भाग 2: क्रिसमस की पूर्व संध्या पर मेरे अरबपति एक्स-हसबैंड ज़बरदस्ती मेरे घर में घुस आए, उन्हें पक्का यकीन था कि मैं किसी और मर्द की बाहों में मिलूँगी।//

क्रिसमस की पूर्व संध्या पर मेरा अरबपति पूर्व-पति यह सोचकर मेरे घर में घुस आया कि वह मुझे किसी दूसरे आदमी की बाँहों में पाएगा। लेकिन वहाँ उसे मेरे सोफे के पास रखे डायपर, हीटर के पास सूखते नन्हे मोज़े और मेरी छाती से लगा सोता हुआ नवजात बच्चा मिला।

हमारे तलाक के पाँच महीने बाद आखिरकार देक्लान राठौड़ को उस सच का पता चल गया, जिसे मैंने उससे छिपाकर रखा था।

और जिस पल मैंने फुसफुसाकर कहा—

“देक्लान… अपने बेटे से मिलो।”

उसके चेहरे से सारा गुस्सा गायब हो गया।

मैंने कभी किसी ताकतवर आदमी को इतना डरा हुआ नहीं देखा था।

कुछ ही मिनट पहले मैंने अपनी दिल्ली की बर्फीली-सी ठंडी रात में बाहर गाड़ी के तेज़ ब्रेक की आवाज़ सुनी थी। हमारे साउथ दिल्ली वाले घर की ड्राइववे में एक काली लग्ज़री कार आकर रुकी थी।

दरवाज़ा खोलते ही सामने देक्लान राठौड़ खड़ा था।

महँगा कश्मीरी कोट, काले बालों पर जमी हल्की नमी और चेहरे पर वही कठोर आत्मविश्वास, जिससे कभी उसके सामने पूरी बोर्डरूम खामोश हो जाती थी।

मैं उसे देखकर स्तब्ध रह गई।

“देक्लान? तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

उसकी आँखें मेरे पीछे घर के अंदर किसी को तलाश रही थीं।

“क्या कोई यहाँ है?”

मेरा पेट कस गया।

“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए। चले जाओ।”

लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी।

वह मुझे पीछे छोड़ते हुए घर के अंदर आ गया।

मैं जानती थी, वह क्या देखने की उम्मीद कर रहा था।

किसी दूसरे आदमी का कोट।

दो वाइन ग्लास।

या ऐसा कोई सबूत कि हमारे तलाक के पाँच महीने बाद मैंने उसे इतनी आसानी से अपनी जिंदगी से निकाल दिया था, जितनी आसानी से उसने कभी मुझे खुद को बेकार महसूस करा दिया था।

लेकिन फिर वह रुक गया।

मेरे लिविंग रूम ने उससे पहले ही सब कुछ कह दिया था, जो मैं कहने वाली थी।

सोफे के पास एक बेबी कार-सीट रखी थी।

कॉफी टेबल का आधा हिस्सा डायपर के पैकेटों से भरा था।

सोफे पर एक छोटा-सा कपड़ा पड़ा था।

और कमरे के कोने में रखे इलेक्ट्रिक हीटर के पास कई बेहद छोटे मोज़े सूख रहे थे।

“देक्लान…”

वह धीरे-धीरे मेरी तरफ मुड़ा।

मैं अपनी बाँहों में अपने नवजात बेटे को लिए खड़ी थी।

आरव एक हल्के नीले कंबल में लिपटा हुआ था। वह शांति से सो रहा था और उसकी एक नन्ही मुट्ठी उसके गाल के नीचे दबी हुई थी।

वह अभी एक सप्ताह का भी नहीं हुआ था।

देक्लान उसे घूरता रहा।

फिर मेरी तरफ देखा।

फिर दोबारा बच्चे की तरफ।

मैंने उसकी आँखों के पीछे तेजी से चल रही गणना देखी।

हमारे तलाक को पाँच महीने हो चुके थे।

और हमारी आखिरी रात को नौ महीने।

उसके चेहरे से अचानक सारा रंग उड़ गया।

“देक्लान,” मैंने धीमे से कहा और आरव को अपनी छाती से और कसकर लगा लिया।

“अपने बेटे से मिलो।”

उसने पीछे रखी कुर्सी को पकड़ लिया।

“मेरा… क्या?”

“तुम्हारा बेटा।”

कुछ सेकंड तक वह आदमी, जो करोड़ों के सौदों पर एक फोन कॉल में फैसला कर सकता था, जैसे साँस लेना ही भूल गया।

आरव हल्का-सा हिला और कुछ पल के लिए उसकी आँखें खुलीं।

देक्लान जम गया।

नवजात की आँखों का रंग अभी पूरी तरह तय नहीं हुआ था, लेकिन उनमें हल्की हरी झलक थी।

वही हरी झलक देक्लान की आँखों में भी थी।

सच उसके चेहरे पर किसी जोरदार चोट की तरह उतर गया।

“नहीं…” वह फुसफुसाया।

मैंने उसके चेहरे पर कुछ टूटते हुए देखा।

वह अविश्वास नहीं था।

वह दुःख था।

“हाँ।”

उसकी निगाह बच्चे से हट ही नहीं रही थी।

“उसका… नाम क्या है?”

“आरव नील राठौड़।”

इस बार उसने मेरी तरफ देखा।

‘नील’ देक्लान का बीच का नाम था, जिसे उसके परिवार में सिर्फ बेहद करीबी लोग जानते थे।

उसके होंठ खुले, लेकिन आवाज़ नहीं निकली।

मैंने इस पल की कल्पना न जाने कितनी बार की थी।

कभी मैंने सोचा था वह चिल्लाएगा।

कभी लगा था वह मुझ पर झूठ बोलने का आरोप लगाएगा।

कभी लगा था वह बिना कुछ कहे चला जाएगा।

लेकिन मैंने उसे इस तरह टूटते हुए कभी नहीं सोचा था।

वह एक कदम मेरी तरफ बढ़ा।

फिर रुक गया।

जैसे अचानक उसे एहसास हो गया हो कि अब उसे मेरे और बच्चे के बीच आने का अधिकार नहीं रहा।

“तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?”

उसकी आवाज़ टूट रही थी।

मैंने अपने सोते हुए बेटे की तरफ देखा।

मेरे पास बहुत सारे जवाब थे।

क्योंकि जब मुझे पता चला कि मैं गर्भवती हूँ, तब तक हमारी शादी बिखर चुकी थी।

क्योंकि देक्लान हर बहस को ऐसी बातचीत बना देता था जिसमें उसे जीतना जरूरी होता था।

क्योंकि उसके पैसे, उसके वकील और उसका प्रभाव मुझे डराते थे।

मुझे डर था कि अगर उसे आरव के बारे में पता चल गया, तो मुझे अपनी जिंदगी का बाकी हिस्सा सिर्फ अपने बेटे की माँ बने रहने के अधिकार के लिए लड़ना पड़ेगा।

लेकिन एक वजह ऐसी भी थी जिसे मैंने कभी ज़ोर से स्वीकार नहीं किया था।

मैंने उसकी आँखों में देखा।

“तुम सच में जानना चाहते हो?”

“हाँ।”

मैंने गहरी साँस ली।

“तो बैठो, देक्लान। क्योंकि हमारे तलाक से पहले जो हुआ था… वह वैसा नहीं था जैसा तुम समझते हो।”

उसके चेहरे का भाव बदल गया।

बाहर दिल्ली की ठंडी रात में धुंध गहराती जा रही थी। खिड़कियों पर लगी क्रिसमस की रोशनियाँ चुपचाप चमक रही थीं।

देक्लान धीरे से कुर्सी पर बैठ गया।

और उसी पल, जब वह पहली बार मेरे घर में आया था, तब से लेकर अब तक मुझे एक ऐसी बात समझ आई जिसने मुझे उसके गुस्से से भी ज्यादा डरा दिया।

उसे सचमुच पता नहीं था कि क्या हुआ था।

काफी देर तक देक्लान कुछ नहीं बोला।

वह कुर्सी के किनारे बैठा था। दोनों हाथों की उँगलियाँ आपस में जुड़ी थीं।

वह उस आदमी जैसा नहीं लग रहा था जिसकी तस्वीर बिज़नेस मैगज़ीन के कवर पर छपती थी।

वह किसी ऐसे इंसान जैसा लग रहा था जो गलती से किसी ऐसी जिंदगी में आ गया हो, जिसे वह पहचानता ही नहीं था।

आरव मेरी छाती से लगा हल्की आवाज़ करने लगा।

देक्लान की आँखें तुरंत उसकी तरफ उठ गईं।

यह अजीब था कि कुछ ही मिनटों में उसका पूरा ध्यान बदल चुका था।

कुछ देर पहले वह मेरे घर में किसी दूसरे आदमी का सबूत खोज रहा था।

अब इस कमरे में उसके लिए सिर्फ तीन लोग थे।

मैं।

वह।

और वह छोटा-सा इंसान, जिसके बारे में हम दोनों को साथ मिलकर पहले से पता होना चाहिए था।

मैं धीरे से सोफे पर बैठ गई।

“तुमने पूछा था कि मैंने तुम्हें क्यों नहीं बताया।”

देक्लान ने सिर हिलाया।

“लेकिन पहले तुम्हें एक बात समझनी होगी,” मैंने कहा।

“मैंने आरव को तुमसे इसलिए नहीं छिपाया क्योंकि मैं तुम्हें सज़ा देना चाहती थी।”

उसका जबड़ा हल्का-सा कस गया।

“मैं समझता हूँ।”

“नहीं। अभी तुम नहीं समझते।”

उसने मेरी तरफ देखा।

“ठीक है,” उसने धीरे से कहा। “शायद नहीं समझता।”

यह पहला बदलाव था जिसे मैंने महसूस किया।

जिस देक्लान से मेरी शादी हुई थी, वह तुरंत जवाब देता।

वह हर बात का बचाव करता।

जो बात उसे नहीं समझ आती, उसे समझाने लगता।

और आखिर में बातचीत को ऐसी बहस बना देता जिसमें जीतना जरूरी होता।

लेकिन आज वह चुप था।

वह इंतजार कर रहा था।

इसलिए मैंने शुरुआत की।

“मुझे गर्भवती होने का पता तलाक की सुनवाई से ग्यारह दिन पहले चला था।”

उसके चेहरे पर हल्का झटका आया।

“ग्यारह दिन?”

“हाँ।”

“और तलाक के कागज़ों पर हस्ताक्षर करते समय तुम्हें पता था?”

“हाँ।”

उसने नीचे देखा।

मैं लगभग देख सकती थी कि वह पीछे की तारीखें जोड़ रहा था।

“फिर तुमने मुझे फोन क्यों नहीं किया?”

“मैंने कोशिश की थी।”

उसने तुरंत मेरी तरफ देखा।

“क्या?”

“दो बार।”

“मुझे कोई फोन नहीं मिला।”

“मैंने यह नहीं कहा कि तुमने फोन उठाया था।”

वह चुप हो गया।

“पहली बार,” मैंने कहा, “प्रेग्नेंसी टेस्ट के अगले दिन मैंने तुम्हारे ऑफिस में फोन किया था।”

“मेरे ऑफिस?”

“तुम अपना निजी फोन नहीं उठा रहे थे।”

“मैं मुंबई में था।”

“मुझे पता है।”

उसने भौंहें सिकोड़ लीं।

“तुम्हें पता था?”

“तुम्हारी असिस्टेंट ने बताया था।”

“कौन-सी असिस्टेंट?”

“काव्या मेहरा।”

उसका चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

“काव्या?”

“हाँ।”

“उसने क्या कहा?”

“उसने कहा कि तुम उपलब्ध नहीं थे।”

“यह सामान्य बात थी।”

“फिर मैंने उसे बताया कि मुझे तुमसे निजी मामले में बात करनी है।”

देक्लान ने कुछ नहीं कहा।

“मैंने उससे कहा कि यह जरूरी है।”

उसकी आँखें सिकुड़ गईं।

“और?”

“उसने कहा कि तुमने स्टाफ को निर्देश दिया था कि तलाक से जुड़े मामलों के अलावा कोई भी निजी संदेश तुम तक न पहुँचाया जाए।”

देक्लान का चेहरा बदल गया।

“मैंने ऐसा कभी नहीं कहा।”

“मैं कैसे जानती?”

“मैंने कानूनी टीम से कहा था कि सामान्य बातचीत वकीलों के माध्यम से हो। मैंने काव्या से तुम्हें रोकने के लिए नहीं कहा था।”

“लेकिन मैं यह कैसे जानती?”

वह जवाब नहीं दे सका।

मैंने आगे कहा।

“दूसरी बार मैंने तुम्हारी माँ को फोन किया।”

उसका चेहरा और गंभीर हो गया।

“मेरी माँ?”

“हाँ।”

“उन्होंने क्या कहा?”

मैं कुछ पल चुप रही।

“उन्होंने पूछा कि क्या मैं तलाक को लेकर अपना फैसला बदलना चाहती हूँ।”

देक्लान ने आँखें बंद कर लीं।

“फिर?”

“मैंने कहा कि मुझे तुमसे सीधे बात करनी है।”

“और?”

“उन्होंने कहा कि तुम आखिरकार अपनी जिंदगी में आगे बढ़ रहे हो।”

उसकी आँखें खुलीं।

“यह उनकी बात थी?”

“हाँ।”

“मैं आगे बढ़ रहा था?”

“मुझे यही बताया गया।”

देक्लान ने सिर झुका लिया।

“मैंने उन्हें बताया कि बात दोबारा साथ आने की नहीं है।”

मैंने आरव को थोड़ा और ऊपर उठाया।

“लेकिन मैंने उन्हें गर्भावस्था के बारे में नहीं बताया।”

उसने तुरंत पूछा—

“क्यों?”

“क्योंकि मैं तुम्हें खुद बताना चाहती थी।”

कुछ क्षण तक हम दोनों चुप रहे।

“मानो या न मानो, देक्लान,” मैंने कहा, “मेरे लिए यह बात मायने रखती थी कि तुम्हें अपने बच्चे के बारे में मेरी जुबान से पता चले।”

उसकी आँखों में दर्द उभरा।

मैंने आगे कहा—

“फिर मैं तुम्हारे ऑफिस आई।”

देक्लान सीधा बैठ गया।

“तुम राठौड़ ग्रुप के ऑफिस आई थीं?”

“तलाक की सुनवाई से पहले वाले बुधवार को।”

“मैं उस दिन ऑफिस में था।”

“मुझे पता है।”

उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

“तुम बिल्डिंग में थीं?”

“चौबीसवीं मंजिल पर।”

“मेरी मंजिल?”

“हाँ।”

“मैंने तुम्हें नहीं देखा।”

“क्योंकि मुझे रिसेप्शन से आगे जाने ही नहीं दिया गया।”

वह अपनी हथेली से चेहरा रगड़ने लगा।

“काव्या?”

मैंने सिर हिलाया।

“वही बाहर आई थी।”

“उसने क्या कहा?”

मैंने कुछ पल आँखें बंद कीं।

मुझे आज भी वह लॉबी याद थी।

चमकता हुआ संगमरमर।

काँच की दीवारें।

महँगी खुशबू।

और उन सबके बीच मैं—पुराना हरा कोट पहने, हाथ में मेडिकल रिपोर्ट पकड़े, काँपती हुई।

मैं गर्भवती थी।

डरी हुई थी।

और शायद पहली बार फिर से उम्मीद कर रही थी।

“उसने कहा था—‘एलेना, वह इस रिश्ते को साफ तरीके से खत्म करना चाहता है। उसे जाने दो।’”

देक्लान ने मेरी तरफ देखा।

“और फिर?”

“उसने कहा कि तुमने हमारे रिश्ते को बचाने की बहुत कोशिश की है और अब तुम्हें शांति चाहिए।”

“मैंने ऐसा कभी नहीं कहा।”

“मुझे अब पता है।”

वह चुप रहा।

“तभी मैंने तय किया कि तलाक की सुनवाई से पहले तुम्हें नहीं बताऊँगी।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैं डर गई थी।”

उसने धीरे से पूछा—

“किससे?”

“तुमसे नहीं।”

मैंने उसकी आँखों में देखा।

“तुम्हारी ताकत से।”

वह बिल्कुल शांत हो गया।

“तुम्हारे पास पैसे थे। वकील थे। प्रभाव था। पूरी एक व्यवस्था थी।”

मैंने आरव के सिर पर हाथ फेरा।

“और मेरे पास सिर्फ मेरा डर था।”

देक्लान ने नजरें झुका लीं।

“मैंने कभी तुम्हारे बेटे को तुमसे छीनने की कोशिश नहीं की होती।”

“मुझे अब पता है।”

उसने मेरी तरफ देखा।

“लेकिन तब तुम्हें पता नहीं था।”

“नहीं।”

उसने बहुत धीमे से सिर हिलाया।

“यह मेरी गलती थी।”

मैं कुछ पल उसे देखती रही।

उसने बचाव नहीं किया।

दलील नहीं दी।

बस अपनी गलती स्वीकार कर ली।

शायद पहली बार।

तभी आरव हल्का-सा जागा।

देक्लान की नजर तुरंत उस पर चली गई।

मैंने पूछा—

“उसे गोद में लेना चाहोगे?”

देक्लान जैसे जम गया।

“अभी?”

“हाँ।”

“लेकिन मुझे नहीं पता कैसे।”

“कोई नहीं जानता।”

मैंने उसे पास बुलाया।

“बैठो।”

वह बैठ गया।

मैंने उसके हाथों की स्थिति ठीक की।

“सिर को सहारा देना।”

“यह मुझे पता है।”

“जानना और करना अलग चीजें हैं।”

उसने मेरी तरफ देखा।

“आजकल यह बात बार-बार सुनने को मिल रही है।”

मैं हल्का-सा मुस्कुरा दी।

धीरे से मैंने आरव को उसकी बाँहों में रख दिया।

देक्लान ने साँस रोक ली।

“आराम से।”

“मैं आराम से हूँ।”

“तुम ऐसे दिख रहे हो जैसे किसी ने तुम्हें बम पकड़ा दिया हो।”

“यह मदद नहीं कर रहा।”

आरव ने हल्की आवाज़ की।

देक्लान घबरा गया।

“वह ठीक है?”

“हाँ।”

“पक्का?”

“पक्का।”

आरव ने अपनी आँखें खोलीं।

देक्लान उसे देखता रह गया।

फिर आरव ने अपनी छोटी-सी उँगली देक्लान की एक उँगली के चारों ओर लपेट ली।

देक्लान की आँखें भर आईं।

उसने बहुत धीमे से कहा—

“हैलो…”

आरव ने जम्हाई ली।

देक्लान हल्का-सा हँसा।

“लगता है अभी प्रभावित नहीं हुआ।”

मैंने कहा—

“उसकी पसंद काफी ऊँची है।”

“यह तुम पर गया है।”

मैंने उसे घूरा।

“क्या कहा?”

“कुछ नहीं।”

और उस रात पहली बार हमारे बीच कोई ऐसी मुस्कान आई जिसमें दर्द कम था।

कुछ देर बाद उसने पूछा—

“अब क्या होगा?”

मैंने उसकी तरफ देखा।

“मुझे नहीं पता।”

उसने आरव की तरफ देखा।

“मैं उसकी जिंदगी का हिस्सा बनना चाहता हूँ।”

मेरा दिल कस गया।

“मुझे उम्मीद थी।”

“लेकिन मैं आज तुमसे कोई फैसला लेने को नहीं कहूँगा।”

मैंने उसकी तरफ देखा।

यह वह देक्लान नहीं था जिसे मैं जानती थी।

“कोर्ट?”

“नहीं।”

“वकील?”

“नहीं।”

“कल सुबह कोई नोटिस?”

वह हल्का-सा मुस्कुराया।

“नहीं।”

“तो तुम क्या चाहते हो?”

उसने अपने बेटे की तरफ देखा।

“बस उसे फिर से देखना चाहता हूँ।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

“कब?”

“जब तुम तैयार हो।”

उस जवाब ने मुझे सबसे ज्यादा चौंकाया।

क्योंकि देक्लान हमेशा अपनी शर्तें तय करता था।

आज पहली बार वह मेरी शर्तों का इंतजार कर रहा था।

तभी ऊपर से मेरी माँ की आवाज़ आई।

“कल सुबह ग्यारह बजे आ जाना।”

मैंने चौंककर उनकी तरफ देखा।

वह आरव को गोद में लिए सीढ़ियों से उतर रही थीं।

“माँ!”

“क्या?”

“तुमने उसकी तरफ से फैसला क्यों कर दिया?”

माँ ने देक्लान की तरफ देखा।

“क्योंकि बच्चा किसी कागज़ पर नहीं पला करता।”

देक्लान चुप रहा।

फिर धीरे से बोला—

“मैं ग्यारह बजे आऊँगा।”

माँ ने सिर हिलाया।

“ठीक है।”

देक्लान दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

लेकिन जाने से पहले वह रुका।

“एलेना?”

“हाँ?”

“मैं पूरी कहानी जानना चाहता हूँ।”

मैंने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें पता नहीं है?”

उसने सिर हिलाया।

“नहीं।”

फिर उसने अपना फोन निकाला।

“आज दोपहर मुझे काव्या का ईमेल मिला।”

मेरी साँस रुक गई।

“काव्या का?”

“उसने पिछले महीने नौकरी छोड़ दी थी।”

“उसने क्या लिखा?”

देक्लान की आँखों में पहली बार डर दिखाई दिया।

“उसने लिखा कि हमारे बारे में एक बात है जो मुझे वर्षों पहले बता देनी चाहिए थी।”

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

“कौन-सी बात?”

“उसने ज्यादा कुछ नहीं बताया।”

“फिर?”

“उसने क्रिसमस के बाद मिलने के लिए कहा है।”

मैंने धीरे से पूछा—

“क्यों?”

“मुझे नहीं पता।”

“क्या उसने मेरा नाम लिया?”

“हाँ।”

मेरी धड़कन तेज हो गई।

“क्या कहा?”

देक्लान ने मेरी आँखों में देखा।

“उसने लिखा था—‘एलेना ने तुम्हें चुनना बंद नहीं किया था। तुम्हें यह जानने का अधिकार है कि उसने कितनी बार तुम्हें चुनने की कोशिश की थी।’”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

मैंने कुछ नहीं कहा।

देक्लान ने भी नहीं।

हमारे पीछे क्रिसमस ट्री की रोशनियाँ चमक रही थीं।

मेरी बाँहों में आरव सो रहा था।

और बाहर दिल्ली की ठंडी रात और गहरी होती जा रही थी।

पाँच महीने बाद मैंने देक्लान को वह सच बता दिया था, जिसे मैंने इतने समय तक अपने भीतर छिपाकर रखा था।

लेकिन उस रात मुझे पहली बार एहसास हुआ—

शायद हमारे विवाह के भीतर एक और ऐसा रहस्य छिपा था, जिसकी सच्चाई से हम दोनों अनजान थे।

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