उसने मेरी माँ को “नौकरानी” कहा—लेकिन वह घर कभी उसका नहीं था।//

उसने मेरी 66 साल की माँ को थप्पड़ मारा, उसे “नौकरानी” कहा और सबके सामने दावा किया कि यह घर उसका है… उसे क्या पता था कि असली मालिक मैं हूँ!

जब मैं छह साल विदेश में काम करने के बाद भारत लौटी, तो मैंने सोचा था कि फूलों का गुलदस्ता लेकर अपनी माँ को अचानक चौंका दूँगी और उन्हें गले लगाकर उन छह सालों की दूरी पूरी कर दूँगी।

लेकिन घर पहुँचते ही जो दृश्य मैंने देखा, उसने मेरे पैरों तले जमीन खिसका दी।

मेरी 66 साल की माँ, सविता शर्मा, सूजी हुई उँगलियों के साथ आँगन की फर्श पर घुटनों के बल बैठी उसे रगड़-रगड़कर साफ कर रही थीं।

और घर के अंदर से मेरी भाभी कविता मल्होत्रा उन पर चिल्ला रही थी—

“जल्दी करो! मेहमान एक घंटे में आने वाले हैं!”

एक पल के लिए मुझे लगा कि शायद मैं गलत घर के सामने खड़ी हूँ।

तभी माँ ने सिर उठाया।

उन्होंने मुझे देखा और वहीं जम गईं।

उनकी आँखों में खुशी नहीं थी।

घबराहट थी।

“तुम्हें पहले फोन करना चाहिए था,” उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। “प्लीज़… कोई तमाशा मत करना।”

उसी क्षण मुझे समझ आ गया कि कुछ बहुत गलत था।

मैंने छह साल विदेश के अस्पतालों में नाइट शिफ्ट करते हुए गुजारे थे। मैं एक आईसीयू नर्स थी। मैंने अपने जन्मदिन, त्योहार और अपनी जिंदगी के लगभग हर महत्वपूर्ण पल को छोड़ दिया था, सिर्फ इसलिए कि अपने पिता के गुजरने के बाद मैं अपनी माँ के लिए एक खूबसूरत घर खरीद सकूँ।

मैं चाहती थी कि उन्हें जिंदगी के बाकी साल सम्मान और सुकून से मिलें।

लेकिन मेरी माँ उस घर में आज़ाद इंसान की तरह नहीं, बल्कि कैदी की तरह रह रही थीं।

मेरे बड़े भाई रोहित शर्मा और उसकी पत्नी कविता आर्थिक परेशानी के कारण “कुछ समय के लिए” घर में रहने आए थे।

वह “कुछ समय” कब दो साल में बदल गया, किसी को पता ही नहीं चला।

कविता ने मुझे देखा और होंठों पर ठंडी मुस्कान लाई।

“ओह… आखिरकार वापस आ ही गईं।”

उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और फिर हाथ में पकड़ी किराने की थैली मेरी तरफ बढ़ा दी।

“अगर बस खड़ी ही रहना है, तो कम से कम अपनी माँ की मदद कर दो।”

उसने एक बार भी यह नहीं पूछा कि मैं कैसी हूँ।

एक बार भी यह नहीं कहा कि घर खरीदने के लिए मैंने कितनी मेहनत की।

मैंने घर के अंदर कदम रखा तो एक और अजीब बात महसूस हुई।

दीवारों से मेरी माँ की सारी तस्वीरें गायब थीं।

उनकी जगह कविता की पसंद की सजावट लगी थी।

और सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात—

मेरी माँ का कमरा भी गायब था।

वह कमरा अब कविता की माँ शोभा मल्होत्रा के पास था।

मेरी अपनी माँ अब कपड़े धोने वाली जगह के पास रखे एक छोटे-से फोल्डिंग बेड पर सोती थीं।

जब मैंने पूछा क्यों, तो माँ ने हमेशा की तरह मुस्कुराकर कहा—

“बस कुछ दिनों की बात है।”

लेकिन उनकी काँपती आवाज बता रही थी कि यह “कुछ दिनों” की बात नहीं थी।

उस दोपहर कविता अपनी डिनर पार्टी की तैयारियों में लगी हुई थी।

तभी मेरी आँखों के सामने वह हुआ जिसने मेरे अंदर का सारा खून जमा दिया।

माँ के हाथ से सर्विंग ट्रे अचानक छूट गई।

एक प्लेट नीचे गिरकर टूट गई।

कविता बिना एक पल गंवाए माँ की तरफ बढ़ी और—

चटाक!

उसने माँ के गाल पर जोरदार थप्पड़ मार दिया।

पूरा कमरा शांत हो गया।

“निकम्मी बूढ़ी औरत!” कविता चीखी।

“तुम्हें पता भी है वह प्लेट कितनी महँगी थी?”

माँ ने तुरंत अपना जलता हुआ गाल पकड़ लिया।

“मुझे माफ कर दो… मैं साफ कर देती हूँ।”

वह डरी हुई थीं।

सिर्फ शर्मिंदा नहीं।

डरी हुई।

जैसे यह पहली बार नहीं हुआ था।

मेरे भाई रोहित से कुछ कदम दूर खड़ा था।

उसने माँ का बचाव नहीं किया।

उसने कविता को नहीं रोका।

उसने तो हैरानी भी नहीं जताई।

बस एक लंबी साँस ली और वहाँ से चला गया।

मैं माँ के साथ फर्श पर बैठकर टूटे हुए टुकड़े उठाने लगी।

तभी मेरी नजर उनकी स्वेटर की आस्तीन के नीचे पड़ी।

नीले निशान।

पुराने भी।

नए भी।

कुछ पीले पड़ चुके थे।

कुछ गहरे बैंगनी थे।

मेरे हाथ काँपने लगे।

“माँ…”

उन्होंने तुरंत आस्तीन नीचे कर ली।

“मैं गिर गई थी।”

मैंने उनकी आँखों में देखा।

वह झूठ पूरा भी नहीं बोल पाईं।

उस रात जब ड्रॉइंग रूम में सब लोग हँस रहे थे, मैं चुपचाप घर के अलग-अलग हिस्सों को देखने लगी।

और जो कुछ मुझे मिला, उसने मेरे दिल को और ज्यादा तोड़ दिया।

एक कागज पर घर के कामों की पूरी सूची बनी थी।

उसमें सिर्फ एक नाम था—

सविता।

खाना बनाना।

सफाई।

कपड़े धोना।

बाथरूम साफ करना।

आँगन धोना।

बगीचे का काम।

हर दिन।

फिर मैंने रसोई की दराज खोली।

अंदर बैंक के स्टेटमेंट पड़े थे।

हर महीने मेरी माँ के खाते से सैकड़ों रुपये निकल रहे थे।

मैंने आगे देखा।

उनके धार्मिक ग्रंथ के अंदर एक फॉर्म छिपा था।

सरकारी वरिष्ठ नागरिक आवास योजना का आवेदन।

उसके बगल में माँ ने अपने काँपते हाथों से लिखा था—

“शायद मेरे चले जाने से ये लोग नाराज़ नहीं होंगे।”

मैंने आँखें बंद कर लीं।

जिस घर को मैंने माँ के सम्मान के लिए खरीदा था, वही घर उन्हें अपमान, डर और बेबसी दे रहा था।

उन्हें यह विश्वास दिलाया गया था कि अब उस घर में उनकी कोई जगह नहीं है।

लेकिन उन्हें क्या पता था—

उस घर की असली मालकिन मैं थी।

और आज रात के बाद उनकी बनाई हुई पूरी झूठी दुनिया सबके सामने बिखरने वाली थी।

माँ का नाम सविता था।

कविता उसे प्यार से नहीं बुलाती थी।

वह उनका नाम ऐसे बोलती थी जैसे किसी नौकर को आदेश दे रही हो।

मैंने वरिष्ठ नागरिक आवास का आवेदन उसी तरह मोड़कर वापस रखा और उसे माँ के फोल्डिंग बेड के नीचे रखी दराज में रख दिया।

कुछ पल तक मैं उस संकरे बिस्तर के पास खड़ी रही।

पतला-सा कंबल।

तकिए के पास पानी का प्लास्टिक गिलास।

दवाइयों की एक बोतल।

और मेरे पिता महेश शर्मा की तस्वीर।

बस इतना ही बचा था माँ के पास।

उनकी बाकी जिंदगी तीन गत्ते के डिब्बों में बंद थी, जो वॉशिंग मशीन के पास रखे थे।

तभी बाहर से कविता की आवाज आई—

“सविता!”

इस बार उसकी आवाज में चिढ़ साफ थी।

मैं तुरंत रसोई में चली गई।

“कॉफी मैं ले जाती हूँ,” मैंने कहा।

माँ सिंक के सामने खड़ी थीं।

उनके कंधे झुके हुए थे।

एक हाथ काउंटर पर टिका था, जैसे उन्हें सहारे की जरूरत हो।

उन्होंने जल्दी से मेरी तरफ देखा।

“नहीं बेटी, मैं कर लूँगी।”

मैंने उनका हाथ थाम लिया।

“मुझे पता है कि आप कर सकती हैं।”

फिर मैंने धीरे से कहा—

“लेकिन अब आप बैठेंगी।”

माँ की नजर डाइनिंग रूम की तरफ चली गई।

“नहीं… मुझे नहीं बैठना चाहिए।”

“क्यों?”

“मेहमान…”

“मेहमान आपकी जिम्मेदारी नहीं हैं।”

उनके होंठ खुले, लेकिन कोई शब्द नहीं निकला।

मैंने कॉफी चाँदी के पॉट में डाली और ट्रे तैयार की।

“आप ड्रॉइंग रूम में बैठिए।”

माँ ने मेरी कलाई पकड़ ली।

“तुम नहीं समझती।”

“तो मुझे समझाओ।”

“आज रात नहीं।”

“क्यों?”

उनकी पकड़ और कस गई।

“क्योंकि रोहित पहले ही बहुत दबाव में है।”

मैं उन्हें देखती रह गई।

उनकी बाँहों पर चोट के निशान थे।

उनका कमरा उनसे छीन लिया गया था।

उनके खाते से पैसे निकाले जा रहे थे।

फिर भी उनकी पहली चिंता अपने बेटे को बचाने की थी।

“किस बात का दबाव?” मैंने पूछा।

माँ ने दरवाजे की तरफ देखा।

इससे पहले कि वह कुछ कहतीं, कविता अंदर आ गई।

उसने क्रीम रंग की साड़ी पहनी थी, जिसके किनारे पर सुनहरे काम की महीन कढ़ाई थी।

उसके कानों में मोती की बालियाँ थीं।

मैंने उन्हें तुरंत पहचान लिया।

वे मेरे पिता ने मेरी माँ को उनकी शादी की तीसवीं सालगिरह पर दी थीं।

मेरी नजर बालियों पर टिक गई।

कविता ने मेरी नजर पकड़ ली।

“ओह,” उसने कान छूते हुए कहा, “माँजी ने ये मुझे दे दी थीं।”

माँ ने तुरंत आँखें झुका लीं।

मैंने सिर्फ इतना कहा—

“अच्छा।”

कविता की नजर कॉफी की ट्रे पर गई।

“आखिरकार। सब लोग इंतजार कर रहे हैं।”

उसने ट्रे लेने की कोशिश की।

मैंने नहीं छोड़ी।

“क्या माँ ने तुम्हें ये बालियाँ दी थीं,” मैंने पूछा, “या तुमने उनके गहनों के डिब्बे से खुद निकाल लीं?”

कविता की मुस्कान बनी रही।

लेकिन उसकी आँखों के पीछे कुछ ठंडा चमका।

“कितना अजीब सवाल है।”

“सवाल आसान है।”

मेरी माँ तुरंत हमारे बीच आ गईं।

“मैंने दी थीं।”

जवाब बहुत जल्दी आया।

कविता मुस्कुराई।

“देखा? बात खत्म।”

उसने ट्रे ली और डाइनिंग रूम की तरफ चली गई।

दरवाजे पर रुककर उसने पीछे देखे बिना कहा—

“और हाँ, जब लोग साथ रहते हैं तो सबको कुछ न कुछ समझौते करने पड़ते हैं। तुम्हारी माँ यह बात समझती हैं, भले ही तुम नहीं समझतीं।”

वह चली गई।

माँ ने तुरंत फुसफुसाकर कहा—

“उसे मत उकसाना।”

“माँ, उसने आपको मारा है।”

“गलती से हुआ।”

“उसने हाथ उठाकर आपके चेहरे पर मारा।”

“वह गुस्से में थी।”

“गुस्सा होना इसे गलती नहीं बना देता।”

माँ चुप हो गईं।

मैं उनके हाथ अपने हाथों में लेकर बोली—

“मेरी तरफ देखिए।”

उन्होंने धीरे से मेरी ओर देखा।

“आप यह घर छोड़कर कहीं नहीं जाएँगी।”

उनके चेहरे पर डर दौड़ गया।

“तुम्हें किसने बताया कि मैं घर छोड़ रही हूँ?”

“मुझे आपका आवेदन मिल गया।”

उनके चेहरे का रंग उड़ गया।

“तुमने मेरी चीजें देखीं?”

“मैं सच ढूँढ़ रही थी।”

“तुम्हें कोई अधिकार नहीं था।”

उनकी आवाज धीमी थी।

लेकिन उसमें कुछ ऐसा था जो मैंने पूरे दिन नहीं सुना था।

गुस्सा।

और उस पल मुझे थोड़ी राहत मिली।

क्योंकि गुस्सा इस बात का संकेत था कि उनके अंदर अभी भी वह हिस्सा जिंदा था जो जानता था कि उनके साथ गलत हो रहा है।

“माफ कीजिए,” मैंने कहा। “मुझे वह किताब नहीं खोलनी चाहिए थी।”

उन्होंने अपने हाथ छुड़ा लिए।

“तुम नहीं जानती कि तुम किस चीज में कदम रख चुकी हो।”

“तो मुझे बताइए।”

“मैं नहीं बता सकती।”

“क्यों?”

उनकी नजर डाइनिंग रूम की तरफ चली गई, जहाँ रोहित मेहमानों के बीच बैठा कहानी सुना रहा था।

“क्योंकि यह सिर्फ मेरे बारे में नहीं है।”

तभी रसोई का दरवाजा खुला।

एक महिला अंदर आई।

उसके हाथ में दो खाली गिलास थे।

उसकी उम्र लगभग साठ-पैंसठ साल रही होगी।

बाल करीने से संवारे हुए थे और चेहरा ऐसा था जैसे उसे हमेशा सम्मान की आदत रही हो।

वह कविता की माँ थी।

शोभा मल्होत्रा।

उसने गिलास सिंक के पास रखे और मुझे गौर से देखा।

“तो तुम ही हो वह मशहूर बहू?”

मैंने कहा—

“मुझे नहीं पता था कि मैं इतनी मशहूर हूँ।”

“कविता ने तुम्हारे बारे में बताया है।”

“मुझे यकीन है।”

शोभा ने माँ की तरफ देखा।

“सविता, नीचे वाले बाथरूम में किसी मेहमान ने पानी गिरा दिया है। जाकर साफ कर दो।”

माँ ने आदतन कपड़ा उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।

मैंने उससे पहले कपड़ा उठा लिया।

“आज रात माँ कुछ साफ नहीं करेंगी।”

शोभा ने भौंह उठाई।

“क्या कहा तुमने?”

“आपने सुना।”

माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

“प्लीज़…”

शोभा की आवाज ठंडी हो गई।

“इस घर का अपना एक नियम है। शायद तुम्हें इसमें दखल नहीं देना चाहिए, क्योंकि तुम अभी-अभी आई हो।”

मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“यह घर मेरी माँ का है।”

शोभा ने हल्की, लगभग दयालु मुस्कान दी।

“मेरी जानकारी कुछ और कहती है।”

“आपकी जानकारी क्या कहती है?”

माँ ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया।

शोभा ने पहले माँ को देखा, फिर मुझे।

“यह परिवार का मामला है।”

“मैं भी परिवार हूँ।”

“तो अपने भाई से बात करो।”

वह मुड़ी और रसोई से बाहर चली गई।

मैं दरवाजे को बंद होते देखती रही।

फिर माँ से पूछा—

“उसका क्या मतलब था?”

“कुछ नहीं।”

“उसे लगता है यह घर तुम्हारा नहीं है।”

“लोग कई बार गलत समझ लेते हैं।”

“क्या रोहित ने उन्हें बताया कि घर उसका है?”

माँ चुप रहीं।

उनकी चुप्पी ही जवाब थी।

मैंने लंबी साँस ली।

जब मैंने यह घर खरीदा था, तब रजिस्ट्री मेरे नाम पर हुई थी।

मैंने पूरा भुगतान अपनी कमाई से किया था।

पिता के गुजरने के बाद माँ मानसिक रूप से इतनी टूट गई थीं कि मैंने तय किया था कि घर मेरे नाम पर रहेगा, लेकिन माँ जब तक चाहेंगी उसमें रहेंगी।

घर के सारे खर्च भी मैं ही उठाऊँगी।

रोहित यह बात अच्छी तरह जानता था।

वह मूल रजिस्ट्री के एक दस्तावेज पर गवाह तक बना था।

इसलिए उसके पास ईमानदारी से यह कहने का कोई रास्ता नहीं था कि घर उसका है।

“माँ,” मैंने पूछा, “रोहित लोगों से क्या कहता रहा है?”

माँ थकी हुई थीं।

“अभी नहीं।”

“फिर कब?”

“डिनर के बाद।”

“वादा?”

उनकी आँखों में आँसू भर आए।

“वादा।”

यह पूरे दिन में उनका पहला स्पष्ट जवाब था।

मैंने उस वादे को थाम लिया।

जब हम डाइनिंग रूम में पहुँचे, लगभग हर कुर्सी भरी हुई थी।

टेबल पर सफेद गुलाब रखे थे।

मोमबत्तियाँ जल रही थीं।

चमकते गिलास करीने से रखे थे।

कविता ने कमरे को किसी महँगे मैगज़ीन के फोटोशूट जैसा बना दिया था।

लेकिन उसमें मेरी माँ की कोई चीज नहीं थी।

न उनकी कढ़ाई वाली मेजपोश।

न वह नीला चीनी मिट्टी का कटोरा जो पिता ने अपनी शादी के बाद पहली यात्रा में खरीदा था।

न चालीस सालों में इकट्ठे किए गए अलग-अलग चम्मच।

बस कविता की दुनिया थी।

रोहित टेबल के सिरहाने बैठा था।

वही कुर्सी, जिस पर कभी मेरे पिता बैठते थे।

उसने हमें देखा।

“अरे, आ गईं? हमें लगा तुम चली गईं।”

मेरी माँ के लिए एक सीट रसोई के पास रखी गई थी।

कविता ने इशारा किया।

“सविता, तुम्हारी जगह वहाँ है।”

माँ उस तरफ जाने लगीं।

मैंने रोहित के बगल वाली कुर्सी खींच दी।

“माँ यहाँ बैठेंगी।”

कविता ने मुझे घूरा।

“यह जगह मेरी माँ की है।”

“तो तुम्हारी माँ रसोई के पास बैठ सकती हैं।”

पूरा कमरा असहज हो गया।

शोभा ने शांत मुस्कान के साथ कहा—

“मैं जहाँ बैठी हूँ, वहीं ठीक हूँ।”

माँ ने धीरे से कहा—

“कोई बात नहीं।”

मैंने उनकी तरफ देखकर कहा—

“नहीं। बात है।”

रोहित ने माथे पर हाथ फेरा।

“क्या हम आज रात यह सब नहीं कर सकते?”

“क्या?”

“हर चीज को झगड़े में बदलना।”

“मैं घर आए अभी एक दिन भी पूरा नहीं हुआ।”

“और फिर भी पूरा घर तनाव में है।”

कविता हल्के से हँसी।

“मेरी ननद हमेशा से बहुत सुरक्षात्मक रही हैं। छह साल विदेश में रहने से शायद इंसान भूल जाता है कि परिवार कैसे चलता है।”

टेबल के सामने बैठे एक आदमी ने गला साफ किया और प्लेट की तरफ देखने लगा।

मैंने उसे पहचान लिया।

उसका नाम राकेश वर्मा था।

वह उस निर्माण कंपनी में रोहित का क्षेत्रीय निदेशक था जहाँ मेरा भाई काम करता था।

उसकी पत्नी सुनीता उसके बगल में बैठी थी।

दो अन्य दंपति भी कंपनी के सहयोगी और पड़ोसी थे।

तभी मुझे समझ आया—

यह सिर्फ पारिवारिक डिनर नहीं था।

रोहित अपने बॉस को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा था।

कविता ने अपना गिलास उठाया।

“अब जब सब बैठ गए हैं, मैं एक टोस्ट करना चाहती हूँ।”

माँ अभी भी कुर्सी के पास खड़ी थीं।

कविता ने कहा—

“नई शुरुआत के नाम।”

सबने गिलास उठा लिए।

“रोहित की प्रमोशन के नाम,” कविता बोली, “और इस खूबसूरत घर में हम सबके नए भविष्य के नाम।”

राकेश मुस्कुराया।

“अभी प्रमोशन तय नहीं हुई है।”

कविता ने हाथ हिलाया।

“हम अपने लोगों के बीच हैं।”

फिर उसने पूरे कमरे को देखते हुए कहा—

“जब रोहित और मैंने पहली बार यह घर संभाला था, तब इसे बहुत काम की जरूरत थी। नई फर्श, पेंट, बगीचा… सब कुछ। लेकिन हमने इसमें भविष्य देखा।”

मेरी माँ ने कुर्सी की पीठ कसकर पकड़ ली।

मैंने रोहित की तरफ देखा।

वह मेरी नजर से बच रहा था।

कविता बोली—

“हमने इसे असली घर बनाने के लिए बहुत मेहनत की है। ऐसी जगह जहाँ हमारा परिवार बढ़ सके।”

एक पड़ोसी बोला—

“आप लोगों ने सचमुच बहुत अच्छा काम किया है।”

कविता मुस्कुराई।

“धन्यवाद। अब तो यह सच में हमारा लगता है।”

हमारा।

वह शब्द मेरे कानों में ठहर गया।

मैं उसी समय रजिस्ट्री की कॉपी टेबल पर रख सकती थी।

उसे झूठा साबित कर सकती थी।

सबके सामने उसकी पोल खोल सकती थी।

एक पल के लिए मैंने कल्पना की—

उसका चेहरा कैसा होगा जब उसे पता चलेगा कि जिस घर को वह अपना बता रही है, उसकी असली मालकिन उसके सामने बैठी है।

लेकिन मैंने माँ को देखा।

उनकी आँखें मुझसे कह रही थीं—

अभी नहीं।

इसलिए मैं चुप रही।

मैं बैठ गई।

माँ मेरे बगल में बैठीं।

कविता के चेहरे पर राहत थी।

वह राहत जीत की तरह दिख रही थी।

डिनर शुरू हो गया।

रोहित अपने काम की बातें कर रहा था।

राकेश प्रोजेक्ट की देरी के बारे में पूछ रहा था।

शोभा किसी धार्मिक संस्था के कार्यक्रम की बात कर रही थी।

कविता मेहमानों के गिलास भर रही थी और खाने की तारीफें ऐसे स्वीकार कर रही थी जैसे पूरा खाना उसी ने बनाया हो।

लेकिन मैं अपनी माँ के हाथ का खाना पहचानती थी।

रोज़मेरी वाला चिकन नहीं था, बल्कि माँ का खास धनिया-पुदीना मसाला वाला चिकन था।

आलू में उतनी ही लहसुन की मात्रा थी जितनी माँ हमेशा डालती थीं।

और मिठाई?

वह वही पुरानी सेब की पाई थी जिसकी रेसिपी माँ ने एक पुराने डिब्बे में संभालकर रखी थी।

कविता ने खाना नहीं बनाया था।

मेरी माँ ने बनाया था।

फिर भी माँ मुश्किल से कुछ खा रही थीं।

डिनर के बीच सुनीता ने माँ से कहा—

“सविता जी, खाना बहुत स्वादिष्ट है।”

माँ जवाब देतीं, उससे पहले कविता बोल पड़ी—

“धन्यवाद। यह हमारे परिवार की पुरानी रेसिपी है।”

मैंने पूछा—

“किसके परिवार की?”

कविता का हाथ रुक गया।

“हमारे।”

“मेरी माँ की।”

टेबल पर फिर सन्नाटा छा गया।

कविता ने काँटा नीचे रखा।

“क्या हर बात में मुझे सुधारना जरूरी है?”

“सिर्फ उन बातों में जो सच नहीं हैं।”

रोहित ने मुझे चेतावनी भरी नजर से देखा।

“बस करो।”

मैंने उसकी ओर देखा।

“क्यों?”

उसका चेहरा लाल हो गया।

कविता मेहमानों की ओर देखकर मुस्कुराई।

“भाई-बहन की पुरानी प्रतिद्वंद्विता है। कुछ चीजें कभी नहीं बदलतीं।”

“हम कभी प्रतिद्वंद्वी नहीं थे।”

कविता बोली—

“रोहित कुछ और ही बताता है।”

मैंने भाई की तरफ देखा।

“रोहित क्या बताता है?”

“यहाँ नहीं,” वह बुदबुदाया।

लेकिन कविता नहीं रुकी।

“वह कहता है कि तुम्हें हमेशा सबसे सफल, सबसे जिम्मेदार और सबको बचाने वाली बनना था।”

रोहित का जबड़ा तन गया।

“कविता।”

“क्या? हम सब बड़े लोग हैं।”

माँ ने अपना नैपकिन मेज पर रखा।

“मैं अपने कमरे में जाना चाहती हूँ।”

कविता की आँखें सख्त हो गईं।

“अभी मिठाई नहीं आई है।”

“मैं थक गई हूँ।”

“बस कुछ मिनट।”

उसकी आवाज में आदेश छिपा था।

मेहमान शायद उसे समझ नहीं पाए।

लेकिन मैंने समझ लिया।

माँ ने भी समझ लिया।

फिर भी वह वापस बैठ गईं।

उस पल मेरे अंदर एक बात बिल्कुल साफ हो गई।

यह सिर्फ एक बुरा दिन नहीं था।

यह एक पूरी व्यवस्था थी।

कविता आदेश देती थी।

रोहित टकराव से बचता था।

शोभा उस व्यवस्था को मजबूत करती थी।

और माँ हर आदेश मानती थीं।

सबने अपनी-अपनी भूमिका सीख ली थी।

यहाँ तक कि मेरी माँ ने भी।

सवाल सिर्फ इतना था—

क्यों?

डिनर खत्म होने के बाद कविता खड़ी हुई।

“सविता, मिठाई ले आओ।”

मैंने कुर्सी पीछे खिसकाई।

“मैं मदद करती हूँ।”

कविता बोली—

“तुम मेहमान हो।”

“तो मेरी माँ भी मेहमान हैं।”

“नहीं,” कविता ने तुरंत कहा, फिर खुद को संभालते हुए बोली, “मेरा मतलब… वह यहाँ रहती हैं।”

“तुम भी तो रहती हो।”

रोहित अचानक खड़ा हो गया।

“क्या मैं तुमसे बात कर सकता हूँ?”

उसने गलियारे की तरफ देखा।

मैं उसके पीछे चली गई।

वह अपने पुराने कमरे में गया, जिसे अब ऑफिस बना दिया गया था।

उसने दरवाजा बंद कर दिया।

“तुम क्या कर रही हो?” उसने गुस्से में पूछा।

“यह समझने की कोशिश कर रही हूँ कि हमारी माँ के साथ क्या हुआ।”

“कुछ नहीं हुआ।”

“वह वॉशिंग मशीन के पास सोती हैं।”

“यह उनकी पसंद थी।”

“उनके शरीर पर चोट के निशान हैं।”

“वह गिर जाती हैं।”

“कविता ने उन्हें मेरे सामने थप्पड़ मारा।”

वह नजरें चुराने लगा।

“कविता का गुस्सा निकल गया था।”

“तुम इसे ऐसे कह रहे हो जैसे इससे सब ठीक हो जाता है।”

“वह तनाव में है।”

मैंने उसे घूरा।

“आईसीयू में मैंने जिंदगी भर तनाव में लोगों को देखा है। उनमें से ज्यादातर ने मेरी माँ को नहीं मारा।”

उसके कंधे झुक गए।

“मैं उसका बचाव नहीं कर रहा।”

“तुमने उसे रोका भी नहीं।”

“मैंने देखा नहीं।”

“तुम वहीं खड़े थे।”

“प्लेट टूटने की आवाज सुनी थी। मैं बाद में पहुँचा।”

“तुमने माँ को अपना चेहरा पकड़े देखा था।”

उसने बालों पर हाथ फेरा।

“आवाज धीमी रखो।”

और तभी मुझे सब समझ आया।

उसे यह चिंता नहीं थी कि माँ ठीक हैं या नहीं।

उसे सिर्फ यह चिंता थी कि कोई सुन न ले।

मैं उसके करीब गई।

“कविता को क्यों लगता है कि यह घर उसका है?”

उसकी आँखें झपकीं।

“उसे ऐसा नहीं लगता।”

“उसने सबके सामने कहा कि उसने और तुमने यह घर संभाला है।”

“वह बातें बढ़ा-चढ़ाकर कहती है।”

“शोभा को भी ऐसा लगता है।”

“शोभा कविता की हर बात मानती है।”

“और तुमने अपने ऑफिस में क्या बताया है?”

उसका चेहरा बदल गया।

बस थोड़ा।

लेकिन मैंने देख लिया।

“इसका इससे क्या लेना-देना है?”

“आज रात सिर्फ डिनर नहीं है। राकेश तुम्हारी प्रमोशन की वजह से आया है।”

“वह पारिवारिक दोस्त है।”

“वह तुम्हारा क्षेत्रीय निदेशक है।”

रोहित ने दरवाजे की तरफ देखा।

मैंने आवाज धीमी की।

“क्या तुमने उसे बताया कि यह घर तुम्हारा है?”

उसने जवाब नहीं दिया।

“रोहित।”

“लोन की बातचीत में यह बात आई थी।”

“कौन-सा लोन?”

वह कुर्सी पर बैठ गया।

कुछ पल के लिए वह मेरा बड़ा भाई नहीं, बल्कि ऐसा आदमी लग रहा था जो अपनी ही बनाई हुई मुसीबत में फँस चुका था।

“कंपनी में वरिष्ठ कर्मचारियों को नई परियोजना में निवेश का मौका मिल रहा है।”

“मतलब?”

“अगर हम निवेश करें और प्रोजेक्ट सफल हो जाए, तो कर्मचारी से पार्टनर बन सकते हैं।”

“और तुम्हें पैसे चाहिए।”

“मुझे आर्थिक रूप से मजबूत दिखना था।”

मेरा पेट कस गया।

“क्या तुमने इस घर को गिरवी रखा?”

“नहीं।”

जवाब बहुत जल्दी आया।

बहुत जल्दी।

“कोशिश की थी?”

वह चुप रहा।

मैं मेज के चारों ओर घूमकर उसके सामने आ गई।

“तुमने किया क्या?”

“मैंने संपत्ति का विवरण जमा किया।”

“मेरे घर को अपनी संपत्ति दिखाकर?”

“पारिवारिक निवास के रूप में।”

“पारिवारिक निवास तुम्हारी संपत्ति नहीं है।”

“मुझे पता है।”

“फिर क्यों लिखा?”

उसने सिर झुका लिया।

“मुझे लगा सब ठीक कर लूँगा, इससे पहले कि किसी को पता चले।”

मैंने उसकी ओर देखा।

“इसका मतलब क्या है?”

उसने एक फाइल खोली और एक मुड़ा हुआ दस्तावेज निकाला।

“मैंने रजिस्ट्री में जालसाजी नहीं की।”

मैंने तीखी नजर से देखा।

“यह बात सुनकर मुझे बिल्कुल राहत नहीं मिली।”

उसने कागज मेरी तरफ बढ़ाया।

उसके ऊपर लिखा था—

अंतिम वसीयतनामा।

नीचे मेरी माँ का नाम था।

मैंने पहला पन्ना पढ़ा।

उसमें लिखा था कि माँ की मृत्यु के बाद घर पर उनके सभी अधिकार रोहित को मिलेंगे।

मैं कुछ पल तक समझ ही नहीं पाई कि मैं क्या पढ़ रही हूँ।

फिर मैंने घर का पता देखा।

सही था।

प्रॉपर्टी नंबर भी सही था।

लेकिन समस्या यह थी—

मेरी माँ उस संपत्ति की कानूनी मालिक थीं ही नहीं।

वह वह घर किसी को विरासत में दे ही नहीं सकती थीं।

“यह दस्तावेज बेकार है,” मैंने कहा।

“मुझे पता है।”

“कविता को पता है?”

“उसे लगता है माँ के नाम पर घर है।”

“शोभा को?”

“वही।”

“राकेश को?”

रोहित का चेहरा उतर गया।

“मैंने उसे वसीयत नहीं दिखाई।”

“तो क्या दिखाया?”

“बैंक स्टेटमेंट। मरम्मत की रसीदें। बिजली-पानी के बिल।”

“तुमने घर को अपनी संपत्ति साबित करने के लिए पूरा वित्तीय रिकॉर्ड बना दिया।”

“मैंने उस पर लोन नहीं लिया।”

“क्योंकि ले नहीं सकते थे।”

“मैं उन्हें बताने वाला था।”

“कब?”

“प्रमोशन के बाद।”

मैंने उसकी आँखों में देखा।

“जब सब लोग तुम्हारे झूठ पर फैसले ले चुके होते?”

उसने सिर झुका लिया।

“मैं जानता हूँ कि यह कितना गलत दिखता है।”

“मुझे इसकी परवाह नहीं कि यह कैसा दिखता है।”

मैंने शांत आवाज में कहा—

“मुझे परवाह है कि इससे माँ के साथ क्या हुआ।”

उसकी आँखें भर आईं।

“उनके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था।”

“तुम उनके घर में रहने आए थे।”

“हमारे पास कोई और जगह नहीं थी।”

“और फिर?”

“कविता ने कहा कि बच्चों के लिए जगह चाहिए। शोभा का फ्लैट बिक गया, इसलिए वह भी यहाँ आ गई। कमरों को लेकर झगड़ा हुआ। माँ ने अपना कमरा दे दिया।”

“माँ हर चीज दे देती हैं जब कोई उन पर दबाव डालता है।”

“मुझे पता है।”

“क्या सच में?”

वह फिर नजरें चुराने लगा।

“मैंने सोचा था सब अस्थायी है।”

“माँ ने भी यही लिखा था।”

वह मेरी तरफ पलटा।

“क्या लिखा था?”

“शायद मेरे चले जाने से वे नाराज़ नहीं होंगे।”

उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

“तुमने यह कहाँ देखा?”

“उनके वरिष्ठ नागरिक आवास के आवेदन में।”

रोहित कुर्सी पर बैठ गया।

“उन्होंने घर छोड़ने के लिए आवेदन किया?”

“वह अपने ही जीवन से गायब होने की तैयारी कर रही थीं, ताकि तुम सब आराम से रह सको।”

उसने चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।

डाइनिंग रूम से हँसी की आवाजें आ रही थीं।

किसी ने प्लेट रखी।

कविता कॉफी के लिए आवाज लगा रही थी।

“मुझे नहीं पता था,” रोहित ने कहा।

“तुम उनकी बिस्तर से दस कदम दूर रहते हो।”

“मुझे लगा उन्हें कम जगह चाहिए।”

“वह तुम्हारी माँ हैं।”

“मुझे पता है!”

उसकी आवाज ऊँची हुई और फिर टूट गई।

“मुझे पता है।”

कुछ देर हम दोनों चुप रहे।

मैंने पूछा—

“माँ के खाते से जो पैसे निकले, उनका क्या हुआ?”

वह जम गया।

मैंने वसीयत मेज पर रख दी।

“हर महीने पैसे निकाले गए हैं।”

“घर के खर्च के लिए।”

“माँ को पता है?”

“उन्होंने योगदान देने की बात मानी थी।”

“कितना?”

उसने एक रकम बताई।

वह रकम खाते से निकाली गई रकम की आधी से भी कम थी।

“बाकी?”

रोहित कुछ कहता, उससे पहले दरवाजा खुल गया।

कविता सामने खड़ी थी।

उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।

“तुम्हें हमारी चीजें देखने का कोई अधिकार नहीं था।”

मैंने दस्तावेज की तरफ देखा।

“हमारी चीजें?”

वह अंदर आई और दरवाजा बंद कर दिया।

“यह निजी मामला है।”

“यह मेरी माँ की वसीयत है, उस संपत्ति के बारे में जिसकी वह मालिक ही नहीं हैं।”

कविता ने रोहित की तरफ देखा।

“तुमने उसे बता दिया?”

“उसे मिल गया।”

कविता की आँखों में गुस्सा चमका।

“तुमने वादा किया था कि आज रात ऐसा नहीं होगा।”

“मैंने योजना नहीं बनाई थी।”

“तुम कभी कुछ योजना नहीं बनाते,” उसने कड़वाहट से कहा। “सब कुछ बर्बाद होने देते हो और फिर खुद को पीड़ित दिखाते हो।”

रोहित खड़ा हो गया।

“बस।”

कविता मेरी तरफ मुड़ी।

“छह साल तक वह गायब रहती है और हम सब कुछ संभालते हैं। फिर एक दिन आती है और खुद को हम सबका जज समझने लगती है।”

मैंने कहा—

“मैं हर महीने पैसे भेजती थी।”

“तुमने पैसे भेजे।”

उसकी आवाज में ताना था।

“ऐसे जैसे पैसे भेजना यहाँ मौजूद रहने के बराबर हो।”

उसकी बात ने मुझे भीतर तक चोट पहुँचाई।

क्योंकि उसमें कुछ सच्चाई थी।

मैंने फोन किए थे।

बिल भरे थे।

मरम्मत करवाई थी।

उपहार भेजे थे।

लेकिन मैं यहाँ नहीं थी।

मैंने रोहित पर भरोसा किया था कि वह माँ का ध्यान रखेगा।

“मुझे पहले लौट आना चाहिए था,” मैंने कहा।

फिर उसकी आँखों में देखकर जोड़ा—

“लेकिन इससे तुम्हारा किया सही नहीं हो जाता।”

“मैंने क्या किया?”

“तुमने उन्हें मारा।”

कविता का आत्मविश्वास डगमगा गया।

“मेरा नियंत्रण चला गया था।”

“तुमने उन्हें तुमसे डरना सिखा दिया।”

“तुम नहीं जानती कि इस परिवार ने क्या झेला है।”

“तो बताओ।”

वह रोहित की ओर देखने लगी।

वह नजरें झुका चुका था।

कविता ने हाथ बाँध लिए।

“तुम्हारी माँ घर खोने वाली थीं।”

मैंने उसे घूरा।

“यह असंभव है।”

“उन्होंने प्रॉपर्टी टैक्स नहीं भरा।”

“टैक्स मेरे खाते से जाता है।”

“पिछले साल नहीं गया।”

मैंने रोहित की तरफ देखा।

वह चुप था।

कविता ने कहा—

“बैंक में समस्या हुई थी। नोटिस आए। जुर्माना बढ़ता गया। रोहित ने सब संभाला।”

“किस पैसे से?”

“हमारे पैसे से।”

“कितने?”

रोहित ने आखिरकार कहा—

“लगभग अठारह हजार।”

“यह कैसे संभव है?”

“टैक्स, मरम्मत, बीमा और बेसमेंट में पानी भरने का खर्च।”

“बेसमेंट की मरम्मत के पैसे मैंने दिए थे।”

रोहित बोला—

“तुमने ठेकेदार को दिए थे। बाद में फफूंदी हटाने का खर्च नहीं दिया था।”

मेरे भीतर पहली बार एक दरार पड़ी।

घर के मालिक होने को लेकर नहीं।

माँ के साथ हुए व्यवहार को लेकर नहीं।

बल्कि उस कहानी को लेकर जो मैंने अपने मन में बना रखी थी—

कि विदेश में रहते हुए मैंने माँ की जरूरत की हर चीज पूरी कर दी थी।

मैंने पूछा—

“बैंक की समस्या क्या थी?”

रोहित ने जमीन की तरफ देखा।

“किसी ने घर के खाते तक पहुँच बनाई थी।”

“कौन?”

“हमें नहीं पता।”

“रिपोर्ट की?”

“माँ ने मना कर दिया।”

“क्यों?”

दोनों चुप रहे।

कविता के चेहरे का भाव बदल गया।

गुस्से के नीचे अब थकान दिखाई दे रही थी।

“क्योंकि उन्हें पता था कि पैसे किसने लिए थे,” उसने कहा।

मैंने दरवाजे की तरफ देखा।

“माँ कहाँ हैं?”

“रसोई में,” कविता बोली। “तुम्हारी शानदार डिनर पार्टी परोस रही हैं।”

मैं तुरंत बाहर गई।

माँ रसोई में नहीं थीं।

मैंने उन्हें आँगन में पाया।

शाम ठंडी हो चुकी थी।

बगीचे की सीमा के पास पिता ने जो पुराने चमेली के पौधे लगाए थे, उनके पास माँ खड़ी थीं।

उन्होंने मुझे आते हुए सुना।

“क्या मेहमान चले गए?”

“अभी नहीं।”

“अपना स्वेटर पहन लो। ठंड लग जाएगी।”

मैं उनके पास गई।

“माँ, घर के खाते से पैसे किसने निकाले?”

उनका शरीर तन गया।

“वह सब संभाल लिया गया है।”

“किसने निकाले?”

“मैंने गलती की।”

“कैसी गलती?”

“मैंने किसी पर भरोसा किया।”

“किस पर?”

काफी देर तक वह चुप रहीं।

फिर उन्होंने धीरे से कहा—

“विनोद।”

मैंने तुरंत पहचान लिया।

“चाचा विनोद?”

मेरे पिता के छोटे भाई।

अंतिम संस्कार के बाद से मैंने उन्हें नहीं देखा था।

माँ ने सिर हिलाया।

“पिछली सर्दियों में उनका फोन आया था। उनका कारोबार डूब रहा था।”

“तो आपने उन्हें खाते तक पहुँच दे दी?”

“मैं सिर्फ थोड़े पैसे भेजना चाहती थी।”

“कितने?”

“दो हजार।”

“और उन्होंने ज्यादा निकाल लिए?”

माँ की आँखें भर आईं।

“उन्होंने कहा था कि वापस कर देंगे।”

“कितने?”

“सैंतीस हजार।”

मेरे भीतर कुछ टूट गया।

“वह खाता तुम्हारे टैक्स, बीमा और घर के खर्च के लिए था।”

“मुझे पता है।”

“तुमने मुझे फोन क्यों नहीं किया?”

“तुम काम कर रही थीं।”

“मैं हमेशा काम करती हूँ, माँ। इसका मतलब यह नहीं कि तुम मुझे फोन नहीं कर सकतीं।”

“तुमने पहले ही बहुत कुछ किया है।”

“और रोहित?”

“उसे नोटिस मिले।”

“उसने खर्च संभाला?”

“हाँ।”

“अपने पैसे से?”

“हाँ।”

मैंने खिड़की से रोहित को देखा।

पहली बार मुझे सिर्फ उसका अपराध नहीं दिखा।

मुझे यह भी दिखा कि किस तरह एक समस्या दूसरी समस्या को जन्म देती गई।

एक समझौता।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

और धीरे-धीरे किसी को याद ही नहीं रहा कि सामान्य जीवन कैसा होता है।

मैंने पूछा—

“रोहित ने वह वसीयत क्यों बनाई?”

माँ ने आँखें बंद कर लीं।

“मैंने उस पर हस्ताक्षर किए थे।”

“माँ, आप उस घर को रोहित के नाम नहीं कर सकतीं। वह आपका है ही नहीं।”

“मुझे पता है।”

“फिर क्यों?”

“क्योंकि शोभा ने उसे पैसे उधार दिए थे।”

“अठारह हजार?”

“उससे ज्यादा।”

“कितने?”

“पैंतालीस हजार।”

मैं उन्हें देखती रह गई।

“इतने पैसे क्यों?”

“रोहित पर पहले से कर्ज था।”

“किस बात का?”

“उसने निवेश किया था। वह डूब गया।”

“कंपनी वाला निवेश?”

“नहीं। उससे पहले।”

माँ ने आवाज और धीमी कर दी।

“उसने कुछ लोगों से पैसे उधार लिए थे।”

“किससे?”

“मुझे नहीं पता।”

“कविता को?”

“कुछ बातें पता थीं।”

“और शोभा ने पैसा क्यों दिया?”

“उसे लगा रोहित को आखिरकार घर विरासत में मिलेगा।”

“इसलिए आपने झूठी वसीयत पर हस्ताक्षर किए?”

“मुझे लगा इससे सब शांत हो जाएगा।”

मैंने उनकी तरफ देखा।

“माँ, इससे उन्हें ऐसी जिंदगी बनाने की इजाजत मिल गई जो शुरू से ही झूठ पर आधारित थी।”

माँ ने धीरे से कहा—

“मैं तुमसे घर रोहित के नाम करने को कहने वाली थी।”

मेरे भीतर जैसे जमीन खिसक गई।

“आप मुझसे कहने वाली थीं कि मैं यह घर रोहित को दे दूँ?”

“उसके बच्चे हैं।”

“उसके बच्चे भी नहीं हैं।”

“वे चाहते हैं।”

“यह कोई वजह नहीं है।”

माँ ने मेरी तरफ देखा।

“तुम्हारे पास नौकरी है। बचत है। तुम अपना ख्याल रख सकती हो।”

“तो इसका मतलब यह है कि जो घर मैंने आपके लिए खरीदा, वह उसे दे दूँ?”

माँ की आवाज काँप गई।

“वह यहाँ रहा।”

यह बात मेरे दिल में चुभ गई।

“वह यहाँ रहा,” माँ ने दोहराया। “जब तुम्हारे पिता बीमार थे, रोहित यहीं था।”

“मैं तीन बार भारत आई थी।”

“दो-दो हफ्तों के लिए।”

“मैं उनके इलाज के सारे बिल भर रही थी।”

“मुझे पता है।”

“मैं काम इसलिए कर रही थी क्योंकि किसी को करना था।”

“मुझे यह भी पता है।”

“फिर ऐसा क्यों लग रहा है जैसे आप मुझे अलग तरीके से जीने की सजा दे रही हैं?”

माँ का चेहरा टूट गया।

“नहीं बेटी…”

लेकिन मेरे भीतर का पुराना दर्द अब बाहर आ चुका था।

मैंने वर्षों तक माना था कि माँ समझती हैं कि मैं क्यों गई।

विदेश में नर्सिंग की नौकरी से मुझे भारत की तुलना में कई गुना ज्यादा कमाई होती थी।

पिता का इलाज महँगा था।

घर खरीदना मेरे लिए सिर्फ एक संपत्ति खरीदना नहीं था।

वह मेरा वादा था।

मैंने सोचा था—

अब माँ को कभी यह डर नहीं रहेगा कि वह कहाँ रहेंगी।

लेकिन शायद मेरी अनुपस्थिति भी एक तरह का कर्ज बन गई थी।

ऐसा कर्ज जिसे पैसे चुकता नहीं कर सकते थे।

“मैं इसलिए नहीं गई थी कि मैं आपसे कम प्यार करती हूँ,” मैंने कहा।

“मुझे पता है।”

“सच?”

माँ रोने लगीं।

“मैंने तुम्हें हर दिन याद किया।”

मैंने नजरें फेर लीं।

मुझे डर था कि अगर मैंने उनकी आँखों में देखा, तो मेरा गुस्सा उसी क्षण खत्म हो जाएगा।

तभी पीछे से दरवाजा खुला।

रोहित बाहर आया।

“राकेश और बाकी लोग जा रहे हैं।”

“अच्छा।”

वह वहीं खड़ा रहा।

“कविता ने मुझे बताया कि उसने क्या कहा।”

“कौन-सी बात?”

“टैक्स वाली।”

“और पैसे वाली?”

उसने सिर हिलाया।

माँ ने आँसू पोंछे।

“प्लीज़, लड़ो मत।”

मैंने रोहित की तरफ देखा।

“तुम पर कुल कितना कर्ज है?”

उसने माँ की तरफ देखा।

“यहाँ नहीं।”

“अब कोई बंद कमरे नहीं। कोई आधे सच नहीं।”

वह धीरे-धीरे आँगन में आया।

“बहत्तर हजार।”

माँ के मुँह से निकला—

“इतना?”

“बढ़ गया।”

“कैसे?”

“ब्याज। लेट पेमेंट। एक खाते से दूसरे की भरपाई।”

“कविता को पता है?”

“लगभग पचास हजार।”

“शोभा को?”

“पैंतालीस।”

मैंने कहा—

“मतलब इस घर में हर इंसान के पास सच्चाई का अलग संस्करण था।”

रोहित ने सिर झुका दिया।

मैंने पूछा—

“क्या तुमने माँ के पेंशन के पैसे भी अपने कर्ज में लगाए?”

“कुछ।”

माँ ने सीने पर हाथ रखा।

“तुमने कहा था वह राशन के लिए है।”

“ज्यादातर राशन के लिए ही था।”

“कितने लिए?”

“पिछले साल करीब छह हजार।”

माँ का चेहरा जैसे अचानक बूढ़ा हो गया।

“मुझे तुम पर भरोसा था।”

“मैं वापस करने वाला था।”

माँ ने धीरे से कहा—

“यही बात चाचा विनोद ने भी कही थी।”

रोहित सिहर गया।

मेरी माँ उससे दूर हट गईं।

पूरी शाम मैं चाहती रही थी कि माँ गुस्सा करें।

अब जब वह पल आया, तो वह वैसा नहीं था जैसा मैंने सोचा था।

उन्होंने चीखकर कुछ नहीं कहा।

उन्होंने कोई गाली नहीं दी।

उन्होंने बस अपने बेटे को ऐसे देखा जैसे पहली बार पहचान रही हों कि उनके सामने खड़ा आदमी वही बेटा नहीं था जिसे उन्होंने पाला था।

“तुमने मुझे यह सोचने दिया कि मैं बहुत महँगी हूँ,” माँ ने कहा।

रोहित की आँखें भर आईं।

“माँ…”

“तुम बिल दिखाते थे। कहते थे कि मैं बिजली ज्यादा खर्च करती हूँ।”

“मैं मजबूर था।”

“तुमने कहा था कि मुझे शुक्रगुजार होना चाहिए कि कविता मुझे यहाँ रहने दे रही है।”

रोहित ने सिर उठाया।

“मैंने ऐसा नहीं कहा।”

“तुम उसके पास खड़े थे जब उसने कहा था।”

“यह एक जैसा नहीं है।”

“मेरे लिए था।”

कोई कुछ नहीं बोला।

माँ अंदर चली गईं।

कुछ देर बाद मेहमान चले गए।

घर अचानक असामान्य रूप से शांत हो गया।

डाइनिंग रूम में केवल शोभा, कविता, रोहित और माँ थे।

मैं भी वहीं खड़ी थी।

आखिरकार शोभा ने कहा—

“मुझे लगता है हमें इस बारे में शांति से बात करनी चाहिए।”

कविता कड़वी हँसी।

“आपका मतलब है, इससे पहले कि वह हमें घर से निकाल दे?”

मैंने कहा—

“मैं आज रात किसी को सड़क पर नहीं निकाल रही।”

कविता ने व्यंग्य किया।

“कितनी मेहरबानी है।”

“यह मेहरबानी नहीं है। यह समझदारी है।”

उसने मेरी तरफ देखा।

“तो फिर क्या बदलेगा?”

“आज रात से माँ अपने कमरे में वापस जाएँगी।”

शोभा का चेहरा बदल गया।

“और मैं कहाँ सोऊँगी?”

“गेस्ट रूम में।”

“वह तो अभी रोहित का ऑफिस है।”

“तो मेज बाहर जाएगी।”

कविता बीच में बोली—

“मेरी माँ की तबीयत ठीक नहीं रहती। उन्हें बड़ा बाथरूम चाहिए।”

शोभा ने उसे घूरकर देखा।

“कौन-सी बीमारी?”

कविता अचानक चुप हो गई।

मैंने कहा—

“दूसरी बात। माँ के बैंक कार्ड, खाते के रिकॉर्ड, पहचान पत्र और निजी दस्तावेज उन्हें वापस दिए जाएँगे।”

रोहित तुरंत ऑफिस की तरफ चला गया।

“तीसरी बात—उनके खाते से कोई पैसा नहीं निकलेगा।”

कविता ने रोहित की तरफ देखा।

उसने नजरें नहीं मिलाईं।

“चौथी बात,” मैंने कहा, “कल सुबह मैं वकील और वित्तीय सलाहकार से मिलूँगी। हम घर की रजिस्ट्री, बैंक से निकासी, टैक्स, शोभा का कर्ज, रोहित के कर्ज और इस घर में हस्ताक्षर किए गए हर दस्तावेज की जाँच करेंगे।”

शोभा ने सीधा होकर कहा—

“मेरे वित्तीय मामले निजी हैं।”

“जब वे मेरी संपत्ति से जुड़े हैं, तब निजी नहीं रह जाते।”

“मुझे गुमराह किया गया।”

“हाँ,” मैंने कहा। “आपको किया गया।”

वह चुप हो गईं।

उन्होंने रोहित की तरफ देखा।

“क्या तुम्हें पता था कि तुम्हारी माँ कानूनी मालिक नहीं हैं?”

रोहित ने धीरे से कहा—

“हाँ।”

शोभा का चेहरा बदल गया।

कविता ने रोहित की ओर देखा।

“तुमने मुझसे कहा था कि घर माँ के नाम है।”

“मैंने कहा था कि यह उनका घर है।”

“तुमने मुझे वसीयत दिखाई थी।”

“मैंने कभी नहीं कहा कि रजिस्ट्री उनके नाम है।”

कविता उसे घूरती रह गई।

“तुम चाहते थे कि मैं यही समझूँ।”

रोहित के पास कोई जवाब नहीं था।

तभी शोभा ने धीरे से कहा—

“मैंने अपना फ्लैट बेच दिया था।”

कविता ने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“आठ महीने पहले।”

“आपने कहा था बिल्डिंग में मरम्मत हो रही है।”

“मैं नहीं चाहती थी कि तुम जानो।”

“क्या?”

“रोहित को जो पैसे दिए थे, वह मेरी लगभग सारी बचत थी।”

कविता के चेहरे का रंग उड़ गया।

“आपने कहा था कि आपके पास रिटायरमेंट की बचत है।”

“थोड़ी है।”

“कितनी?”

शोभा ने सिर झुका लिया।

“कुछ महीनों के लिए।”

कमरे का माहौल फिर बदल गया।

अब सिर्फ माँ पीड़ित नहीं थीं।

शोभा ने भी अपनी बेटी और दामाद के झूठ पर भरोसा करके अपनी सुरक्षा दाँव पर लगा दी थी।

कविता उसके पास बैठ गई।

“आपने ऐसा क्यों किया?”

शोभा ने थकी मुस्कान दी।

“क्योंकि तुमने कहा था कि रोहित की प्रमोशन के बाद सब ठीक हो जाएगा।”

कविता ने पति की तरफ देखा।

“क्या प्रमोशन सच में होने वाली है?”

रोहित ने कहा—

“मेरा नाम विचाराधीन है।”

“और कंपनी में निवेश?”

“वह भी है।”

“क्या तुमने पैसे जमा किए?”

रोहित चुप रहा।

“क्यों?”

“मैंने कुछ पैसे पुराने कर्ज में लगा दिए।”

“कितने?”

“अट्ठाईस हजार।”

कविता जैसे पत्थर की हो गई।

अब उसके पास कहने को कुछ नहीं था।

सिर्फ अविश्वास था।

“तुमने मुझसे झूठ बोला।”

रोहित ने धीमे से कहा—

“मैं सब बचाने की कोशिश कर रहा था।”

कविता फट पड़ी—

“तुम ही सब बर्बाद कर रहे थे!”

माँ सोने के लिए फिर उसी छोटे कमरे में चली गईं।

मैं उनके पीछे जाना चाहती थी।

लेकिन उन्होंने कहा—

“आज नहीं।”

मैं वहीं रुक गई।

कुछ देर बाद रोहित एक लोहे का दस्तावेज वाला बॉक्स लेकर आया।

उसने उसे टेबल पर रखा।

“माँ के सारे कागज।”

मैंने बॉक्स खोला।

बैंक स्टेटमेंट।

बीमा के दस्तावेज।

टैक्स के नोटिस।

मेडिकल रिपोर्ट।

माँ का पासपोर्ट।

उनका आधार कार्ड।

और सबसे नीचे—

एक मोटा लिफाफा।

उस पर मेरा नाम लिखा था।

मेरे हाथ रुक गए।

यह रोहित की लिखावट नहीं थी।

कविता की भी नहीं।

मेरी माँ की लिखावट थी।

मैंने माँ की तरफ देखा।

वह कमरे में नहीं थीं।

मैंने लिफाफा खोला।

अंदर कई कागज थे।

और एक पत्र।

पहले पन्ने पर तारीख पाँच महीने पुरानी थी।

मैंने पढ़ना शुरू किया—

“मेरी प्यारी बेटी अनन्या…”

मैं रुक गई।

अनन्या मेरा नाम नहीं था।

मैंने अगला पन्ना पलटा।

पत्र आगे लिखा था—

“मैंने तुम्हें सच्चाई बताने में देर की, क्योंकि मुझे डर था कि सच्चाई जानने के बाद तुम हमारे परिवार को अलग नजर से देखोगी।”

मेरा दिल तेज धड़कने लगा।

बाकी लोग चुपचाप मुझे देख रहे थे।

मैंने नीचे रखे दस्तावेज उठाए।

पहला था—

जन्म प्रमाणपत्र।

ऊपर मेरा नाम था।

जन्मतिथि मेरी थी।

लेकिन जहाँ लिखा था—

माता का नाम

वहाँ सविता शर्मा का नाम नहीं था।

वहाँ एक और नाम लिखा था—

अंजलि लुईस मेहता।

मैंने उसे दो बार पढ़ा।

फिर बंद कमरे की तरफ देखा जहाँ माँ गई थीं।

अगला कागज लगभग अड़तीस साल पुरानी अखबार की कटिंग थी।

शीर्षक में लिखा था—

“जिला अस्पताल से नवजात बेटी के साथ निकली युवती रहस्यमय तरीके से लापता।”

नीचे एक धुंधली तस्वीर थी।

तस्वीर में जो महिला थी…

उसकी आँखें बिल्कुल मेरी जैसी थीं।

कटिंग के पीछे माँ ने छह शब्द लिखे थे—

“उसने तुम्हें अपनी मर्जी से नहीं छोड़ा था।”

मेरे हाथ काँपने लगे।

और तभी मुझे कपड़े धोने वाले कमरे के अंदर से खिड़की खुलने की आवाज सुनाई दी।

मैंने तुरंत उस तरफ देखा।

और पहली बार मेरे मन में सवाल उठा—

आखिर मेरी माँ ने मुझसे इतने सालों तक कौन-सा सच छिपाया था?

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