एक बेघर आदमी ने मेरी खरीदी अतिरिक्त थाली खाकर कहा—कल दफ्तर मत जाना; रात तीन बजे संदेश आया—‘छठी मंज़िल भी कम है,’ और मैं हँस दी//

भाग २

दो बजकर तीन मिनट पर मेरे मोबाइल पर सरकारी आपदा चेतावनी आई।

“निचले क्षेत्रों से तुरंत ऊँचे स्थानों की ओर जाएँ।”

साक्षी ने संदेश पढ़ा।

इस बार उसने कोई मज़ाक नहीं किया।

हम दोनों खिड़की के पास पहुँचे।

चौबीसवीं मंज़िल से सड़क खिलौने जैसी लगती थी।

लेकिन नीचे जो हो रहा था, वह खिलौना नहीं था।

बारिश इतनी घनी थी कि सामने वाली इमारत धुँधली दिखाई दे रही थी।

सड़क के किनारे खड़ी दो मोटरसाइकिलें कुछ मिनट पहले अपनी जगह थीं।

अब पानी उनके पहियों के ऊपर पहुँच चुका था।

साक्षी ने फुसफुसाकर कहा—

—इतनी जल्दी?

मैंने घड़ी देखी।

२:११।

मोबाइल बजा।

अरविंद।

मैंने कुछ सेकंड स्क्रीन देखी।

फिर कॉल उठा ली।

उसकी आवाज़ सामान्य रखने की कोशिश कर रही थी।

—नैना, कहाँ हो?

—दफ्तर में नहीं।

कुछ क्षण चुप्पी रही।

उसने पूछा—

—घर पर?

—नहीं।

—कहाँ हो?

मैंने कहा—

—ऊँची जगह पर।

दूसरी तरफ उसकी साँस सुनाई दी।

फिर आवाज़ बदल गई।

—लैपटॉप तुम्हारे पास है?

मैंने मेज़ पर पड़े अपने कंपनी वाले लैपटॉप की तरफ देखा।

—हाँ।

—अच्छा। अभी खोलो।

—क्यों?

—सर्वर पर कुछ पुराने अस्थायी फोल्डर हैं। तुम्हें प्रशासनिक पहुँच मिली हुई है। उन्हें हटाना है।

मैंने खिड़की के बाहर देखा।

सायरन अब भी सुनाई दे रहा था।

—अभी?

उसने तेज़ स्वर में कहा—

—हाँ, अभी।

मैंने पूछा—

—कौन से फोल्डर?

कुछ सेकंड उत्तर नहीं आया।

फिर वह बोला—

—धवलगढ़ के पुराने निरीक्षण प्रारूप।

मेरी उँगलियाँ ठंडी पड़ गईं।

मैंने साक्षी की तरफ देखा।

वह मुझे ही देख रही थी।

मैंने फोन कान से थोड़ा दूर किया।

—आपने सुबह कहा था परियोजना बंद हो चुकी है।

अरविंद ने कहा—

—नैना, बहस का समय नहीं है।

—फिर उन्हें अभी हटाने की जरूरत क्यों है?

उसकी आवाज़ नीचे हो गई।

—क्योंकि सर्वर स्थानांतरित हो रहा है। तकनीकी बात है।

मैंने कहा—

—विवेक कर सकता है।

—नहीं।

—क्यों?

उसने अचानक कहा—

—क्योंकि अंतिम पहुँच तुम्हारे खाते में है।

कमरे में कुछ पल सिर्फ़ बारिश सुनाई दी।

मैंने लैपटॉप नहीं खोला।

अरविंद ने फिर कहा—

—तुम्हारी पदोन्नति अगले महीने तय होनी है। समझदारी से काम करो।

मैंने कॉल काट दी।

साक्षी ने पूछा—

—क्या हटाने को कह रहा था?

मैंने उत्तर देने से पहले मेज़ की तरफ देखा।

भूरा लिफाफा वहीं पड़ा था।

पहली बार वह किसी छोड़ी हुई चीज़ जैसा नहीं लग रहा था।

मेरे भीतर एक बात सीधी बैठ गई।

वह आदमी लिफाफा भूलकर नहीं गया था।

मैंने उसे उठाया।

साक्षी मेरे सामने कुर्सी पर बैठ गई।

—खोलो।

मैंने किनारा फाड़े बिना चिपकी पट्टी धीरे-धीरे अलग की।

अंदर आठ कागज़ थे।

एक पुरानी तस्वीर।

और काले रंग की छोटी स्मृति-चिप।

सबसे ऊपर का पन्ना तीन साल पुराना था।

“धवलगढ़ जलाशय—मानसून पूर्व स्वतंत्र संरचनात्मक निरीक्षण।”

नीचे नाम था—

“डॉ. शरद कुलकर्णी
मुख्य संरचना अभियंता।”

मेरी नज़र नाम पर अटक गई।

एस. कुलकर्णी।

वही नाम जो रात मैंने पुराने मंच पर देखा था।

मैंने दूसरा पन्ना उठाया।

तकनीकी शब्द बहुत थे, लेकिन हर पन्ने पर दाहिनी तरफ एक छोटा सार था।

“निकासी नालियों में लगातार अवरोध।”

“नींव दबाव सामान्य सीमा से ऊपर।”

“अत्यधिक वर्षा में जोखिम बढ़ने की संभावना।”

“पूर्ण जाँच तक सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी न किया जाए।”

साक्षी मेरे कंधे के ऊपर से पढ़ रही थी।

उसने पूछा—

—ये असली हैं?

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

तीसरे पन्ने पर तारीख थी।

२९ जुलाई।

तीन साल पहले।

नीचे तीन नाम।

डॉ. शरद कुलकर्णी।

अरविंद मल्होत्रा—सहायक परियोजना प्रमुख।

और कंपनी के तत्कालीन निदेशक।

मैंने पन्ना मेज़ पर रख दिया।

अरविंद उस समय इस परियोजना में था।

उसने मुझसे कहा था कि उसका इससे कोई संबंध नहीं।

अगला पन्ना एक आंतरिक टिप्पणी थी।

ऊपर कंपनी की मुहर।

नीचे लिखा था कि यदि स्वतंत्र रिपोर्ट औपचारिक रूप से दर्ज की गई तो परियोजना की स्वीकृति और अगले चरण का ठेका रुक सकता है।

राशि—

अड़तालीस करोड़ रुपये।

साक्षी ने बस मेरी तरफ देखा।

मैंने अगला पन्ना पलटा।

वह सुरक्षा प्रमाणपत्र की प्रति थी।

स्थिति—

“स्वीकृत।”

और नीचे डिजिटल हस्ताक्षर—

“डॉ. शरद कुलकर्णी।”

उसके पीछे एक छोटी हस्तलिखित टिप्पणी लगी थी।

“मैंने इस प्रमाणपत्र को स्वीकृति नहीं दी।”

नीचे वही हस्ताक्षर हाथ से किए गए थे।

मैं कुर्सी पर पीछे टिक गई।

मेरे कानों में कुछ सेकंड आवाज़ कम सुनाई देने लगी।

आखिरी दो पन्ने ईमेल की छपी प्रतियाँ थीं।

शरद कुलकर्णी ने कंपनी निदेशक, जल संसाधन विभाग और निरीक्षण समिति को लिखा था कि उनके नाम से जारी प्रमाणपत्र अधिकृत नहीं था।

तीन दिन बाद उन्हें परियोजना से हटाने का आदेश मिला।

कारण—

“व्यवहार संबंधी समस्या और संस्थान की प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाने वाली गतिविधियाँ।”

उस एक पंक्ति के बाद कुछ समझाने की जरूरत नहीं थी।

अरविंद को खतरे की जानकारी थी।

मैंने पुरानी तस्वीर उठाई।

धवलगढ़ बाँध के सामने छह लोग खड़े थे।

बीच में साफ़ दाढ़ी, हेलमेट और नीली कमीज़ पहने आदमी को पहचानने में मुझे दो सेकंड लगे।

वही आँखें।

वही सीधी नज़र।

वही व्यक्ति जिसने रात मेरी अतिरिक्त थाली तीन मिनट में खत्म की थी।

उसकी दाहिनी तरफ करीब चालीस साल का अरविंद खड़ा था।

कंधे पर उसका हाथ रखा हुआ था।

साक्षी ने धीरे से कहा—

—हे भगवान।

मैंने उसे देखा।

उसने तस्वीर मेज़ पर रख दी।

—वह आदमी भिखारी नहीं था।

मैंने कहा—

—अब है।

यह वाक्य मुँह से निकलते ही कमरे में भारी होकर गिरा।

मोबाइल फिर बजा।

विवेक।

मैंने तुरंत उठाया।

पीछे कई लोगों की आवाज़ें थीं।

—नैना दी, आप कहाँ हैं?

—सुरक्षित जगह पर। तुम?

उसने तेजी से कहा—

—दफ्तर में।

मैं खड़ी हो गई।

—क्या?

—अरविंद सर ने सबको बुलाया था। करीब सत्रह लोग आए हैं। नीचे पार्किंग में पानी भर गया है। सुरक्षा वाले कह रहे हैं लिफ्ट बंद कर दो।

मैंने पूछा—

—अरविंद कहाँ है?

कुछ सेकंड चुप्पी।

—पता नहीं।

—मतलब?

—वह करीब डेढ़ बजे चले गए थे।

मेरी पकड़ फोन पर कस गई।

उसने सत्रह कर्मचारियों को सुबह छह बजे आने को कहा था।

कुछ लोग बारिश बढ़ने से पहले ही पहुँच गए थे।

और वह खुद निकल गया था।

मैंने पूछा—

—तुम लोग किस मंज़िल पर हो?

—पाँचवीं।

मेरे दिमाग में उस आदमी की आवाज़ आई।

“बारह मंज़िल।”

मैंने कहा—

—सब लोग ऊपर जाओ। छत तक पहुँचने का रास्ता खुला है?

—शायद।

—शायद नहीं। अभी देखो।

विवेक ने किसी से पूछा।

फिर बोला—

—दसवीं मंज़िल तक सीढ़ी है, उसके ऊपर रखरखाव वाला दरवाज़ा बंद रहता है।

मैंने तुरंत हमारे कार्यालय भवन के सुरक्षा प्रभारी का नंबर खोजा।

कॉल नहीं लगी।

फिर भवन प्रबंधन।

तीसरी कोशिश में किसी ने उठाया।

मैंने कंपनी का नाम, मंज़िल और संख्या बताई।

उस आदमी ने कहा कि वह दूर था, लेकिन छत की अतिरिक्त चाबी चौथी मंज़िल के अग्नि उपकरण कक्ष में लगी लाल पेटी में रहती है।

मैंने विवेक को बताया।

वह भागा।

कॉल पर उसकी साँस सुनाई दे रही थी।

एक मिनट।

दो मिनट।

फिर उसने कहा—

—मिल गई।

—सबको ऊपर ले जाओ।

—दफ्तर का सर्वर?

मैं लगभग चिल्ला पड़ी—

—विवेक, सर्वर वहीं रहने दो।

कुछ सेकंड बाद उसने कहा—

—ठीक है।

कॉल कट गई।

साक्षी पानी की बोतल लेकर मेरे पास आई।

—पहले खुद बैठो।

मैंने बोतल नहीं ली।

—मेरे खाते से कोई फोल्डर हटाना चाहता है।

—तो खाता बंद करो।

मैंने उसकी तरफ देखा।

यही तो करना था।

मैंने कंपनी का लैपटॉप खोला।

आंतरिक सुरक्षा पृष्ठ खोला।

पासवर्ड बदला।

सभी सक्रिय सत्र बंद किए।

फिर धवलगढ़ खोजा।

इस बार फोल्डर नहीं मिला।

लेकिन सूचना लेखे में तीन असफल प्रवेश दिखाई दिए।

समय—

१:५८।

२:०४।

२:०९।

उपयोगकर्ता—

“ए. मल्होत्रा।”

मैंने स्क्रीन के चित्र सुरक्षित कर लिए।

तभी अरविंद का संदेश आया।

“तुमने पासवर्ड क्यों बदला?”

मैंने जवाब नहीं दिया।

उसका दूसरा संदेश आया।

“मुझे तुरंत फोन करो।”

तीसरा—

“कंपनी डेटा रोकना गंभीर अनुशासनहीनता है।”

चौथा—

“जो भी दस्तावेज़ तुम्हारे पास हैं, वे कंपनी की संपत्ति हैं।”

मैंने वह पंक्ति दो बार पढ़ी।

उसे पता था मेरे पास दस्तावेज़ हैं।

साक्षी ने भी पढ़ा।

हम दोनों कुछ नहीं बोले।

मैंने सिर्फ़ मोबाइल की स्क्रीन सुरक्षित कर ली।

दो बजकर बावन मिनट पर नीचे की मुख्य सड़क पहचानना मुश्किल हो गया।

जहाँ गाड़ियाँ खड़ी थीं वहाँ गंदला पानी घूम रहा था।

कुछ कारों की आपात बत्तियाँ चमकती दिखाई देतीं और फिर अँधेरे में छिप जातीं।

बारिश काँच पर लगातार पड़ रही थी।

बिजली पूरी तरह चली गई।

भवन की आपात रोशनी जल उठी।

साक्षी ने दोनों पावर बैंक जाँच लिए।

मैंने पानी की पेटियाँ गिनीं।

हमारे पास काफी था।

तीन बजकर सात मिनट पर सरकारी चेतावनी बदली।

“धवलगढ़ जलाशय के एक सुरक्षा भाग में गंभीर संरचनात्मक विफलता। प्रभावित क्षेत्रों के निवासी ऊँची इमारतों में ऊपर जाएँ।”

साक्षी ने मोबाइल नीचे कर दिया।

उसने कहा—

—उसने सही कहा था।

मैं उत्तर नहीं दे सकी।

मेरे दिमाग में वही दृश्य था।

दुकान की सफेद रोशनी।

आठ-दस मिनट की मुलाकात।

एक थाली।

और एक आदमी जिसे पूरे शहर ने शायद तीन साल तक पागल कहा था।

मैंने जिला आपदा नियंत्रण कक्ष का नंबर मिलाया।

पहली चार कोशिशें व्यस्त।

पाँचवीं पर आवाज़ आई।

मैंने कहा कि मेरे पास धवलगढ़ की पुरानी स्वतंत्र निरीक्षण रिपोर्ट और सुरक्षा प्रमाणपत्र से जुड़े दस्तावेज़ हैं।

अधिकारी ने पहले मुझे ईमेल पर भेजने को कहा।

मैंने कागज़ों की साफ़ तस्वीरें लीं।

स्मृति-चिप लैपटॉप में लगाई।

अंदर पाँच फोल्डर थे।

तारीखों के अनुसार।

निरीक्षण के वीडियो।

उपकरणों के आँकड़े।

ईमेल की मूल प्रतियाँ।

और एक ध्वनि रिकॉर्डिंग।

मैंने उसे नहीं खोला।

पहले पूरा संग्रह नियंत्रण कक्ष के सुरक्षित पते पर भेजा।

फिर राज्य बाँध सुरक्षा प्रकोष्ठ को।

फिर अपने निजी भंडारण में।

आखिर में विवेक को सिर्फ़ एक संदेश भेजा—

“जो भी हो, अपने फोन से आज रात के सभी निर्देश सुरक्षित रखना।”

उसने अंगूठे का चिन्ह भेज दिया।

चार बजे के आसपास पानी हमारे क्षेत्र में भी तेजी से बढ़ा।

हम पश्चिमी हिस्से में थे इसलिए स्थिति पूर्वी इलाकों जितनी गंभीर नहीं थी।

फिर भी नीचे की दुकानें आधी डूब चुकी थीं।

चौबीसवीं मंज़िल पर खड़े होकर मैं पहली बार समझ रही थी कि ऊँचाई सिर्फ़ संख्या नहीं होती।

नीचे हर मंज़िल किसी का घर था।

किसी की दवा।

किसी की अलमारी।

किसी की दुकान।

किसी की पूरी बचत।

साक्षी चुपचाप रसोई में गई।

दो बोतलें निकालीं।

फिर वापस रख दीं।

—अभी नहीं। बाद में।

मैंने उसकी तरफ देखा।

कल तक वह मेरे दस डिब्बे नूडल्स पर हँस रही थी।

अब हर बोतल गिन रही थी।

सुबह छह बजकर दस मिनट पर विवेक ने संदेश भेजा।

“सब लोग छत पर हैं।”

उसके बाद—

“पाँचवीं मंज़िल तक पानी आ गया।”

मैंने फोन मेज़ पर रख दिया।

कुछ देर किसी से बात नहीं की।

अरविंद का कॉल फिर आया।

इस बार मैंने उठा लिया।

उसकी आवाज़ पहले जैसी नहीं थी।

—तुमने किसी को कुछ भेजा है?

मैंने पूछा—

—आप कहाँ हैं?

—यह जरूरी नहीं।

—सत्रह लोग दफ्तर की छत पर हैं।

उसने कहा—

—मुझे पता है।

—आप उन्हें बुलाकर खुद चले गए?

वह चुप रहा।

मैंने पूछा—

—धवलगढ़ के सुरक्षा कागज़ किसने बदले थे?

उसने तुरंत कहा—

—तुम्हें तकनीकी मामलों की समझ नहीं है।

मैंने सामने तस्वीर रखी।

तस्वीर में शरद कुलकर्णी के कंधे पर उसका हाथ था।

मैंने कहा—

—डॉ. शरद कुलकर्णी कौन हैं?

दूसरी तरफ बिल्कुल आवाज़ नहीं आई।

यही उसका जवाब था।

फिर वह बहुत धीरे बोला—

—नैना, जो तुम्हें मिला है, उसमें पूरी कहानी नहीं है।

मैंने कुछ नहीं कहा।

वह खुद बोलता गया।

—ऐसी परियोजनाओं में दर्जनों मत होते हैं। हर अभियंता सबसे खराब स्थिति लिखता है। हर चेतावनी पर बाँध बंद नहीं किए जाते।

मैं चुप रही।

—कुलकर्णी अत्यधिक प्रतिक्रिया दे रहे थे।

मैंने पूछा—

—तो उनके नाम से प्रमाणपत्र क्यों जारी हुआ?

फिर चुप्पी।

लंबी।

अरविंद ने कहा—

—फोन पर ऐसी बातें मत करो।

मैंने कॉल काट दी।

साक्षी ने मेरी तरफ देखा।

—वह डर गया है।

मैंने कहा—

—अब डरना चाहिए।

सुबह नौ बजे तक मोबाइल नेटवर्क बार-बार जा रहा था।

इमारत के लोग गलियारे में जमा होने लगे।

किसी के पास दूध कम था।

किसी बुज़ुर्ग की दवा अगले दिन खत्म होने वाली थी।

एक परिवार अठारहवीं मंज़िल से ऊपर आया क्योंकि नीचे का हिस्सा खाली कराया जा रहा था।

हमने अपना अतिरिक्त पानी बाहर रखा।

एक बच्ची अपनी माँ के साथ आई।

शायद सात साल की।

उसने मेज़ पर नूडल्स के पैकेट देखे।

साक्षी ने एक पैकेट उसकी माँ को दिया।

पहली बार मुझे सुपरमार्केट वाली महिला का चेहरा याद आया।

वह मुझे ऐसे देख रही थी जैसे मैं युद्ध पर जा रही हूँ।

उस समय मुझे खुद भी यही लगा था।

अब कोई नहीं हँस रहा था।

दोपहर तक खबर स्पष्ट होने लगी।

धवलगढ़ जलाशय के किनारे का एक मुख्य सुरक्षा भाग अत्यधिक दबाव के बाद विफल हुआ था।

पूर्वी औद्योगिक पट्टी और निचली बस्तियों में पानी तेजी से घुसा था।

कई इमारतों की निचली मंज़िलें खाली कराई जा रही थीं।

बचाव दल नावों से लोगों तक पहुँच रहे थे।

दफ्तर के लोग अभी भी छत पर थे।

करीब तीन बजे विवेक का वीडियो आया।

पानी दसवीं मंज़िल की सीढ़ियों के नीचे तक दिखाई दे रहा था।

विवेक कैमरा घुमाकर बोला—

—अगर आपने रात नहीं कहा होता तो हम पाँचवीं पर बैठे रहते।

मैंने वीडियो बंद कर दिया।

उस वाक्य का जवाब मेरे पास नहीं था।

क्योंकि चेतावनी मेरी नहीं थी।

मैं सिर्फ़ पहली इंसान थी जिसने उस आदमी को पूरी तरह अनसुना नहीं किया था।

शाम पाँच बजे जिला नियंत्रण कक्ष से कॉल आया।

एक अधिकारी ने मेरा नाम पूछा।

फिर सीधे कहा—

—आपने जो दस्तावेज़ भेजे हैं, उनकी मूल प्रतियाँ सुरक्षित रखिए। किसी को मत दीजिए। दल आपसे संपर्क करेगा।

मैंने पूछा—

—क्या वे असली हैं?

उसने इतना ही कहा—

—प्रारंभिक मिलान में कई विवरण सरकारी अभिलेखों से मेल खा रहे हैं।

कॉल कट गई।

मेज़ पर पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

मैंने उसे फिर उठाया।

इस बार मेरी नजर तस्वीर के पीछे गई।

नीली स्याही में लिखा था—

“मानसून निरीक्षण दल, धवलगढ़।”

उसके नीचे तारीख।

और सबसे नीचे एक छोटी पंक्ति—

“अरविंद, आँकड़ों को मत बदलना। समस्या कागज़ पर छोटी करने से बाँध पर छोटी नहीं होगी।”

मेरी उँगली वहीं रुक गई।

वह किसी आधिकारिक रिपोर्ट का हिस्सा नहीं था।

शायद किसी पुराने सहकर्मी का निजी नोट।

शायद शरद का।

शायद मज़ाक में लिखा गया वाक्य।

लेकिन अब उसका अर्थ मज़ाक नहीं था।

उसी समय मुझे उसकी कमीज़ की बाँह का नीला दाग याद आया।

तीन साल पुरानी तस्वीर में भी उसके दाहिने हाथ के पास वही नीली निरीक्षण स्याही लगी थी।

मैंने तस्वीर नीचे रख दी।

कुछ चीज़ें आदमी से सब कुछ छिन जाने के बाद भी उसके साथ रह जाती हैं।

दूसरी रात हम मुश्किल से सोए।

पानी हमारे भवन की सातवीं मंज़िल के आसपास स्थिर हुआ।

पूर्वी हिस्से से आने वाली खबरें ज्यादा खराब थीं, लेकिन राहत दल लगातार काम कर रहे थे।

सुबह करीब आठ बजे दफ्तर के सभी सत्रह कर्मचारी सुरक्षित निकाले गए।

विवेक ने सबसे पहले मुझे फोन किया।

—हम बाहर आ गए।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

सिर्फ़ दो सेकंड।

फिर पूछा—

—सब?

—सब।

उसने फिर कहा—

—अरविंद सर ने समूह से रात वाले सारे संदेश मिटा दिए हैं।

मैंने कहा—

—अपने फोन में देखो।

—मैंने चित्र सुरक्षित कर लिए थे।

—उन्हें मत मिटाना।

विवेक चुप हुआ।

फिर बोला—

—उन्होंने हमसे रात को सर्वर कक्ष के दो पुराने संग्रह हटाने को भी कहा था।

मेरी आँखें खुल गईं।

—किसने?

—अरविंद सर ने।

—कब?

—रात करीब बारह पचास।

—तुमने किया?

—नहीं। उन्होंने कहा था छह बजे तक कर देंगे। इसलिए हमें बुलाया गया था।

अब पूरा क्रम सामने था।

सुबह छह बजे की “अनिवार्य उपस्थिति” कोई साधारण सर्वर काम नहीं था।

बारिश की चेतावनी जारी थी।

धवलगढ़ पर दबाव बढ़ रहा था।

और अरविंद को पुराने अभिलेख मिटाने थे।

उसने लोगों को इसलिए बुलाया था।

फिर स्थिति बिगड़ते ही खुद निकल गया।

मैंने फोन मेज़ पर रख दिया।

साक्षी ने मेरी तरफ देखा।

मैंने कुछ नहीं समझाया।

जरूरत नहीं थी।

तीसरे दिन पानी धीरे-धीरे कम होने लगा।

दोपहर में दो अधिकारी हमारे भवन तक पहुँचे।

एक जल संसाधन विभाग से।

दूसरा आर्थिक अपराध जाँच शाखा से।

उन्होंने भूरे लिफाफे के हर पन्ने की तस्वीर ली।

स्मृति-चिप की प्रति बनाई।

मुझसे पूछा कि यह मुझे कहाँ मिली।

मैंने दुकान का पता बताया।

उन्होंने शरद कुलकर्णी की तस्वीर दिखाई।

वही आदमी।

अधिकारी ने कहा—

—ये पिछले तीन साल से विभाग को लगातार पत्र भेज रहे थे।

मैंने पूछा—

—फिर किसी ने सुना क्यों नहीं?

उसने मेरी तरफ देखा।

लेकिन जवाब नहीं दिया।

दूसरे अधिकारी ने सिर्फ़ फाइल बंद की।

उस शाम सार्वजनिक सूचना आई कि धवलगढ़ परियोजना के पुराने सुरक्षा प्रमाणपत्रों की स्वतंत्र जाँच शुरू कर दी गई है।

क्षितिज कंपनी से सभी संबंधित डिजिटल अभिलेख सुरक्षित रखने को कहा गया।

अगली सुबह कंपनी का एक ईमेल आया।

विषय था—

“आंतरिक गोपनीयता उल्लंघन।”

मुझे अस्थायी रूप से निलंबित किया गया था।

साक्षी ने पढ़ा।

—अब भी?

मैंने लैपटॉप बंद कर दिया।

—अब इससे फर्क नहीं पड़ता।

लेकिन दो घंटे बाद दूसरा ईमेल आया।

इस बार कंपनी से नहीं।

राज्य जाँच दल से।

उन्होंने मुझे औपचारिक रूप से दस्तावेज़ देने वाले व्यक्ति के रूप में दर्ज किया था और कंपनी को मेरे खाते, उपकरण या मूल फाइलों में बदलाव न करने का निर्देश भेज दिया था।

उसके बाद घटनाएँ तेज़ हुईं।

विवेक और छह अन्य कर्मचारियों ने रात वाले संदेश जमा किए।

भवन के सुरक्षा अभिलेख में अरविंद की गाड़ी रात एक बजकर बत्तीस मिनट पर बाहर जाते हुए दर्ज थी।

सर्वर सूचना लेखे में उसके खाते से पुराने धवलगढ़ फोल्डर हटाने के प्रयास थे।

और स्मृति-चिप में सबसे महत्वपूर्ण फाइल वह थी जिसे मैंने पहली रात खोला ही नहीं था।

एक बैठक की ध्वनि रिकॉर्डिंग।

तारीख तीन साल पुरानी।

आवाज़ें साफ़ थीं।

शरद कुलकर्णी बार-बार कह रहे थे कि सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी करने से पहले विस्तृत जाँच आवश्यक है।

एक दूसरी आवाज़ लागत और ठेका रुकने की बात कर रही थी।

फिर अरविंद की आवाज़ आई।

शांत।

व्यावहारिक।

वही स्वर जिसमें उसने मुझे सुबह नौकरी छोड़ने को कहा था।

—अगर हर सबसे खराब संभावना को आधिकारिक जोखिम मानेंगे तो कोई परियोजना पूरी नहीं होगी।

कुछ क्षण बाद शरद की आवाज़ आई—

—आँकड़े संभावना नहीं हैं।

रिकॉर्डिंग वहीं खत्म नहीं हुई थी।

अंतिम हिस्से में प्रमाणपत्र की बात हुई।

शरद ने साफ़ कहा कि वह हस्ताक्षर नहीं करेंगे।

तीन दिन बाद उनके नाम का डिजिटल प्रमाणपत्र जारी हुआ था।

जाँच दल को अब अनुमान लगाने की जरूरत नहीं थी।

मुझे भी नहीं।

चार दिन बाद अरविंद को पद से हटाया गया।

कंपनी के धवलगढ़ से जुड़े दो वरिष्ठ अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाया गया।

अगले सप्ताह राज्य सरकार ने क्षितिज की बाँध-सुरक्षा से जुड़ी नई निविदाओं पर रोक लगा दी।

अड़तालीस करोड़ रुपये वाला विस्तार अनुबंध रद्द हुआ।

कंपनी के बाहर वही पत्रकार खड़े थे जिनके सामने अरविंद कभी नई परियोजनाओं की घोषणा करता था।

मैंने वीडियो सिर्फ़ एक बार देखा।

वह इमारत से बाहर निकला।

सफेद कमीज़।

नीचे झुकी नजर।

दर्जनों सवाल।

उसने किसी का जवाब नहीं दिया।

उस दिन मुझे उसकी कोई बात याद नहीं आई।

सिर्फ़ अपनी मेज़ पर उसकी उँगली याद आई।

“नौकरी भी छोड़ देना।”

अगले सोमवार मैंने सच में नौकरी छोड़ दी।

निलंबन वापस लिया जा चुका था।

मानव संसाधन विभाग ने मुझे बनाए रखने की कोशिश की।

वेतन बढ़ाने की बात हुई।

दूसरे विभाग में भेजने की बात हुई।

मैंने इस्तीफा मेज़ पर रख दिया।

क्योंकि जिस जगह किसी चेतावनी की कीमत उसके सही या गलत होने से नहीं, बल्कि उससे ठेके को होने वाले नुकसान से तय हो, वहाँ मुझे अपनी कुर्सी ऊँची नहीं लगी।

दो हफ्ते बाद पानी लगभग उतर चुका था।

मैं उसी दुकान पर गई।

दरवाज़े के बाहर नया काँच लगा था।

अंदर की आधी अलमारियाँ बदली जा रही थीं।

दुकानदार ने मुझे पहचान लिया।

मैंने मोबाइल में शरद कुलकर्णी की तस्वीर दिखाई।

—ये आए थे दोबारा?

उसने सिर हिलाया।

—बाढ़ से एक रात पहले के बाद नहीं।

मैंने पूछा—

—आप इन्हें जानते थे?

उसने कुछ देर सोचा।

—नाम नहीं। दो-तीन महीने से कभी-कभी बाहर बैठते थे। पैसे नहीं माँगते थे। कोई चाय दे दे तो पी लेते थे। अक्सर कागज़ पढ़ते रहते थे।

मैंने पूछा—

—कहाँ रहते थे?

—पता नहीं।

मैं बाहर आ गई।

उसी जगह खड़ी हुई जहाँ मैंने उन्हें खाना दिया था।

फुटपाथ पर अब सूखी मिट्टी की मोटी परत थी।

दुकान की सफेद रोशनी फिर सड़क पर पड़ रही थी।

मैंने जिला जाँच अधिकारी को फोन किया।

—डॉ. शरद कुलकर्णी कहाँ हैं?

उसने कहा—

—हम भी ढूँढ़ रहे हैं।

मैं चौंकी।

—आपके पास उनका पता नहीं?

—पुराना पता बंद है। फोन कई महीने से निष्क्रिय है।

मैंने पूछा—

—फिर उन्हें बाँध की स्थिति का इतना सही समय कैसे पता था?

अधिकारी कुछ सेकंड चुप रहा।

—वह कई साल उस संरचना पर काम कर चुके थे। शायद वर्षा और पुराने आँकड़ों से अंदाज़ लगाया हो।

“शायद।”

मैंने कॉल काट दिया।

तभी मुझे तीन बजकर छह मिनट वाला संदेश याद आया।

मैंने अधिकारी को दोबारा फोन किया।

—एक और बात।

—जी?

—उस रात मुझे एक अनजान नंबर से संदेश आया था।

—क्या लिखा था?

मैंने बताया।

उसने नंबर माँगा।

मैंने भेज दिया।

करीब आधे घंटे बाद उसका फोन आया।

—यह नंबर किसी सक्रिय मोबाइल खाते में दर्ज नहीं है।

मैंने कहा—

—मुझे पता है। संदेश भेजने के बाद बंद हो गया था।

उसने पूछा—

—आपने यह नंबर डॉ. कुलकर्णी को कभी दिया था?

—नहीं।

—उन्होंने आपका नाम पूछा था?

मैं ठिठक गई।

नहीं।

उन्होंने मेरा नाम भी नहीं पूछा था।

उन्होंने केवल मेरा पहचान-पत्र देखा था।

और चाबी।

बी-६०४।

मेरे फ्लैट की मंज़िल उन्हें पता हो सकती थी।

मेरा नंबर नहीं।

मैंने दुकान के बाहर खड़े-खड़े अपना पुराना संदेश खोला।

“छठी मंज़िल अभी भी कम है।”

उसके नीचे मेरा न भेजा जा सका जवाब था।

“आप कौन हैं?”

मैं काफी देर स्क्रीन देखती रही।

फिर मोबाइल बंद कर दिया।

उस सवाल का उत्तर मुझे कभी नहीं मिला।

लेकिन बाकी सवालों के उत्तर धीरे-धीरे सामने आते गए।

जाँच में पाया गया कि तीन साल पहले शरद कुलकर्णी की मूल रिपोर्ट औपचारिक अभिलेख से हटाकर संशोधित सार रखा गया था।

उनके विरोध के बाद उन पर अनुशासनहीनता की शिकायतें दर्ज हुईं।

पेशेवर संस्था में उनकी सदस्यता अस्थायी रूप से रोकी गई।

परामर्श के काम बंद हुए।

जिन लोगों ने पहले उनके साथ काम किया था, उनमें से अधिकतर चुप रहे।

कुछ ने बाद में कहा कि उन्हें डर था उनकी नौकरी चली जाएगी।

अरविंद ने उसी परियोजना के बाद दो पदोन्नतियाँ पाईं।

जिस चेतावनी ने शरद का जीवन नीचे धकेला, उसी चेतावनी को दबाना अरविंद के लिए सीढ़ी बन गया था।

तीन साल बाद वही सीढ़ी उसके नीचे से हट गई।

उस पर कोई भाषण नहीं हुआ।

कोई विजयी सामना नहीं।

बस उसका नाम कंपनी की वेबसाइट से गायब हुआ।

उसका केबिन बंद हुआ।

उसकी बड़ी परियोजनाएँ दूसरे लोगों को दे दी गईं।

और जिन कर्मचारियों के सामने उसने मुझ पर हँसा था, उन्हीं में से सत्रह लोगों ने लिखित बयान दिया कि उसने जोखिम की रात उन्हें दफ्तर बुलाया था।

विवेक ने अपने बयान की प्रति मुझे भेजी।

आखिरी पंक्ति पढ़कर मैं काफी देर चुप रही।

उसने लिखा था—

“अगर नैना ने हमें ऊपर जाने के लिए नहीं कहा होता, तो हम निर्देश का इंतज़ार करते रहते।”

मैंने उसे फोन किया।

वह बोला—

—दी, मैंने सच लिखा है।

मैंने कहा—

—चेतावनी मेरी नहीं थी।

विवेक कुछ क्षण चुप रहा।

फिर बोला—

—लेकिन आपने सुनी थी।

बस इतना।

करीब छह सप्ताह बाद मुझे भोपाल की एक जोखिम-विश्लेषण संस्था से प्रस्ताव मिला।

काम साधारण था।

वेतन मेरी पुरानी नौकरी से थोड़ा कम।

लेकिन पहले साक्षात्कार में उन्होंने मुझसे पूछा—

“अगर आपके आँकड़े प्रबंधन की उम्मीद के खिलाफ जाएँ तो आप क्या करेंगी?”

मैं कुछ सेकंड चुप रही।

फिर जवाब दिया—

—आँकड़े बदलने से घटना अपना रास्ता नहीं बदलती।

कमरे में किसी ने कुछ नहीं कहा।

मुझे अगले दिन नियुक्ति पत्र मिल गया।

शरद कुलकर्णी का पता फिर भी नहीं चला।

राज्य विभाग ने बाद में उनकी पुरानी शिकायतों को दोबारा खोला।

उनके खिलाफ दर्ज पेशेवर टिप्पणी हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

उनकी रिपोर्ट को आधिकारिक जाँच का हिस्सा बनाया गया।

लेकिन वह स्वयं किसी बैठक में नहीं आए।

किसी पत्रकार के सामने नहीं आए।

किसी ने उनका साक्षात्कार नहीं लिया।

कई बार मुझे लगता था शायद मैंने उन्हें उस रात सच में देखा ही नहीं था।

फिर बैग से वह पुरानी तस्वीर निकल आती।

या मेरे पास रखा भूरा लिफाफा।

और मुझे पता चल जाता कि वह थे।

तीन महीने बाद मैं फिर उसी दुकान पर गई।

बारिश का मौसम खत्म होने लगा था।

मैंने एक खाना अपने लिए लिया।

भुगतान करने से पहले हाथ अपने आप दूसरी थाली की तरफ चला गया।

मैं कुछ सेकंड उसे देखती रही।

फिर उठा ली।

बाहर कोई नहीं बैठा था।

मैंने वह खाना पास की रात की चौकी में काम कर रहे बुज़ुर्ग सुरक्षा कर्मचारी को दे दिया।

उन्होंने चौंककर पूछा—

—मेरे लिए?

मैंने सिर हिला दिया।

उन्होंने धन्यवाद कहा।

मैं चली आई।

कोई भविष्यवाणी नहीं हुई।

कोई संदेश नहीं आया।

कुछ असाधारण नहीं हुआ।

और शायद यही ठीक था।

उस रात घर पहुँचकर मैंने अपनी नई इमारत की लिफ्ट में छठी मंज़िल का अंक जलते देखा।

दरवाज़ा खुला।

मैं बाहर नहीं निकली।

मेरी मंज़िल अठारहवीं थी।

लिफ्ट ऊपर बढ़ती रही।

मैंने फोन निकाला।

तीन बजकर छह मिनट वाला संदेश अब भी सुरक्षित था।

मैंने उसे मिटाया नहीं।

क्योंकि उस कहानी में सबसे डरावनी चीज़ पानी नहीं था।

वह यह था कि खतरे की बात तीन साल पहले कही जा चुकी थी।

लोगों ने सुनी भी थी।

और फिर तय किया था कि उसे सुनना उनके लिए महँगा पड़ेगा।

धवलगढ़ की जाँच रिपोर्ट बाद में सार्वजनिक हुई।

अरविंद का नाम उसमें था।

शरद कुलकर्णी का भी।

मेरा नाम केवल एक छोटे से हिस्से में था—

“मूल दस्तावेज़ उपलब्ध कराने वाली कर्मचारी।”

मेरे लिए उतना काफी था।

क्योंकि मुझे अब भी उस आदमी का पहला वाक्य याद था।

“कल दफ्तर मत जाना।”

उसने मुझसे पैसे नहीं माँगे थे।

विश्वास भी नहीं माँगा था।

उसने बस चेतावनी दी थी।

बाकी फैसला मेरा था।

और अगर उस रात मैंने आठ-दस रुपये बचाने के लिए वह अतिरिक्त खाना नहीं उठाया होता, तो शायद वह मुझसे कभी बोलता ही नहीं।

कभी-कभी पूरी जिंदगी बदलने वाली चीज़ कोई बड़ी योजना नहीं होती।

बस भुगतान काउंटर पर रखी एक अतिरिक्त थाली होती है।

और किसी ऐसे आदमी के सामने दो मिनट रुक जाना, जिसके सामने बाकी शहर रुकना छोड़ चुका हो।

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