जिस दिन बड़े भाई ने कहा “इस कारखाने में तुम्हारा एक रुपया भी नहीं”, उसी दिन छोटे भाई ने पुरानी नीली बही बैग में दबाकर घर छोड़ा//

PART 2

अगली सुबह सूरज निकलने से पहले मैं जाग गया।

सिमरन सो रही थी।

गुरप्रीत के कमरे की बत्ती जल रही थी। अंतिम परीक्षा पास थी, इसलिए वह देर रात तक पढ़ता था।

मेरे सामने मेज पर वही नीली बही रखी थी।

मैंने उसे खोला।

शुरुआती पन्नों पर साधारण हिसाब था।

कितने मीटर कपड़ा आया।

किस दुकानदार ने कितने रुपये दिए।

पहली सिलाई मशीन किस दिन खरीदी गई।

कहाँ से धागा उधार आया।

हर पन्ने पर मेरी और जगजीत की लिखावट मिली हुई थी।

मैं पन्ने पलटता गया।

आखिरी हिस्से में मोटा नीला कागज चिपका था।

उसमें पीतल की छोटी चाबी बंधी थी।

मैंने उसे पहले भी कई बार देखा था।

मगर मेरे लिए वह बस किसी पुराने ताले की चाबी थी।

उस सुबह पहली बार उस पर खुदा “बी-१७” मुझे किसी बंद दरवाजे जैसा लगा।

मैंने हरपाल को फोन किया।

उसने तुरंत उठाया।

मैंने कहा—

—पेटी मत खोलना। मैं आ रहा हूँ।

बेंगलुरु जाना आसान नहीं था।

जेब में कुल सत्रह हजार रुपये बचे थे। नई नौकरी मैंने दो दिन पहले ही शुरू की थी। कपड़े के एक व्यापारी के गोदाम में माल का हिसाब रखना था। महीने के बाईस हजार मिलने थे।

मैंने मालिक से तीन दिन की छुट्टी माँगी।

उसने पूछा—

—अभी तो आए हो। सब ठीक है?

मैंने सिर झुका कर कहा—

—पुराना हिसाब देखना है।

शायद मेरी आवाज सुनकर उसने ज्यादा कुछ नहीं पूछा।

अगले दिन मैं रात की रेलगाड़ी से निकला।

सिमरन ने एक कपड़े के थैले में छह पराठे रख दिए।

जाते समय उसने बस इतना कहा—

—जो मिले, पहले पढ़ना। गुस्से में कोई फैसला मत करना।

गुरप्रीत मुझे स्टेशन तक छोड़ने आया।

गाड़ी चलने लगी तो उसने खिड़की के बाहर से कहा—

—पापा जी, अगर ताया जी ने गलत किया भी हो, आप अपना नुकसान मत करना।

मैंने उसका हाथ पकड़कर सिर हिलाया।

उस समय मुझे नहीं मालूम था कि मेरा बेटा जिस “गलत” की कल्पना कर रहा था, बात उससे कहीं आगे जा चुकी थी।

करीब छत्तीस घंटे बाद मैं बेंगलुरु पहुँचा।

हमारी पुरानी शाखा शहर के बाहरी औद्योगिक क्षेत्र में थी।

कभी वहाँ पैंतालीस लोग काम करते थे।

उस दिन आधा शटर खुला था।

अंदर धूल, बंद मशीनें और गत्ते के खाली डिब्बे पड़े थे।

हरपाल मुझे देखकर बाहर आया।

उसके बाल पहले से ज्यादा सफेद हो गए थे।

उसने मुझे गले लगाया।

फिर बिना कुछ कहे भीतर ले गया।

पिछले कमरे में लोहे की पेटी रखी थी।

करीब ढाई फुट लंबी।

किनारों पर जंग।

ऊपर फीके सफेद रंग से लिखा—

“बी-१७।”

मैं उसके सामने बैठ गया।

चाबी निकाली।

पहली बार नहीं लगी।

दूसरी बार मैंने थोड़ा दबाव दिया।

ताला खुल गया।

हरपाल ने मेरी तरफ देखा।

मैंने ढक्कन उठाया।

अंदर कपड़े में लिपटी चार मोटी फाइलें थीं।

एक रबर की मोहर।

कुछ पुराने छायाचित्र।

तीन बैंक पुस्तिकाएँ।

और नीचे भूरे कागज का एक बड़ा लिफाफा।

सबसे ऊपर की फाइल पर तारीख लिखी थी—

“१२ जुलाई २००४।”

हमारी पहली दुकान खुलने से ग्यारह दिन पहले की तारीख।

मैंने पहला कागज उठाया।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

मेरा गला सूख गया।

हरपाल ने पानी आगे किया।

मैंने नहीं लिया।

पहला कागज साझेदारी का प्रारूप था।

उसमें जगजीत सिंह की हिस्सेदारी पचपन प्रतिशत थी।

मंजीत सिंह की पैंतालीस प्रतिशत।

नीचे दोनों के हस्ताक्षर थे।

मैंने अपने हस्ताक्षर पहचान लिए।

जगजीत के भी।

अगले कागज पर बैंक की मुहर थी।

हमारी पहली दुकान के लिए जमा किए गए सात लाख चालीस हजार रुपये में चार लाख रुपये मेरे खाते से आए थे।

वही पैसे जो मैंने अपने हिस्से की पैतृक जमीन बेचकर लगाए थे।

मैं कुर्सी से उठ गया।

पुराना कमरा जैसे अचानक छोटा हो गया था।

मैंने हरपाल से पूछा—

—ये सब यहाँ कैसे आया?

उसने सिर हिलाया।

—मुझे नहीं पता। आगे देखो।

तीसरी फाइल बेंगलुरु शाखा की थी।

उसमें मेरे नाम से दर्ज प्रबंधकीय अधिकार थे।

कई खरीद समझौतों पर मेरा नाम था।

बीस लाख रुपये की पहली मशीनों के भुगतान में मेरी स्वीकृति थी।

फिर मुझे एक ऐसा कागज मिला जिस पर मैं देर तक आँखें टिकाए रहा।

वह साझेदारी समाप्त करने की घोषणा थी।

तारीख—

“१८ नवंबर २०११।”

उस दिन मैं बेंगलुरु में था।

कागज के अनुसार मैंने स्वेच्छा से अपना हिस्सा जगजीत को दे दिया था।

नीचे मेरा हस्ताक्षर बना था।

मैंने उसे छुआ।

वह मेरा हस्ताक्षर नहीं था।

मेरे नाम का आकार लगभग वैसा था।

लेकिन “म” की पहली रेखा छोटी थी।

मैं हमेशा उसे लंबा खींचता था।

हरपाल मेरे पास खड़ा रहा।

हम दोनों ने कुछ नहीं कहा।

उसी क्षण मुझे कारखाने के मुख्य द्वार की वह पीतल की पट्टी याद आई।

“ज.स. — म.स.”

जगजीत ने उसे कभी क्यों नहीं हटाया?

उत्तर मेरे सामने नहीं था।

फिर भी उस छोटी पट्टी का भार पहली बार समझ आया।

किसी समय उस भवन की दीवारें सच जानती थीं।

कागज बदल गए थे।

दीवार पर दो नाम रह गए थे।

मैंने अगला कागज खोला।

उसी कथित घोषणा के आधार पर अगले छह महीनों में साझेदारी के खाते बंद हुए थे।

फिर सारी संपत्ति एक नई निजी कंपनी में चली गई।

उसमें जगजीत और बाद में अर्जुन हिस्सेदार बने।

मेरा नाम गायब था।

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।

भूरे लिफाफे में हमारे पुराने लेखा विशेषज्ञ सुखदेव अरोड़ा का पत्र था।

वह दस साल पहले चल बसे थे।

पत्र जगजीत के नाम था।

मैंने पूरा पढ़ा।

उसमें लिखा था कि मंजीत की अनुपस्थिति में उसकी हिस्सेदारी हटाने से पहले उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति और सत्यापित सहमति आवश्यक है। नीचे लाल कलम से एक पंक्ति थी—

“मूल घोषणा संदिग्ध है। बिना सत्यापन इसे अंतिम न मानें।”

पत्र पर जगजीत के हस्ताक्षर थे।

अर्थात उसे चेतावनी मिली थी।

उसने पढ़ा था।

फिर भी उसने आगे के कागज बनवाए।

मैंने फाइल बंद कर दी।

हरपाल ने पूछा—

—अब क्या करोगे?

मैंने उत्तर नहीं दिया।

मेरे भीतर जो सबसे तेज बात चल रही थी, वह बदला नहीं था।

मुझे अपने बेटे का चेहरा दिख रहा था।

चार लाख पचास हजार रुपये की फीस।

जगजीत की उँगली मेज पर।

और वह एक वाक्य—

“इस कारखाने में तुम्हारा एक रुपया भी नहीं।”

मैंने भूरे लिफाफे को वापस पेटी में रखा।

फिर पूछा—

—तुम्हें ये पेटी क्यों मिली?

हरपाल ने बताया कि अर्जुन ने बेंगलुरु शाखा का बचा सामान बेचने का आदेश दिया था। पुराने लोहे के रैक हटाते समय दीवार के पीछे बंद कोठरी मिली। पेटी उसी में थी।

उसने आगे कहा—

—एक बात और है।

मैंने उसकी तरफ देखा।

वह पास रखे तीन नए कागज लेकर आया।

अर्जुन ने पिछले वर्ष कंपनी के विस्तार के लिए बैंक समूह से करीब अट्ठाईस करोड़ रुपये का ऋण लिया था।

ऋण के लिए उसने घोषणा की थी कि कंपनी की सारी पुरानी संपत्ति बिना किसी साझेदारी विवाद के जगजीत परिवार के पूर्ण स्वामित्व में है।

मैंने कागज रख दिया।

अब यह केवल मेरे हिस्से का प्रश्न नहीं था।

जिस पुराने झूठ ने मुझे बाहर किया था, उसी झूठ पर नया कर्ज खड़ा था।

मैंने कहा—

—इन सबकी प्रतियां बनवा दो।

हरपाल ने पूछा—

—जगजीत को बताओगे?

मैंने सिर हिलाया।

—अभी नहीं।

मैं लुधियाना लौटा।

घर पहुँचते ही सिमरन ने मेरा चेहरा देखा।

उसने पूछा भी नहीं कि क्या मिला।

मैंने चारों फाइलें मेज पर रखीं।

गुरप्रीत भी बैठ गया।

करीब डेढ़ घंटे तक मैं दोनों को एक-एक कागज दिखाता रहा।

अंत में कमरे में केवल दीवार घड़ी की आवाज थी।

गुरप्रीत ने उस जाली हस्ताक्षर वाले कागज को दोबारा उठाया।

उसने पूछा—

—आपने इतने साल कभी हिस्सा क्यों नहीं माँगा?

मेरे पास बड़ा उत्तर नहीं था।

मैंने कहा—

—क्योंकि वो मेरा भाई था।

गुरप्रीत ने कागज नीचे रख दिया।

उसने फिर कुछ नहीं पूछा।

अगले दिन हम एक पुराने विधिक सलाहकार, जसपाल मेहरा, के पास गए।

वह कभी हमारे पिता के परिचित थे।

उन्होंने करीब तीन घंटे कागज देखे।

फिर चश्मा उतारकर पूछा—

—तुम्हारे पास मूल नीली बही भी है?

मैंने उनके सामने रख दी।

उन्होंने शुरुआती भुगतान की तारीखें मिलाईं।

बैंक पुस्तिका की तिथियाँ वही थीं।

साझेदारी प्रारूप में दर्ज पहली पूँजी वही थी।

उन्होंने कहा—

—इसे संभालकर रखो। किसी को मूल मत देना।

मैंने पूछा—

—क्या मुझे अभी जगजीत के खिलाफ जाना चाहिए?

उन्होंने मेरी तरफ सीधे देखा।

—तुम्हें तय करना है कि तुम्हें पैसा चाहिए, अधिकार चाहिए या सच दर्ज कराना है। तीनों रास्ते एक जैसे नहीं होते।

मैंने उसी शाम फैसला किया।

मुझे उसका घर नहीं चाहिए था।

उसकी कुर्सी नहीं।

उसका बेटा मेरे नीचे काम करे, यह भी नहीं।

मुझे सिर्फ यह दर्ज चाहिए था कि मैं कभी उसका पाला हुआ आदमी नहीं था।

मैं साझेदार था।

और उसने यह जानते हुए मुझे मिटाया था।

हमने पहले कंपनी और ऋण देने वाले बैंकों को औपचारिक सूचना भेजी।

कागजों की प्रमाणित प्रतियाँ जोड़ी गईं।

जगजीत को पत्र तीन दिन बाद मिला।

उसका फोन उसी शाम आया।

मैंने उठाया।

वह गरजा—

—ये क्या तमाशा शुरू किया है तूने?

मैंने खिड़की के बाहर देखा।

सिमरन सिलाई मशीन पर बैठी थी।

मैंने कहा—

—कागज पढ़ लो।

वह बोला—

—कौन से कागज असली हैं, कौन से नकली, मैं अच्छी तरह जानता हूँ।

मैं चुप रहा।

उसकी आवाज और ऊँची हुई—

—तू मुझे डराएगा? तीस साल का व्यापार है मेरा। सौ लोग मेरे साथ खड़े हैं।

मैंने पूछा—

—तो फिर डर क्यों रहे हो?

कुछ क्षण फोन पर कुछ नहीं था।

फिर उसने कहा—

—तूने अगर बैंक में एक भी और कागज दिया, तो याद रखना, मैं सबको बताऊँगा कि बेंगलुरु शाखा का पैसा तूने ही गायब किया था।

मेरा हाथ फोन पर स्थिर हो गया।

अब उसने नया रास्ता चुना था।

मेरे पुराने काम को ही मेरे खिलाफ करना।

दो दिन बाद शहर के कपड़ा बाजार में बात फैल गई कि मंजीत ने वर्षों पहले बेंगलुरु शाखा में गड़बड़ी की थी और अब कंपनी पर झूठा दावा कर रहा है।

तीन पुराने परिचितों ने मुझे फोन किया।

एक ने सीधा पूछा—

—सच क्या है?

मैंने कहा—

—थोड़ा रुक जाओ।

मुझे पहली बार समझ आया कि जगजीत केवल कागज नहीं बचा रहा था।

वह अपनी बनाई छवि बचा रहा था।

उस छवि में वह अकेला निर्माता था।

मैं केवल जरूरतमंद छोटा भाई।

यही कहानी उसने घर में भी सुनाई थी।

बाजार में भी।

अपने बेटे को भी।

शायद खुद को भी।

इस बीच गुरप्रीत ने अपनी पढ़ाई जारी रखी।

उसने मुझसे कहा—

—आप अपने मामले पर ध्यान दो। मेरी फीस की चिंता मत करना।

शाम को वह दो बच्चों को गणित पढ़ाता।

रात में अपनी परीक्षा की तैयारी करता।

सिमरन ने सिलाई बढ़ा दी।

मैंने गोदाम की नौकरी नहीं छोड़ी।

सुबह आठ बजे काम पर जाता।

शाम छह बजे लौटता।

फिर जसपाल जी के साथ कागज देखता।

मेरी जिंदगी बाहर से पहले से छोटी हो गई थी।

लेकिन पहली बार हर दिन मेरा अपना था।

करीब चार महीने बाद बैंक ने जगजीत की कंपनी के पुराने स्वामित्व कागजों की स्वतंत्र जाँच शुरू की।

अर्जुन ने शायद इसे साधारण औपचारिकता समझा।

उसी समय उसने एक और गलती कर दी।

उसने कर्ज की सीमा बढ़ाने के लिए कारखाने की जमीन का नया मूल्यांकन जमा कराया।

उस घोषणा में फिर लिखा था—

“किसी तीसरे व्यक्ति का कोई दावा नहीं।”

जबकि हमारा नोटिस बैंक के पास पहले से दर्ज था।

जसपाल जी ने कागज देखकर कुछ नहीं कहा।

बस उसे बाकी प्रतियों के साथ रख दिया।

करीब एक वर्ष बीत गया।

गुरप्रीत ने परीक्षा में अपने विभाग में दूसरा स्थान प्राप्त किया।

उस दिन घर में हमने बाहर से मिठाई नहीं मँगाई।

सिमरन ने अपने हाथ से सूजी का हलवा बनाया।

गुरप्रीत ने पहला कटोरा मेरे सामने रखा।

मैंने कहा—

—तेरे लिए बनाया है।

वह मुस्कुराया—

—फीस आपने भरी थी।

उस एक वाक्य के आगे मेरे पास कुछ नहीं था।

छह महीने बाद उसे पुणे की एक बड़ी अभियांत्रिकी कंपनी में नौकरी मिल गई।

वार्षिक वेतन करीब बारह लाख रुपये था।

नियुक्ति पत्र हाथ में आने के बाद वह सबसे पहले उस छोटी दुकान पर गया जहाँ हमने मेरा स्कूटर बेचा था।

वापस आया तो एक पुरानी दिखने वाली, मगर ठीक हालत की मोटरसाइकिल साथ थी।

उसने चाबी मेरी हथेली पर रखी।

मैंने पूछा—

—ये क्या है?

उसने कहा—

—स्कूटर आपने मेरी फीस के लिए बेचा था। ये मैं अपने लिए नहीं लाया।

मैंने चाबी वापस उसकी तरफ बढ़ाई।

उसने हाथ पीछे कर लिया।

सिमरन दरवाजे पर खड़ी थी।

उसकी आँखें गीली थीं, लेकिन वह मुस्कुरा रही थी।

मैंने मोटरसाइकिल उस दिन नहीं चलाई।

करीब आधे घंटे बाद अकेले बाहर निकाला।

सीट पर हाथ रखा।

फिर वापस अंदर आ गया।

उधर जगजीत के व्यापार की हालत बदल रही थी।

पहले बैंक ने नया ऋण रोक दिया।

फिर दो बड़े खरीदारों ने भुगतान की शर्तें कड़ी कर दीं।

अर्जुन ने घाटा छिपाने के लिए सस्ता माल खरीदना शुरू किया।

तीन बड़े आदेश लौटे।

एक वर्ष में कंपनी का ऋण अट्ठाईस करोड़ से बढ़कर चौंतीस करोड़ के करीब हो गया।

मशीनों पर भुगतान बाकी था।

कामगारों की दो महीने की मजदूरी अटक गई।

जगजीत ने मुझे एक बार फिर फोन किया।

इस बार उसकी आवाज धीमी थी।

उसने कहा—

—मिलना है।

मैंने पूछा—

—क्यों?

—भाई से मिलने के लिए भी कारण बताना पड़ेगा?

मैंने कुछ क्षण बाद कहा—

—घर आ जाओ।

वह नहीं आया।

शायद मेरे छोटे घर में आना अब भी उसके लिए कठिन था।

फिर अचानक एक सुबह हरपाल का फोन आया।

वह अब लुधियाना वापस आ चुका था।

उसने कहा—

—आज बैंक वाले कारखाने में बैठक कर रहे हैं। पुराने साझेदारी कागजों पर भी बात होगी। उन्होंने तुम्हें बुलाया है।

मैं कारखाने पहुँचा तो लगभग तीन वर्ष बाद मुख्य द्वार के भीतर कदम रखा।

वही चौकी।

वही धातु की गंध।

लेकिन मशीनों की आवाज आधी थी।

कई पंक्तियाँ बंद थीं।

द्वार के पास रुका।

पीतल की पुरानी पट्टी अभी भी लगी थी।

रंग उतर चुका था।

मैंने उँगली से “म.स.” को छुआ।

इस बार धूल नहीं पोंछी।

अंदर सभा कक्ष में लगभग सोलह लोग बैठे थे।

बैंक के प्रतिनिधि।

लेखा जाँच करने वाले लोग।

दो बड़े खरीदार।

जगजीत।

अर्जुन।

और हरपाल।

मैं सबसे पीछे बैठ गया।

जगजीत ने मेरी तरफ नहीं देखा।

अर्जुन ने देखा।

उसके चेहरे पर वही पुरानी कठोरता थी, मगर अब आँखों के नीचे गहरे घेरे थे।

बैठक शुरू हुई।

पहले ऋण की बात हुई।

फिर बकाया मजदूरी।

फिर संपत्ति पर दावे।

अर्जुन अचानक खड़ा हुआ।

उसने मेरी तरफ इशारा किया और कहा—

—सारा संकट इनके झूठे दावे के बाद शुरू हुआ। ये कंपनी में कभी हिस्सेदार नहीं थे। बेंगलुरु में कर्मचारी की तरह काम करते थे। अब कंपनी कमजोर हुई तो हिस्सा माँग रहे हैं।

मैंने उसे देखा।

तीन साल पहले उसी कमरे के पास उसने कहा था—

“भावनाओं से व्यापार नहीं चलता।”

आज भी उसका तरीका वही था।

बस कुर्सी बदल गई थी।

बैंक की ओर से बैठे वरिष्ठ अधिकारी ने पूछा—

—क्या आपके पास इस बात का अभिलेख है कि श्री मंजीत सिंह ने अपनी हिस्सेदारी विधिवत छोड़ी थी?

अर्जुन ने फाइल आगे कर दी।

वही १८ नवंबर २०११ की घोषणा।

अधिकारी ने उसे देखा।

फिर मेरे सामने रखी प्रमाणित प्रति देखी।

उन्होंने पूछा—

—श्री मंजीत, उस तारीख को आप कहाँ थे?

मैंने कहा—

—बेंगलुरु।

—कोई प्रमाण?

हरपाल खड़ा हुआ।

उसने एक मोटा उपस्थिति पंजी सामने रखा।

उस तारीख को मेरी प्रविष्टि थी।

सुबह ८ बजकर १२ मिनट।

शाम ७ बजकर ४० मिनट।

उसी दिन बेंगलुरु के एक आपूर्तिकर्ता के साथ बैठक के हस्ताक्षर भी थे।

अर्जुन ने कहा—

—हस्ताक्षर कहीं भी हो सकते हैं।

हरपाल बैठ गया।

मैंने कुछ नहीं कहा।

जसपाल जी ने भूरे लिफाफे की प्रमाणित प्रति अधिकारी को दी।

पुराने लेखा विशेषज्ञ का पत्र।

“मूल घोषणा संदिग्ध है।”

नीचे जगजीत के हस्ताक्षर।

कमरा एकदम शांत हो गया।

मैंने जगजीत की तरफ देखा।

उसने पहली बार मेरी आँखों में देखा।

उसके चेहरे पर वह भाव नहीं था जो किसी झूठे आरोप में फँसे आदमी के चेहरे पर आता।

उसने आँखें नीचे कर लीं।

वरिष्ठ अधिकारी ने पूछा—

—श्री जगजीत सिंह, आपको यह आपत्ति पत्र मिला था?

जगजीत ने पानी का गिलास उठाया।

उसका हाथ हल्का काँप रहा था।

उसने कहा—

—बहुत पुरानी बात है। याद नहीं।

तभी हरपाल ने दूसरी फाइल खोली।

उसमें पत्र प्राप्त होने की रसीद थी।

उसी तारीख।

उसी हस्ताक्षर।

फिर नीली बही सामने रखी गई।

पहले सात लाख चालीस हजार रुपये की पूँजी।

मेरे चार लाख।

जगजीत के तीन लाख चालीस हजार।

पुरानी बैंक पुस्तिका।

जमीन बेचने की रसीद।

साझेदारी का प्रारूप।

बेंगलुरु शाखा में मेरे अधिकार।

एक-एक कागज मेज पर आता गया।

किसी ने आवाज ऊँची नहीं की।

किसी को करनी भी नहीं पड़ी।

फिर अधिकारी ने वह नया ऋण घोषणापत्र सामने रखा जिसमें अर्जुन ने दावा किया था कि कंपनी पर किसी तीसरे व्यक्ति का विवाद नहीं है।

उन्होंने पूछा—

—जब आपको मंजीत सिंह का नोटिस मिल चुका था, उसके बाद यह घोषणा क्यों दी गई?

अर्जुन के होंठ खुले।

फिर बंद हो गए।

उसने अपने पिता की तरफ देखा।

जगजीत ने उसकी तरफ नहीं देखा।

उसी क्षण मेरा फैसला भीतर कहीं पूरा हो गया।

मैंने तीन साल तक जिस वाक्य को ढोया था, उसकी जगह एक दूसरा वाक्य आ गया।

मैंने कोई हिस्सा गढ़ा नहीं था।

मुझे हिस्से से मिटाया गया था।

अधिकारी ने फाइल बंद कर दी।

बैठक वहीं नहीं समाप्त हुई।

लेकिन जगजीत की कहानी वहीं समाप्त हो गई।

उसके बाद जो हुआ, वह बहुत तेज हुआ।

बैंक समूह ने कंपनी की ऋण सीमा रोक दी।

पुरानी संपत्ति के स्वामित्व की स्वतंत्र जाँच पूरी होने तक जगजीत और अर्जुन को नई संपत्ति गिरवी रखने से रोका गया।

बड़े खरीदारों ने अपने आदेश दूसरी इकाइयों में भेज दिए।

कामगारों ने बकाया भुगतान की लिखित माँग एक साथ रखी।

तीन सप्ताह बाद कंपनी के ऋणदाता पुनर्गठन पर सहमत हुए, लेकिन एक शर्त पर—

जगजीत और अर्जुन दैनिक प्रबंधन से बाहर रहेंगे।

जिस कुर्सी के लिए जगजीत ने भाई खोया था, वह कुर्सी उसके पास नहीं रही।

उसके नाम का बोर्ड कुछ महीने और मुख्य द्वार पर टंगा रहा।

फिर ऋणदाताओं ने नई प्रबंधन व्यवस्था में उसे हटवा दिया।

पहली बार कारखाने के बाहर केवल यह लिखा गया—

“परिधान निर्माण इकाई।”

जगजीत का नाम गायब था।

मेरा भी।

अजीब बात थी।

मुझे उसे देखकर दुख नहीं हुआ।

शायद इसलिए कि मुझे अपना नाम बोर्ड पर वापस नहीं चाहिए था।

जाँच के बाद मेरी मूल हिस्सेदारी को गलत तरीके से समाप्त किया गया माना गया। अंतिम समझौते में मुझे कंपनी की बची परिसंपत्तियों में मेरे अधिकार का भुगतान मिलना था।

राशि छोटी नहीं थी।

कई करोड़ रुपये बनते थे।

जसपाल जी ने पूछा—

—क्या करोगे?

मैंने सबसे पहले उन इकहत्तर कामगारों की सूची माँगी जिनकी मजदूरी कई महीनों से अटकी थी।

अपने समझौते की पहली किश्त से मैंने वह हिस्सा अलग कराया जो कानूनी रूप से मेरे पुराने साझेदार दावे से जुड़ी देनदारियों के अनुपात में बनता था।

मुझे किसी पर उपकार नहीं करना था।

बस मेरा नाम जिस व्यापार से जुड़ा था, उसके मजदूर खाली हाथ घर न जाएँ।

बाकी रकम का एक हिस्सा मैंने सिमरन के नाम कर दिया।

जिस दिन कागज उसके सामने रखे, वह रसोई में आटा गूँध रही थी।

उसने हाथ धोए।

कागज देखा।

फिर पूछा—

—इतना सब मेरे नाम क्यों?

मैंने कहा—

—जब मेरे नाम के कागज गायब थे, तब घर तुम्हारे नाम पर चल रहा था।

उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

बस कागज तह करके अलमारी में रख दिया।

गुरप्रीत ने मेरी रकम लेने से मना कर दिया।

उसने पुणे की नौकरी जारी रखी।

दो वर्ष बाद उसने अपने दो साथियों के साथ छोटी औद्योगिक अभिकल्पना इकाई शुरू की।

पहली बार उसने निवेश माँगा तो मैं हँस पड़ा।

उसने तुरंत कहा—

—उधार है। हिस्सा लिखकर देंगे।

मैंने पूछा—

—मुझ पर भरोसा नहीं?

वह मुस्कुराया।

—आप पर है। कागज भरोसे के खिलाफ नहीं होते, पापा जी। गलत आदमी के हाथ में कागज हथियार बनते हैं। सही आदमी के हाथ में याददाश्त।

मैंने उसी दिन दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।

हर पन्ना पढ़कर।

करीब छह महीने बाद एक शाम जगजीत मेरे घर आया।

इस बार टैक्सी से।

सिमरन ने दरवाजा खोला।

उसने भीतर आने दिया।

मैं बरामदे में बैठा था।

वह मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।

कुछ देर दोनों चुप रहे।

उसकी पगड़ी पहले की तरह ठीक बंधी थी, मगर चेहरा ढीला पड़ गया था।

उसने कहा—

—सब चला गया।

मैंने कुछ नहीं कहा।

उसने आगे देखा और बोला—

—अर्जुन अब दिल्ली में नौकरी ढूँढ रहा है। घर का बड़ा हिस्सा बेच दिया। कारें भी।

मैंने पूछा—

—तुम ठीक हो?

वह मेरी तरफ देखकर हँसने की कोशिश करने लगा।

हँसी नहीं निकली।

उसने कहा—

—तुझे याद है, पहले शटर के पैसे कम पड़ गए थे?

मुझे याद था।

उस रात हम दोनों ने फर्श पर चादर बिछाकर दुकान में ही नींद की थी ताकि नया माल चोरी न हो।

मैंने सिर हिलाया।

जगजीत ने जेब से एक छोटी चीज निकाली।

पीतल की पुरानी पट्टी।

“ज.स. — म.स.”

मैंने उसे देखते ही हाथ रोक लिया।

उसने पट्टी मेज पर रख दी।

उसकी आवाज बहुत धीमी थी—

—नई व्यवस्था वालों ने द्वार बदलवाया। ये कबाड़ में पड़ी थी।

हम दोनों उस पट्टी को देखते रहे।

करीब बीस वर्ष पहले हमने इसे साथ बनवाया था।

उसने तब दुकानदार से कहा था—

“दोनों नाम बराबर साफ दिखने चाहिए।”

जगजीत ने पूछा—

—मंजीत, क्या तू मुझे कभी माफ कर पाएगा?

मैंने उसकी तरफ देखा।

तीन साल पहले शायद मैं इस सवाल का दूसरा उत्तर देता।

अब नहीं।

मैंने कहा—

—मैंने बहुत पहले माफ कर दिया था।

वह मेरे चेहरे को पढ़ता रहा।

मैंने आगे कहा—

—लेकिन जो रिश्ता था, वह वापस नहीं आएगा। उसके लिए कागज नहीं, भरोसा चाहिए था।

उसने सिर झुका लिया।

कुछ देर बाद उठा।

दरवाजे तक पहुँचा तो सिमरन ने रसोई से पूछा—

—चाय पीकर जाइए।

जगजीत रुक गया।

उसने पीछे देखा।

शायद उसे उम्मीद नहीं थी।

वह वापस बैठ गया।

सिमरन ने तीन कप चाय रखी।

किसी ने पुरानी बात नहीं छेड़ी।

बाहर हल्की बारिश शुरू हो गई थी।

जगजीत जाते समय पीतल की पट्टी वहीं छोड़ गया।

मैंने उसे दीवार पर नहीं लगाया।

अगली सुबह गुरप्रीत आया तो उसने पूछा—

—इसे कहाँ रखोगे?

मैंने पट्टी उठाई।

नीली बही वाली अलमारी खोली।

दोनों को एक साथ भीतर रख दिया।

फिर ताला बंद कर दिया।

क्योंकि अब मुझे किसी द्वार पर अपना नाम साबित नहीं करना था।

जिस दिन मेरे भाई ने कहा था कि उस कारखाने में मेरा एक रुपया भी नहीं, मैं खाली जेब घर लौटा था।

सालों बाद मेरे पास पैसा भी आया, अधिकार भी, और वही कागज भी जो मेरा नाम वापस दे सकते थे।

लेकिन आखिर में मेरी सबसे बड़ी कमाई वह नहीं थी।

मेरी सबसे बड़ी कमाई यह थी कि मेरा बेटा किसी के सामने फीस के लिए हाथ फैलाने वाला आदमी नहीं बना।

मेरी पत्नी ने अपनी चूड़ियों की कीमत से बड़ा घर खड़ा किया।

और जिस भाई ने रिश्ते से ज्यादा कुर्सी को संभाला था, उसे अंत में वही कुर्सी छोड़नी पड़ी।

पीतल की पट्टी आज भी मेरी अलमारी में है।

उस पर दो नाम हैं।

मैं उसे देखकर अब यह नहीं सोचता कि किसका हिस्सा कितना था।

बस इतना याद आता है—

एक समय हम दोनों ने सच में साथ शुरू किया था।

फिर एक ने कागज बदल दिए।

दूसरे ने अपना रास्ता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *