स्कूल से लौटते ही आराध्या खुद को “गंदी” कहकर बाथरूम में बंद हो जाती थी—नाली में अटके नीले-सफेद धागों ने कविता को उसी दोपहर स्कूल पहुँचा दिया//

PART 2

प्रधानाचार्य अरविंद माथुर ने मेज पर दोनों हथेलियाँ रखीं।

उनके सामने छह माताएँ थीं।

तीन बच्चियाँ।

सीमा।

और मैं।

कमरे में ठंडी हवा चल रही थी, फिर भी मेरी हथेली पसीने से भीग रही थी। मैंने काली चिप चुपचाप अपने पर्स की अंदरूनी जेब में डाल दी।

माथुर ने गला साफ किया—

—सबसे पहले मैं साफ कर दूँ कि स्कूल बच्चों की सुरक्षा और गरिमा को सबसे ऊपर रखता है।

मेरे सामने बैठी महिला अचानक हँस दी।

वह खुशी वाली हँसी नहीं थी।

उसने अपना नाम रश्मि बताया था।

उसकी बेटी तान्या चौथी कक्षा में थी।

रश्मि ने मेज पर एक छोटी कॉपी रखी—

—तो मेरी बेटी पिछले एक महीने से रात को स्कूल जाने से पहले रो क्यों रही है?

माथुर ने कॉपी देखी तक नहीं।

—बच्चों में कई तरह के व्यवहारिक बदलाव आते हैं।

दूसरी माँ बोली—

—मेरी बेटी ने खाना कम कर दिया।

तीसरी ने कहा—

—मेरी बच्ची रोज कपड़े बदलकर उन्हें खुद धोती है।

मैंने सीमा की ओर देखा।

उसकी उंगलियाँ मेज के नीचे रखे फोन पर चल रही थीं।

वह किसी को संदेश भेज रही थी।

मैंने कहा—

—मेरी बेटी घर आते ही खुद को “गंदी” कहती है।

सीमा ने तुरंत मेरी ओर देखा—

—वह शब्द आपने उससे सुना है। यह जरूरी नहीं कि स्कूल ने सिखाया हो।

मैंने फोन निकालकर स्कर्ट की तस्वीर सामने रख दी।

—और यह?

माथुर थोड़ा आगे झुके।

“दोपहर दल—७।”

उनकी आँखें उस छोटे कागज़ पर दो सेकंड ज्यादा रुकीं।

मुझे वही दो सेकंड चाहिए थे।

मैंने पूछा—

—यह किसका बनाया हुआ समूह है?

उन्होंने कुर्सी की पीठ से शरीर टिकाया।

—मुझे इसकी जानकारी नहीं है।

सीमा ने बात काटी—

—शायद बच्चों ने खेल में लगाया हो।

मेरे बगल में बैठी तान्या अचानक अपनी माँ के और करीब खिसक गई।

उसकी नजर सीमा पर थी।

सीमा ने भी उसे देख लिया।

वह मुस्कुराई—

—तान्या, बेटा, तुम बताओ। हमने कभी तुम्हारे साथ गलत व्यवहार किया?

तान्या की माँ ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

बच्ची का चेहरा नीचे हो गया।

—नहीं।

सीमा की मुस्कान चौड़ी हुई।

—देखा?

तभी तान्या ने बहुत धीमे कहा—

—लेकिन मैं सात नंबर में नहीं थी।

कमरा शांत हो गया।

मेरी सांस वहीं अटक गई।

मैंने आराध्या की स्कर्ट पर लिखे शब्द याद किए।

दोपहर दल—७।

रश्मि ने बेटी की ओर झुककर पूछा—

—सात नंबर क्या है?

तान्या ने होंठ भींच लिए।

सीमा तुरंत खड़ी हुई—

—बस। बच्चों से इस तरह सवाल करना ठीक नहीं है।

मैंने पहली बार उसकी कुर्सी की तरफ हाथ बढ़ाकर उसे बैठने का इशारा किया।

—उसे बोलने दीजिए।

उसने मेरी तरफ देखा।

ऐसा जैसे मैं सीमा पार कर रही हूँ।

माथुर ने कहा—

—कविता जी, कृपया भाषा और तरीके का ध्यान रखिए।

मैंने उनकी आँखों में देखकर कहा—

—मैंने अभी कुछ कहा ही नहीं।

उसके बाद कोई कुछ सेकंड नहीं बोला।

और उन्हीं कुछ सेकंड में मुझे समझ आ गया कि इन दोनों को बच्चियों के जवाब से ज्यादा डर इस बात का था कि बच्चियाँ जवाब देना शुरू न कर दें।

तान्या फिर भी नहीं बोली।

हम उस दिन बिना किसी उत्तर के घर लौट आए।

लेकिन जाते-जाते माथुर ने एक बात जरूर कही।

उन्होंने फाइल बंद की—

—हम इस विषय को यहीं समाप्त समझना चाहेंगे। बच्चों की पढ़ाई का नुकसान किसी के हित में नहीं है।

मैं दरवाज़े तक गई।

फिर पलटी।

—यह चेतावनी है?

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

—सलाह है।

मैंने पहली बार उनके चेहरे को ध्यान से देखा।

उन्हें सचमुच विश्वास था कि स्कूल का नाम हमारे बच्चों की बात से बड़ा है।

घर लौटते समय मैंने काली चिप को पर्स से नहीं निकाला।

पहले आराध्या से बात करनी थी।

मैं नहीं चाहती थी कि किसी और की कहानी सुनकर मैं अपनी बेटी के मुंह में शब्द डाल दूँ।

शाम सात बजे वह अपनी गणित की कॉपी खोले बैठी थी।

एक ही सवाल पर पंद्रह मिनट से पेंसिल घूम रही थी।

मैं उसके सामने नहीं बैठी।

मैं बगल में फर्श पर बैठ गई।

मैंने कहा—

—मैं आज स्कूल गई थी।

पेंसिल रुक गई।

—मुझे पता है।

मैं चौंकी।

—कैसे?

—सीमा मैडम ने कक्षा में कहा था कि कुछ बच्चों की मम्मियाँ शिकायत करने आई थीं।

मेरे भीतर कुछ ठंडा उतर गया।

—उन्होंने सबके सामने कहा?

आराध्या ने सिर हिलाया।

फिर मेरी ओर देखे बिना बोली—

—उन्होंने कहा कि जो बच्चे घर पर बातें बताते हैं, उनके माता-पिता परेशानी खड़ी करते हैं।

मैंने अपनी हथेली घुटने पर दबाई।

मुझे उस क्षण उससे सौ सवाल पूछने थे।

लेकिन मैं सिर्फ एक पूछ सकी—

—तुम “दोपहर दल—७” में हो?

उसका चेहरा बदल गया।

इतना साफ कि अब किसी उत्तर की जरूरत नहीं थी।

वह उठने लगी।

मैंने रास्ता नहीं रोका।

बस कहा—

—मैं तुम्हें डाँटने नहीं वाली।

वह खड़ी रही।

—पापा को भी नहीं बताऊँगी, जब तक तुम नहीं चाहोगी।

उसकी आँखें मेरी ओर उठीं।

—किसी को?

—तुम्हारी अनुमति के बिना तुम्हारी बात किसी रिश्तेदार के सामने नहीं कहूँगी।

वह वापस बैठ गई।

कुछ देर तक सिर्फ घड़ी की आवाज़ आई।

फिर उसने पूछा—

—अगर मैं गंदी निकली तो?

मैंने तुरंत उत्तर नहीं दिया।

क्योंकि मुझे लगा अगर मैंने बहुत जल्दी कहा “तुम गंदी नहीं हो”, तो वह फिर बंद हो जाएगी।

मैंने पूछा—

—यह किसने कहा कि तुम गंदी हो?

उसने पेंसिल की नोक कॉपी पर दबा दी।

—नियम में लिखा है।

—कौन सा नियम?

—दोपहर वाला।

उस दिन बस इतना ही मिला।

मैंने आगे नहीं दबाया।

अगली सुबह मैंने स्कूल नहीं भेजा।

आराध्या ने खुद भी जाने की जिद नहीं की।

निखिल को मैंने सारी बात बताई। वह तुरंत स्कूल जाने को तैयार हो गया, लेकिन मैंने रोक दिया।

—अभी नहीं।

वह भड़क गया—

—हमारी बेटी सात हफ्ते से डर रही है और तुम कह रही हो अभी नहीं?

मैंने पर्स से काली चिप निकाली।

—क्योंकि यह पहले देखना है।

निखिल चुप हो गया।

हमारे घर में पुराना छोटा संगणक था जिसमें ऐसी चिप सीधे नहीं लगती थी।

नीचे रहने वाले मेरे भाई ने कुछ महीने पहले एक जोड़ने वाला उपकरण दिया था। मैंने दराजें खंगालीं। आखिर वह बिजली के पुराने तारों के पीछे मिला।

चिप लगाते समय मेरे हाथ स्थिर नहीं थे।

आराध्या अपने कमरे में थी।

निखिल मेरे पीछे खड़ा था।

पर्दे खिंचे थे।

पटल पर एक के बाद एक कई खाने दिखाई दिए।

तारीखों के नाम।

कुल सत्ताईस।

पहली तारीख लगभग दो महीने पुरानी थी।

वही सप्ताह जब आराध्या ने पहली बार स्कूल से आकर बिना खाना खाए नहाना शुरू किया था।

मैंने निखिल की ओर देखा।

उसने कुछ नहीं कहा।

पहला दृश्य खोला।

स्कूल का पिछला गलियारा।

कैमरा ऊपर कोने में था।

समय दोपहर एक बजकर बयालीस मिनट।

नीली-सफेद वर्दी में पाँच बच्चियाँ दीवार के पास खड़ी थीं।

सीमा सामने थी।

उसके हाथ में एक सूची थी।

वह एक-एक नाम देख रही थी।

दृश्य में आवाज़ नहीं थी।

फिर एक सहायक महिला धूसर रंग के लंबे एप्रन लेकर आई।

बच्चियों ने उन्हें पहन लिया।

उन्हें गलियारे के आखिर में बने उस हिस्से की ओर भेजा गया जिस पर “स्वास्थ्य कक्ष” लिखा था।

दूसरा दृश्य।

अगले दिन।

चार बच्चियाँ।

तीसरा।

छह।

चौथा।

तीन।

हर दृश्य में एक ही बात।

सीमा।

सूची।

धूसर एप्रन।

और बच्चियों के हाथों में उनकी अपनी स्कर्ट या कमीज।

मैंने कुर्सी की धार पकड़ ली।

निखिल ने धीरे से कहा—

—आराध्या को ढूँढो।

मैं तारीखों में नीचे गई।

बारह जुलाई।

वीडियो चला।

दो बजकर तीन मिनट।

पहले तान्या आई।

फिर दो और बच्चियाँ।

फिर आराध्या।

मैंने स्क्रीन रोक दी।

मेरी बेटी गलियारे में दोनों हाथ सामने जोड़कर खड़ी थी।

उसकी नजर जमीन पर थी।

सीमा उसके सामने कुछ कह रही थी।

आराध्या ने सिर हिलाया।

फिर सीमा ने सूची में कुछ लिखा।

सहायक महिला ने उसे एप्रन दिया।

वीडियो में कोई आवाज़ नहीं थी।

फिर भी मेरे कानों में आराध्या की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

“मैं गंदी हूँ।”

मैंने अगली फाइल खोली।

वह वीडियो नहीं था।

मोबाइल से बनाई गई तस्वीरें थीं।

एक रजिस्टर।

ऊपर लिखा था—

“विशेष स्वच्छता सुधार सूची।”

नीचे बच्चों के नाम।

कक्षा।

तारीख।

कारण।

मैं स्क्रीन के करीब गई।

किसी के आगे लिखा था—

“पसीने की गंध।”

किसी के आगे—

“कपड़े पर दाग।”

किसी के आगे—

“बाल अस्त-व्यस्त।”

किसी के आगे—

“निजी स्वच्छता सामग्री मिली।”

फिर आराध्या का नाम आया।

उसके आगे लिखा था—

“दोहराव—७।”

मेरे सामने वह छोटा कागज़ घूम गया।

दोपहर दल—७।

मैंने पहली बार समझा कि सात कोई समूह नहीं था।

वह गिनती थी।

आराध्या को सातवीं बार उस सूची में डाला गया था।

मैंने स्क्रीन से नजर नहीं हटाई।

उस साधारण से अंक ने मेरे भीतर कुछ बदल दिया।

मेरी बेटी सात हफ्तों से हर दोपहर अपने शरीर को किसी गलती की तरह धो रही थी।

और स्कूल उसे आदत कह रहा था।

मैंने अगली फाइल खोली।

इस बार आवाज़ थी।

शायद मिताली ने अपना फोन मेज पर उल्टा रखकर बनाई थी।

सीमा की आवाज़ साफ आ रही थी।

—जिन बच्चों पर निशान मिले, उन्हें सीधे पीछे भेजना है। पहले कपड़े साफ करवाओ, फिर पर्ची भरवाओ।

किसी महिला ने पूछा—

—माता-पिता को बताना है?

सीमा हँसी।

—हर बात घर पहुँचेगी तो स्कूल चलाएँगे या पंचायत?

फिर दूसरी पुरुष आवाज़।

माथुर की।

—इस तिमाही निरीक्षण है। साफ-सफाई की शिकायत शून्य चाहिए। जो भी मामला हो, परिसर के अंदर ही खत्म करो।

किसी ने धीमे स्वर में कहा—

—लेकिन छोटी बच्चियाँ डर रही हैं।

कुछ सेकंड शांति।

फिर सीमा—

—डरेंगी तभी याद रखेंगी।

मेरी उंगली रुक गई।

उसी क्षण मेरे भीतर फैसला उतर गया—

सीमा बच्चों को साफ नहीं रख रही थी, वह उन्हें शर्मिंदा रख रही थी।

लेकिन चिप अभी खत्म नहीं हुई थी।

एक और आवाज़ वाली फाइल थी।

इसमें मिताली बोल रही थी।

बहुत धीमे।

—अगर कोई यह देख रहा है तो शायद मैं स्कूल में न रहूँ। पिछले महीने तीन माताओं ने फोन किया था। उनकी शिकायतें रजिस्टर में दर्ज नहीं की गईं। मुझे कॉल सूची बदलने को कहा गया। मैंने मना किया। फिर सुरक्षा विभाग से पुराने दृश्य हटाने का निर्देश आया। हटाने से पहले मैंने जो मिल सका, बचा लिया।

मेरे बगल में निखिल ने कुर्सी खींचकर बैठते हुए पूछा—

—मिताली ने यह हमें क्यों दिया?

मैंने उत्तर नहीं दिया।

आखिरी तस्वीर खुल चुकी थी।

स्कूल की दीवार पर लगा एक बड़ा प्रमाणपत्र।

“जिला स्वच्छ परिसर सम्मान हेतु अंतिम निरीक्षण।”

तारीख अगले सोमवार।

मैं स्क्रीन देखती रही।

यहीं असली कारण था।

बच्चियों को उनकी भलाई के लिए चुप नहीं कराया जा रहा था।

स्कूल अपनी चमक बचा रहा था।

अगले दिन मैं अकेली मिताली से मिलने नहीं गई।

रश्मि, तान्या की माँ, भी मेरे साथ थी।

हमने उसे स्कूल के सामने नहीं बुलाया।

करीब आधा किलोमीटर दूर एक छोटी भोजनशाला थी। सुबह साढ़े दस बजे वहाँ सिर्फ दो मेजें भरी थीं।

मिताली को देखकर लगा वह पूरी रात नहीं सोई थी।

उसने बैठते ही कहा—

—मैंने नौकरी छोड़ दी है।

मैंने पूछा—

—चिप आपने बनाई?

उसने चाय को छुआ तक नहीं।

—सुरक्षा वाले विजय भैया ने पुराने दृश्य हटाने से पहले मुझे दे दिए थे। उन्हें भी गलत लग रहा था। आवाज़ें मैंने अपने फोन से बनाई थीं।

रश्मि ने पूछा—

—यह कब से चल रहा है?

—पिछले साल से।

मैंने मेज के नीचे अपनी उंगलियाँ कस लीं।

—कितने बच्चों के साथ?

मिताली ने पहली बार हमारी ओर देखा।

—सूची में इस साल बयालीस नाम हैं।

रश्मि का चेहरा सख्त हो गया।

—सिर्फ लड़कियाँ?

—ज्यादातर।

—क्यों?

मिताली ने सिर झुका लिया।

—क्योंकि वर्दी, बाल, शरीर में बदलाव और निजी स्वच्छता की चीज़ों को लेकर उन पर ज्यादा निगरानी रखी जाती थी। कुछ लड़कों के नाम भी हैं, लेकिन लड़कियों को पीछे वाले कक्ष में भेजने का नियम अलग था।

मैंने पूछा—

—वहाँ होता क्या था?

उसने जवाब देने से पहले लंबी सांस ली।

—कपड़े पर दाग हो, पसीना हो, कोई निजी सामान दिखाई दे जाए या वर्दी खराब लगे तो बच्चे को दोपहर के खाने के बाद अलग किया जाता था। उसे एप्रन दिया जाता था। अपने कपड़े खुद साफ करने होते थे। फिर एक पर्ची लिखनी होती थी कि वह अगली बार “स्वच्छ होकर” आएगा।

मैंने पूछा—

—आराध्या के कपड़े का किनारा?

मिताली ने मेरी ओर देखा।

—शायद मुहर की वजह से।

—कौन सी मुहर?

उसने बैग से एक खाली पर्ची निकाली।

नीचे मरून रंग की छोटी चौकोर मुहर थी।

“सुधार आवश्यक।”

मेरी आंखों के सामने बाथरूम की नाली में मिला वही गहरा रंग आ गया।

आराध्या उस मुहर वाले हिस्से को घर लाकर धोती रही होगी।

जब रंग नहीं गया होगा तो उसने कपड़े का किनारा अलग कर दिया होगा।

फिर खुद सिला होगा।

मैंने पर्ची मेज पर रख दी।

उस छोटे कागज़ को देखते हुए मुझे उस रात की कल्पना हुई।

दस साल की मेरी बेटी।

कमरे का दरवाज़ा बंद।

सुई हाथ में।

उंगलियों से कपड़ा जोड़ती हुई।

और शायद यह सोचती हुई कि अगर माँ ने देख लिया तो उसे भी लगेगा कि उसकी बेटी गंदी है।

मैंने मिताली से पूछा—

—उन्हें घर पर बताने से रोका जाता था?

उसने सिर हिलाया।

—सीमा मैडम कहती थीं कि घर पर शिकायत गई तो अभिभावक को बुलाकर बच्चे की “स्वच्छता आदतों” पर बात होगी। कई बच्चियाँ उसी बात से डर जाती थीं।

रश्मि ने कड़वे स्वर में कहा—

—मतलब गलती भी बच्ची की, शर्म भी बच्ची की।

मिताली ने कोई जवाब नहीं दिया।

जरूरत नहीं थी।

हमने उसी दिन बाकी माताओं से संपर्क शुरू किया।

शाम तक ग्यारह परिवार जुड़ गए।

अगली सुबह सत्रह।

तीसरे दिन छब्बीस।

हर घर की कहानी अलग थी।

लेकिन उनमें एक चीज़ समान थी।

बच्चे घर आकर खुद को सुधारने की कोशिश कर रहे थे जबकि गलती उनकी थी ही नहीं।

किसी बच्ची ने स्कूल में खाना छोड़ दिया था क्योंकि दाल गिरने से वर्दी खराब हो सकती थी।

एक बच्ची खेल के समय भागती नहीं थी क्योंकि पसीना आने से डरती थी।

एक नौ साल की बच्ची अपने बैग में तीन रूमाल रखती थी और हर घंटे चेहरा पोंछती थी।

एक माँ ने बताया कि उसकी बेटी ने आईने के सामने खड़े होना कम कर दिया था।

मैं हर बात सुनती और मेरे सामने आराध्या का बंद बाथरूम आता।

उस बीच स्कूल ने अपना पहला कदम चला।

सभी अभिभावकों को संदेश आया—

“कुछ असत्य और भ्रामक बातें फैल रही हैं। कृपया अपुष्ट जानकारी साझा न करें।”

उसके बीस मिनट बाद मुझे प्रधानाचार्य का फोन आया।

मैंने उठाया।

माथुर ने कहा—

—कविता जी, आप काफी सक्रिय दिखाई दे रही हैं।

मैंने खिड़की से नीचे सड़क देखी।

—हाँ।

—आप समझदार महिला हैं। बच्ची हमारे स्कूल में पढ़ती है। भविष्य लंबा है।

—सीधी बात कीजिए।

कुछ पल चुप्पी।

फिर वह बोले—

—बिना पूरी जानकारी के स्कूल की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाना आपके लिए भी ठीक नहीं होगा।

मैंने पूछा—

—क्या आप आराध्या का नाम सूची में होने से इनकार कर रहे हैं?

वह चुप।

—क्या आप “विशेष स्वच्छता सुधार सूची” से इनकार कर रहे हैं?

फिर चुप।

—क्या आप सीमा मैडम की उस बात से इनकार कर रहे हैं कि “डरेंगी तभी याद रखेंगी”?

इस बार उनकी सांस की आवाज़ सुनाई दी।

उन्होंने पूछा—

—आपके पास क्या है?

मैंने फोन काट दिया।

उसी शाम स्कूल ने हमें बैठक के लिए बुलाया।

शनिवार।

सुबह ग्यारह बजे।

सिर्फ चुनिंदा अभिभावक।

हमने जाने का फैसला किया।

लेकिन इस बार अकेले नहीं।

छब्बीस परिवारों ने अपनी लिखित शिकायत तैयार की।

मिताली ने भी हस्ताक्षर किए।

सुरक्षा विभाग के विजय ने एक छोटा बयान दिया कि पुराने दृश्य हटाने का निर्देश आया था।

हमने सामग्री की तीन अलग प्रतियाँ बनाईं।

एक हमारे पास।

एक शिक्षा विभाग के लिए।

एक बाल अधिकार कार्यालय के लिए।

मैंने आराध्या को कुछ नहीं दिखाया।

लेकिन शुक्रवार की रात वह खुद मेरे कमरे में आई।

उसके हाथ में वही स्कर्ट थी।

उसने उसे बिस्तर पर रखा।

मैंने कुछ नहीं पूछा।

वह किनारे बैठी।

कुछ देर बाद बोली—

—आपको मिल गया?

—क्या?

उसने उंगली से अंदर की सिलाई छुई।

मैंने सिर हिलाया।

उसका चेहरा नीचे हो गया।

—मैंने ठीक से नहीं सिला।

उस एक वाक्य ने मुझे भीतर तक रोक दिया।

वह सात हफ्तों से जिस बात को छिपा रही थी, उसमें भी उसे अपनी सिलाई खराब होने की चिंता थी।

मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई।

—तुमने वह हिस्सा क्यों हटाया?

उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी—

—उस पर मुहर लग गई थी।

—क्यों?

—मेरी स्कर्ट पर खाना गिर गया था।

मैंने कुछ नहीं कहा।

—सीमा मैडम ने कहा था कि जो बच्चा खुद को साफ नहीं रख सकता, उसे घर वाले भी ठीक से नहीं सिखाते।

उसने मेरी ओर देखा।

—मैं नहीं चाहती थी कि वो आपके बारे में ऐसा कहें।

मैं बोल नहीं सकी।

इतने दिनों तक मैं सोच रही थी मेरी बच्ची खुद को बचा रही थी।

वह तो मुझे बचाने की कोशिश कर रही थी।

आराध्या ने आगे कहा—

—पहली बार सिर्फ खाना गिरा था। फिर अगली बार मेरे बाल खराब थे। फिर खेल के बाद कपड़े गीले थे। फिर मेरे बैग में वो चीज़ मिली थी जो दादी ने दी थी।

मैं समझ गई।

कुछ महीने पहले उसके शरीर में बदलाव शुरू हुए थे। दादी ने एहतियात के लिए उसके बैग की छोटी जेब में निजी स्वच्छता की सामग्री रख दी थी।

स्कूल में किसी ने बैग क्यों देखा था?

मैंने पूछा—

—तुम्हारा बैग किसने खोला?

—जाँच होती थी।

—सबकी?

उसने सिर हिलाया—

—कभी-कभी।

—किसके सामने?

—कक्षा में नहीं। बाहर।

मैंने अपनी आवाज़ स्थिर रखी।

—फिर?

—मैडम ने कहा था कि इतनी छोटी उम्र में यह सब बैग में लेकर घूमना अच्छी आदत नहीं है। उन्होंने मेरा नाम फिर लिख दिया।

उसने उंगलियों से स्कर्ट की सिलाई छुई।

—मैंने सोचा शायद सच में मुझमें ही कुछ खराब है।

मैंने उसका चेहरा अपनी ओर करने की कोशिश नहीं की।

मैंने बस अपना हाथ बिस्तर पर उसके पास रख दिया।

कुछ सेकंड बाद उसने खुद अपनी हथेली मेरे हाथ पर रख दी।

अगली सुबह स्कूल का सभागार लगभग भर चुका था।

स्कूल ने शायद सोचा था दस या बारह लोग आएँगे।

सत्तर से ज्यादा माता-पिता पहुँच गए।

कुछ उन बच्चों के भी जिनके नाम सूची में नहीं थे।

सीमा मंच के पास खड़ी थी।

उसने मुझे देखा।

फिर मेरे हाथ की फाइल देखी।

उसकी मुस्कान उस दिन पहली बार गायब हुई।

माथुर ने माइक उठाया—

—हम यहाँ कुछ गलतफहमियाँ दूर करने के लिए एकत्र हुए हैं।

पीछे से किसी पिता ने कहा—

—पहले सूची दिखाइए।

सभागार में आवाज़ें उठीं।

माथुर ने हाथ ऊपर किया—

—कृपया अनुशासन बनाए रखें।

मैं सामने वाली पंक्ति में बैठी थी।

सीमा ने माइक लिया—

—स्कूल ने सिर्फ स्वच्छता संबंधी मार्गदर्शन दिया है। किसी बच्चे को अपमानित नहीं किया गया।

रश्मि मेरे बगल से उठी।

उसने पूछा—

—“दोपहर दल” क्या है?

सीमा ने कहा—

—ऐसा कोई औपचारिक दल नहीं।

—विशेष स्वच्छता सुधार सूची?

सीमा का चेहरा तन गया।

—आंतरिक कामकाज की कुछ सूचियाँ हो सकती हैं।

मैं खड़ी हुई।

—उनमें बच्चों के नाम हैं?

—मुझे याद नहीं।

—आराध्या मिश्रा?

सीमा ने मेरी ओर देखा।

—मुझे याद नहीं।

मैंने मिताली को देखा।

वह पीछे खड़ी थी।

मैंने मंच की ओर बढ़कर छोटी काली चिप मेज पर रख दी।

बस रखी।

कुछ कहा नहीं।

सीमा की नजर उस पर टिक गई।

वही आधा पल।

वही जो पहली बार तस्वीर दिखाने पर आया था।

माथुर तुरंत बोले—

—यह क्या है?

मैंने जवाब दिया—

—जो आपको याद नहीं, उसका हिसाब।

स्कूल प्रबंधन समिति की अध्यक्ष भी उस दिन मौजूद थीं। शायद स्कूल ने उन्हें सिर्फ औपचारिकता के लिए बुलाया था।

उन्होंने प्रधानाचार्य की ओर देखा—

—चलाइए इसे।

माथुर बोले—

—इसकी प्रामाणिकता—

अध्यक्ष ने उनकी बात बीच में रोक दी—

—चलाइए।

सभागार की बड़ी स्क्रीन चालू हुई।

पहला दृश्य।

गलियारा।

पाँच बच्चियाँ।

सीमा।

सूची।

धूसर एप्रन।

दूसरा।

तीसरा।

फिर आराध्या।

मेरी बेटी स्क्रीन पर खड़ी थी।

मेरे पीछे बैठे लोगों में फुसफुसाहट बंद हो गई।

मैंने पीछे नहीं देखा।

मुझे स्क्रीन भी नहीं देखनी थी।

मैं वह दृश्य पहले देख चुकी थी।

फिर रजिस्टर की तस्वीर आई।

एक-एक नाम।

कारण।

तारीख।

गिनती।

फिर आवाज़ चली।

“हर बात घर पहुँचेगी तो स्कूल चलाएँगे या पंचायत?”

कोई नहीं हिला।

फिर माथुर की आवाज़—

“इस तिमाही निरीक्षण है। साफ-सफाई की शिकायत शून्य चाहिए।”

और अंत में सीमा की आवाज़—

“डरेंगी तभी याद रखेंगी।”

उसके बाद मैंने कुछ नहीं कहा।

यही वह जगह थी जहाँ किसी भाषण की जरूरत नहीं थी।

सीमा मंच के बीच में खड़ी थी।

उसके पीछे स्कूल का बड़ा आदर्श वाक्य लिखा था—

“सम्मान से सीखें, विश्वास से बढ़ें।”

उसके ठीक नीचे उसकी अपनी आवाज़ सभागार में गूँजकर खत्म हुई थी।

प्रबंधन अध्यक्ष ने धीरे से माइक अपनी ओर खींचा।

उन्होंने सीमा को देखा—

—आप अभी सभागार छोड़िए।

सीमा का चेहरा बदल गया।

—मैडम, आप पूरी बात—

—अभी।

सीमा ने माथुर की ओर देखा।

पहली बार माथुर ने उसकी तरफ नहीं देखा।

वह मंच से उतरी।

जिस गलियारे में वह महीनों बच्चों को सूची देखकर अलग करती रही थी, उसी तरफ का दरवाज़ा खुला।

वह बाहर चली गई।

कुछ मिनट बाद अध्यक्ष ने माथुर से पूछा—

—क्या पुराने कैमरा दृश्य हटाने का निर्देश आपने दिया था?

माथुर बोले—

—नियमित व्यवस्था के तहत—

पीछे बैठे विजय खड़े हो गए।

—नहीं सर। आपने तारीख देकर कहा था कि निरीक्षण से पहले पिछली सामग्री साफ कर दें।

माथुर ने उनकी ओर देखा।

विजय बैठ गए।

बात वहीं खत्म हो गई।

उस दिन किसी ने तालियाँ नहीं बजाईं।

मुझे अच्छा लगा।

क्योंकि यह जीत का तमाशा नहीं था।

हमारे बच्चों ने कुछ जीता नहीं था।

उनसे जो छीन लिया गया था, हम बस उसे वापस लेने की शुरुआत कर रहे थे।

दोपहर दो बजे तक शिक्षा विभाग के दो अधिकारी स्कूल पहुँच चुके थे।

अभिभावकों की शिकायत पहले ही जमा हो चुकी थी।

बाल अधिकार कार्यालय को भी सामग्री भेजी जा चुकी थी।

उसी शाम स्कूल प्रबंधन ने सूचना जारी की।

सीमा को तत्काल जिम्मेदारियों से हटाया गया।

माथुर को जाँच पूरी होने तक पद से अलग किया गया।

“विशेष स्वच्छता सुधार” व्यवस्था बंद।

सभी संबंधित अभिलेख सुरक्षित रखने का निर्देश।

तीन दिन बाद जिला स्वच्छ परिसर सम्मान का निरीक्षण रद्द कर दिया गया।

जिस पुरस्कार के लिए बच्चों की शिकायतें शून्य दिखाई जा रही थीं, उसी पुरस्कार की दौड़ से स्कूल बाहर हो गया।

एक हफ्ते बाद समाचार माध्यमों में मामला पहुँचा।

पहले नोएडा।

फिर दिल्ली।

फिर दूसरे शहरों में माता-पिता अपनी-अपनी स्कूल व्यवस्थाओं पर सवाल उठाने लगे।

मुझे कई अनजान महिलाओं के संदेश आए।

कुछ ने सिर्फ एक पंक्ति लिखी—

“आज मैंने बेटी से पूछा कि स्कूल में कोई उसे शर्मिंदा तो नहीं करता।”

मैं उन संदेशों का उत्तर नहीं दे पाती थी।

मुझे बार-बार लगता था, अगर हमारी नाली उस दिन बंद न होती तो?

अगर नीले-सफेद धागे बाहर न आते?

अगर मिताली चुप रहती?

अगर विजय दृश्य मिटा देता?

शायद आराध्या कुछ महीने बाद बाथरूम में बंद होना छोड़ देती।

और हम सोचते कि आदत चली गई।

लेकिन आदत नहीं जाती।

शब्द रह जाते हैं।

“गंदी।”

आराध्या के लिए वह शब्द हटने में समय लगा।

हमने उसे अगले दो सप्ताह स्कूल नहीं भेजा।

फिर स्कूल प्रबंधन ने बच्चों और अभिभावकों के लिए अलग सहायता व्यवस्था शुरू की।

नई प्रधानाचार्या आईं।

पहले ही दिन उन्होंने किसी मंच से भाषण नहीं दिया।

उन्होंने हर कक्षा में एक छोटा डिब्बा रखवाया जिसमें बच्चा बिना नाम लिखे अपनी परेशानी डाल सकता था।

पीछे वाला तथाकथित स्वास्थ्य कक्ष बदला गया।

दरवाज़े का पुराना ताला हटाया गया।

वहाँ अब कोई सूची नहीं थी।

कोई मुहर नहीं।

कोई “सुधार” पर्ची नहीं।

आराध्या स्कूल वापस जाने के दिन सुबह सात बजे तैयार होकर बैठक में आई।

वही नीली-सफेद वर्दी।

लेकिन वह पुरानी सिली हुई स्कर्ट नहीं।

मैंने नई खरीदी थी।

वह जूते पहनते-पहनते रुकी।

—माँ?

—हाँ?

—अगर आज कपड़ों पर खाना गिर गया तो?

मेरे मुंह तक कई जवाब आए।

मैंने सिर्फ कहा—

—तो घर आकर कपड़े धो देंगे।

उसने मेरी ओर देखा।

मैंने उसके फीते बाँधते हुए कहा—

—कपड़ा गंदा हो सकता है। बच्चा नहीं।

उसने कुछ नहीं कहा।

बस अपना बस्ता उठा लिया।

स्कूल से लौटने का समय हुआ तो मैं जानबूझकर बाथरूम के पास नहीं खड़ी हुई।

दो बजकर उन्नीस मिनट पर दरवाज़ा खुला।

जूते बाहर निकले।

बस्ता सोफे पर गिरा।

मेरी पीठ रसोई की ओर थी।

मैंने पानी चलने की आवाज़ का इंतज़ार किया।

नहीं आई।

पीछे से उसकी आवाज़ आई—

—माँ, खाने में क्या है?

मैंने पलटकर देखा।

उसके बाल उलझे थे।

कमीज पर हल्का पीला दाग था।

एक मोज़ा नीचे खिसका हुआ।

वही पुरानी आराध्या नहीं।

लेकिन उसके करीब।

बहुत करीब।

मैंने प्लेट निकाली।

वह कुर्सी पर बैठी और बिना कपड़े बदले खाना खाने लगी।

उस दिन बाथरूम का दरवाज़ा खुला रहा।

और कई हफ्तों बाद पहली बार हमारे घर में दोपहर के समय लगातार पानी बहने की आवाज़ नहीं आई।

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