली।

    मेरा पति – जिससे मैंने शादी के दस साल बिताए थे – वह मुझसे झूठ बोल रहा था? वह नाटक कर रहा था कि वह चल नहीं सकता?

    और उसकी माँ और बहन – वे इस सब में शामिल थीं?

    लेकिन इससे भी बुरी बात – कोई उसे मारना चाहता था? उसका हादसा कोई दुर्घटना नहीं थी?

    मैंने अगली फाइल खोली – वीडियो क्लिप।

    उसमें राजीव को अस्पताल के वॉर्ड में अकेले चलते हुए दिखाया गया था। वह बिस्तर से उठा, दरवाज़े तक गया, वहाँ खड़ा हुआ, कुछ देर बाहर देखा, फिर वापस लौटा और बिस्तर पर लेट गया। वीडियो में तारीख और समय भी दिख रहा था – यह तीन दिन पहले की रात की रिकॉर्डिंग थी। रात के 2:15 बजे।

    दूसरी वीडियो क्लिप में राजीव फोन पर बात कर रहा था। मैं साफ़ नहीं सुन पा रही थी, लेकिन कुछ शब्द मुझे समझ आए – “USB”, “डिलीवर”, “कल रात”

    तीसरी वीडियो क्लिप और भी चौंकाने वाली थी। उसमें निशा और राजीव एक साथ बैठे हुए थे। निशा राजीव को कुछ कागज़ात दिखा रही थी। राजीव ने उन कागज़ात पर हस्ताक्षर किए। फिर दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया और कुछ देर तक फुसफुसाते रहे।

    मैंने उस वीडियो को बार-बार देखा। मैं समझ नहीं पा रही थी कि वे किन कागज़ात पर हस्ताक्षर कर रहे थे। लेकिन मुझे कुछ तो बता रहा था कि यह कुछ गलत था।

    फिर मैंने आखिरी फाइल खोली – ऑडियो रिकॉर्डिंग।

    ऑडियो रिकॉर्डिंग: दिनांक – 15 अक्टूबर, रात 10:30 बजे

    (आवाज़ें – राजीव और निशा)

    निशा: भाई, USB मिल गई?

    राजीव: नहीं अभी तक नहीं। मुझे लगता है वह उसके पास है।

    निशा: किसके पास?

    राजीव: अंजलि के पास। वह नर्स जो रात की ड्यूटी करती है।

    निशा: तुमने उसे क्यों बताया?

    राजीव: मैंने नहीं बताया! उसने शायद मुझे चलते हुए देख लिया। वह हर रात मेरे कमरे के आसपास मँडराती रहती है।

    निशा: तो अब क्या करना है?

    राजीव: हमें वह USB वापस लेनी होगी। चाहे कुछ भी करना पड़े।

    निशा: और अगर उसने शर्मा को कुछ बता दिया?

    राजीव: तो हम उसे भी संभाल लेंगे। माँ ने पहले ही सब प्लान कर लिया है। बस तुम मेरा साथ दो।

    निशा: भाई, क्या हम सही कर रहे हैं?

    राजीव: हाँ। यह हमारे परिवार के लिए ज़रूरी है। उसे कुछ नहीं पता चलना चाहिए।

    (ऑडियो यहाँ खत्म होती है)

    मैंने ऑडियो सुनी तो मेरे पसीने छूट गए। मेरा पूरा शरीर ठंडा पड़ गया। मेरे पति और उनकी बहन ने इस पूरी साजिश को रचा था। और वे USB को वापस पाना चाहते थे – वही USB जो अंजलि ने मुझे दी थी।

    लेकिन इस USB में ऐसा क्या था जो इतना महत्वपूर्ण था? मैंने इसे खोला तो इसमें यही तीन फाइलें थीं। क्या इसमें और कुछ था जो मुझे नहीं दिख रहा था?

    मैंने फिर से फोल्डर खोला। मैंने हर फाइल को ध्यान से देखा। तभी मेरी नज़र एक छिपे हुए फोल्डर पर पड़ी। मैंने उसे खोला तो उसमें एक और दस्तावेज़ था। उसका नाम था – “बीमा पॉलिसी”

    मैंने वह दस्तावेज़ खोला तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं।

    वह राजीव की लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी थी, जो उसने हादसे से एक हफ्ते पहले ली थी। पॉलिसी की राशि – 5 करोड़ रुपये। और उस पॉलिसी में एकमात्र लाभार्थी था – राजीव का भतीजा, जो अमेरिका में रहता था। मुझे नहीं, उसके बेटे को नहीं, बल्कि उसके भतीजे को।

    मैंने उस पॉलिसी को बार-बार पढ़ा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे पति ने अपनी इंश्योरेंस पॉलिसी में मुझे और आरव को क्यों नहीं रखा। उसके भतीजे का नाम क्यों था?

    तभी मुझे एक और चीज़ दिखी। पॉलिसी के नीचे एक नोट था – “हादसे की स्थिति में, सभी कानूनी दावे निशा शर्मा द्वारा संभाले जाएंगे।”

    मैं उस पॉलिसी को देखती रही। मेरे दिमाग़ में सब कुछ साफ़ हो रहा था।

    राजीव ने अपनी चोटों का नाटक इसलिए किया था ताकि वह बीमा कंपनी को बता सके कि वह अब काम करने में असमर्थ है। वह पूरी राशि अपने भतीजे को देना चाहता था – या शायद निशा को?

    लेकिन एक बात मुझे समझ नहीं आ रही थी – अगर वह बीमा राशि चाहता था, तो उसे अपनी मौत के लिए प्लान बनाना चाहिए था, न कि चोटों के नाटक के लिए। क्या वह असल में मरना चाहता था?

    या फिर…

    मेरे दिमाग़ में एक डरावना विचार आया।

    क्या यह सब कुछ मुझे और आरव को निशाना बनाने के लिए था?

    भाग 3

    “सच्चाई का सामना”

    मैं उस रात सो नहीं पाई। मैंने पूरी रात लैपटॉप पर बैठकर हर फाइल, हर सबूत को बार-बार देखा। मैंने अंजलि के पत्र को कई बार पढ़ा। मैंने वीडियो क्लिप्स देखीं, ऑडियो सुनी, और बीमा पॉलिसी को हर कोण से समझने की कोशिश की।

    सुबह होते-होते मेरा दिमाग पूरी तरह साफ़ हो चुका था। मुझे पता था कि अब मुझे क्या करना है।

    सबसे पहले, मैंने अपने लैपटॉप की सारी फाइलें एक बाहरी हार्ड ड्राइव में कॉपी कर लीं। मैंने दो कॉपियाँ बनाईं – एक मैंने अपने ऑफिस के लॉकर में रखी, दूसरी मैंने अपने एक भरोसेमंद दोस्त के पास छोड़ दी। मैंने उसे बताया कि अगर मुझे कुछ हो जाए, तो वह हार्ड ड्राइव को पुलिस को दे देना।

    फिर मैंने अपना फोन चेक किया। पाँच मिस्ड कॉल्स थीं – सभी निशा की। तीन मैसेज भी थे।

    “शर्मा, कहाँ हो?”
    “हॉस्पिटल आओ, राजीव को बहुत तकलीफ हो रही है।”
    “क्या तुम सच में इतनी लापरवाह हो?”

    मैंने उन मैसेजेस को पढ़ा और मुस्कुराई। निशा का नाटक जारी था। वे चाहते थे कि मैं अस्पताल आऊँ और राजीव के पास अकेली रहूँ। शायद उन्हें लगा कि मैं USB अपने साथ लाऊँगी।

    लेकिन मैं अब वह नहीं थी जो कुछ दिन पहले थी। अब मैं हर कदम सोच-समझकर उठाने वाली थी।

    मैंने निशा को मैसेज किया – “मैं ऑफिस जा रही हूँ। कुछ ज़रूरी काम है। शाम को अस्पताल आऊँगी।”

    उसका जवाब आया – “राजीव तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है। वह बहुत परेशान है।”

    मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने आरव को स्कूल के लिए तैयार किया और उसे एक दोस्त के घर छोड़ दिया। मैंने उस दोस्त को बताया कि आरव कुछ दिनों के लिए उनके साथ रहेगा।

    “कुछ परिवारिक समस्या है,” मैंने कहा। “मुझे कुछ दिनों के लिए आरव को सुरक्षित जगह रखना है।”

    मेरी दोस्त ने बिना किसी सवाल के मान लिया। उसने मुझे आश्वासन दिया कि आरव का ख्याल रखेगी।

    फिर मैंने पुलिस स्टेशन जाने का फैसला किया। लेकिन इससे पहले, मैंने एक वकील से मिलने का सोचा। मेरे ऑफिस के एक सहकर्मी की पत्नी वकील थी। उसका नाम वंदना था। मैंने उसे फोन किया और उसे सब कुछ बताने का फैसला किया।

    हम एक कैफे में मिले। मैंने वंदना को हर चीज़ के बारे में बताया – USB, वीडियो क्लिप्स, ऑडियो रिकॉर्डिंग, बीमा पॉलिसी और अंजलि का पत्र। वंदना ने सब कुछ ध्यान से सुना। उसने मुझसे कहा कि मेरे पास पर्याप्त सबूत हैं और मुझे पुलिस में शिकायत दर्ज करानी चाहिए।

    “लेकिन पहले,” उसने कहा, “हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके पति को पता न चले कि आपको सब पता है। जब तक हम पुलिस को पूरी तरह से अपने साथ न ले लें, तब तक आप नार्मल बनी रहें।”

    मैंने मान लिया।

    उसी दिन शाम को मैं अस्पताल पहुँची। मैंने अपने चेहरे पर एक मुस्कान लगा ली और राजीव के कमरे में दाखिल हुई। कमरे में सविता देवी, निशा और राजीव थे। तीनों ने मुझे देखा तो मानो राहत की साँस ली।

    “तुम आ गईं,” राजीव ने कहा। उसकी आवाज़ कमज़ोर लग रही थी। “मुझे लगा तुम नहीं आओगी।”

    “ऑफिस में कुछ ज़रूरी काम था,” मैंने कहा। “मुझे माफ़ कर दो।”

    निशा ने मुझे तीखी नज़रों से देखा। “तुम इतनी देर से क्यों आईं? राजीव को बहुत तकलीफ हो रही थी। डॉक्टर ने कहा कि उनका दर्द बढ़ गया है।”

    मैंने अपना बैग एक तरफ रखा और राजीव के पास गई। “तुम ठीक हो?” मैंने उसका हाथ पकड़ा।

    राजीव ने दर्द से कराहते हुए कहा, “नहीं, जान… मुझे बहुत दर्द हो रहा है। मेरे पैर बिल्कुल सुन्न हो गए हैं।”

    मैंने उसकी आँखों में देखा। वह झूठ बोल रहा था, और वह इतनी आसानी से झूठ बोल रहा था जैसे उसे बचपन से सिखाया गया हो। मुझे उस पर बहुत गुस्सा आ रहा था, लेकिन मैंने खुद को रोका।

    “डॉक्टर को बुलाऊँ?” मैंने पूछा।

    “नहीं, तुम रहो यहाँ। मुझे अकेलापन महसूस हो रहा है।”

    निशा और सविता देवी ने एक-दूसरे की तरफ देखा। फिर निशा बोली, “माँ, चलो हम बाहर चलते हैं। शर्मा को राजीव के साथ थोड़ी देर बिताने दो।”

    वे दोनों कमरे से बाहर चली गईं। दरवाज़ा बंद होते ही राजीव का रुख थोड़ा बदल गया। उसका चेहरा मास्क की तरह था – एक पल दर्द से कराह रहा था, अगले पल सामान्य हो गया।

    “तुमने USB देखी?” उसने अचानक पूछा।

    मेरे दिमाग़ में बिजली कौंधी। क्या वह जानता था?

    “कौन सी USB?” मैंने मासूमियत से पूछा।

    “अंजलि ने तुम्हें एक USB दी थी। मैंने देखा था।”

    मेरा दिल बैठ गया। वह जानता था। उसने अंजलि को मुझे USB देते देखा था।

    “वह USB बैग में है,” मैंने कहा, अपनी आवाज़ को नियंत्रित करते हुए। “मैंने अभी तक नहीं देखी। क्या है उसमें?”

    राजीव ने अपने बिस्तर से उठकर मेरी तरफ देखा। “वह USB मुझे दे दो, जान। वह कुछ ज़रूरी दस्तावेज़ हैं। अंजलि गलती से मेरी चीज़ें ले गई थी।”

    “गलती से?” मैंने पूछा। “तो उसने वह USB गलती से तुम्हारे कमरे से ली और फिर मुझे दे दी?”

    राजीव ने अपना गुस्सा नियंत्रित करने की कोशिश की। “बस USB दे दो। इसके बारे में बहुत मत सोचो।”

    मैं खड़ी हो गई। “राजीव, तुम मुझसे झूठ क्यों बोल रहे हो?”

    वह स्तब्ध रह गया। “क्या?”

    “तुम चल सकते हो। तुम्हें किसी चोट नहीं है। यह सब नाटक क्यों है?”

    राजीव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। वह कुछ बोलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन शब्द नहीं निकल रहे थे। मैंने उससे आगे कुछ नहीं पूछा, क्योंकि उसी क्षण दरवाज़ा खुला और निशा अंदर आ गई। उसने मेरी और राजीव के बीच का तनाव भांप लिया।

    “क्या हुआ?” उसने पूछा।

    राजीव ने जल्दी से अपने आपको संभाला और वापस बिस्तर पर लेट गया। “कुछ नहीं, निशा। बस थोड़ी थकान हो रही है।”

    निशा ने मुझे देखा। मेरी आँखें उसे सब कुछ बता रही थीं। उसे समझने में देर नहीं लगी कि मुझे सब पता है।

    “शर्मा, तुम्हें कुछ बताना है?” उसने मुझसे पूछा, उसकी आवाज़ में खतरे की लहर थी।

    “नहीं,” मैंने कहा। “मुझे नहीं लगता कि अब कुछ बताना बाकी है।”

    मैंने अपना बैग उठाया और बाहर जाने लगी। लेकिन दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते राजीव ने मुझे आवाज़ दी।

    “शर्मा, रुको।”

    मैं रुकी, लेकिन मुड़ी नहीं।

    “तुम्हें यह सब समझ नहीं आएगा,” उसने कहा, उसकी आवाज़ में कुछ अजीब था – शायद पछतावा, शायद डर। “यह मेरी मर्ज़ी से नहीं हुआ। मुझे मजबूर किया गया था।”

    “किसने?” मैंने मुड़कर पूछा।

    राजीव ने निशा की तरफ देखा। निशा ने उसे चुप रहने का इशारा किया, लेकिन राजीव ने बात जारी रखी।

    “माँ… और निशा। वे चाहती थीं कि हम बीमा का पैसा हासिल करें। हमारे ऊपर बहुत क़र्ज़ है, शर्मा। मैंने तुम्हें इसलिए नहीं बताया क्योंकि तुम परेशान हो जातीं।”

    मैं स्तब्ध रह गई। “तो तुमने मुझसे झूठ बोला, अपने बेटे से झूठ बोला, पूरे परिवार से झूठ बोला – सिर्फ़ कुछ पैसों के लिए?”

    “यह सिर्फ़ पैसे नहीं हैं,” निशा चिल्लाई। “यह हमारी पूरी ज़िंदगी है! तुम्हें पता है कि पिताजी ने हमारा सब कुछ लूट लिया था। हम इस क़र्ज़ से बाहर निकलना चाहते थे। राजीव ने हमारी मदद करने के लिए यह किया।”

    “तो तुम्हारा प्लान क्या था?” मैंने निशा से पूछा। “राजीव को ‘असमर्थ’ दिखाना, बीमा का पैसा लेना, और फिर?”

    निशा मुँह फेरकर खड़ी हो गई। राजीव ने नीचे देखा।

    “और USB?” मैंने पूछा। “उसमें क्या था?”

    राजीव ने कहा, “बीमा पॉलिसी से जुड़े कुछ दस्तावेज़। मैंने उन्हें छिपा दिया था ताकि कोई देख न ले। पर अंजलि ने वे दस्तावेज़ गलती से ले लिए और उन्हें USB में डालकर तुम्हें दे दिया।”

    मैंने उसकी ओर देखा। एक पल के लिए मुझे लगा कि वह सच बोल रहा है, लेकिन फिर मुझे वह ऑडियो याद आई जिसमें उसने कहा था – “उसे कुछ नहीं पता चलना चाहिए।”

    “तुम झूठ बोल रहे हो,” मैंने कहा। “उस ऑडियो में तुम किसी को धमकी दे रहे थे। तुमने कहा – ‘हमें वह USB वापस लेनी होगी, चाहे कुछ भी करना पड़े।’ तुम USB में मौजूद किसी चीज़ को छिपाना चाहते थे – क्या वह बीमा पॉलिसी नहीं है। और तुम्हारा हादसा कोई दुर्घटना नहीं थी, है न?”

    मेरी बात सुनकर राजीव की आँखें फट गईं। निशा भी चौंक गई। उन्हें नहीं पता था कि मैं USB के बारे में इतना जानती हूँ।

    राजीव ने अपना सिर हिलाया, “शर्मा, सुन। मुझसे गलती हुई है। मुझे माफ कर दे। मैं सब कुछ सही कर दूंगा। बस इसे पुलिस तक मत ले जा।”

    लेकिन उसके शब्द काफी नहीं थे। मेरे अंदर का गुस्सा अब ज़ोर पकड़ रहा था। यह आदमी, जो मेरा पति था, जिसके साथ मैंने दस साल बिताए थे, मुझसे झूठ बोल रहा था, मेरे बेटे से झूठ बोल रहा था, और अब सब कुछ सही करने की बात कर रहा था।

    “नहीं, राजीव,” मैंने दृढ़ता से कहा। “अब बहुत देर हो चुकी है। मैं पुलिस के पास जा रही हूँ।”

    निशा ने मुझे रोकने की कोशिश की, पर मैंने उसे धकेल दिया और बाहर निकल गई। मैंने अपना फोन निकाला और वंदना को कॉल किया। उसने मुझसे कहा कि वह पुलिस स्टेशन मेरा इंतज़ार कर रही है।

    मैं अस्पताल से बाहर निकली तो मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे कंधों से बोझ उतार दिया हो। मैंने पुलिस स्टेशन पहुँचकर सब कुछ बताया, सारे सबूत पेश किए। वंदना ने मेरे साथ शिकायत दर्ज करवाई।

    पुलिस ने तुरंत कार्रवाई शुरू की। उन्होंने अंजलि को गवाह के तौर पर बुलाया। उसने भी अपनी बात रखी और बताया कि उसने राजीव को अस्पताल में चलते देखा था, साथ ही उसने निशा और राजीव के बीच की बातचीत भी रिकॉर्ड की थी।

    अगले दिन पुलिस ने राजीव, निशा और सविता देवी को हिरासत में ले लिया। बीमा पॉलिसी की जाँच हुई तो पता चला कि राजीव ने हादसे से पहले एक और पॉलिसी ली थी – जिसमें लाभार्थी मैं और आरव थे। यानी उसने एक पॉलिसी तो असली बनाई, और दूसरी नकली, जिसमें उसके भतीजे का नाम था। वह असली पॉलिसी का पैसा लेकर भागना चाहता था, और उसके लिए उसे ‘असमर्थ’ दिखना पड़ता था।

    पुलिस ने आगे की जाँच में पता लगाया कि राजीव का हादसा असल में एक साजिश थी – उसने उस ट्रक ड्राइवर को पैसे देकर अपनी गाड़ी से टकराने को कहा था, ताकि वह चोटिल दिख सके। लेकिन ड्राइवर ने गाड़ी को ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर से टक्कर मारी, जिससे राजीव को असली चोटें भी आईं।

    इस पूरे मामले में राजीव, निशा और सविता देवी पर धोखाधड़ी, झूठे दस्तावेज़ बनाने और सार्वजनिक धोखा देने के आरोप लगे। राजीव को चिकित्सीय जाँच के बाद हिरासत में ले लिया गया और उस पर मुकदमा चलाया गया।

    अंत

    कुछ हफ्तों बाद, जब सब कुछ काफी हद तक सामान्य हो गया, तो मैं आरव के साथ एक नए घर में शिफ्ट हो गई। मैंने अपनी नौकरी जारी रखी, आरव को एक नए स्कूल में डाला, और अपनी ज़िंदगी को एक नई शुरुआत दी।

    अंजलि, वह नर्स जिसने मुझे USB दी थी, मेरी अच्छी दोस्त बन गई। वह अब भी उसी अस्पताल में काम करती है, लेकिन उसकी नौकरी पक्की हो गई क्योंकि पुलिस ने उसकी बहादुरी की तारीफ की थी।

    राजीव पर मुकदमा चला और उसे सात साल की सज़ा सुनाई गई। निशा और सविता देवी को भी तीन-तीन साल की सज़ा हुई, हालाँकि वे अपील कर सकती थीं। मैंने उनसे मिलना बंद कर दिया। मुझे उनकी ज़रूरत नहीं थी।

    आरव ने कभी अपने पिता के बारे में ज़्यादा नहीं पूछा। शायद वह समझ गया था कि क्या हुआ। या शायद उसने महसूस किया कि मैं अब खुश थी – और वह भी खुश था।

    एक दिन मैं अपने नए घर के बालकनी में खड़ी थी, सूरज डूब रहा था, और आरव बगल में अपना होमवर्क कर रहा था। मैंने USB ड्राइव को अपने हाथ में घुमाया, जिसने मेरी ज़िंदगी पलट दी थी।

    अगर वह USB न होती, तो मैं शायद आज भी उसी अंधेरे में होती, उस झूठ में जी रही होती। लेकिन सच्चाई ने मुझे आज़ाद कर दिया।

    मैंने USB को एक बक्से में बंद किया और उसे एक कोने में रख दिया – उस सबूत के तौर पर कि कभी मैंने खुद पर भरोसा किया और सही फैसला लिया।

    और मैंने अपने बेटे को गले लगाया, क्योंकि उसकी वजह से ही मैंने यह सब सहा था। उसी रात, जब उसने राजीव को चलते देखा था, तो सच सामने आया। हालाँकि उस वक़्त मैंने उस पर विश्वास नहीं किया, लेकिन उसकी बातों ने ही मुझे USB देखने की हिम्मत दी।

    सच हमेशा मुश्किल होता है, लेकिन झूठ से बेहतर है। और अब मैं जानती हूँ कि ज़िंदगी में सबसे बड़ा सबूत आपका अपना विश्वास होता है – खुद पर और अपने बच्चों पर।

    समाप्त

     

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