PART 2
दरवाजा बंद होते ही बाहर का शोर हल्का पड़ गया।
विश्राम कक्ष में एक पुराना पंखा घूम रहा था।
शालिनी सामने पड़ी लकड़ी की कुर्सी पर नहीं बैठी।
उसने लिफाफा मेज पर रखा।
दो बार हाथ बढ़ाया।
दोनों बार वापस खींच लिया।
मैं दरवाजे के पास खड़ा था।
उसने मुझे भीतर आने के लिए नहीं कहा था।
हरीश जी ने कहा था।
उन्होंने शायद समझ लिया था कि यह बातचीत किसी सरकारी निरीक्षण का हिस्सा नहीं रही।
शालिनी ने मेरी तरफ देखे बिना पूछा—
—तुम्हें पता है इसमें क्या लिखा है?
—नहीं।
—अंदाजा?
मैंने दीवार पर लगी घड़ी देखी।
तीन बजकर सत्रह मिनट।
—अंदाजा लगाकर सात साल खराब किए जा सकते हैं। सच नहीं बदला जा सकता।
वह कुर्सी पर बैठ गई।
उसने अपनी चाँदी की अंगूठी घुमाई।
यही उसकी पुरानी आदत थी।
परीक्षा का परिणाम आने से पहले।
घर का किराया बाकी होने पर।
अपने पिता से नाराज होने पर।
मैंने इतने साल बाद वह हरकत देखी तो प्लेटफार्म पर टँगी पर्ची से ज्यादा पुरानी एक तस्वीर मेरे सामने आ गई।
दिल्ली का हमारा एक कमरा।
एक लोहे की मेज।
दो कुर्सियाँ।
शालिनी किताब पर झुकी हुई।
और मैं महीने के खर्च को चार हिस्सों में बाँट रहा था।
उस समय वह अंगूठी सात सौ चालीस रुपये की नहीं थी।
वह मेरी पूरी एक दिन की कमाई से भी ज्यादा थी।
शालिनी ने लिफाफे की मोहर खोल दी।
अंदर चार चीजें थीं।
पहली, हाथ से लिखा छह पन्नों का पत्र।
दूसरी, बैंक की तीन पुरानी जमा पर्चियाँ।
तीसरी, दिल्ली के एक प्रशिक्षण संस्थान की फीस रसीदें।
चौथी, हमारे संयुक्त खाते से निकाली गई रकम का आवेदन।
उसने सबसे पहले आवेदन उठा लिया।
नीचे मेरे हस्ताक्षर थे।
साथ में उसके पिता देवेंद्र वर्मा के हस्ताक्षर भी थे।
उसका माथा सिकुड़ा।
उसने पहली जमा पर्ची देखी।
रकम—
एक लाख बीस हजार रुपये।
खाता उसके प्रशिक्षण संस्थान का था।
दूसरी—
एक लाख पचास हजार।
तीसरी—
एक लाख दस हजार।
कुल वही रकम थी।
तीन लाख अस्सी हजार रुपये।
जिसे लेकर सात साल से उसकी कहानी में मैं घर छोड़कर भागा हुआ आदमी था।
उसके हाथ धीरे-धीरे नीचे आए।
मैं कुछ नहीं बोला।
उसे प्रमाण से ज्यादा समय की जरूरत थी।
उसने पत्र खोला।
पहली पंक्ति पढ़ते ही उसकी पीठ कुर्सी से अलग हो गई।
मैंने उसके चेहरे पर नजर नहीं जमाई।
खिड़की के बाहर देखा।
प्लेटफार्म पर एक बच्चा अपनी माँ का हाथ खींचकर मेरे ठेले की ओर इशारा कर रहा था।
शालिनी पत्र पढ़ती रही।
उसके पिता ने लिखा था कि जब वह दूसरी मुख्य परीक्षा की तैयारी कर रही थी, तब घर की आर्थिक स्थिति वैसी नहीं थी जैसी उन्होंने उसे बताई थी।
उनका छोटा कारोबार छह महीने से बंद था।
दिल्ली की फीस भरने के पैसे नहीं थे।
लेकिन बेटी को वापस बुलाने की हिम्मत भी नहीं हुई।
उन्होंने मुझसे कहा था—
“बस इस बार संभाल लो। चयन हुआ तो मैं धीरे-धीरे चुका दूँगा।”
मेरे पास भी तीन लाख अस्सी हजार नहीं थे।
संयुक्त खाते में एक लाख चालीस हजार थे।
बाकी के लिए मैंने अपनी छोटी फोटोप्रतिलिपि की दुकान बेच दी थी।
पुरानी मोटरसाइकिल भी।
फिर पैसा एक साथ उनके हाथ में देने के बजाय सीधे संस्थान के खाते में जमा किया।
शालिनी को बताया गया कि फीस उसके पिता ने भरी है।
मैंने उस समय विरोध नहीं किया।
क्योंकि परिणाम नाम का होता है।
फीस किसने भरी, यह परीक्षा में नहीं पूछा जाता।
पत्र के तीसरे पन्ने पर कहानी बदल गई थी।
शालिनी के पिता ने लिखा था कि गलती पैसे माँगने की नहीं थी।
गलती उसके बाद हुई।
मुख्य परीक्षा से करीब दो सप्ताह पहले मैं दिल्ली से प्रयागराज आया था।
घर का पुराना कर्ज बढ़ चुका था।
उन्होंने मुझसे फिर मदद माँगी।
मेरे पास कुछ नहीं बचा था।
मैंने मना कर दिया।
उस बात पर हमारे बीच बहस हुई।
उन्हें पहली बार लगा कि उनकी बेटी अगर अफसर बन गई तो मेरे साथ रहकर शायद उस जीवन में चली जाएगी जहाँ पिता का नियंत्रण कम होगा।
उनके भीतर का डर धीरे-धीरे अहंकार बन गया।
उन्होंने शालिनी को फोन किया।
और कहा कि संयुक्त खाते का पैसा मैं एक असफल व्यापार में लगा चुका हूँ।
फिर कहा कि मैं घर छोड़कर चला गया हूँ।
जब मैंने शालिनी से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे रोकने की कोशिश नहीं की।
बस एक बात कही—
“अभी उसे परीक्षा देने दो। उसके बाद जो कहना हो कहना।”
मैंने गलती की।
मैं मान गया।
दो दिन बाद मैंने शालिनी को फोन किया।
उसने फोन उठाया।
मैंने सिर्फ उसका नाम कहा था।
वह मेरी आवाज सुनते ही बोली थी—
—पापा ने सब बता दिया है।
मैंने कहा था—
—एक बार मेरी बात—
लेकिन उसने काट दिया।
—मुझे तुम्हारी जरूरत थी और तुमने वही समय चुना?
उसके बाद वह अंतिम वाक्य आया था।
दोबारा सामने न आने वाला।
मैंने फोन नीचे रख दिया।
अगले दिन उसकी परीक्षा थी।
मैंने दोबारा फोन नहीं किया।
पत्र में देवेंद्र जी ने लिखा था कि उन्होंने सोचा था परीक्षा के बाद सच बता देंगे।
फिर परिणाम आया।
शालिनी साक्षात्कार तक पहुँच गई।
फिर उनके भीतर एक और डर पैदा हुआ।
अगर सच खुला तो बेटी उनसे पूछेगी कि उन्होंने उसके पति को झूठा क्यों बनाया।
उन्होंने बात टाल दी।
शालिनी चयनित हो गई।
प्रशिक्षण के लिए चली गई।
महीने बीत गए।
झूठ जितना पुराना होता गया, उसे स्वीकार करना उतना कठिन होता गया।
आखिरी पन्ने पर उनकी लिखावट सीधी नहीं थी।
शालिनी उसे पढ़ते-पढ़ते रुक गई।
कमरे में पंखे की आवाज साफ सुनाई देने लगी।
उसने अगली पंक्ति पर उँगली रखी।
फिर मेरी ओर देखा।
उसकी आँखों में अब कोई अफसरी सवाल नहीं था।
उसने पत्र मुझे नहीं दिया।
सिर्फ पढ़ती रही।
उसके पिता ने लिखा था कि उन्होंने कई बार मुझे शालिनी से मिलने को कहा, लेकिन तब तक मैं एक ही जवाब देता था—
“जिस दिन वह खुद पूछेगी, मैं सब बता दूँगा। उसके जीवन में अपनी सफाई लेकर नहीं घुसूँगा।”
उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की थी।
यह भी लिखा था कि पैसा मैंने कभी वापस नहीं माँगा।
सबसे नीचे एक पंक्ति थी—
“बेटी, अगर तुम्हें रमाकांत छोटा आदमी लगे तो पहले यह याद करना कि तुम्हारे सबसे बड़े सपने के नीचे उसकी दुकान की कीमत लगी थी।”
शालिनी ने वहीं पढ़ना बंद कर दिया।
कोई बड़ा संवाद नहीं हुआ।
उसने सिर्फ अपनी कुर्सी पीछे खिसकाई।
चाँदी की अंगूठी घुमाने वाली उँगली अब स्थिर थी।
मैंने इतने वर्षों में कई बार सोचा था कि सच सामने आएगा तो मुझे कैसा लगेगा।
जीत जैसा?
न्याय जैसा?
कुछ नहीं लगा।
मेरे सामने एक औरत बैठी थी जिसे सात साल पुरानी अपनी जिंदगी दोबारा पढ़नी पड़ रही थी।
उसने तीसरी रसीद उठाई।
पीछे मेरी लिखावट थी—
“शेष किराया अगले सोमवार।”
उसका अंगूठा उसी जगह रुका।
यही वह छोटा विवरण था जो शायद उसे सबसे ज्यादा चुभा।
उस समय हम दिल्ली में किराए के एक कमरे में रहते थे।
शालिनी हर महीने मकान मालिक से कहती थी कि किराया मैं संभालता हूँ।
उसे कभी मालूम नहीं हुआ कि उसकी आखिरी प्रशिक्षण फीस भरने के बाद दो महीने तक मेरे पास पूरा किराया नहीं था।
उसने धीरे से पूछा—
—तुम कहाँ सोते थे?
मुझे सवाल समझ नहीं आया।
—क्या?
उसने रसीद दिखाई।
—जब दुकान बेच दी थी… तब तुम कहाँ रहते थे?
मैंने कुर्सी की पीठ पर हाथ रखा।
—पहले दुकान वाले कमरे में।
—दुकान तो बेच चुके थे।
—नए मालिक ने बीस दिन रहने दिया था।
—उसके बाद?
—स्टेशन के पास हरीश जी के साथ।
उसकी नजर तुरंत दरवाजे की तरफ गई।
हरीश जी बाहर खड़े थे।
शायद उन्हें अपना नाम सुनाई दिया।
उन्होंने दरवाजा आधा खोला।
शालिनी खड़ी हो गई।
उसने पूछा—
—आप इन्हें तभी से जानते हैं?
हरीश जी कुछ पल मुझे देखते रहे।
मैंने रोकने का इशारा नहीं किया।
उन्होंने कहा—
—करीब आठ साल से।
शालिनी ने पूछा—
—तब ये क्या करते थे?
हरीश जी अंदर आए।
—सुबह स्टेशन के बाहर चाय पहुँचाते थे। दोपहर में एक मुद्रणालय में काम। रात को बच्चों की किताबों की जिल्द बनाते थे।
शालिनी ने मेरी तरफ देखा।
—मुझसे कहा था कि प्रयागराज में नई दुकान शुरू कर रहे हो।
मैंने जवाब दिया—
—आपकी मुख्य परीक्षा थी।
हरीश जी ने कुछ समझकर नजर नीचे कर ली।
शालिनी वापस बैठी।
करीब एक मिनट बाद उसने पूछा—
—फिर समोसे?
मैंने पहली बार हल्की मुस्कान के साथ कहा—
—लोग किताब रोज नहीं खरीदते। खाना रोज खाते हैं।
उसके होंठ हिले, मगर मुस्कान नहीं आई।
उसने सामने रखी पर्चियों को इकट्ठा किया।
फिर अचानक उसकी नजर दरवाजे से बाहर मेरे ठेले पर गई।
वही छोटी पर्ची।
पाँच बच्चों के नाम।
उसने पूछा—
—वह फीस किसकी है?
मैंने कहा—
—इसका उस पुराने मामले से संबंध नहीं है।
—फिर भी जानना चाहती हूँ।
हरीश जी ने मेरी ओर देखा।
इस बार जवाब उन्होंने दिया।
—हमारे स्टेशन पर कुलियों, सफाईकर्मियों और ठेला लगाने वालों के बच्चों के लिए एक छोटी पढ़ाई सहायता योजना चलती है।
शालिनी ने पूछा—
—सरकारी?
हरीश जी मुस्कुराए।
—नहीं। रमाकांत की।
मैंने तुरंत कहा—
—मेरी अकेले की नहीं है।
उन्होंने मेरी बात अनसुनी कर दी।
—पहले साल तीन बच्चे थे। अब सत्रह हैं। कोई सौ देता है, कोई पाँच सौ। रमाकांत हर महीने सबसे बड़ा हिस्सा डालते हैं।
शालिनी ने पर्ची फिर देखी।
—क्यों?
इस बार मैंने जवाब देने से पहले थोड़ा समय लिया।
—क्योंकि मैंने देखा था कि पढ़ाई पैसे की कमी पर रुकती कैसी है।
वह मेरी तरफ देखती रही।
मैंने जोड़ा—
—और क्योंकि हर किसी को अपनी दुकान बेचने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।
इसके बाद कमरे में किसी ने कुछ नहीं कहा।
मुझे लगा बात पूरी हो चुकी है।
मैं वापस जाने लगा।
शालिनी ने पीछे से आवाज दी—
—रमाकांत।
मैं रुक गया।
—हाँ?
वह खड़ी थी।
हाथ में उसके पिता का पत्र था।
—तुमने शादी की अंगूठी क्यों नहीं उतारी?
यह वह सवाल था जिसके लिए मेरे पास कोई दस्तावेज नहीं था।
मैंने अपने हाथ की तरफ देखा।
—उतारने की जरूरत नहीं पड़ी।
—सात साल में?
—कुछ चीजें रखने से जिंदगी रुकती नहीं है।
मैं बाहर आ गया।
मेरे ठेले के पास पाँच लोग प्रतीक्षा कर रहे थे।
तेल ठंडा होने लगा था।
मैंने आँच बढ़ाई।
एक बुजुर्ग यात्री ने पूछा—
—भैया, समोसा मिलेगा या जिलाधिकारी ने दुकान बंद करा दी?
मैं हँस पड़ा।
—मिलेगा।
उस साधारण सवाल ने मुझे वापस मेरी दुनिया में ला दिया।
लेकिन शालिनी उस दिन अपनी दुनिया में वापस नहीं जा पाई।
करीब चालीस मिनट बाद निरीक्षण पूरा हुआ।
उसका काफिला निकल गया।
मुझे लगा कहानी यहीं खत्म हो जाएगी।
सात साल पहले उसने एक फैसला गलत जानकारी पर किया था।
आज सही जानकारी उसके पास थी।
बाकी उसका जीवन था।
रात नौ बजे मैंने ठेला बंद किया।
दिन की कुल बिक्री पाँच हजार दो सौ चालीस रुपये थी।
सामान और मजदूरी निकालने के बाद करीब चौदह सौ बचते।
मैंने पाँच सौ रुपये अलग रखे।
पर्ची पर “निधि” के आगे निशान लगाया।
अगले दिन उसकी विद्यालय फीस जमा करनी थी।
हरीश जी मेरे पास आए।
उन्होंने पूछा—
—घर चलोगे?
—दस मिनट।
वह कुछ देर खड़े रहे।
फिर बोले—
—महोदया ने तुम्हारा नंबर माँगा है।
मैंने पैसे गिने।
—आपने दिया?
—नहीं। कहा तुमसे पूछूँगा।
मैंने बक्सा बंद कर दिया।
—दे दीजिए।
बस इतना।
रात दस बजकर ग्यारह मिनट पर फोन आया।
नंबर नया था।
मैंने उठाया।
दूसरी तरफ कुछ सेकंड आवाज नहीं आई।
फिर शालिनी बोली—
—मैं हूँ।
—जानता हूँ।
—कैसे?
—जिनसे सात साल बात न हुई हो, उनकी चुप्पी भी याद रहती है।
वह फिर चुप हो गई।
मैंने कुर्सी खींची।
उसने पूछा—
—क्या तुम कल सुबह मुझसे मिल सकते हो?
—स्टेशन पर दस बजे तक काम रहता है।
शायद वह पुरानी शालिनी होती तो कहती कि जिलाधिकारी बुला रही है।
उसने सिर्फ पूछा—
—उसके बाद?
—साढ़े दस।
—ठीक है।
फोन कट गया।
अगली सुबह मैं जिला कार्यालय नहीं गया।
उसने भी नहीं बुलाया।
वह साढ़े दस बजे स्टेशन के बाहर वाली छोटी चाय की दुकान पर आई।
न सरकारी गाड़ी।
न सुरक्षाकर्मी।
सिर्फ एक साधारण सूती कुर्ता और वही चाँदी की अंगूठी।
मैंने पूछा—
—यहाँ क्यों?
उसने प्लास्टिक की कुर्सी खींची।
—क्योंकि तुम्हें मेरे कार्यालय में बुलाती तो फिर मैं अफसर होती और तुम मिलने आए आदमी।
उसने सामने की दूसरी कुर्सी की ओर इशारा किया।
—आज वह बातचीत नहीं करनी।
मैं बैठ गया।
चाय वाला मुझे पहचानता था।
उसने बिना पूछे दो चाय रख दीं।
शालिनी ने कप छुआ तक नहीं।
उसने कहा—
—मैंने रात भर पापा का पत्र पढ़ा।
मैंने जवाब नहीं दिया।
उसने आगे कहा—
—हर बार लगा कि कोई पंक्ति बदल जाएगी।
उसकी नजर मेज पर थी।
—नहीं बदली।
मैंने पूछा—
—अब क्या जानना है?
उसने मेरी तरफ देखा।
—सबसे पहले यह कि तुमने मुझे सच बताने की कोशिश सिर्फ एक बार क्यों की।
मैंने चाय उठाई।
यही सवाल मैं खुद से कई वर्ष पूछ चुका था।
—क्योंकि दूसरी कोशिश का मतलब तुम्हारी कही सीमा तोड़ना होता।
—पति-पत्नी में ऐसी सीमा नहीं होती।
—होती है, जब एक कह दे कि सामने मत आना।
उसने तुरंत कहा—
—मैं झूठ पर विश्वास कर रही थी।
—मुझे तब यह मालूम था।
—फिर?
मैंने कप नीचे रख दिया।
—आपकी परीक्षा अगले दिन थी। उसके बाद चयन हुआ। प्रशिक्षण शुरू हुआ। खबरों में तस्वीर आई। हर बार लगा, अब जाकर क्या कहूँ? कि जिसने तुम्हें पाला उसने झूठ बोला और जिस आदमी को तुमने निकाला वह सही था?
वह चुप रही।
मैंने कहा—
—सच बताना आसान था। आपके जीवन के दो रिश्तों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना मुश्किल था।
उसने धीरे से कहा—
—तुमने फैसला मेरे लिए कर दिया।
मैंने सिर हिलाया।
—हाँ। और वह मेरी गलती थी।
वह पहली बार मेरी तरफ ऐसे देखी जैसे शायद इसी जवाब की उम्मीद नहीं थी।
मैंने कहा—
—मैंने त्याग किया, इसलिए मेरी हर बात सही नहीं हो जाती।
उसके हाथ कप के पास आए।
—और मैंने बिना सुने फैसला किया।
मैंने कुछ नहीं कहा।
कुछ स्वीकारोक्तियाँ उत्तर नहीं माँगतीं।
करीब पाँच मिनट हम चाय की दुकान के सामने आते-जाते लोगों को देखते रहे।
फिर उसने पूछा—
—तुम स्टेशन पर ही क्यों रहे?
—काम था।
—तुम कोई दूसरी दुकान खोल सकते थे।
—खोली थी।
मैंने बताया कि तीन साल पहले स्टेशन के सामने किराए पर छोटी दुकान ली थी।
पहले महीने ठीक चली।
दूसरे महीने सड़क चौड़ीकरण में वह हिस्सा हट गया।
मुआवजे में बहुत पैसा नहीं मिला।
हरीश जी ने स्टेशन पुनर्वास योजना के बारे में बताया।
मैंने आवेदन किया।
ठेला मिल गया।
शालिनी ने पूछा—
—तुम्हें यह काम छोटा नहीं लगा?
मैंने उसकी तरफ देखा।
—काम क्यों छोटा लगेगा?
वह कुछ नहीं बोली।
शायद उसे अपने कल के शब्द याद थे।
“जो आदमी जिम्मेदारी छोड़कर जा सकता है…”
अब वही आदमी हर दिन सुबह साढ़े पाँच बजे उठकर आटा तैयार करता था, दो कर्मचारियों की मजदूरी देता था और सत्रह बच्चों की फीस के हिसाब में अपना हिस्सा जोड़ता था।
मैंने उसे यह सूची नहीं सुनाई।
ज़रूरत नहीं थी।
दोपहर तक हम अलग हो गए।
उसने जाते हुए सिर्फ पूछा—
—क्या मैं कभी फिर बात कर सकती हूँ?
मैंने कहा—
—पूछने की जरूरत नहीं।
अगले कुछ सप्ताह में हमारी मुलाकातें बढ़ीं।
लेकिन कहानी फिल्मों जैसी नहीं बदली।
वह अगले दिन सामान बाँधकर मेरे कमरे में नहीं आई।
मैं उसके सरकारी बंगले में नहीं गया।
हमारे बीच सात साल थे।
उन्हें एक माफी से छोटा नहीं किया जा सकता था।
कभी वह स्टेशन के बाहर चाय पीती।
कभी फोन करती।
कभी दो दिन बात नहीं होती।
एक शाम उसने पूछा—
—तुमने मेरे बारे में लोगों को क्या बताया?
—किसे?
—यहाँ।
मैंने कहा—
—कि मेरी पत्नी सरकारी सेवा में है।
वह कुछ सेकंड चुप रही।
—छोड़ा हुआ क्यों नहीं कहा?
—क्योंकि मुझे छोड़ा गया था, आपको बदनाम करने का अधिकार नहीं मिला था।
उसके बाद फोन पर सिर्फ उसकी साँस सुनाई दी।
चार दिन बाद स्टेशन पर जिला प्रशासन और रेलवे की संयुक्त बैठक थी।
इस बार शालिनी फिर पूरे दल के साथ आई।
लेकिन मेरा ठेला निरीक्षण सूची में नहीं था।
वह सीधे बैठक कक्ष चली गई।
बैठक खत्म होने पर करीब पैंतालीस कर्मचारी बाहर निकले।
मैंने ध्यान नहीं दिया।
फिर स्टेशन अधीक्षक मेरे पास आए।
—रमाकांत, पाँच मिनट चलना।
—समोसे?
—मोहन देख लेगा।
मैं उनके साथ चला गया।
प्रतीक्षालय में करीब पचास लोग थे।
रेलवे अधिकारी।
सफाईकर्मी।
कुली।
दुकानदार।
प्रशासन के कर्मचारी।
सामने शालिनी खड़ी थी।
मेरे कदम रुक गए।
मैंने हरीश जी की तरफ देखा।
उन्होंने कंधा उचकाया।
शालिनी के हाथ में कोई पत्र नहीं था।
कोई रसीद भी नहीं।
उसने मुझे सामने नहीं बुलाया।
उसने उपस्थित कर्मचारियों से कहा—
—पिछले निरीक्षण में मैंने यहाँ एक व्यक्ति के बारे में सार्वजनिक रूप से निजी टिप्पणी की थी।
कमरा शांत हो गया।
वह आगे बोली—
—वह टिप्पणी गलत जानकारी पर आधारित थी।
उसने मेरी तरफ देखा।
—गलती मेरी थी कि मैंने जानकारी की जाँच किए बिना एक आदमी के चरित्र पर फैसला किया।
बस।
न उसने पिता का नाम लिया।
न हमारे खाते का।
न मेरी दुकान बेचने की बात।
न अपने पद का सहारा लिया।
उसने सिर्फ उतना सार्वजनिक किया जितना अपमान सार्वजनिक हुआ था।
फिर उसने कहा—
—जिस जगह गलती सबके सामने हुई हो, सुधार भी वहीं होना चाहिए।
और वह अपनी कुर्सी पर बैठ गई।
मैं वहीं खड़ा रहा।
तालियाँ नहीं बजीं।
बजनी भी नहीं चाहिए थीं।
यह कोई समारोह नहीं था।
मुझे पहली बार लगा कि शालिनी सिर्फ अपना अपराधबोध हल्का नहीं कर रही।
वह जिम्मेदारी उठा रही थी।
बैठक खत्म हुई।
सब बाहर जाने लगे।
एक सफाईकर्मी महिला मेरे पास से गुजरते हुए बोली—
—भैया, आज समोसा जलेगा तो नहीं?
मैं हँसा।
—आप लोगों ने दस मिनट रोक लिया, अब एक खेप की जिम्मेदारी आपकी।
सामान्य जीवन वापस आ गया।
पर असली बदलाव उसके एक सप्ताह बाद हुआ।
शालिनी ने फोन किया।
उसने पूछा—
—तुम बच्चों की फीस किस नाम से जमा करते हो?
—क्यों?
—बस बताओ।
मैं सतर्क हो गया।
—अगर सरकारी पैसा दिलाने की सोच रही हो तो नियम देखकर करना। मेरा नाम मत लगाना।
उसने हल्के स्वर में कहा—
—तुम हमेशा मुझे आदेश देते थे या मैं भूल गई हूँ?
—परीक्षा के समय आप सुनती कहाँ थीं?
फोन के उस पार पहली बार उसकी हँसी सुनाई दी।
वही पुरानी।
छोटी।
अचानक आने वाली।
कुछ दिनों बाद जिला प्रशासन ने कोई निजी सहायता नहीं दी।
इसके बजाय शालिनी ने सरकारी विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों की सूची की समीक्षा शुरू करवाई।
जो योजनाएँ पहले से थीं, उन्हीं के आवेदन पूरे करवाए गए।
हमारी छोटी सहायता योजना से जुड़े सत्रह बच्चों में से ग्यारह सरकारी छात्रवृत्ति के पात्र निकले।
तीन परिवारों के दस्तावेज अधूरे थे।
दो के बैंक खाते नहीं जुड़े थे।
एक बच्ची निधि का जन्म प्रमाणपत्र गलत था।
दो महीने में ये काम पूरे हो गए।
उस दिन मैंने पहली बार समझा कि मेरे पास जितना था, मैं उतना कर सकता था।
उसके पास जो अधिकार था, उसका सही इस्तेमाल मुझसे कहीं ज्यादा लोगों तक पहुँच सकता था।
वह मेरे काम को अपने नाम से बड़ा नहीं बना रही थी।
बस जहाँ व्यवस्था रुकी थी, वहाँ उसे चला रही थी।
निधि की फीस वाली पर्ची मैंने ठेले से हटा दी।
अब उसका नाम छात्रवृत्ति सूची में था।
जिस दिन मैंने पर्ची उतारी, शालिनी वहीं खड़ी थी।
उसने पूछा—
—हटा क्यों रहे हो?
मैंने कहा—
—अब इसकी जरूरत नहीं।
उसने पर्ची हाथ में ली।
यही वही पर्ची थी जिसे उसने हमारी पहली मुलाकात में देखा था।
तब शायद उसे लगा था कि समोसे बेचने वाला पति पाँच छोटे हिसाबों में उलझा है।
अब उस कागज पर पाँच नाम नहीं थे।
पाँच घर थे।
उसने पर्ची मोड़ी नहीं।
सीधी करके मुझे वापस दी।
तीन महीने बाद देवेंद्र जी की बरसी आई।
शालिनी ने मुझे फोन नहीं किया।
सिर्फ एक संदेश भेजा—
“मैं शाम पाँच बजे घर जा रही हूँ। तुम आना चाहो तो दरवाजा खुला है।”
मैं गया।
सात वर्षों बाद उसके पुराने घर में कदम रखा।
दीवार पर उसके पिता की तस्वीर थी।
नीचे कोई बड़ा आयोजन नहीं था।
सिर्फ एक दीपक।
शालिनी फर्श पर बैठी थी।
उसने मुझे आते देखा।
कुछ नहीं कहा।
मैं उसके पास बैठ गया।
थोड़ी देर बाद उसने पिता का वही पत्र मेरे सामने रखा।
अब वह पारदर्शी आवरण में सुरक्षित था।
उसने पूछा—
—इसे रखूँ या जला दूँ?
मैंने तस्वीर की तरफ देखा।
—रखो।
—क्यों?
—क्योंकि आदमी की गलती मिटाने से वह आदमी पूरा अच्छा नहीं हो जाता। और गलती बचाकर रखने से पूरा बुरा भी नहीं।
वह चुप रही।
उसने पत्र वापस रख दिया।
उस दिन हमने पिता को दोषी साबित करने के लिए कोई लंबी बातचीत नहीं की।
उनकी तस्वीर दीवार पर रही।
उनकी गलती पत्र में।
दोनों सच एक ही घर में रह सकते थे।
हम बाहर निकले तो शाम हो चुकी थी।
दरवाजे पर शालिनी ने कहा—
—एक बात पूछूँ?
—हाँ।
—हमारे बारे में क्या सोचा है?
सात साल पहले यही प्रश्न शायद मुझे भीतर तक हिला देता।
अब मेरे पास सुबह की दुकान थी।
दो कर्मचारी थे।
किराया था।
बच्चों की सूची थी।
एक पूरी जिंदगी थी जो उसकी अनुपस्थिति में भी बनी थी।
मैंने कहा—
—सोचा है कि जल्दी फैसला नहीं करेंगे।
वह हल्का सा मुस्कुराई।
—यह मेरे लिए सजा है?
—नहीं।
मैंने दरवाजे की चौखट पर हाथ रखा।
—शायद पहली बार हम दोनों बिना किसी तीसरे आदमी के फैसले के अपना रिश्ता तय करेंगे।
उसने सिर हिलाया।
छह महीने बाद भी मैं प्लेटफार्म नंबर तीन पर समोसे बेच रहा था।
यही बात कई लोगों को समझ नहीं आई।
एक स्थानीय समाचार पत्र ने हमारी कहानी का थोड़ा हिस्सा सुन लिया था।
पत्रकार मेरे पास आया।
उसने पूछा—
—आपकी पत्नी इतनी बड़ी अधिकारी हैं। अब भी ठेला क्यों?
मैंने पूछा—
—मेरी पत्नी अधिकारी बन गई तो मेरा काम खराब हो गया?
वह हँसकर बोला—
—मेरा मतलब है, जिंदगी बदल सकती है।
मैंने गर्म समोसे कागज की प्लेट में रखे।
—बदली है।
उसने आसपास देखा।
—कहाँ?
मैंने प्लेट सामने बैठे एक कुली को दे दी।
—पहले मैं यह काम मजबूरी में करता था। अब अपनी मर्जी से करता हूँ।
उसने शायद इससे बेहतर उत्तर की उम्मीद की थी।
मुझे नहीं थी।
शालिनी ने सरकारी बंगला नहीं छोड़ा।
मैंने स्टेशन नहीं छोड़ा।
लेकिन रविवार की सुबह वह मेरे किराए के छोटे घर में आने लगी।
कभी आलू छीलती।
कभी किताब पढ़ती।
पहली बार उसने समोसा बनाने की कोशिश की तो आधे खुले रह गए।
मैंने एक उठाकर देखा।
वह नाराज हुई।
—हँसना मत।
मैंने कहा—
—जिलाधिकारी महोदया, यह जनता के लिए जोखिम है।
उसने बेलन मेरी तरफ बढ़ाया।
—खुद बना लो।
सात साल बाद हमारे घर में पहली बहस समोसों के आकार पर हुई।
शायद इसी से मुझे पता चला कि कुछ रिश्ते बड़े वादों से नहीं लौटते।
वे छोटी सामान्य बातों से लौटते हैं।
एक वर्ष बाद स्टेशन के सामने एक स्थायी दुकान आवंटित हुई।
पुनर्वास योजना में मेरा नंबर आया।
दुकान बड़ी थी।
अंदर छह मेजें रखी जा सकती थीं।
हरीश जी ने कहा—
—अब बोर्ड बदलना पड़ेगा।
मैंने पूछा—
—क्यों?
—“रमाकांत नाश्ता केंद्र” बहुत छोटा नाम है।
मैंने हँसकर कहा—
—काम चल रहा है।
दुकान खुलने वाले दिन कोई फीता नहीं था।
कोई सरकारी समारोह नहीं।
सुबह छह बजकर दस मिनट पर मैंने शटर उठाया।
सबसे पहले शालिनी आई।
साधारण सलवार-कुर्ते में।
हाथ में पुरानी नीली डायरी।
वही डायरी जो उस लोहे के बक्से में लिफाफे के ऊपर रखी रहती थी।
उसने मेज पर रखी।
मैंने पूछा—
—यह क्यों लाई?
उसने पहला पन्ना खोला।
वहाँ मेरी पुरानी लिखावट थी—
“शालिनी की फीस।”
उसके नीचे सात वर्ष बाद उसने नई पंक्ति लिखी थी—
“बच्चों की पढ़ाई।”
उसने कलम मेरी तरफ बढ़ाई।
—अब हिसाब दोनों रखेंगे।
मैंने कलम नहीं ली।
पहले उसकी तरफ देखा।
फिर अपने हाथ की पुरानी अंगूठी की तरफ।
उसने अपनी चाँदी की अंगूठी घुमाई।
अब उस हरकत में बेचैनी नहीं थी।
मैंने कलम पकड़ ली।
दुकान के बाहर पहली खेप तैयार होने लगी।
स्टेशन से उद्घोषणा सुनाई दी।
लोग भागते हुए निकले।
किसी ने हमें पहचानकर नहीं देखा।
किसी को यह फर्क नहीं पड़ा कि काउंटर के पीछे खड़ा आदमी जिलाधिकारी का पति है।
और यही ठीक था।
क्योंकि मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा बदलाव यह नहीं था कि मेरी पत्नी आईएएस बन गई थी।
न यह कि उसने सबके सामने अपनी गलती मानी।
बदलाव उस दिन पूरा हुआ जब उसने मेरे ठेले, मेरे काम और मेरे बीते सात वर्षों को किसी असफल आदमी की कहानी समझना बंद कर दिया।
शालिनी ने पहला तैयार समोसा प्लेट में रखा।
उसने मेरी तरफ बढ़ाया—
—जाँच करिए।
मैंने एक टुकड़ा चखा।
नमक थोड़ा कम था।
मैंने कुछ नहीं कहा।
वह मेरी आँखें देखकर समझ गई।
उसने नमक का डिब्बा उठाया।
मैं हँस पड़ा।
इस बार वह भी हँसी।
दुकान के बाहर बोर्ड अब भी वही था—
“रमाकांत नाश्ता केंद्र।”
उसके नीचे हमने बस एक छोटी पंक्ति और जोड़ दी थी—
“हर महीने की बचत का एक हिस्सा बच्चों की पढ़ाई के लिए।”
उस पंक्ति पर किसी अफसर का नाम नहीं था।
न मेरा त्याग लिखा था।
न शालिनी की माफी।
जरूरत भी नहीं थी।
सुबह की पहली गाड़ी प्लेटफार्म पर लगी।
भीड़ हमारी दुकान की तरफ बढ़ी।
मैं काउंटर के पीछे खड़ा हो गया।
शालिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू सँभाला और पैसे रखने वाला डिब्बा अपनी तरफ खींच लिया।
मैंने उसे देखा।
सात साल पहले उसने कहा था कि मैं दोबारा उसके सामने न आऊँ।
मैं सचमुच नहीं गया था।
जिंदगी ने उसे खुद उस प्लेटफार्म तक पहुँचा दिया था जहाँ मैं खड़ा था।
और इस बार हम दोनों में से किसी ने दूसरे को जाने के लिए नहीं कहा।
