जैसे ही होमगार्ड ने मुझे सलाम किया, मेरे कदम थम गए—चार साल पहले जिसे मैंने छोड़ा था, आज वही मेरे सबसे बड़े सच के सामने खड़ा था
PART 1
मुख्य द्वार पार करने ही वाली थी कि दाईं तरफ खड़े होमगार्ड ने एड़ी मिलाकर सलाम किया—
—नमस्ते, मैडम।
मैं दो कदम आगे निकल गई।
फिर रुक गई।
वह आवाज़ मैं भूल नहीं सकती थी।
मैं धीरे-धीरे पीछे मुड़ी।
फीकी खाकी वर्दी। साधारण जूते। धूप में थोड़ा काला पड़ा चेहरा। बालों में पहले से ज्यादा सफेदी।
लेकिन आँखें वही थीं।
दीपक चौहान।
चार साल पहले जिस आदमी से मैंने कहा था कि वह मेरी नई जिंदगी में फिट नहीं बैठता, आज वह मेरे सामने खड़ा था।
मैं कुछ सेकंड उसे देखती रही।
उसने फिर सलाम किया।
इस बार उसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी।
मानो वह पहले से जानता था कि मैं आ रही हूँ।
मेरे पीछे खड़े थाना प्रभारी ने धीरे से कहा—
—मैडम?
मैंने जवाब नहीं दिया।
मेरे मुँह से सिर्फ एक नाम निकला—
—दीपक?
उसने नजरें सीधी रखीं—
—जी, मैडम।
उसका मुझे मैडम कहना अंदर तक लगा।
मैंने आसपास देखा।
चार जवान हमें देख रहे थे। रिसेप्शन के पास बैठा मुंशी भी उठ चुका था।
मैंने खुद को संभाला—
—तुम यहाँ?
दीपक ने सामान्य स्वर में कहा—
—आज मेरी ड्यूटी यहाँ लगी है।
बस इतना।
न कोई शिकायत।
न कोई पुरानी बात।
थाना प्रभारी राजीव सेंगर मेरे पास आया—
—मैडम, आप इन्हें जानती हैं?
मैंने जवाब देने से पहले दीपक को देखा।
वह चुप रहा।
मैंने कहा—
—हाँ।
राजीव मुस्कुराया—
—अच्छा। दीपक पुराने होमगार्ड हैं। बहुत सीधे आदमी हैं। अपनी ड्यूटी करते हैं, किसी से ज्यादा मतलब नहीं रखते।
दीपक ने मेरी तरफ देखा भी नहीं।
मैं अंदर चली गई।
मेरा निरीक्षण तय था।
फाइलें देखनी थीं। लंबित शिकायतें देखनी थीं। कर्मचारियों से बात करनी थी।
लेकिन अगले बीस मिनट में मैं एक भी पन्ना ठीक से नहीं पढ़ सकी।
मेरी आँखों के सामने बार-बार वही चेहरा आ रहा था।
आठ साल पहले हमारे किराए के छोटे कमरे में रात के दो बजे वह मेरे लिए चाय बनाता था।
मैं किताब लेकर बैठी रहती।
वह फर्श पर हिसाब लगाता कि अगले महीने की कोचिंग फीस कहाँ से आएगी।
मैंने कई बार कहा था—
—रहने दो। शायद ये परीक्षा मेरे बस की नहीं।
वह हँसता—
—तुम बस पढ़ो। पैसों का हिसाब मैं देख लूँगा।
मुझे बाद में पता चला था कि उसने अपने हिस्से की खेत की जमीन बेच दी थी।
फिर निर्माण स्थल पर काम किया।
कभी गोदाम में रात की पाली।
कभी सामान ढोने का काम।
तब मुझे उसकी मेहनत से शर्म नहीं आती थी।
मैं उसे अपना सबसे मजबूत आदमी कहती थी।
फिर मेरी दुनिया बदल गई।
प्रशिक्षण शुरू हुआ।
नई जगहें।
नए लोग।
नया दायरा।
मेरे आसपास ज्यादातर लोग पढ़े-लिखे परिवारों से थे। उनके जीवनसाथी डॉक्टर, अधिकारी, वकील या बड़े कारोबारी थे।
और दीपक?
वह जब मुझसे मिलने आता, साधारण कमीज पहनता।
ज्यादा अंग्रेजी नहीं बोलता था।
कांटे-चम्मच से खाने में असहज हो जाता था।
पहले मैं उसकी यही बात पसंद करती थी।
फिर यही चीजें मुझे परेशान करने लगीं।
सबसे खराब बात यह थी कि मैंने कभी उससे यह नहीं पूछा कि उसे कैसा लगता है।
मैं सिर्फ सोचती रही कि लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे।
चार साल पहले मैंने उसे बैठाकर कहा था—
—हम दोनों अब अलग दुनिया के लोग हैं।
उसने काफी देर मुझे देखा।
फिर पूछा—
—तुम जाना चाहती हो?
मैंने कहा—
—हाँ।
उसने कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।
मुझे लगा था उसने आसानी से हार मान ली।
आज पहली बार सोच रही थी कि शायद उसने हार नहीं मानी थी।
शायद मैंने कभी उसे लड़ने का मौका ही नहीं दिया।
दरवाजे पर दस्तक हुई।
मैं वर्तमान में लौटी।
राजीव अंदर आया—
—मैडम, चाय?
—नहीं।
मैंने सामने रखी कर्मचारी सूची उठाई।
दीपक का नाम तीसरे पन्ने पर था।
मैंने पूछा—
—ये यहाँ कब से है?
राजीव ने सहजता से कहा—
—करीब डेढ़ साल से अलग-अलग जगह ड्यूटी लगती रहती है।
—रहता कहाँ है?
राजीव मेरी तरफ देखने लगा।
मैंने तुरंत जोड़ा—
—मैं कर्मचारी विवरण देख रही हूँ।
उसने एक पता बताया।
शहर के पुराने हिस्से की एक छोटी बस्ती।
मैंने पूछा—
—परिवार?
राजीव ने कंधे उचकाए—
—अकेले रहते हैं शायद।
फिर वह थोड़ा हँसा—
—वैसे अजीब आदमी हैं। ड्यूटी से जो भत्ता मिलता है, उसका बड़ा हिस्सा बाल गृह को दे देते हैं। खर्च चलाने के लिए रात में बिजली के छोटे-मोटे काम भी करते हैं।
मैंने सिर उठाया।
—कौन सा बाल गृह?
राजीव ने नाम बताया।
मैं उस जगह को जानती थी।
कुछ महीने पहले मेरे कार्यालय ने वहाँ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की थी।
मैंने पूछा—
—इतनी जानकारी तुम्हें कैसे है?
राजीव का चेहरा एक पल के लिए बदल गया।
फिर उसने कहा—
—मैडम, छोटा जिला है। सबकी जानकारी रहती है।
उसकी बात मुझे ठीक नहीं लगी।
तभी बाहर कुछ गिरने की आवाज आई।
मैं उठी।
गलियारे में दीपक झुककर कुछ कागज उठा रहा था। शायद किसी कर्मचारी की फाइल हाथ से छूट गई थी।
उसकी जेब से एक पुरानी तस्वीर नीचे गिरी।
मैंने उसे उससे पहले देख लिया।
तस्वीर उलटी पड़ी थी।
दीपक ने तुरंत उठाकर जेब में रख ली।
मैंने पूछा—
—क्या था?
उसने मेरी तरफ देखा—
—पुरानी चीज है।
—मेरी तस्वीर है?
पहली बार उसका चेहरा थोड़ा कठोर हुआ।
—इसका ड्यूटी से संबंध नहीं है, मैडम।
मुझे जवाब मिल गया था।
मैं चुप रही।
वह मुड़ने लगा।
मैंने कहा—
—दीपक।
वह रुक गया।
मैंने बहुत कोशिश के बाद पूछा—
—तुमने कभी मुझसे संपर्क क्यों नहीं किया?
उसने कुछ क्षण मेरी तरफ देखा।
फिर बोला—
—जिस दिन आपने कहा था कि मैं आपकी जिंदगी के लायक नहीं हूँ, उसी दिन जवाब मिल गया था।
मैं कुछ नहीं कह सकी।
वह बाहर चला गया।
मेरी हथेली ठंडी हो गई थी।
मैं अपने कमरे में वापस आई।
करीब दस मिनट बाद एक बूढ़े मुंशी ने दरवाजा बंद करके मेरे सामने मोटी फाइल रख दी।
उसके हाथ काँप रहे थे।
उसने धीमे स्वर में कहा—
—मैडम, एक बात पूछूँ?
—पूछिए।
—आप सच में दीपक चौहान को जानती हैं?
मैंने कहा—
—वह मेरे पूर्व पति हैं।
मुंशी का चेहरा बदल गया।
उसने कुर्सी नहीं ली।
बस फाइल पर हाथ रखकर खड़ा रहा।
—फिर ये आपको देखनी चाहिए।
मैंने फाइल की तरफ देखा।
ऊपर आठ साल पुरानी तारीख थी।
कोने में लाल स्याही से सिर्फ एक शब्द लिखा था—
“गोपनीय।”
मैंने पूछा—
—इसमें क्या है?
उसने गहरी साँस ली—
—दीपक चौहान का पुराना रिकॉर्ड।
मेरी उंगलियाँ फाइल तक गईं।
मुंशी ने मेरा हाथ रोक दिया—
—मैडम, पहले एक बात जान लीजिए। इस फाइल में जो लिखा है, उसका आधा भी अगर आपको उस समय पता होता… तो शायद आप उनसे अलग नहीं होतीं।
मेरी नजर उसके चेहरे पर जम गई।
—किसने छिपाया था?
मुंशी ने दरवाजे की तरफ देखा।
उसी समय बाहर राजीव सेंगर की आवाज सुनाई दी—
—मिश्रा जी, आप अंदर क्या कर रहे हैं?
मुंशी पीछे हट गया।
मैंने फाइल अपने सामने खींच ली।
राजीव कमरे में आया।
फाइल देखते ही उसका चेहरा उतर गया।
उसने पहली बार बिना मेरी अनुमति के आगे बढ़कर कहा—
—मैडम, ये पुराना बंद मामला है। इसका आज के निरीक्षण से कोई संबंध नहीं।
मैंने उसकी आँखों में देखा।
—आपको कैसे पता कि इस फाइल में क्या है?
वह चुप हो गया।
मैंने फाइल खोलने के लिए पहला पन्ना उठाया।
तभी मुंशी ने बहुत धीमे कहा—
—मैडम… इसमें आपका नाम भी है।
मेरी उंगलियाँ वहीं रुक गईं।
लेकिन असली सच अभी बाकी था.
