जिस पत्नी ने वर्दी और रुतबे के घमंड में मुझे “मामूली आदमी” कहकर छोड़ा, तीन साल बाद वही मेरी कुर्सी के सामने सलाम करने पर मजबूर हुई//

PART 2

मेरी अखिल भारतीय रैंक सैंतीस थी।

मुझे भारतीय प्रशासनिक सेवा मिली थी।

मैंने स्क्रीन कई बार देखी।

शायद इसलिए नहीं कि भरोसा नहीं था।

बल्कि इसलिए कि एक साल पहले मैं इसी कमरे में बैठकर खुद से पूछ रहा था कि मेरे अंदर बचा क्या है।

और अब वही नाम देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक की सूची में था।

आशीष बीस मिनट बाद मेरे कमरे पर पहुँच गया।

दरवाजा खुलते ही उसने मुझे पकड़ लिया।

—आईएएस!

मैंने पहली बार खुलकर हँसने की कोशिश की।

आँखें भर आईं।

आशीष पीछे हुआ।

—स्नेहा को बताया?

मैं तुरंत शांत हो गया।

—नहीं।

—बताएगा?

मैंने सिर हिला दिया।

—क्यों?

मैंने लैपटॉप बंद किया।

—ये मैंने उसे जवाब देने के लिए नहीं किया था।

वह कुछ नहीं बोला।

सच ये था कि शुरुआत शायद उसी चोट से हुई थी।

लेकिन बीच रास्ते में बात बदल गई थी।

पढ़ते-पढ़ते मुझे समझ आया था कि अगर मेरी पूरी मेहनत सिर्फ किसी एक इंसान को गलत साबित करने के लिए है, तो मैं फिर उसी इंसान के हिसाब से जी रहा हूँ।

मैं ऐसा नहीं चाहता था।

कुछ दिनों बाद प्रशिक्षण के लिए बुलावा आया।

मैं मसूरी चला गया।

वहाँ किसी को नहीं पता था कि मैं किस वजह से परीक्षा की तैयारी तक पहुँचा।

और मुझे अच्छा लगा।

वहाँ मैं सिर्फ विक्रम था।

न किसी का छोड़ा हुआ पति।

न किसी का बदला लेने वाला आदमी।

प्रशिक्षण ने मेरी दिनचर्या बदल दी।

सुबह जल्दी उठना।

कक्षाएँ।

मैदानी अभ्यास।

कानून।

प्रशासन।

फाइलें।

लोगों की समस्याएँ।

पहली बार मुझे लगा कि जिंदगी सिर्फ निजी दुख के आसपास नहीं घूमती।

एक रात फोन पर माँ ने पूछा—

—बेटा, स्नेहा को पता चला?

मैंने कहा—

—शायद खबर में देखा होगा।

—फोन नहीं आया?

—नहीं।

माँ कुछ पल चुप रहीं।

—अच्छा है।

मैं मुस्कुराया।

माँ उससे नाराज़ थीं।

लेकिन मैंने कभी उनके सामने स्नेहा के बारे में खराब बात नहीं की।

कुछ रिश्ते खत्म होने के बाद सबसे सही काम यही होता है कि उन्हें हर रोज दोबारा खत्म न किया जाए।

करीब दो महीने बाद मुझे एक संदेश आया।

नंबर सहेजा हुआ नहीं था।

“बधाई। तुम्हारे चयन के बारे में पता चला।”

नाम नहीं लिखा था।

जरूरत भी नहीं थी।

मैंने नंबर पहचान लिया।

स्नेहा।

मैंने संदेश पढ़ा।

जवाब नहीं दिया।

दस मिनट बाद दूसरा संदेश आया।

“तुमने बताया नहीं।”

मैंने इस बार लिखा—

“बताने जैसा हमारे बीच कुछ बचा नहीं था।”

वह संदेश पढ़ा गया।

फिर कोई जवाब नहीं आया।

उसके बाद करीब डेढ़ साल तक हमारी कोई बात नहीं हुई।

मेरी अलग-अलग जगह प्रशिक्षण और फील्ड पोस्टिंग हुई।

मैंने छोटे कस्बों में काम किया।

कभी पानी की शिकायत।

कभी जमीन के रिकॉर्ड।

कभी स्कूल की इमारत।

कभी अस्पताल की व्यवस्था।

काम दिखने में साधारण होता था, लेकिन हर फाइल के पीछे कोई आदमी खड़ा होता था।

मुझे ये बात जल्दी समझ आ गई।

इसी दौरान स्नेहा की खबर कभी-कभी पुराने दोस्तों से मिल जाती।

वह सेवा में आगे बढ़ रही थी।

राजीव अब भी उसके आसपास था।

आशीष एक दिन फोन पर बोला—

—सुना है दोनों शादी करने वाले हैं।

मैंने फाइल से नजर नहीं हटाई।

—अच्छा।

—बस अच्छा?

—और क्या बोलूँ?

वह हँसा।

—तू सच में बदल गया।

मैंने कहा—

—नहीं। बस जो मेरा नहीं है, उसके बारे में सोचने का समय कम हो गया है।

करीब तीन साल बाद मुझे उत्तर प्रदेश के एक महत्वपूर्ण जिले में कार्यवाहक जिलाधिकारी का अतिरिक्त प्रभार मिला।

आदेश अचानक आया था।

वर्तमान जिलाधिकारी को राज्य मुख्यालय बुलाया गया था।

वरिष्ठ अधिकारी ने फोन पर कहा—

—विक्रम, कुछ सप्ताह तुम्हें अतिरिक्त जिम्मेदारी संभालनी होगी।

मैंने कहा—

—जी सर।

मैंने उस जिले का नाम दोबारा पढ़ा।

कुछ जाना-पहचाना लगा।

फिर याद आया।

स्नेहा की पोस्टिंग उसी जिले में अपर पुलिस अधीक्षक के पद पर थी।

मेरे हाथ कुछ सेकंड कागज पर रुके।

बस कुछ सेकंड।

फिर मैंने अगली फाइल खोली।

कार्यभार संभालने के अगले दिन शाम चार बजे कानून-व्यवस्था की संयुक्त बैठक रखी गई।

सम्मेलन कक्ष में लगभग बीस अधिकारी बैठे थे।

मैं सबसे बाद में अंदर गया।

सभी खड़े हो गए।

मैंने बैठने का इशारा किया।

फाइल खोली।

—शुरू करें।

एसपी साहब मेरे दाहिने बैठे थे।

उनके बगल में एक खाली कुर्सी थी।

बैठक शुरू हुए लगभग सात मिनट हुए थे कि दरवाजा खुला।

—माफ कीजिए सर, ट्रैफिक समीक्षा में देर हो गई।

मैंने सिर उठाया।

स्नेहा दरवाजे पर खड़ी थी।

हमारी नजर मिली।

उसके कदम वहीं रुक गए।

कमरे में किसी को कुछ समझ नहीं आया।

मैंने अपनी फाइल की तरफ देखा।

—आइए, बैठिए।

उसने कुर्सी तक पहुँचने में सामान्य से ज्यादा समय लिया।

मैं बैठक आगे बढ़ाता रहा।

—अगला मुद्दा।

एसपी साहब ने एक रिपोर्ट उसकी तरफ बढ़ाई।

—स्नेहा, ये आप बताइए।

उसने रिपोर्ट खोली।

आवाज शुरू में थोड़ी धीमी थी।

—सर, पिछले सप्ताह हमने चार संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पेट्रोलिंग लगाई है…

मैंने बीच में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

वह पेशेवर तरीके से रिपोर्ट देती रही।

बैठक करीब पचास मिनट चली।

अंत में सभी अधिकारी खड़े हुए।

स्नेहा भी।

उसने औपचारिक रूप से कहा—

—धन्यवाद, सर।

मैंने सिर हिलाया।

तीन साल पहले उसी ने कहा था—

“तुम एक मामूली क्लर्क हो।”

आज वह मुझे “सर” कह रही थी।

लेकिन सच कहूँ तो उस पल मुझे वैसी खुशी नहीं हुई जैसी लोग सोच सकते हैं।

मुझे बस एक बात महसूस हुई।

मैं उस रात से बहुत आगे आ चुका था।

बाकी अधिकारी चले गए।

स्नेहा दरवाजे के पास रुक गई।

फिर पलटी।

—सर… दो मिनट मिल सकते हैं?

मैंने घड़ी देखी।

—अगर आधिकारिक बात है तो बैठिए।

उसके चेहरे पर हल्का बदलाव आया।

—निजी है।

मैंने कुर्सी से पीछे होकर कहा—

—तो कार्यालय के बाद।

वह कुछ सेकंड मुझे देखती रही।

—ठीक है।

शाम सात बजे वह मेरे कार्यालय आई।

इस बार वर्दी में थी।

कमरे में सिर्फ हम दोनों थे।

उसने दरवाजा बंद नहीं किया।

अच्छा किया।

वह सामने बैठी।

कुछ देर कुछ नहीं बोली।

फिर पूछा—

—तुमने कभी बताया क्यों नहीं कि तुम तैयारी कर रहे थे?

मैंने कहा—

—हमारा तलाक हो चुका था।

—उससे पहले भी कर रहे थे।

—तब प्रक्रिया चल रही थी।

—तुम मुझे दिखाना चाहते थे कि तुम भी कर सकते हो?

मैंने उसकी तरफ देखा।

—शुरुआत में शायद।

वह चुप रही।

मैंने आगे कहा—

—फिर समझ आया कि जिंदगी तुम्हें जवाब देने से बड़ी है।

उसने नजर नीचे कर ली।

कुछ पल बाद बोली—

—मुझे नहीं पता था तुम इतना आगे निकल जाओगे।

मैंने शांत स्वर में कहा—

—यही समस्या थी, स्नेहा।

वह मेरी तरफ देखने लगी।

—तुम्हें हमेशा लगता था कि आगे कौन है, पीछे कौन है।

वह कुछ नहीं बोली।

मैंने फाइल बंद की।

—अगर और कोई बात नहीं है तो मुझे निकलना है।

वह उठी।

दरवाजे तक गई।

फिर मुड़ी।

—राजीव और मैं साथ नहीं हैं।

मैंने जवाब नहीं दिया।

शायद वह मेरे चेहरे पर कुछ ढूँढ़ रही थी।

उसे कुछ नहीं मिला।

वह चली गई।

अगले दो सप्ताह हम रोज किसी न किसी बैठक में मिलते रहे।

मैंने कभी उसके साथ अलग व्यवहार नहीं किया।

ना अतिरिक्त नरमी।

ना कठोरता।

फिर एक सुबह राज्य मुख्यालय से गोपनीय फाइल आई।

मामला पुलिस विभाग की दो साल पुरानी वाहन खरीद से जुड़ा था।

कई बिलों में गड़बड़ी थी।

कुछ भुगतान ऐसे विक्रेताओं को गए थे जिनकी पात्रता संदिग्ध थी।

जिले से पुराने दस्तावेज माँगे गए।

दोपहर तक मेरे सामने संबंधित अधिकारियों के नाम थे।

एक नाम पढ़ते ही मेरी नजर रुक गई।

स्नेहा सिंह।

उस समय वह खरीद समिति में थी।

उसकी डिजिटल स्वीकृति फाइल में लगी थी।

और दूसरे हस्ताक्षर थे—

राजीव मल्होत्रा।

मैंने फाइल बंद नहीं की।

पूरी पढ़ी।

शाम को एसपी साहब को बुलाया।

—इसका मूल रिकॉर्ड कहाँ है?

उन्होंने कहा—

—पुराने सर्वर में होना चाहिए।

—लॉग चाहिए। किस अधिकारी के खाते से, किस समय स्वीकृति हुई।

उन्होंने गंभीर होकर सिर हिलाया।

—जी।

अगले दिन स्नेहा मेरे कमरे में आई।

इस बार उसके चेहरे पर पहले जैसा आत्मविश्वास नहीं था।

—मुझे पता चला है पुरानी खरीद की जांच खुली है।

मैंने कहा—

—हाँ।

—मेरा नाम है?

मैंने कुछ सेकंड उसे देखा।

—आप समिति में थीं।

वह कुर्सी पर बैठ गई।

—मैंने वो अंतिम स्वीकृति नहीं दी थी।

—फाइल में आपका डिजिटल हस्ताक्षर है।

उसने तुरंत कहा—

—नहीं।

फिर खुद ही धीमी हुई।

—मेरा मतलब… मैंने राजीव सर से उस खरीद पर आपत्ति की थी।

—लिखित में?

वह चुप हो गई।

मैं समझ गया।

—नहीं?

उसने सिर हिलाया।

—उन्होंने कहा था कि छोटी प्रक्रिया है। बाद में ठीक कर देंगे।

मैंने पूछा—

—आपने अपना सिस्टम खुला छोड़ा था?

उसका चेहरा बदल गया।

—कई बार।

मैं कुर्सी पर पीछे हुआ।

—ये जवाब जांच में मुश्किल पैदा करेगा।

वह अचानक बोली—

—तुम्हें लगता है मैंने पैसा लिया?

मैंने कहा—

—मुझे क्या लगता है, उससे फर्क नहीं पड़ता।

—तुम मुझे जानते हो।

मैंने तुरंत जवाब दिया—

—मैं तुम्हें पति की तरह जानता था। ये जांच अधिकारी के रूप में होगी।

उसके चेहरे पर चोट साफ थी।

लेकिन यही सही था।

मैं निजी पहचान के आधार पर किसी को निर्दोष नहीं कह सकता था।

वह उठने लगी।

फिर रुक गई।

—अगर तुम चाहो तो मुझे बहुत आसानी से फँसने दे सकते हो।

मैंने कहा—

—और अगर तुम निर्दोष हो तो ऐसा करना गलत होगा।

वह मुझे देखती रही।

मैंने घंटी बजाई।

—रिकॉर्ड आने दीजिए।

वह चली गई।

दो दिन बाद सर्वर लॉग आया।

मैंने आईटी अधिकारी को सामने बैठाकर पूरी जानकारी निकलवाई।

स्नेहा के खाते से स्वीकृति रात 11 बजकर 18 मिनट पर हुई थी।

उस दिन सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार वह दूसरे जिले में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में मौजूद थी।

लेकिन यह अकेला प्रमाण काफी नहीं था।

उसका पासवर्ड किसी और के पास कैसे गया?

आईटी अधिकारी ने कहा—

—सर, उस समय विभाग में सामान्य डिजिटल टोकन इस्तेमाल होता था। टोकन मशीन में हो तो दूसरे सिस्टम से भी उपयोग संभव था।

—उस मशीन का लॉग?

उसने स्क्रीन पलटी।

—यह रहा।

स्वीकृति जिस कंप्यूटर से हुई थी, वह राजीव मल्होत्रा के कार्यालय का सिस्टम था।

मैंने कुर्सी से आगे झुककर दोबारा समय देखा।

फिर कहा—

—पूरी तकनीकी रिपोर्ट बनाइए। अनुमान नहीं। सिर्फ रिकॉर्ड।

अगले दिन मैंने फाइल मंडलायुक्त और राज्य मुख्यालय भेज दी।

साथ में साफ लिखा—

“अंतिम निर्णय स्वतंत्र विभागीय जांच द्वारा किया जाए।”

मैं खुद निर्णायक अधिकारी नहीं बना।

क्योंकि स्नेहा मेरी पूर्व पत्नी थी।

तीन सप्ताह बाद जांच टीम जिले में आई।

राजीव भी आया।

उसे देखकर पहली बार पुरानी बात याद आई।

तलाक की सुनवाई के दिन वही बाहर गाड़ी में बैठा था।

आज वह सम्मेलन कक्ष के बाहर अपनी फाइल पकड़े खड़ा था।

उसने मुझे देखते ही कहा—

—विक्रम जी, दो मिनट?

मैं रुक गया।

—कहिए।

वह मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था।

—पुरानी बातें अपनी जगह हैं। मैं बस चाहता हूँ कि इस मामले को सही नजर से देखा जाए।

मैंने कहा—

—इसीलिए स्वतंत्र जांच चल रही है।

वह थोड़ा करीब आया।

—कुछ प्रशासनिक विवेक भी होता है।

मैंने उसकी तरफ देखा।

—वही इस्तेमाल करके मैंने खुद को निर्णय से अलग रखा है।

उसकी मुस्कान खत्म हो गई।

मैं आगे चला गया।

जांच में धीरे-धीरे कई रिकॉर्ड सामने आए।

विक्रेताओं से जुड़े फोन नंबर।

ईमेल।

स्वीकृति का समय।

राजीव के कार्यालय से भेजे गए निर्देश।

स्नेहा की एक पुरानी ईमेल भी मिली जिसमें उसने खरीद मूल्य पर सवाल उठाया था।

ईमेल उसने ड्राफ्ट की थी लेकिन आधिकारिक फाइल में शामिल नहीं हुई थी।

जांच अधिकारी ने पूछा—

—भेजी क्यों नहीं?

स्नेहा ने कहा—

—राजीव सर ने कहा था मौखिक रूप से चर्चा हो गई है, लिखने की जरूरत नहीं।

—आपने मान लिया?

उसने सिर झुका दिया।

—हाँ।

उस एक शब्द में उसकी सबसे बड़ी गलती थी।

उसने रिश्ता और अधिकार मिलाकर देखे थे।

पहले मेरे साथ।

फिर राजीव के साथ।

करीब एक महीने बाद अंतरिम रिपोर्ट आई।

स्नेहा के खिलाफ आर्थिक लाभ का कोई प्रमाण नहीं मिला।

तकनीकी रिकॉर्ड ने भी दिखाया कि विवादित डिजिटल स्वीकृति उसके द्वारा नहीं की गई थी।

लेकिन प्रक्रिया में लापरवाही के लिए उसे विभागीय चेतावनी दी गई।

राजीव के खिलाफ मामला आगे बढ़ा दिया गया।

उसकी जिम्मेदारियाँ हटा दी गईं और अलग जांच शुरू हुई।

रिपोर्ट पढ़कर मैंने सिर्फ हस्ताक्षर किए।

उस शाम स्नेहा बिना समय लिए मेरे कार्यालय आ गई।

मेरे स्टाफ ने रोकना चाहा।

मैंने अंदर आने दिया।

वह सामने खड़ी रही।

—तुमने वो सर्वर लॉग क्यों निकलवाया?

मैंने कहा—

—क्योंकि जरूरी था।

—तुम चाहते तो सिर्फ फाइल देखकर आगे भेज सकते थे।

—हाँ।

—तब शायद मैं निलंबित हो जाती।

मैं चुप रहा।

वह कुछ कदम आगे आई।

—जिस आदमी को मैंने सबसे ज्यादा अपमानित किया, उसी ने मेरे खिलाफ सबसे आसान मौका छोड़ दिया।

मैंने धीरे से कहा—

—मैंने तुम्हारे लिए कुछ नहीं छोड़ा।

वह रुक गई।

—मैंने अपने काम के लिए रिकॉर्ड देखा।

उसकी आँखें भर आईं।

वह बैठ गई।

—मैं बहुत गलत थी।

मैंने पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया।

उसने नहीं लिया।

—राजीव ने मुझे कई बार कहा था कि तुम मेरे लायक नहीं हो।

मैंने जवाब दिया—

—लेकिन फैसला तुम्हारा था।

उसने तुरंत सिर हिलाया।

—हाँ।

कमरे में चुप्पी रही।

पहली बार उसने अपनी गलती का दोष किसी और पर डालने की कोशिश नहीं की।

वह बोली—

—मुझे वर्दी मिली तो लगा मैं बदल गई हूँ। लोग उठकर खड़े होते थे। गाड़ी के आगे रास्ता खाली होता था। फोन पर बड़े लोग बात करते थे। धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि जिन लोगों के पास ये सब नहीं है, वो मुझसे नीचे हैं।

मैंने कुछ नहीं कहा।

वह आगे बोली—

—और सबसे पहले मैंने तुम्हें नीचे समझा।

मैंने खिड़की की तरफ देखा।

वह बातें सुनना आसान नहीं था।

लेकिन अब उनसे मेरा जीवन तय नहीं होता था।

स्नेहा ने पूछा—

—क्या कभी मुझे माफ कर पाओगे?

मैंने उसे देखा।

—मैं बहुत पहले कर चुका हूँ।

वह जैसे पहली बार राहत से साँस ले पाई।

फिर धीमे से बोली—

—तो क्या हम…

मैंने उसकी बात पूरी होने से पहले सिर हिला दिया।

—नहीं।

उसका चेहरा स्थिर हो गया।

मैंने शांत स्वर में कहा—

—माफ करना और वापस उसी रिश्ते में जाना दो अलग बातें हैं।

वह चुप रही।

—मैं तुमसे नफरत नहीं करता, स्नेहा। लेकिन जिस दिन तुमने मुझे मेरी नौकरी, मेरी आय और मेरे सामाजिक स्तर से माप लिया था, उस दिन हमारे बीच सिर्फ प्यार नहीं टूटा था। भरोसा भी गया था।

वह कुछ देर तक मेज देखती रही।

फिर खड़ी हुई।

—मैं समझती हूँ।

दरवाजे तक पहुँचकर उसने कहा—

—कम से कम अब मैं सच में समझती हूँ।

मैंने सिर हिलाया।

वह चली गई।

मुझे लगा कहानी वहीं खत्म हो गई।

लेकिन दो महीने बाद एक घटना हुई जिसकी मुझे भी उम्मीद नहीं थी।

राज्य स्तर पर युवा सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए एक कार्यक्रम रखा गया था।

मुझे मुख्य अतिथियों में बुलाया गया।

स्नेहा भी पुलिस विभाग की ओर से वहाँ मौजूद थी।

मंच से उतरते समय कार्यक्रम संचालक ने घोषणा की कि आर्थिक रूप से कमजोर अभ्यर्थियों के लिए नई छात्रवृत्ति शुरू की जा रही है।

उसका नाम मेरे पिता के नाम पर था।

“स्वर्गीय रघुवीर सिंह अध्ययन सहायता योजना।”

पहले साल पचास छात्रों की फीस दी जानी थी।

कार्यक्रम के बाद स्नेहा मेरे पास आई।

—ये तुम्हारी योजना है?

—हाँ।

उसने पूछा—

—कब से सोच रहे थे?

मैंने कहा—

—काफी समय से।

वह बोर्ड पर पिता का नाम पढ़ती रही।

फिर बोली—

—तुम्हारी वही बाइक… तुम्हारे पिताजी की निशानी थी ना?

मैंने सिर हिलाया।

उसे सब याद था।

—तुमने उसे मेरी कोचिंग के लिए बेच दिया था।

—हाँ।

कुछ सेकंड बाद उसने पूछा—

—कभी अफसोस हुआ?

मैंने जवाब देने से पहले सामने बैठे छात्रों को देखा।

उनमें से कई साधारण कपड़ों में थे।

कुछ अपने माता-पिता के साथ आए थे।

मैंने कहा—

—उस समय नहीं।

वह मेरी तरफ देखने लगी।

मैंने आगे कहा—

—बाद में भी नहीं।

उसकी आँखें फिर भर आईं।

शायद उसे उम्मीद थी कि मैं कहूँगा उसने मेरा त्याग बर्बाद कर दिया।

लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता था।

उस बाइक के पैसे से एक इंसान अपने सपने तक पहुँचा था।

उसके बाद उसने क्या चुना, वह उसकी जिम्मेदारी थी।

मेरी नहीं।

स्नेहा ने धीमे से कहा—

—विक्रम, एक बात और है।

मैंने उसकी तरफ देखा।

—क्या?

उसने अपना फोन निकाला।

एक पुराना ईमेल खोला।

तारीख करीब तीन साल पुरानी थी।

वही सप्ताह जब हमारा तलाक अंतिम हुआ था।

ईमेल एक सरकारी प्रशिक्षण संस्थान को भेजा गया था।

उसमें मेरा नाम था।

मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

—ये क्या है?

वह बोली—

—तुम्हारे साक्षात्कार से कुछ दिन पहले मुझे पता चल गया था कि तुम यूपीएससी दे रहे हो।

मैं चुप हो गया।

उसने कहा—

—आशीष ने नहीं बताया। तुम्हारी पुरानी किताबों में एक प्रवेश पत्र रह गया था। वह मेरे सामान के साथ आ गया था।

मैं ईमेल पढ़ता रहा।

उसमें मेरे बारे में कोई सिफारिश नहीं थी।

सिर्फ ये सूचना थी कि उम्मीदवार विक्रम सिंह ने लंबे समय तक अपनी पत्नी की तैयारी में सहयोग किया था और आर्थिक कठिनाई के बावजूद पढ़ाई जारी रखी।

मैंने पूछा—

—ये भेजने की जरूरत क्यों पड़ी?

स्नेहा ने कहा—

—जरूरत नहीं थी।

वह हल्का सा मुस्कुराई।

—शायद उस समय मुझे पहली बार डर लगा था कि मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी है।

मैंने फोन उसे वापस दिया।

—इससे मेरे परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ा होगा।

—मुझे पता है।

—तो फिर?

उसने कहा—

—मैं बस चाहती थी कि कहीं तो दर्ज रहे कि जिस आदमी को मैंने मामूली कहा था, वह मामूली नहीं था।

मैं कुछ पल चुप रहा।

फिर कहा—

—मुझे दर्ज होने की जरूरत नहीं थी।

उसने सिर हिलाया।

—आज समझ में आता है।

उसी समय कार्यक्रम का एक कर्मचारी मेरे पास आया।

—सर, अगले सत्र के बच्चे आपका इंतजार कर रहे हैं।

मैंने कहा—

—आ रहा हूँ।

मैं चलने लगा।

पीछे से स्नेहा ने आवाज दी—

—विक्रम।

मैं रुका।

वह इस बार मुस्कुरा रही थी।

न पुराना घमंड था।

न कोई उम्मीद।

—तुम सच में जीत गए।

मैंने कहा—

—ये कोई मुकाबला नहीं था।

फिर मैं मंच की ओर चला गया।

कुछ महीनों बाद मेरा अतिरिक्त प्रभार समाप्त हो गया।

नए जिलाधिकारी आ गए।

मेरी दूसरी पोस्टिंग हो गई।

स्नेहा भी बाद में दूसरे जिले चली गई।

हमारे बीच दोबारा कोई निजी रिश्ता नहीं बना।

लेकिन कभी-कभी सरकारी बैठकों में मिल जाते थे।

अब वह मुझे देखकर सिर्फ औपचारिक नमस्ते करती।

मैं भी।

राजीव की विभागीय जांच लंबी चली।

उसके खिलाफ कई प्रशासनिक अनियमितताएँ प्रमाणित हुईं और उसे महत्वपूर्ण पद से हटा दिया गया।

मैंने उस मामले की आगे की जानकारी जानने की कोशिश नहीं की।

एक साल बाद आशीष मुझसे मिलने आया।

हम पुराने दिनों की बातें कर रहे थे।

उसने हँसते हुए कहा—

—भाई, एक बात बता।

—क्या?

—अगर उस रात स्नेहा तुझे “मामूली क्लर्क” नहीं बोलती तो तू आईएएस बनता?

मैं कुछ देर सोचता रहा।

फिर मैंने कहा—

—शायद नहीं।

वह जोर से हँसा।

—तो धन्यवाद तो बनता है उसका।

मैं भी हँस पड़ा।

फिर सिर हिलाया।

—नहीं।

—क्यों?

मैंने कहा—

—किसी का अपमान तुम्हें शुरुआत दे सकता है। मंजिल तक तुम्हें अपनी मेहनत ही ले जाती है।

आशीष कुछ सेकंड चुप रहा।

फिर बोला—

—ये बात मंच पर बोलना।

मैंने कहा—

—नहीं। बहुत भाषण जैसा लगेगा।

हम दोनों हँस पड़े।

उस रात घर लौटते समय एक ट्रैफिक सिग्नल पर मेरी गाड़ी रुकी।

बगल में एक पुरानी बाइक खड़ी थी।

वैसी ही जैसी कभी मेरे पिता की थी।

कुछ साल पहले उसे देखकर मुझे पछतावा होता।

उस दिन नहीं हुआ।

मुझे सिर्फ वह शाम याद आई जब मैंने बाइक बेचकर पैसे स्नेहा के हाथ में रखे थे।

उसने पूछा था—

—और तुम दफ्तर कैसे जाओगे?

मैंने कहा था—

—चलकर।

वह रो पड़ी थी।

उस समय का प्यार झूठा नहीं था।

बाद में लिया गया उसका फैसला भी सच था।

और आज की मेरी जिंदगी भी सच थी।

हर अच्छी शुरुआत का अच्छा अंत हो, जरूरी नहीं।

लेकिन खराब अंत के बाद जिंदगी खत्म हो जाए, ये भी जरूरी नहीं।

तीन साल पहले एक फोन कॉल के बाद मैं खुद को बेकार समझने लगा था।

तीन साल बाद वही महिला मेरे सामने अधिकारी की तरह खड़ी थी।

लोगों को सबसे ज्यादा हैरानी मेरी कुर्सी देखकर हुई।

मुझे नहीं।

मेरे लिए असली बदलाव उस कुर्सी से पहले हो चुका था।

जिस दिन मैंने तय किया था कि अब मैं अपनी कीमत किसी दूसरे इंसान की नजर से तय नहीं करूँगा।

वही दिन मेरी असली जीत थी।

 

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