PART 2
जगदीश मेरी तरफ बढ़ा, लेकिन मैंने पीछे हटने के बजाय साइकिल का हैंडल पकड़कर उसे अपने सामने कर लिया।
मैं लड़ाई नहीं चाहता था।
मुझे बस कुछ सेकंड चाहिए थे।
मेरी जैकेट के अंदर दूसरा छोटा फोन था। उसका एक बटन दबाते ही पहले से तय आपात संकेत नीलम तक जाता।
मैंने हाथ नीचे किया और बटन दबा दिया।
महेश ने मेरी हरकत देखी।
“मोबाइल निकाल।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं कह रहा हूँ।”
मैंने उसे फोन नहीं दिया।
वह अब पहले जितना निश्चिंत नहीं था।
उसने जगदीश से कहा,
“इसका बैग देख।”
मैंने साफ कहा,
“मेरी चीजों को बिना वजह हाथ मत लगाना।”
महेश हँसा।
“अभी भी एसपी बना हुआ है?”
भीड़ में किसी ने धीमी आवाज में कहा,
“अगर सच में हुए तो?”
महेश तुरंत पलटा।
“किसने कहा?”
कोई जवाब नहीं आया।
मैंने आसपास देखा।
सलीम चाय वाला था।
मोहन सब्जी वाला था।
रामदीन भी थोड़ी दूरी पर खड़े थे।
तीन दिन पहले तक हर आदमी अकेले में बोलता था।
आज सब एक साथ खड़े थे।
लेकिन मुझे उनसे बहादुरी दिखाने की उम्मीद नहीं थी। उन्हें मेरी वजह से परेशानी में नहीं पड़ना चाहिए था।
मैंने कहा,
“महेश जी, एक काम कीजिए। कंट्रोल रूम में फोन लगाइए। पूछ लीजिए कि जिले के एसपी का नाम क्या है।”
उसने जवाब नहीं दिया।
मैं समझ गया कि वह मेरा नाम जानता है।
असल सवाल यह था कि उसने मुझे पहले पहचाना क्यों नहीं।
मैं कार्यालय के कार्यक्रमों में सामान्यतः वर्दी या औपचारिक कपड़ों में दिखाई देता था। यहाँ बिखरे बाल, पुराना कुर्ता और गमछे के साथ मेरी शक्ल अलग लग रही थी।
फिर भी अब उसका चेहरा बता रहा था कि उसे शक हो चुका है।
उसने जगदीश को किनारे बुलाया।
दोनों ने धीरे बात की।
मैं शब्द नहीं सुन सका।
फिर जगदीश तेजी से पुलिस जीप में बैठा और कहीं फोन करने लगा।
मैंने घड़ी देखी।
आपात संकेत भेजे तीन मिनट हो चुके थे।
नीलम की टीम को यहाँ पहुँचने में कम से कम आठ मिनट लगते।
आठ मिनट लंबा समय होता है जब सामने वाला जान चुका हो कि उसके खिलाफ सबूत इकट्ठे किए जा रहे हैं।
महेश फिर मेरे पास आया।
इस बार उसकी आवाज धीमी थी।
“अगर तुम सच में राठौर साहब हो, तो पहचान पत्र दिखाओ।”
मैंने जेब से पहचान पत्र निकाला।
उसने देखा।
चेहरा सख्त हो गया।
अब वह हँसा नहीं।
जगदीश जीप से उतरा।
“साहब…”
महेश ने उसे हाथ से चुप कराया।
फिर मेरी तरफ देखकर बोला,
“सर, गलतफहमी हो गई।”
बस इतना।
चार दिन से जो आदमी लोगों से ऊँची आवाज में बात करता था, उसकी आवाज बदल चुकी थी।
मैंने पूछा,
“कौन सी गलतफहमी?”
“सर, हमें लगा कोई संदिग्ध आदमी है। सुरक्षा के लिए पूछताछ…”
मैंने बीच में रोक दिया।
“दूध क्यों गिराया?”
वह चुप।
“दो सौ रुपये किस नियम में हैं?”
कोई जवाब नहीं।
“दो लीटर दूध किस सरकारी आदेश में है?”
वह फिर चुप।
भीड़ अब हमारे करीब आ गई थी।
सलीम ने पहली बार ऊँची आवाज में कहा,
“साहब, हमसे भी लेते हैं।”
महेश ने उसे देखा।
सलीम पीछे नहीं हटा।
मोहन बोला,
“मुझसे हर बाजार वाले दिन।”
राकेश आगे आया।
“मेरी गाड़ी भी रोकते हैं।”
मैंने हाथ उठाकर सभी को शांत किया।
“जिसे जो कहना है, बाद में लिखित बयान देगा। अभी कोई बहस नहीं करेगा।”
मेरा सबसे बड़ा डर यही था कि स्थिति भीड़ और पुलिस के बीच झगड़े में न बदल जाए।
मैं महेश को कानून के तहत जवाबदेह बनाना चाहता था।
चौराहे पर फैसला नहीं करना था।
दूर से दो गाड़ियों की आवाज आई।
नीलम की सफेद एसयूवी आगे आकर रुकी। उसके पीछे भ्रष्टाचार निरोधक इकाई की गाड़ी थी।
नीलम उतरी।
उसने आते ही मुझे देखा।
“सर, आप ठीक हैं?”
“हाँ।”
फिर उसने महेश की तरफ देखा।
“सब लोग अपनी जगह रहें।”
महेश ने तुरंत कहा,
“मैडम, गलतफहमी है।”
नीलम बोली,
“वह बाद में देखेंगे।”
भ्रष्टाचार निरोधक इकाई के निरीक्षक अजय सक्सेना ने टीम के साथ आसपास की स्थिति संभाली।
मैंने उनसे कहा,
“चौराहे पर लगे क्यूआर कोड, संबंधित खाते और आज की रिकॉर्डिंग को प्रक्रिया के अनुसार सील कराइए। थाने की रिकॉर्ड बुक और पिछले छह महीने के वाहन रोकने से संबंधित रिकॉर्ड भी चाहिए।”
महेश मेरी तरफ देखता रहा।
मुझे लगा वह अब डर गया है।
लेकिन फिर एक अजीब बात हुई।
उसने अपनी घड़ी देखी।
और हल्का सा मुस्कराया।
मैंने यह देखा।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं, सर।”
करीब पाँच मिनट बाद एक और पुलिस गाड़ी आई।
उसमें से अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मनोज तिवारी उतरे।
उन्हें देखकर मैं चौंका।
मैंने उन्हें नहीं बुलाया था।
वे सीधे मेरे पास आए।
“सर, मुझे कंट्रोल रूम से पता चला। आप अकेले यहाँ क्यों आए? यह बहुत गलत हो सकता था।”
उनकी बात सही थी।
लेकिन मेरी नजर महेश पर थी।
मनोज को देखते ही उसके चेहरे का तनाव थोड़ा कम हुआ था।
बस थोड़ा।
मैंने इस बात को वहीं मन में रख लिया।
मनोज ने कहा,
“सर, पहले आप वापस चलिए। यहाँ मैं देख लेता हूँ।”
“नहीं।”
“सर, आपकी सुरक्षा—”
“मैं यहीं रहूँगा।”
उन्होंने सिर हिलाया।
फिर महेश से बोले,
“तुमने बहुत बड़ी गलती की है।”
महेश ने नीचे देखा।
“जी सर।”
दोनों के बीच सिर्फ दो शब्द हुए।
लेकिन मुझे उसमें सामान्य अफसर और अधीनस्थ वाली दूरी महसूस नहीं हुई।
मैंने नीलम की तरफ देखा।
वह भी शायद वही बात समझ चुकी थी।
हम थाने पहुँचे।
मैंने आदेश दिया कि किसी भी दस्तावेज को बिना वीडियोग्राफी के न छुआ जाए।
महेश का कमरा खोला गया।
पहली नजर में सब सामान्य था।
रजिस्टर।
पुरानी फाइलें।
एक कंप्यूटर।
अलमारी।
नीलम ने पूछा,
“क्यूआर कोड वाला लेनदेन इसके निजी रिकॉर्ड में मिलेगा?”
अजय बोले,
“जरूरी नहीं। अगर समझदार है तो सीधे अपने नाम पर कुछ नहीं रखेगा।”
मैंने कहा,
“जीप भी देखिए।”
महेश तुरंत बोला,
“सर, उसमें कुछ नहीं है।”
कमरे में सबकी नजर उसकी तरफ चली गई।
मैंने पूछा,
“आपको कैसे पता हम क्या ढूँढ रहे हैं?”
वह चुप हो गया।
अजय अपनी टीम के साथ बाहर चले गए।
मनोज मेरे पास खड़े थे।
“सर, छोटे स्तर की वसूली लग रही है। निलंबित करके विभागीय जाँच करा देते हैं।”
मैंने उनकी तरफ देखा।
“आपको रकम का स्तर कैसे पता?”
उन्होंने जवाब दिया,
“मेरा मतलब सामान्य तौर पर…”
“अभी हमने हिसाब देखा ही नहीं।”
उन्होंने बात बदल दी।
“हाँ, सही है।”
मुझे बेचैनी होने लगी।
मैं मनोज को तीन साल से जानता था।
कई मामलों में उन्होंने अच्छा काम किया था।
मेरी अनुपस्थिति में जिले के कई हिस्सों की जिम्मेदारी उन्हीं पर रहती थी।
मेरी योजना के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी।
मैंने जानबूझकर नहीं दी थी।
गुमनाम शिकायत में एक लाइन और थी जिसे मैंने किसी को नहीं बताया था।
“दारोगा अकेला नहीं है।”
तब मुझे लगा था कि इसका मतलब उसके दो-तीन सिपाही होंगे।
अब मैं उस लाइन को अलग तरह से पढ़ रहा था।
करीब बीस मिनट बाद अजय जीप से एक पुरानी डायरी लेकर आए।
“सर, सीट के नीचे थी।”
महेश ने तुरंत कहा,
“वह मेरी नहीं है।”
अजय ने उसे खोला।
पन्नों पर तारीखें और रकम थीं।
कई जगह दुकानों के छोटे नाम लिखे थे।
“सलीम—100”
“मोहन—150”
“दूध—200+2”
“पिकअप—500”
सब कुछ बहुत साधारण तरीके से लिखा था।
लेकिन हर सात या दस दिन के बाद एक लाइन आती थी।
“एम.टी.”
और उसके आगे बड़ी रकम।
मैंने मनोज की तरफ देखा।
वे डायरी नहीं देख रहे थे।
उन्होंने मोबाइल निकाल लिया था।
“एम.टी. कौन है?”
मैंने महेश से पूछा।
“पता नहीं, सर।”
“डायरी आपकी नहीं, लेकिन एम.टी. भी नहीं जानते?”
“जी।”
“ठीक है।”
मैंने अजय से कहा,
“इसे प्रक्रिया के अनुसार सुरक्षित रखिए।”
मनोज ने अचानक कहा,
“सर, एक डायरी से कुछ साबित नहीं होगा। महेश कह रहा है उसकी नहीं है।”
मैंने जवाब दिया,
“इसीलिए जाँच हो रही है।”
वह शांत हो गए।
नीलम कंप्यूटर देख रही थी।
कुछ देर बाद उसने मुझे बुलाया।
“सर।”
मैं उसके पास गया।
“क्या मिला?”
“एक एक्सेल फाइल।”
“नाम?”
“मंथली सप्लाई।”
फाइल पासवर्ड से बंद थी।
अजय की तकनीकी टीम ने सिस्टम को अपने नियंत्रण में लिया।
तभी महेश ने कहा,
“सर, एक बात अकेले में कह सकता हूँ?”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“यहीं कहिए।”
वह चुप रहा।
“बोलिए।”
उसने मनोज की तरफ देखा।
यह नजर एक सेकंड से भी कम रही।
लेकिन अब मुझे शक नहीं रहा।
मैंने नीलम से कहा,
“महेश को दूसरे कमरे में ले चलो।”
मनोज बोले,
“क्यों?”
“बयान लेना है।”
“मैं भी चलता हूँ।”
“नहीं।”
पहली बार मनोज का चेहरा सख्त हुआ।
“सर?”
“आप बाहर रहिए।”
कमरे में मैं, नीलम, अजय और महेश बैठे।
वीडियो रिकॉर्डिंग शुरू हुई।
मैंने कहा,
“अब बोलिए।”
महेश कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला,
“सर, मुझे बचा लीजिए।”
मैंने सीधा जवाब दिया,
“मैं किसी को बचाने नहीं आया।”
“मैं सब बता दूँगा।”
“सच बताइए। आगे कानून तय करेगा।”
उसने पानी माँगा।
नीलम ने गिलास आगे किया।
महेश ने एक घूँट लिया।
“यह सिस्टम पहले से चल रहा था।”
“किसके कहने पर?”
वह फिर चुप।
मैंने कहा,
“नाम।”
“सर…”
“नाम।”
उसने बहुत धीमे कहा,
“तिवारी साहब।”
कमरे में कुछ सेकंड चुप्पी रही।
मैं चाहता तो तुरंत प्रतिक्रिया देता।
मैंने नहीं दी।
“कौन तिवारी?”
“एएसपी मनोज तिवारी।”
नीलम ने मेरी तरफ देखा।
मैंने महेश से कहा,
“जो कह रहे हैं, उसका प्रमाण?”
“डायरी।”
“एम.टी.?”
उसने सिर हिलाया।
“और?”
“फोन में चैट थी।”
“थी?”
“मुझसे हर हफ्ते साफ करने को कहते थे।”
“फिर प्रमाण कहाँ है?”
उसने कहा,
“मेरे घर के पुराने टैबलेट में बैकअप होगा।”
अजय ने तुरंत पूछा,
“लोकेशन?”
महेश ने पता बताया।
मैंने टीम भेजने की अनुमति दी, लेकिन स्थानीय थाने के किसी कर्मचारी को साथ नहीं भेजा।
मनोज को अभी कुछ नहीं बताया गया।
मैं बाहर निकला।
वह बरामदे में खड़े फोन पर बात कर रहे थे।
मुझे देखते ही कॉल बंद कर दिया।
“क्या बोला?”
उन्होंने पूछा।
“कुछ बातें।”
“मेरा नाम लिया?”
सवाल इतनी जल्दी आया कि उन्हें खुद भी महसूस हुआ होगा।
मैंने उनकी आँखों में देखा।
“आपको क्यों लगा आपका नाम आएगा?”
उनका चेहरा बदल गया।
“सर, मेरा मतलब है… उसने किसी अधिकारी का नाम लिया?”
“जाँच चल रही है।”
मैं आगे बढ़ गया।
करीब चालीस मिनट बाद महेश के घर गई टीम ने सूचना दी।
एक टैबलेट मिला था।
उसे मौके पर प्रक्रिया के अनुसार सुरक्षित किया गया।
लेकिन असली झटका उसके बाद आया।
टैबलेट में सिर्फ महेश की चैट नहीं थी।
उसमें कई स्क्रीनशॉट थे।
रकम के हिसाब।
तारीखें।
किस इलाके से कितना आया।
किस कर्मचारी ने कितना भेजा।
और एक निजी समूह की बातचीत।
नीलम स्क्रीन पढ़ते-पढ़ते रुक गई।
“सर, यह केवल इस गाँव का मामला नहीं है।”
मैंने स्क्रीन देखी।
देवगढ़ जिले के पाँच थाना क्षेत्रों के नाम थे।
हर इलाके के आगे रकम थी।
नीचे लिखा था—
“एम.टी. ऑफिस।”
मेरा पेट भारी सा हो गया।
जिसे मैं एक दबंग दारोगा की वसूली समझकर आया था, वह काफी बड़ा नेटवर्क लग रहा था।
लेकिन सबसे खराब बात अभी बाकी थी।
तकनीकी अधिकारी ने कहा,
“सर, टैबलेट में कुछ डेटा पिछले हफ्ते कॉपी किया गया है।”
“किसने?”
“डिवाइस यूजर का नाम रिया है।”
महेश ने यह सुनते ही सिर उठा लिया।
“रिया?”
मैंने पूछा,
“कौन है?”
उसने जवाब देने में देर की।
“मेरी बेटी।”
मैंने उसे देखा।
“आपकी बेटी ने डेटा कॉपी किया?”
“मुझे नहीं पता।”
“टैबलेट कौन इस्तेमाल करता था?”
“पहले वह पढ़ाई के लिए करती थी। बाद में मैंने रख लिया।”
मेरे दिमाग में गुमनाम पत्र आया।
उसमें कुछ ऐसी जानकारी थी जो सामान्य दुकानदार को नहीं पता हो सकती थी।
खासकर यह कि पैसा अलग-अलग खातों से होकर जाता था।
मैंने नीलम से कहा,
“रिया कहाँ है?”
महेश ने तुरंत कहा,
“उसे इसमें मत लाइए।”
“पता।”
“सर, वह बच्ची है।”
“पता।”
उसने बताया कि रिया लखनऊ में कानून की पढ़ाई कर रही थी और दो दिन पहले देवगढ़ वापस आई थी।
मैंने महिला अधिकारी की टीम को उससे संपर्क करने के लिए भेजा।
उधर मनोज बेचैन होते जा रहे थे।
उन्होंने दो बार कहा कि उन्हें जरूरी बैठक के लिए निकलना है।
मैंने दोनों बार रोक दिया।
तीसरी बार उन्होंने कहा,
“सर, क्या मैं हिरासत में हूँ?”
“अभी नहीं।”
“तो मैं जा सकता हूँ।”
“कुछ मिनट रुक जाइए।”
“यह आदेश है?”
मैंने कहा,
“हाँ।”
उनका चेहरा बदल गया।
उन्होंने फोन निकाला।
नीलम ने तुरंत कहा,
“सर, जाँच से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित होने तक सभी संबंधित अधिकारियों के फोन प्रक्रिया के अनुसार जमा कर लेना बेहतर होगा।”
मैंने अजय की तरफ देखा।
उन्होंने सिर हिलाया।
मनोज ने विरोध किया।
“आप मुझे संदिग्ध की तरह ट्रीट कर रहे हैं।”
मैंने कहा,
“मैं किसी को अभी कुछ नहीं कह रहा। लेकिन सबके लिए नियम एक रहेगा।”
उन्होंने मोबाइल मेज पर रख दिया।
करीब एक घंटे बाद रिया थाने पहुँची।
साधारण सलवार-कुर्ता पहने बीस-बाईस साल की लड़की।
वह अंदर आते ही अपने पिता को देखकर रुक गई।
महेश ने उसकी तरफ देखा।
“तू यहाँ क्यों आई?”
रिया ने जवाब नहीं दिया।
महिला अधिकारी उसे अलग कमरे में ले गई।
मैं भी नीलम के साथ वहाँ पहुँचा।
मैंने कहा,
“आप पर कोई दबाव नहीं है। जो पता है, वही बताइए।”
रिया ने कुछ सेकंड तक मुझे देखा।
फिर पूछा,
“आप सच में एसपी अर्जुन राठौर हैं?”
“हाँ।”
“दूध वाला बनकर आप ही आए थे?”
मैं चौंका।
“आपको कैसे पता?”
उसने अपने बैग से एक लिफाफा निकाला।
वैसा ही कागज।
वैसी ही लिखावट।
मेरा पहला शक सही दिशा में जा रहा था।
लेकिन उसने लिफाफा मुझे देने के बजाय मेज पर रखा।
“पहली चिट्ठी भी मैंने भेजी थी।”
कमरे में कोई नहीं बोला।
मैंने पूछा,
“आपने?”
उसने सिर हिलाया।
“क्यों?”
उसकी आवाज शांत थी।
“क्योंकि मैं अपने पापा को समझा नहीं पाई।”
महेश बाहर वाले कमरे में था।
रिया आगे बोली,
“मुझे पहले लगा था कि वह दुकानदारों से थोड़ा पैसा लेते हैं। फिर मुझे टैबलेट में हिसाब मिला। उसके बाद पता चला कि ऊपर भी जाता है।”
“आपने डेटा कॉपी किया?”
“हाँ।”
“मनोज तिवारी के बारे में भी आपको पता था?”
उसने कहा,
“सिर्फ उनके बारे में नहीं।”
मैं रुक गया।
“मतलब?”
रिया ने मेरी तरफ देखा।
“आपकी टीम में भी कोई उन्हें खबर देता था।”
मेरे भीतर पहली बार सचमुच डर आया।
क्योंकि मेरी योजना के बारे में बहुत कम लोगों को पता था।
मैंने पूछा,
“कौन?”
“नाम नहीं पता। चैट में ‘एन’ लिखा था।”
मेरे दिमाग में नीलम का नाम आया।
मैंने उसकी तरफ देखा।
वह भी समझ गई।
कुछ सेकंड तक कमरे का माहौल बदल गया।
नीलम ने खुद कहा,
“सर, मेरा फोन भी जमा करा दीजिए।”
मैंने तुरंत जवाब नहीं दिया।
उसने मोबाइल मेज पर रख दिया।
“जाँच सबकी होनी चाहिए।”
रिया बोली,
“मैडम नहीं।”
हम दोनों उसकी तरफ मुड़े।
“फिर?”
उसने कहा,
“एन नाम नहीं है। कोड है—नॉर्थ।”
“नॉर्थ?”
“हाँ। नॉर्थ सर्किल।”
मेरे दिमाग में नक्शा साफ हो गया।
नॉर्थ सर्किल के प्रभारी डीएसपी नवीन सक्सेना थे।
वही अधिकारी जिसने दो महीने पहले महेश की तारीफ वाली रिपोर्ट मेरे दफ्तर भेजी थी।
मैंने सोचा था कि वह सामान्य विभागीय रिपोर्ट है।
अब उसका मतलब अलग था।
मैंने तुरंत नीलम से कहा,
“नवीन को कोई फोन नहीं करेगा।”
लेकिन देर हो चुकी थी।
मनोज का मोबाइल सुरक्षित करने से पहले वह कई कॉल कर चुका था।
हमने सिस्टम में देखा।
आखिरी कॉल नवीन को था।
नीलम ने पूछा,
“अब?”
मैंने कहा,
“अब हम उसे खोजने नहीं जाएँगे।”
वह मुझे देखने लगी।
“वह खुद कुछ करेगा।”
मैंने जिले के सभी मुख्य रास्तों पर सामान्य वाहन जाँच के आदेश दिए। किसी अधिकारी का नाम नहीं लिया गया।
फिर हम मनोज के फोन की प्रक्रिया के अनुसार जाँच करने लगे।
कुछ संदेश हटाए गए थे।
लेकिन कॉल रिकॉर्ड साफ था।
महेश से नियमित बातचीत।
नवीन से लगातार संपर्क।
और कई बार एक ही समय पर समिति के खातों में गतिविधि।
करीब दो घंटे बाद सूचना आई कि नवीन अपने सरकारी आवास पर नहीं था।
कार्यालय में भी नहीं।
मेरे मन में एक ही सवाल था।
उसे किसने बताया?
मनोज?
या नेटवर्क में कोई और?
तभी रामदीन थाने आए।
मैं उन्हें देखकर हैरान हुआ।
“काका, आप यहाँ क्यों आए?”
उन्होंने कहा,
“बाहर गाँव के लोग खड़े हैं।”
मैं बाहर गया।
करीब पचास लोग थे।
कोई नारे नहीं।
कोई हंगामा नहीं।
बस लोग।
सलीम ने कहा,
“साहब, बयान लिखवाना है।”
मोहन बोला,
“मेरा भी।”
राकेश बोला,
“और मेरा।”
मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा।
तीन दिन पहले हर व्यक्ति कहता था, “मेरा नाम मत लेना।”
आज वे खुद थाने आए थे।
मुझे लगा यही वह बदलाव है जिसकी किसी फाइल में एंट्री नहीं बनती, लेकिन असली जाँच इसी से मजबूत होती है।
हमने अलग टीम बनाकर एक-एक बयान दर्ज करना शुरू किया।
मैंने साफ निर्देश दिया कि कोई भी व्यक्ति वह बात न लिखे जो उसने खुद नहीं देखी या भुगती।
मुझे भीड़ की कहानी नहीं चाहिए थी।
मुझे सच चाहिए था।
शाम होते-होते समिति के बैंक खाते के दस्तावेज आ गए।
शिवम जनसेवा समिति सिर्फ नाम की संस्था थी।
उससे रकम तीन अलग-अलग खातों में जाती थी।
एक महेश के रिश्तेदार की कंपनी।
दूसरा एक स्थानीय ठेकेदार का।
तीसरा एक ऐसी फर्म का जो छह महीने पहले बनी थी।
उस फर्म के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता का नाम देखकर नीलम ने मेरी तरफ फाइल बढ़ाई।
“सर।”
नाम था—
अंकित तिवारी।
मनोज तिवारी का छोटा भाई।
अब तस्वीर काफी साफ थी।
मनोज ने पढ़ते ही कहा,
“मेरे भाई का कारोबार है। मुझे नहीं पता वह क्या करता है।”
मैंने पूछा,
“उसकी कंपनी में हर हफ्ते देवगढ़ के अलग-अलग हिस्सों से पैसा क्यों पहुँच रहा है?”
“मुझे नहीं पता।”
“महेश आपको लगातार फोन क्यों करता था?”
“ऑफिशियल काम।”
“नवीन को आखिरी कॉल क्यों किया?”
उन्होंने जवाब नहीं दिया।
अजय ने सभी दस्तावेज देखे।
फिर नियमानुसार आगे की कार्रवाई शुरू हुई।
मनोज का चेहरा अब शांत नहीं था।
उन्होंने मुझसे कहा,
“सर, आप मुझे जानते हैं।”
मैंने कहा,
“इसीलिए मैं कोई निजी फैसला नहीं कर रहा।”
“मैंने आपके साथ काम किया है।”
“और इसलिए जो रिकॉर्ड कहेगा, वही माना जाएगा।”
उसके बाद मैं उनसे बहस नहीं करना चाहता था।
रात करीब नौ बजे नवीन सक्सेना की सरकारी गाड़ी जिले की सीमा के पास रोक ली गई।
वह खुद उसमें नहीं था।
ड्राइवर ने बताया कि नवीन आधे रास्ते में दूसरी गाड़ी में बैठकर चला गया।
जाँच फिर बढ़ी।
लेकिन अब उसके पास ज्यादा समय नहीं था।
उसके आधिकारिक फोन की लोकेशन बंद थी, लेकिन जिस निजी नंबर से वह संपर्क करता था, उसका रिकॉर्ड मिल गया।
करीब डेढ़ घंटे बाद वह एक रिश्तेदार के फार्महाउस पर मिला।
उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत पूछताछ के लिए लाया गया।
रात बहुत लंबी थी।
लेकिन मामला अब किसी एक दारोगा का नहीं रहा था।
अगले दो दिनों में वित्तीय रिकॉर्ड, फोन डेटा, दुकानदारों के बयान और पुलिस के आंतरिक रिकॉर्ड मिलाए गए।
तीन थाना क्षेत्रों से और शिकायतें आईं।
कुछ कर्मचारियों ने खुद बयान देने की इच्छा जताई।
महेश और उसके साथियों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई शुरू हुई।
मनोज और नवीन की भूमिका की अलग जाँच शुरू हुई और उन्हें जिम्मेदारी से हटाया गया ताकि वे रिकॉर्ड को प्रभावित न कर सकें।
मैंने जानबूझकर प्रेस के सामने बड़े दावे नहीं किए।
जाँच पूरी होने से पहले किसी को दोषी घोषित करना आसान होता है।
साबित करना मुश्किल।
मैं वही करना चाहता था जो महीनों पहले होना चाहिए था—हर शिकायत को दस्तावेज में बदलना।
तीसरे दिन मैं फिर उसी चौराहे पर गया।
इस बार वर्दी में।
सलीम ने मुझे देखकर मुस्कराते हुए पूछा,
“साहब, चाय?”
मैंने कहा,
“आज पैसे लेकर आया हूँ।”
वह हँसा।
“आज आपकी चाय मेरी तरफ से।”
“नहीं। दुकान का हिसाब दुकान की तरह चलेगा।”
मैंने पैसे रख दिए।
मोहन पास आया।
“साहब, अब सब ठीक हो जाएगा?”
मैंने तुरंत “हाँ” नहीं कहा।
मुझे झूठा भरोसा देना पसंद नहीं।
मैंने कहा,
“अगर आप लोग बोलते रहेंगे और हम सुनते रहेंगे, तो चीजें बेहतर रहेंगी। सिर्फ एक अधिकारी बदलने से व्यवस्था अपने आप नहीं बदलती।”
उसने सिर हिलाया।
रामदीन थोड़ा दूर खड़े थे।
मैं उनके पास गया।
“काका।”
“हाँ साहब।”
“अब तो पता चल गया मैं दूध वाला नहीं हूँ।”
उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“पहले दिन ही शक था।”
“फिर बताया क्यों नहीं?”
“अगर सच में दूध वाला होता तो बुरा मान जाता।”
मैं हँस दिया।
फिर मुझे याद आया।
“एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“आपने मुझे पहली रात इतनी बातें कैसे बताईं? आपको मुझ पर भरोसा कैसे हुआ?”
रामदीन कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले,
“क्योंकि रिया बिटिया ने कहा था।”
मैं रुक गया।
“रिया?”
“हाँ।”
अब मेरे लिए यह नई बात थी।
“आप उसे जानते हैं?”
“उसकी माँ मेरे पड़ोस के गाँव की थी। बचपन से जानता हूँ।”
“तो शिकायत भेजने की योजना आप दोनों ने बनाई?”
रामदीन ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“फिर?”
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
“साहब, आपने अभी पूरी बात नहीं सुनी।”
मैं चुप रहा।
रामदीन ने कहा,
“रिया ने पहली चिट्ठी नहीं लिखी थी।”
मैंने तुरंत उनकी तरफ देखा।
“उसने खुद कहा है कि उसने लिखी।”
“उसने दूसरी चिट्ठी लिखी थी।”
मेरे दिमाग में कार्यालय वाला पहला लिफाफा घूम गया।
“पहली?”
रामदीन ने पीछे इशारा किया।
चाय की दुकान से सलीम बाहर आया।
मैंने सोचा शायद वही था।
लेकिन वह भी नहीं।
उसके पीछे एक दुबला सा आदमी खड़ा था जिसे मैंने चार दिनों में कई बार देखा था।
वह महेश की पुलिस जीप चलाता था।
सिपाही पवन कुमार।
वह छुट्टी पर होने की बात कहकर दो दिन से गायब था।
मैंने उसे देखा।
“तुम?”
उसने सिर झुका लिया।
“पहली चिट्ठी मैंने भेजी थी, सर।”
मैं कुछ सेकंड कुछ नहीं बोल पाया।
पवन ने कहा,
“मैं तीन साल से उनके साथ था। शुरू में लगा नौकरी है, आदेश मानना है। बाद में समझ आया कि गलत चीजों में चुप रहना भी मदद करना है।”
“पहले सामने क्यों नहीं आए?”
“डरता था।”
“फिर चिट्ठी?”
“रिया जी ने अपने पिता के टैबलेट में हिसाब देखा था। उन्हें पता नहीं था किस पर भरोसा करें। उन्होंने रामदीन काका से बात की। काका ने मुझसे पूछा कि क्या बात सच है।”
“और?”
“मैंने कहा हाँ।”
उसने मेरी तरफ देखा।
“लेकिन मुझे लगा अगर चिट्ठी सिर्फ गाँव वाले भेजेंगे तो शायद थाने में ही घूमकर रह जाएगी। इसलिए मैंने कुछ ऐसी जानकारी लिखी जो केवल अंदर का आदमी जानता था।”
अब मुझे समझ आया कि पहली शिकायत इतनी सटीक क्यों थी।
मैंने पूछा,
“अपना नाम क्यों नहीं लिखा?”
पवन ने कहा,
“क्योंकि मुझे यह भी नहीं पता था कि ऊपर कौन-कौन जुड़ा है।”
यह जवाब सीधा था।
और सही भी।
मैंने उससे कहा,
“अब बयान देना होगा।”
“दूँगा, सर।”
“जो किया है, जो देखा है, सब सच-सच।”
“जी।”
मैं वापस चौराहे की तरफ मुड़ा।
वही जगह जहाँ कुछ दिन पहले मेरा दूध सड़क पर गिरा था।
मुझे लगा था मैं एक दारोगा की शिकायत जाँचने आया हूँ।
असल में एक डरा हुआ गाँव, एक पुलिसकर्मी, एक बेटी और कुछ छोटे दुकानदार महीनों से अलग-अलग हिस्सों में वही सच पकड़े बैठे थे।
किसी एक के पास पूरी कहानी नहीं थी।
और सबसे बड़ी बात यह थी कि जिसने मुझे पहली बार यहाँ बुलाया, वह कोई ताकतवर आदमी नहीं था।
वह उसी दारोगा की जीप चलाने वाला सिपाही था।
वही आदमी जो पहले दिन मेरे सामने खड़ा रहा था और कुछ नहीं बोला था।
मैंने उसकी तरफ देखा।
“पहले दिन जब दूध गिराया गया, तब भी तुम वहीं थे।”
उसने सिर नीचे कर लिया।
“हाँ, सर।”
“तब कुछ क्यों नहीं कहा?”
उसने लंबी सफाई नहीं दी।
सिर्फ इतना बोला,
“उस दिन हिम्मत नहीं हुई।”
मैंने पूछा,
“आज?”
उसने मेरी तरफ देखा।
“आज अकेला नहीं हूँ।”
मैंने पीछे देखा।
सलीम था।
मोहन था।
रामदीन थे।
रिया थोड़ी दूरी पर महिला अधिकारी के साथ खड़ी थी।
और कई लोग अपने बयान दर्ज कराने के लिए इंतजार कर रहे थे।
मुझे उसी समय समझ आया कि इस पूरे मामले का सबसे बड़ा मोड़ महेश का पकड़ा जाना नहीं था।
मनोज या नवीन के नाम सामने आना भी नहीं।
असल बदलाव यह था कि जिन लोगों ने महीनों तक एक-दूसरे से भी सच धीरे बोला था, वे अब वही बात अपने नाम के साथ लिखवा रहे थे।
मैं अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ा।
सलीम पीछे से बोला,
“साहब!”
मैं रुका।
“अगली बार दूध वाला बनकर आएँगे?”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“जरूरत न पड़े, तो बेहतर है।”
वह हँस दिया।
मैं गाड़ी में बैठा और फाइल बंद कर दी।
लेकिन पहली गुमनाम चिट्ठी मैंने अपने पास रखी।
क्योंकि आखिर में उसी बिना नाम वाले दो पन्नों ने यह साबित किया था कि कई बार व्यवस्था के अंदर बदलाव की शुरुआत किसी बड़े भाषण से नहीं होती।
किसी एक डरे हुए आदमी के सच लिख देने से होती है।
