जब ६८ साल के बेकसूर ससुर के गाल पर थप्पड़ का निशान देखा, शांत बहू ने आठ साल बाद अपना पुराना नाम लेकर सिर्फ एक फाइल मँगवाई//

PART 2

महेंद्र बहल ने मेज पर पड़ी फाइल की तरफ देखा तक नहीं

उन्होंने सामने रखा छोटा माइक्रोफोन अपनी ओर खींचा।

—बैठक शुरू की जाए।

वेदप्रकाश जी सबसे पीछे खाली कुर्सी की ओर बढ़े।

शालिनी ने तुरंत हाथ उठा दिया।

—कर्मचारी पीछे खड़े रहते हैं।

मेरे ससुर वहीं रुक गए।

मैंने उनकी कुर्सी खींचकर अपने पास रख दी।

—ये बैठेंगे।

शालिनी हँसी।

—आपको शायद अभी भी समझ नहीं आया कि यहाँ नियम कौन तय करता है।

मैं बैठ गई।

—इसीलिए तो आई हूँ।

महेंद्र बहल ने चश्मा उतारा।

उनकी उम्र करीब साठ रही होगी। आवाज धीमी थी, लेकिन उसमें वर्षों की आदत वाला अधिकार था।

उन्होंने एक कागज उठाया।

—आज सुबह मेरी बेटी के साथ सुरक्षा कर्मचारी वेदप्रकाश ने दुर्व्यवहार किया। गाड़ी रोकने के बहाने ऊँची आवाज में बात की। उसके बाद उनके परिवार ने कर्मचारियों को भड़काने की कोशिश की।

वेदप्रकाश जी की उँगलियाँ कुर्सी के किनारे पर कस गईं।

मैंने कुछ नहीं कहा।

महेंद्र ने आगे पढ़ा—

—सोसाइटी का माहौल खराब करने वाले कर्मचारी को रखने का कोई औचित्य नहीं है।

मैंने पूछा—

—यह शिकायत किस समय लिखी गई?

शालिनी ने मेरी ओर देखा।

—इससे क्या फर्क पड़ता है?

—बहुत थोड़ा।

मैंने हाथ बढ़ाया।

—दिखा दीजिए।

महेंद्र ने कागज मुझे नहीं दिया।

विनोद अरोड़ा बीच में बोले—

—यह बोर्ड का आंतरिक दस्तावेज है।

मैंने सिर हिलाया।

—ठीक है।

मैंने अपनी फाइल नहीं खोली।

कमरे में बैठे कुछ लोग एक-दूसरे को देखने लगे।

शालिनी आगे झुकी।

—सुबह से बहुत नाटक हो चुका। आपके ससुर मुझसे माफी माँग दें। मामला खत्म।

वेदप्रकाश जी ने मेरी तरफ देखा।

उनकी आँखों में वही डर था।

मेरी वजह से बाकी गार्डों की नौकरी चली जाएगी।

यही बात उनके भीतर अटकी थी।

मैंने पूछा—

—किस बात की माफी?

शालिनी ने कुर्सी पीछे टिकाई।

—बदतमीजी की।

—और आपने इन्हें थप्पड़ क्यों मारा?

कमरे में आवाजें बंद हो गईं।

महेंद्र बहल तुरंत बोले—

—ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं।

मैंने उनकी तरफ देखा।

—आप वहाँ थे?

वे चुप हुए।

नवीन सक्सेना ने बीच में कहा—

—कैमरे की रिकॉर्डिंग देखी गई है। उसमें कुछ नहीं है।

मेरी उँगली नीली फाइल की लाल डोरी पर टिक गई।

मुझे सुबह का केबिन याद आया।

दरवाजे के ऊपर लगा कैमरा।

उसकी छोटी हरी बत्ती बंद थी।

उस समय मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया था।

मैंने नवीन से पूछा—

—कौन सा कैमरा देखा?

उनका चेहरा तन गया।

—मुख्य द्वार वाला।

—रिकॉर्डिंग किसने निकाली?

—विक्रेता ने।

—किस समय?

—सुबह।

मैंने धीरे से फाइल अपनी ओर खींची।

डोरी खोली।

पहला पन्ना पेंटहाउस की खरीद का प्रारंभिक समझौता था।

मैंने उसे एक तरफ रखा।

शालिनी की नजर उस पर गई।

वह पढ़ नहीं पाई, लेकिन ऊपर लिखा चौदह सौ एक देखकर उसकी भौंहें सिकुड़ीं।

मैंने दूसरा पन्ना निकाला।

वह सुरक्षा एजेंसी का चौदह महीने का भुगतान सार था।

मैंने वेदप्रकाश जी की तरफ देखा।

—पापा, हर महीने आपके खाते में कितने रुपये आते हैं?

उन्होंने कहा—

—सोलह हजार आठ सौ पचास।

कोषाध्यक्ष विनोद ने तुरंत कहा—

—यही तय वेतन है।

मैंने अगला पन्ना खोला।

—कंपनी सोसाइटी से प्रति गार्ड कितने लेती है?

कोई जवाब नहीं आया।

मैंने विनोद की तरफ पन्ना घुमा दिया।

—उन्नीस हजार सात सौ।

पीछे बैठे किसी निवासी ने धीमे से कहा—

—तीन हजार कम?

विनोद ने कुर्सी सीधी की।

—एजेंसी शुल्क होता है।

मैंने अगला पन्ना रखा।

—एजेंसी शुल्क अलग से नौ सौ रुपये है।

इस बार पीछे हलचल हुई।

महेंद्र बहल ने मेज थपथपाई।

—इसका आज की घटना से क्या संबंध है?

मैंने उनकी बात अनसुनी कर दी।

—वेदप्रकाश जी सहित छह गार्ड। प्रति व्यक्ति एक हजार आठ सौ पचास रुपये “कल्याण और उपकरण” के नाम पर हर महीने काटे गए।

मैंने हिसाब सामने रखा।

—चौदह महीने में एक लाख पचपन हजार चार सौ रुपये।

पारुल दरवाजे के पास खड़ी थी।

उसने दोनों हाथ पेट के सामने बाँध लिए।

मैंने पूछा—

—पापा, आपको नई वर्दी कितनी बार मिली?

—एक बार।

—जूते?

—अपने खरीदे।

—गर्मी में केबिन का पंखा?

वेदप्रकाश जी ने ऊपर देखा।

फिर हल्का सा सिर हिलाया।

—नहीं है।

मैंने फाइल का अगला पन्ना खोला।

बारह छत वाले पंखों का बिल।

कुल रकम तिरसठ हजार छह सौ रुपये।

बिल पर सोसाइटी कार्यालय की मुहर थी।

मुझे सुबह के वे दो खाली तार याद आए।

बस दो तार।

मैंने बिल मेज पर रख दिया।

कुछ देर कोई नहीं बोला।

शालिनी ने उसे उठाया।

—यह पुराना होगा।

मैंने तारीख पर उँगली रख दी।

—पिछले महीने की ग्यारह तारीख।

उसने कागज वापस फेंक दिया।

—तो विक्रेता से पूछिए। हम थोड़ी हर चीज देखने जाते हैं।

मैंने अगला पन्ना निकाला।

सामान प्राप्त करने की पुष्टि।

नीचे हस्ताक्षर थे।

“शालिनी बहल — सुविधा समिति”

उस एक पन्ने पर उसके हस्ताक्षर देखकर कमरे में पहली बार कोई बहस नहीं हुई।

उसने पन्ना उठाने की कोशिश नहीं की।

उसका चेहरा बस स्थिर हो गया।

महेंद्र ने मेरी ओर झुककर कहा—

—आपने ये दस्तावेज कहाँ से लिए?

मैंने जवाब नहीं दिया।

मैंने वेदप्रकाश जी की कमीज की जेब की ओर देखा।

वही चार तह वाला कागज अब भी अंदर था।

—पापा, कल वाला कागज दीजिए।

उन्होंने मेरी ओर देखा।

—नीरजा…

—बस दीजिए।

उन्होंने धीरे से निकालकर मेरे हाथ में रख दिया।

मैंने पहली बार उसे खोला।

ऊपर वेदप्रकाश जी की साफ लिखावट थी।

“सुरक्षा वेतन में कटौती संबंधी अनुरोध।”

नीचे छोटी तालिका।

छह नाम।

खाते में मिली रकम।

वेतन पर्ची पर लिखी रकम।

हर नाम के सामने वही अंतर।

एक हजार आठ सौ पचास रुपये।

अंत में केवल दो पंक्तियाँ थीं—

“मैं पहले बिजली विभाग में लिपिक रहा हूँ। हिसाब शायद समझने में मुझसे गलती हो रही हो। कृपया जाँच करवा दें ताकि किसी कर्मचारी का पैसा गलत जगह न जाए।”

मैंने आखिरी हिस्सा देखा।

“प्राप्तकर्ता—शालिनी बहल।”

समय—

शाम पाँच बजकर बीस मिनट।

१४ अगस्त।

मैंने सिर उठाया।

शालिनी का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

सुबह का थप्पड़ पार्किंग के लिए नहीं था।

कमरे में बैठे लोगों को उसी पल फैसला मिल गया।

मैंने कोई भाषण नहीं दिया।

सिर्फ कागज उसके सामने रख दिया।

वेदप्रकाश जी अपनी कुर्सी पर बैठे रहे।

उनकी नजर जमीन पर थी।

शायद उन्हें भी पहली बार समझ आया कि सुबह उनके साथ हुआ अपमान अचानक नहीं था।

शालिनी ने पानी का गिलास उठाया।

उसकी उँगलियाँ काँपीं।

—उन्होंने मुझे यह कागज दिया था, तो? इसका मतलब यह नहीं कि…

दरवाजे के पास खड़ी पारुल बोल पड़ी।

उसकी आवाज बहुत तेज नहीं थी।

—मैडम सुबह उनसे यही कागज माँग रही थीं।

सबने उसकी तरफ देखा।

पारुल घबरा गई।

मैंने कहा—

—जो देखा, वही बोलो।

उसने झाड़ू का डंडा कसकर पकड़ा।

—मैं पोछा लगा रही थी। शालिनी मैडम ने कहा था, “वह कागज मुझे वापस दो।” काका ने कहा था कि सुपरवाइजर को दूसरी प्रति दे चुके हैं।

शालिनी अचानक उठी।

—यह झूठ बोल रही है!

पारुल दो कदम पीछे हुई।

महेंद्र बोले—

—बैठ जाओ, शालिनी।

वह नहीं बैठी।

मैंने फिर पन्ना पलटा।

इस बार कैमरा व्यवस्था का बिल था।

हर महीने सोसाइटी से एक लाख चौदह हजार रुपये।

छत्तीस कैमरे।

चौबीस घंटे रिकॉर्डिंग।

नब्बे दिन सुरक्षित भंडारण।

नवीन सक्सेना ने तुरंत कहा—

—मैंने बताया ना, फुटेज में कुछ नहीं है।

मैंने उनकी तरफ देखा।

—आपने मुख्य कैमरा देखा था।

—हाँ।

—और आप सही कह रहे हैं।

उनकी आँखों में एक पल राहत आई।

मैंने अगला पन्ना निकाला।

—मुख्य गेट वाला कैमरा सुबह पाँच बजकर छप्पन मिनट पर बंद कर दिया गया था।

राहत गायब हो गई।

मैंने स्क्रीनशॉट सामने रखा।

—दूरस्थ प्रणाली में बंद करने का समय दर्ज है।

नवीन की आवाज बदल गई।

—तकनीकी खराबी हो सकती है।

—हो सकती है।

मैंने अगला पन्ना नहीं उठाया।

कुछ सेकंड बस कागजों को देखती रही।

वही सुबह का छोटा सा दृश्य मेरे सामने लौट आया।

केबिन के कैमरे की बुझी हरी बत्ती।

और सामने इमरजेंसी रास्ते की दूसरी तरफ लाल अग्निशमन पेटी।

उसके ऊपर लगा छोटा गोल उपकरण।

मैंने तब उसे कैमरा समझा ही नहीं था।

मैंने फाइल से एक तस्वीर निकाली।

—लेकिन अग्नि सुरक्षा व्यवस्था का कैमरा आपके कैमरा विक्रेता का नहीं है।

नवीन की गर्दन धीरे से मेरी तरफ मुड़ी।

मैंने मेज पर चित्र रखा।

सुबह छह बजकर तीन मिनट।

काली गाड़ी।

वेदप्रकाश जी।

शालिनी।

अगला चित्र।

उसका उठा हुआ हाथ।

अगला।

वेदप्रकाश जी पीछे हटे हुए।

शालिनी का चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

कोई आवाज नहीं।

वेदप्रकाश जी ने पहली बार सिर उठाकर तस्वीर देखी।

उन्होंने तुरंत नजर फेर ली।

मैंने तस्वीर वापस अपने पास रख ली।

उन्हें बार-बार वह पल देखने की जरूरत नहीं थी।

महेंद्र बहल ने चश्मा पहन लिया।

—यह सब आपको किसने दिया?

मैंने कहा—

—जिसे देना था।

—आप कोई अधिकारी हैं?

—आज यहाँ मैं सिर्फ वेदप्रकाश जी की बहू हूँ।

शालिनी ने हँसने की कोशिश की।

आवाज नहीं निकली।

मैंने अगला दस्तावेज सामने रखा।

यह बारह पन्नों की सूची थी।

लिफ्ट रखरखाव।

कचरा प्रबंधन।

कैमरा सेवा।

गार्ड उपकरण।

बागवानी।

छोटी मरम्मत।

हर भुगतान के सामने एक ही नाम बार-बार दिखाई दे रहा था—

“एसबी सुविधा सेवाएँ।”

एक निवासी ने पूछा—

—ये कौन हैं?

मैंने जवाब नहीं दिया।

फाइल से कंपनी पंजीकरण की प्रति निकाली।

मालिक का नाम था—

समर बहल।

शालिनी का छोटा भाई।

पीछे से किसी महिला की आवाज आई—

—समर तो दुबई में रहता है ना?

दूसरी आवाज आई—

—उसकी यहाँ कंपनी कब से है?

विनोद अरोड़ा ने अचानक कहा—

—रिश्तेदार की कंपनी होना गैरकानूनी नहीं है।

मैंने उनकी तरफ देखा।

—बिल्कुल नहीं।

मैंने अगला पन्ना आगे किया।

तीन दूसरी कंपनियों के निविदा पत्र।

तीनों में अलग-अलग नाम।

लेकिन संपर्क नंबर एक ही।

पता भी एक ही इमारत का।

एक ही मंजिल।

एक ही कमरा।

विनोद की हथेली मेज पर स्थिर हो गई।

मैंने कहा—

—और तीनों निविदाएँ एक ही व्यक्ति के संगणक से बनाई गईं।

मैंने उसके नीचे जमा दस्तावेज रख दिया।

—कंप्यूटर पहचान संख्या सोसाइटी कार्यालय की है।

महेंद्र ने मेरी तरफ देखा।

अब उनकी आवाज में पहले वाला भरोसा नहीं था।

—आप हम पर आरोप लगा रही हैं?

मैंने कहा—

—नहीं।

फिर चुप हो गई।

पीछे बैठे निवासी बेचैन होने लगे।

एक बुजुर्ग आदमी उठ खड़ा हुआ।

—तो यह है क्या?

मैंने उसकी तरफ पहली बार देखा।

—हिसाब।

मैंने फाइल बंद नहीं की।

महेंद्र बहल कुर्सी से उठे।

—यह बैठक यहीं समाप्त होती है।

दरवाजे के पास से आवाज आई—

—नहीं, अभी नहीं।

सबने पीछे देखा।

राघव जी अंदर आए।

उनके साथ दो लोग थे।

एक महिला के हाथ में सरकारी पहचान पत्र था।

दूसरे व्यक्ति के पास दस्तावेजों का चमड़े का बैग।

महेंद्र वहीं रुक गए।

महिला सामने आई।

उसने अपना परिचय दिया—

—सहकारी आवास प्राधिकरण से सीमा माथुर। आज दोपहर रखरखाव खातों और निविदा प्रक्रिया से जुड़ी शिकायत प्राप्त हुई है।

कमरे में फिर सन्नाटा।

उनके साथ आए व्यक्ति ने कहा—

—और मैं श्रम विभाग से अरुण मिश्रा हूँ। सुरक्षा कर्मचारियों की वेतन कटौती संबंधी दस्तावेज देखने हैं।

वेदप्रकाश जी के दोनों हाथ कुर्सी पर टिके थे।

उन्होंने मेरी तरफ देखा।

मैंने सुबह ही फाइल की प्राथमिक प्रतियाँ भेज दी थीं।

इसलिए अब किसी को मुझ पर विश्वास करने की जरूरत नहीं थी।

सीमा माथुर ने महेंद्र से कहा—

—सोसाइटी के पिछले दो वर्ष के मूल खाते, बैंक विवरण और निविदा रजिस्टर सुरक्षित रखिए। किसी अभिलेख में परिवर्तन नहीं होगा।

विनोद ने कुछ कहना चाहा।

अरुण मिश्रा ने उनकी तरफ कागज बढ़ाया।

—छह सुरक्षा कर्मचारियों की वास्तविक वेतन रसीदें भी।

महेंद्र की नजर मुझ पर टिक गई।

—आप हैं कौन?

यही सवाल सुबह शालिनी ने भी पूछा था।

मैंने नीली फाइल का पहला हिस्सा खोला।

इस बार २०१८ के कागज बाहर आए।

गुलमोहर पार्क उस समय नया बना था।

भवन तैयार था, लेकिन अंतिम हस्तांतरण से पहले दर्जनों कमियाँ थीं।

अग्नि सुरक्षा व्यवस्था।

बैकअप बिजली।

कर्मचारियों के लिए विश्राम कक्ष।

रखरखाव जमा राशि।

और सुरक्षा कर्मचारियों के कल्याण कोष की अलग व्यवस्था।

हर टिप्पणी के नीचे शुरुआती अक्षर थे—

“नी. दे.”

महेंद्र बहल की नजर उन अक्षरों पर रुकी।

मैंने अंतिम पन्ना पलटा।

“परियोजना निरीक्षण और हस्तांतरण स्वीकृति।”

नीचे मेरा पूरा नाम था।

“नीरजा नरेश देसाई
प्रबंध निदेशक
देसाई नगर विकास समूह”

महेंद्र ने पन्ना दोबारा देखा।

फिर मुझे।

राघव जी मेरे बगल में खड़े थे।

उन्होंने बस इतना कहा—

—मैडम ने आठ साल पहले इस परियोजना का अंतिम हस्तांतरण खुद रोका था, क्योंकि कर्मचारी सुविधाएँ पूरी नहीं थीं।

कमरे में कुछ लोगों ने मेरी तरफ देखा।

अमित सबसे पीछे खड़ा था।

मैंने उसे आते नहीं देखा था।

उसके चेहरे पर आश्चर्य था।

पर सवाल नहीं।

शालिनी कुर्सी पर बैठ गई।

उसकी आँखें अब फाइल पर थीं।

मैंने उन पुराने पन्नों को हाथ लगाया।

आठ साल पहले मेरे पिता अस्पताल में थे।

कंपनी की जिम्मेदारी अचानक मेरे ऊपर आई थी।

तीन महीने बाद उनका देहांत हुआ।

मैंने काम संभाला।

फिर अमित से शादी हुई।

मैंने अपना रोज का कार्यकारी पद छोड़ दिया, लेकिन हिस्सेदारी कभी नहीं छोड़ी।

देसाई समूह के निर्णय आज भी मेरे हस्ताक्षर के बिना पूरे नहीं होते थे।

मैंने कभी इस बात को अपने घर में महत्व नहीं दिया।

क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि अमित की माँ मुझे मेरे परिवार के पैसे से पहचाने।

वह अब इस दुनिया में नहीं थीं।

वेदप्रकाश जी भी मुझे हमेशा ऐसे ही जानते थे—

उनकी बहू नीरजा।

जिसे वे हर रविवार आलू के पराठे बनाकर खिलाते थे।

जिसे नौकरी छोड़ने पर उन्होंने कभी नहीं पूछा कि कितनी तनख्वाह थी।

बस इतना कहा था—

—जो काम करके रात को नींद आए, वही करना।

आज पहली बार उन्हें पता चल रहा था कि मैं कौन थी।

उन्होंने धीमे से पूछा—

—तूने हमें बताया क्यों नहीं?

मैं उनके पास गई।

—जरूरत नहीं पड़ी थी, पापा।

उन्होंने मेरा चेहरा देखा।

फिर फाइल की तरफ।

—और आज?

मेरी नजर उनके गाल के फीके पड़ चुके निशान पर गई।

—आज पड़ गई।

वे चुप हो गए।

महेंद्र बहल ने कुर्सी पकड़ ली।

—नीरजा जी, शायद बात इतनी बिगाड़ने की जरूरत नहीं थी। कर्मचारियों के वेतन में अगर कोई लेखा त्रुटि हुई है तो हम—

मैंने उनकी ओर देखा।

वह रुक गए।

मैंने फाइल से एक और पन्ना निकाला।

यही वह पन्ना था जिसे देखकर राघव जी ने दोपहर में मुझसे पूछा था कि क्या मैं सच में आज ही बैठक में जाना चाहती हूँ।

गार्ड कल्याण कोष।

२०१८ में देसाई समूह ने प्रारंभिक पाँच वर्षों के लिए बारह लाख रुपये अलग रखे थे।

उस पर स्पष्ट शर्त थी—

“यह धन केवल सुरक्षा कर्मचारियों के विश्राम, गर्मी से बचाव, पेयजल, वर्दी और आकस्मिक सहायता पर व्यय होगा।”

पाँच साल बाद बची राशि सोसाइटी खाते में थी।

सात लाख छत्तीस हजार रुपये।

मैंने अगला बैंक विवरण रखा।

पिछले वर्ष पूरा खाता खाली किया गया था।

भुगतान—

“एसबी सुविधा सेवाएँ।”

शालिनी का भाई।

पीछे बैठे किसी ने कुर्सी खिसकाई।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

महेंद्र बहल ने पहली बार अपनी बेटी की ओर देखा।

शालिनी ने नजरें फेर लीं।

वेदप्रकाश जी ऊपर उस खाली जगह को देख रहे थे जहाँ केबिन में पंखा होना चाहिए था।

उस समय मुझे पहली बार लगा कि उस फाइल में लिखे लाखों रुपये से ज्यादा भारी चीज दो खुले तार थे।

छोटी सी जगह।

गर्मी।

पसीने में भीगा एक बूढ़ा आदमी।

और उसके नाम पर खरीदा गया सामान, जो कभी वहाँ पहुँचा ही नहीं।

सीमा माथुर ने फाइल अपने पास खींची।

—इसकी प्रति चाहिए।

मैंने पहले से तैयार लिफाफा उन्हें दे दिया।

उन्होंने महेंद्र बहल से कहा—

—जाँच पूरी होने तक वर्तमान वित्त समिति कोई नया भुगतान स्वीकृत नहीं करेगी।

विनोद बोल पड़े—

—हमारे बैंक खाते कैसे रोक सकते हैं?

सीमा ने उनकी तरफ देखा।

—मैंने ऐसा नहीं कहा।

वह रुकीं।

—मैंने कहा, आप नया भुगतान स्वीकृत नहीं करेंगे।

विनोद चुप हो गए।

अरुण मिश्रा ने वेदप्रकाश जी से पूछा—

—बाकी पाँच गार्ड कहाँ हैं?

वेदप्रकाश जी ने धीरे से कहा—

—अभी ड्यूटी पर हैं।

—कल सभी से बात होगी।

शालिनी अचानक मेरी तरफ मुड़ी।

—तो तुम्हें यही चाहिए था? पूरे परिवार को बदनाम करना?

मैंने उसे देखा।

सुबह से पहली बार उसकी आवाज में गुस्से से ज्यादा घबराहट थी।

मैंने कुछ नहीं कहा।

वह खड़ी हुई।

—एक छोटी सी बात को तुमने…

वेदप्रकाश जी भी उठे।

मैंने सोचा वह कुछ कहेंगे।

लेकिन उन्होंने अपनी जेब से पुराना रुमाल निकाला और माथे का पसीना पोंछ लिया।

शालिनी उनके सामने आकर रुकी।

शायद उसे लगा वह उससे बहस करेंगे।

उन्होंने सिर्फ एक वाक्य कहा—

—गाड़ी उस रास्ते पर आज भी मत खड़ी करना। जरूरत के समय किसी का रास्ता बंद हो जाएगा।

कमरे में किसी ने कुछ नहीं कहा।

शालिनी की नजर नीचे चली गई।

अगली सुबह सोसाइटी के मुख्य द्वार पर पहली बार चार चीजें साथ पहुँचीं।

छह नए पंखे।

छह कुर्सियाँ।

ठंडे पानी का बड़ा यंत्र।

और सुरक्षा कर्मचारियों के नाम वाले लिफाफे।

श्रम विभाग ने एजेंसी को अंतर राशि रोकने का आदेश दिया था। सोसाइटी ने तत्काल अस्थायी भुगतान किया।

वेदप्रकाश जी ने अपना लिफाफा खोला।

अंदर चौदह महीने की कटौती की रकम थी।

पच्चीस हजार नौ सौ रुपये।

उन्होंने नोट गिने नहीं।

सीधे बाकी पाँच गार्डों के पास गए।

—तुम लोगों का पूरा आया?

सबने अपने-अपने कागज देखे।

तभी उन्होंने अपना लिफाफा जेब में रखा।

मैंने पूछा—

—अपने पैसे नहीं गिनेंगे?

उन्होंने कहा—

—पहले इनका देख लूँ। मेरे तो घर में तुम लोग हो।

चार दिन बाद बोर्ड के तीन सदस्यों ने पद छोड़ दिया।

महेंद्र बहल ने इस्तीफा नहीं दिया।

उन्होंने निवासियों की बैठक बुलाई।

शायद उन्हें लगा था कि वर्षों के रिश्ते अभी भी उन्हें बचा लेंगे।

उस शाम सभागार पहले से ज्यादा भरा था।

इस बार सामने की मेज पर कोई नामपट्टिका नहीं थी।

निवासियों ने सीधे सवाल पूछे।

बारह पंखे कहाँ गए?

कैमरा बंद किसने कराया?

एक ही पते वाली तीन कंपनियों से निविदाएँ क्यों ली गईं?

समर बहल की कंपनी को कल्याण कोष का पैसा किस निर्णय से दिया गया?

महेंद्र हर सवाल पर अलग जवाब देते रहे।

कभी लेखाकार।

कभी सुविधा समिति।

कभी पुराने सचिव।

फिर पीछे से नवीन सक्सेना खड़े हुए।

वह भी उसी बोर्ड में थे।

उन्होंने एक छोटा कागज मेज पर रख दिया।

—कैमरा बंद करने का निर्देश मैंने दिया था।

पूरा सभागार उनकी ओर मुड़ा।

महेंद्र ने दाँत भींचे।

—नवीन!

नवीन ने उनकी तरफ नहीं देखा।

—सुबह पाँच बजकर पचपन मिनट पर शालिनी जी का फोन आया था। कहा था मुख्य द्वार वाले कैमरे की प्रणाली रीसेट करनी है।

शालिनी कुर्सी से उठ गई।

—मैंने ऐसा नहीं कहा!

नवीन ने अपना फोन मेज पर रख दिया।

स्क्रीन पर कॉल का समय था।

पाँच बजकर चौवन मिनट।

सैंतालीस सेकंड।

नवीन ने कहा—

—मैंने डर के कारण कर दिया। फिर दोपहर में झूठ बोला कि रिकॉर्डिंग में कुछ नहीं है।

इस बार किसी को दूसरी फाइल की जरूरत नहीं पड़ी।

महेंद्र बहल कुर्सी पर बैठ गए।

उस बैठक में उनका इस्तीफा स्वीकार हुआ।

शालिनी को सुविधा समिति से हटाया गया।

समर बहल की कंपनी के सारे भुगतान रोक दिए गए।

बाद की आधिकारिक जाँच में कई खर्चों की दोबारा पड़ताल शुरू हुई।

मुझे उनमें से हर नतीजे को देखने की इच्छा भी नहीं थी।

मेरे लिए फैसला पहले ही हो चुका था।

एक सप्ताह बाद मैं सुबह फिर छह बजे गार्ड केबिन पहुँची।

इस बार पंखा चल रहा था।

उसकी आवाज थोड़ी ज्यादा थी।

वेदप्रकाश जी नीचे बैठकर चाय पी रहे थे।

मुझे देखकर बोले—

—यह नया पंखा बड़ा शोर करता है।

मैं हँस पड़ी।

—बंद करवा दूँ?

उन्होंने तुरंत कप नीचे रखा।

—पागल है क्या? आठ साल की फाइल खुलवाई है तूने इसके लिए।

पारुल बाहर से हँस दी।

वेदप्रकाश जी ने मुझे चाय का दूसरा गिलास दिया।

फिर अचानक गंभीर हो गए।

—एक बात पूछूँ?

—पूछिए।

—वो चौदह सौ एक वाला घर सच में खरीद लिया?

मैंने सिर हिलाया।

—समझौता हो गया है।

उन्होंने माथा पकड़ लिया।

—सिर्फ बैठक में आने के लिए इतना बड़ा घर?

—बैठक के लिए नहीं।

—फिर?

मैंने बाहर देखा।

पेंटहाउस की बड़ी बालकनी सुबह की धूप में चमक रही थी।

—आप कहते थे ना, सासू माँ के जाने के बाद हमारे घर में आपकी यादें ज्यादा हैं, लोग कम।

उन्होंने मेरी तरफ देखा।

मैंने चाय की चुस्की ली।

—ऊपर चार कमरे हैं। अमित कह रहा था एक कमरा आपकी पुरानी किताबों के लिए रख देंगे।

वेदप्रकाश जी ने तुरंत मुँह दूसरी तरफ कर लिया।

उन्होंने आँखों के पास हाथ लगाया।

फिर खाँसकर बोले—

—मैं कहीं नहीं आ रहा। मेरी ड्यूटी है।

मैंने मुस्कुराकर कहा—

—ड्यूटी की जगह नहीं बदल रही। घर बदल रहा है।

वह मुझे घूरते रहे।

उसी समय एक काली गाड़ी मुख्य द्वार के सामने आई।

वही गाड़ी।

वेदप्रकाश जी उठे।

गाड़ी इमरजेंसी रास्ते की तरफ मुड़ने लगी।

उन्होंने सीटी बजाई।

हाथ उठाया।

गाड़ी रुक गई।

ड्राइवर की खिड़की नीचे हुई।

अंदर शालिनी बैठी थी।

दोनों की नजर मिली।

कुछ सेकंड तक कोई नहीं बोला।

फिर शालिनी ने ड्राइवर से कहा—

—दूसरी तरफ लगा दो।

गाड़ी पीछे हुई।

नियमित पार्किंग में जाकर रुकी।

वेदप्रकाश जी वापस अपनी कुर्सी पर आ गए।

उन्होंने न कोई जीत वाला चेहरा बनाया, न उसकी तरफ दोबारा देखा।

उन्होंने रजिस्टर खोला और अगली गाड़ी का नंबर लिखने लगे।

मैं उन्हें देखती रही।

आठ साल तक जिस पहचान को मैंने बंद फाइल की तरह रखा था, वह उस दिन खुली जरूर थी।

लेकिन मुझे सबसे ज्यादा गर्व अपने नाम, कंपनी या पेंटहाउस पर नहीं हुआ।

मुझे उस आदमी पर हुआ जिसने अपमान सहने के अगले ही सप्ताह उसी गेट पर खड़े होकर वही नियम फिर लागू किया—बिना बदला लिए, बिना किसी को छोटा किए।

पंखा ऊपर घूम रहा था।

टेबल पर उसकी नई वेतन पर्ची रखी थी।

और उसके नीचे वही चार तह वाला पुराना कागज था, जिस पर उसने सबसे पहले सिर्फ इतना लिखा था—

“किसी कर्मचारी का पैसा गलत जगह न जाए।”

वेदप्रकाश जी ने मेरी तरफ चाय बढ़ाई।

—ठंडी हो जाएगी।

मैंने गिलास उठा लिया।

इस बार गार्ड केबिन में हवा चल रही थी।

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