शिक्षिका ने मेरी बेटी का बैग ज़मीन पर पटका और चिल्लाई—50000 रुपये दो, वरना इसे पूरी दुनिया के सामने चोर बनाकर जेल भिजवाऊँगी! //

विक्रम और मैं एक ही गाँव के रहने वाले थे।

उसके पिता की पुरानी ट्रैक्टर ट्रॉली हमेशा मेरे गैरेज में मरम्मत के लिए आती थी।

हम दोनों ने गाँव के एक ही प्राथमिक स्कूल से पढ़ाई की थी।

लेकिन मैंने कभी रिया के स्कूल में विक्रम के पद या पहचान का ढिंढोरा नहीं पीटा था।

मेरा मानना था कि अपनी बेटी को खुद के दम पर पढ़ाना चाहिए, किसी की सिफारिश पर नहीं।

मैंने विक्रम से शांत स्वर में कहा—

—विक्रम, पहले सीसीटीवी फुटेज देख लो।

विकास खन्ना का चेहरा पीला पड़ने लगा था।

—सर, वो अंदर का कैमरा तो काम नहीं कर रहा…

विक्रम ने कड़े लहजे में कहा—

—जितने कैमरे चल रहे हैं, सबका फुटेज लाओ। अभी।

ट्रस्टी ने तुरंत अपने लैपटौप पर सीसीटीवी का बैकअप खोला और टेबल पर रख दिया।

विक्रम ने समय मिलाया।

सुबह 10 बजकर 20 मिनट।

स्क्रीन पर कॉरिडोर का दृश्य दिखाई दिया।

10 बजकर 22 मिनट पर रिया हाथ में अटेंडेंस रजिस्टर लेकर क्लास के दरवाजे से अंदर गई।

ठीक 35 सेकंड बाद, 10 बजकर 23 मिनट पर रिया बाहर निकल आई।

उसके दोनों हाथ खाली थे।

उसके कपड़ों में कोई उभार नहीं था, न ही उसकी जेबों में कुछ छिपा था।

विक्रम ने वीडियो पॉज किया।

वह स्वाति शर्मा की तरफ मुड़ा।

—मैडम, आपके मुताबिक 50000 रुपये की मोटी गड्डी पर्स में रखी थी।

—हाँ सर! बिल्कुल पर्स के अंदर थी! स्वाति ने घबराते हुए कहा।

—तो क्या 9 साल की इस बच्ची ने 35 सेकंड के अंदर क्लास में प्रवेश किया, आपका भारी बैग खोला, वॉलेट निकाला, 50000 रुपये की गड्डी निकाली, वॉलेट बंद किया, बैग बंद किया और खाली हाथ बाहर आ गई?

स्वाति के पास कोई जवाब नहीं था।

वह हकबका गई।

—सर… हो सकता है उसने पैसे अपनी ड्रेस के अंदर छिपा लिए हों!

विक्रम ने वीडियो आगे बढ़ाया।

10 बजकर 30 मिनट पर सफाईकर्मी रामू झाड़ू-पोछा लेकर क्लास में गया।

वह 10 मिनट तक अंदर रहा और 10 बजकर 40 मिनट पर बाहर आया।

10 बजकर 45 मिनट पर स्वाति शर्मा खुद हाथ में चाय का कप लिए क्लास में आई।

विक्रम ने वीडियो को थोड़ा पीछे किया और जूम करने को कहा।

10 बजकर 21 मिनट।

रिया के अंदर जाने से ठीक 1 मिनट पहले का फुटेज।

क्लास के बाहर लगे खिड़की के शीशे में अंदर का हल्का अक्स दिख रहा था।

विक्रम ने स्क्रीन पर उंगली रखी।

—यहाँ देखिए।

सबकी नजरें स्क्रीन पर टिक गईं।

स्वाति शर्मा खुद अपने बैग से पीला लिफाफा निकाल रही थी।

उसने लिफाफे में से नोटों की गड्डी निकाली और अपने कोट की अंदरूनी जेब में रख ली।

फिर उसने खाली लिफाफे को वापस पर्स में डाल दिया।

क्लास में सन्नाटा छा गया।

स्वाति का चेहरा सफेद पड़ गया था।

उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं।

प्रिंसिपल विकास खन्ना ने तुरंत अपनी पोज़िशन बदल ली।

वह स्वाति पर चिल्लाया—

—स्वाति मैडम! यह क्या नीच हरकत है? आपने स्कूल का नाम खराब कर दिया!

विक्रम ने विकास को हाथ के इशारे से चुप कराया।

—मिस्टर प्रिंसिपल, जरा शांत रहिए। आपकी भूमिका भी अभी साफ होगी।

विक्रम ने सिपाही से कहा—

—मैडम का कोट चेक करो।


स्वाति पीछे हटने लगी।

—आप मुझे हाथ नहीं लगा सकते! मैं महिला हूँ!

तभी बाहर से एक महिला पुलिस कांस्टेबल अंदर आई।

उसने स्वाति के कोट की अंदरूनी जेब में हाथ डाला।

500-500 रुपये के कड़क नोटों की गड्डी बाहर निकल आई।

वही 50000 रुपये।

महिला सिपाही ने नोटों की गड्डी टेबल पर रख दी।

रुपयों के ऊपर वही रबड़ बैंड लगा था जैसा स्वाति के बैग में रखे लिफाफे पर था।

मैं रिया के पास घुटनों के बल बैठा।

उसके चेहरे से आंसू पोंछे।

—रिया, अब रोना बंद करो। तुम्हारे पापा यहाँ हैं।

रिया ने मुझे ज़ोर से गले लगा लिया।

विक्रम ने स्वाति की तरफ देखा।

—अब बताइए, 50000 रुपये आपकी जेब में कैसे आए?

स्वाति कांपने लगी।

—सर… गलती हो गई… मुझे अचानक पैसों की बहुत सख्त ज़रूरत थी…

—ज़रूरत थी तो एक मासूम बच्ची पर चोरी का झूठा आरोप लगा दिया? उससे 50000 रुपये ऐंठने की साजिश रची? विक्रम की आवाज में कड़ापन था।

स्वाति की नजरें नीचे झुक गईं।

मैंने आगे बढ़कर कहा—

—विक्रम, बात सिर्फ पैसों की नहीं है।

—अगर मैं डर जाता, अगर मैं इसे 50000 रुपये दे देता, तो मेरी बेटी जिंदगी भर खुद को चोर समझती। यह बच्चों के मन के साथ खिलवाड़ है।

विकास खन्ना तुरंत मेरे सामने हाथ जोड़ने लगा।

—यादव जी, हमें माफ कर दीजिए। स्कूल प्रशासन की तरफ से भारी भूल हुई है। हम स्वाति मैडम को अभी नौकरी से बर्खास्त करते हैं।

विक्रम ने विकास के हाथ नीचे करवाए।

—प्रिंसिपल साहब, इतनी जल्दी क्या है?

—जब यह मैडम झूठा आरोप लगा रही थी, तब आपने सीसीटीवी फुटेज देखने की ज़हमत क्यों नहीं उठाई?

—आपने सीधे इस गरीब पिता पर दबाव क्यों बनाया कि 50000 रुपये दो वरना केस दर्ज होगा?

विकास के पास कोई जवाब नहीं था।

वह बार-बार अपनी सोने की अंगूठी घुमा रहा था।

विक्रम ने सिपाही से कहा—

—इन दोनों को हिरासत में लो।

—स्वाति शर्मा पर धोखाधड़ी, झूठी एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश, और एक नाबालिग बच्ची को मानसिक प्रताड़ना देने का मामला दर्ज होगा।

—और प्रिंसिपल विकास खन्ना पर रंगदारी मांगने और सह-अभियुक्त होने की धाराएँ लगेंगी।

दोनों सिपाहियों ने स्वाति और विकास को पकड़ लिया।

स्वाति रोने लगी।

—सर, मुझे माफ कर दीजिए! मेरी नौकरी चली जाएगी! मेरी बदनामी हो जाएगी!

मैंने स्वाति की आँखों में देखा।

—आपने मेरी बेटी का बस्ता ज़मीन पर फेंकते वक्त उसकी बदनामी का नहीं सोचा था।

—आपने कहा था कि इसके नाम पर चोरी का दाग लगेगा। आज वही दाग आपके नाम पर लग रहा है।

पुलिस दोनों को बाहर ले जाने लगी।

क्लास के बाहर बाकी बच्चे और शिक्षक जमा हो चुके थे।

सबने देखा कि कैसे एक दबंग शिक्षिका और भ्रष्ट प्रिंसिपल को पुलिस ले जा रही थी।

विक्रम ने रिया के सिर पर हाथ रखा।

—रिया बेटी, तुम्हारी कोई गलती नहीं थी। तुम बहुत बहादुर हो।

रिया ने मुस्कुराकर विक्रम को देखा, फिर मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।

मैंने फर्श से रिया की किताबें उठाईं।

उसका टूटा हुआ पेंसिल बॉक्स और वो पिचका हुआ सेब भी बैग में रखा।

मैंने रिया का बस्ता उसके कंधों पर टांगा।

—चलो बेटा, घर चलें।

हम स्कूल के गलियारे से बाहर निकले।

धूप चमकदार थी।

मेरी खाकी पैंट पर लगा ग्रीस का दाग अब मुझे शर्मिंदा नहीं कर रहा था।

रिया ने मेरा हाथ थाम रखा था और गर्व से सिर उठाकर चल रही थी।

सच्चाई की जीत के सामने 50000 रुपये का लालच और अहंकार बिखर चुका था।

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