मेरे बेटे ने मुझसे पूछा, “पापा, माँ रोज़ कार में रोती क्यों हैं और घर में आने से पहले कपड़े क्यों बदलती हैं?” मुझे लगा मेरी पत्नी मुझे धोखा दे रही है। लेकिन एक सुबह जब मैंने उसका पीछा किया, तो मुझे एक बैग मिला जिसमें पहने हुए कपड़े, एक अनजान परफ्यूम और डिमेंशिया की दवाइयाँ थीं। मैंने कोई हंगामा नहीं किया। मैं चुपचाप इंतज़ार करता रहा… जब तक उसने वह दरवाज़ा नहीं खोला, जिसके पीछे दशकों से दफ़न एक ऐसा पारिवारिक राज़ छिपा था, जो हमारी पूरी ज़िंदगी बदलने वाला था।
भाग 1
“पापा… माँ रोज़ घर में आने से पहले कार में क्यों रोती हैं? और वहीं अपने कपड़े क्यों बदलती हैं?”
आरव कॉफी का कप हाथ में लिए हुए अचानक ठिठक गया।
“क्या मतलब? तुम्हारी माँ कार में कपड़े बदलती हैं?”
उसका आठ साल का बेटा कबीर ऐसे ही नाश्ता करता रहा, जैसे उसने कोई बेहद सामान्य सवाल पूछा हो।
“मुझे अपने कमरे की खिड़की से ड्राइववे साफ दिखाई देता है। माँ जब घर आती हैं, तो कार में बहुत देर तक बैठी रहती हैं। कभी-कभी अपना चेहरा हाथों से ढक लेती हैं। फिर एक बैग निकालती हैं, अपनी शर्ट उतारती हैं, दूसरी पहनती हैं और फिर घर में आती हैं। लगभग हर दिन ऐसा ही होता है।”
आरव के पेट में एक अजीब-सी गाँठ पड़ गई।
पिछली रात स्नेहा लगभग साढ़े सात बजे घर आई थी। उसने कबीर को चूमा, पूछा कि उसका होमवर्क पूरा हुआ या नहीं, और फिर सीधे बाथरूम में चली गई थी।
आरव ने मुश्किल से अपने लैपटॉप से नज़र उठाई थी।
जब से बेंगलुरु की उस सॉफ्टवेयर कंपनी ने अपना हैदराबाद ऑफिस बंद किया था, आरव घर से काम कर रहा था। धीरे-धीरे उसने ड्रॉइंग रूम के एक हिस्से को अपना ऑफिस बना लिया था और अपनी शादी को भी ऐसी चीज़ में बदल दिया था, जो बस उसकी ज़िंदगी के पीछे कहीं चलती रहती थी।
स्नेहा कहती—
“मैं घर आ गई।”
आरव जवाब देता—
“अच्छा।”
और अक्सर उनकी बातचीत वहीं खत्म हो जाती।
उस दोपहर जब उसने स्नेहा की कार को घर के बाहर आकर रुकते सुना, तो आरव चुपचाप खिड़की के पास चला गया।
उसकी पत्नी ने कार पार्क की।
लेकिन वह बाहर नहीं निकली।
एक मिनट बीता।
फिर दूसरा।
आरव ने देखा, स्नेहा स्टीयरिंग पर झुक गई।
उसके कंधे काँपने लगे।
वह रो रही थी।
फिर उसने पीछे की सीट से एक किराने का बैग निकाला और कार के अंदर ही अपनी शर्ट बदलने लगी।
आरव तुरंत खिड़की से पीछे हट गया, ताकि स्नेहा उसे देख न सके।
जब स्नेहा घर के अंदर आई, तब तक आरव फिर से अपने कंप्यूटर के सामने बैठ चुका था।
“हाय।”
“हाय।”
“सब ठीक है?” उसने पूछा।
स्नेहा मुस्कुराई।
“हाँ। बस काम थोड़ा ज़्यादा था।”
उसकी मुस्कान कुछ ज़्यादा ही सही और बनावटी लग रही थी।
अगले दिन, जब स्नेहा नहा रही थी, आरव ने चुपचाप कार की चाबी उठाई।
उसने सीट के नीचे वह बैग ढूँढ़ निकाला।
अंदर एक गहरे नीले रंग की शर्ट, एक टी-शर्ट और एक हल्का स्वेटर था।
आरव ने उन्हें अपने चेहरे के पास किया।
एक तेज़ गंध उसके नाक तक पहुँची—
कीटाणुनाशक, नमी, दवाइयाँ… और इन सबके नीचे एक सस्ता फूलों वाला परफ्यूम, जिसे स्नेहा कभी इस्तेमाल नहीं करती थी।
बैग के सबसे नीचे उसे एक छोटी बोतल मिली।
उस पर लिखा था—
“स्वीट रोज़ फ्लोरल स्प्रे।”
आरव बिल्कुल स्थिर खड़ा रह गया।
अगले कुछ दिनों में उसने उन चीज़ों पर ध्यान देना शुरू किया, जिन्हें वह पहले हमेशा नज़रअंदाज़ करता आया था।
स्नेहा सुबह आठ बजे घर से निकलती थी, जबकि उसका ऑफिस गुरुग्राम में सिर्फ़ बीस मिनट की दूरी पर था।
कुछ दिनों में वह शाम सात बजे लौटती।
कुछ दिनों में रात के नौ बजे।
एक रात आरव ने उसका फोन चेक किया।
उसे अपने ऊपर शर्म आ रही थी।
लेकिन उसे कोई प्रेम भरे मैसेज नहीं मिले।
हाँ, एक नंबर से बार-बार फोन आए थे।
कॉन्टैक्ट का नाम था—
“प्रिया आंटी।”
अक्सर फोन सुबह बहुत जल्दी या शाम को ऑफिस से लौटने के समय आते थे।
फिर उसे एक छोटा-सा नोट मिला।
“डोनेपेज़िल — दिन में एक बार।”
“मेमैन्टिन — डॉक्टर के निर्देश के अनुसार।”
“गैस बंद कर देना।”
“खाना तैयार छोड़ना।”
“चादरें बदलना।”
आरव ने उन दवाइयों के नाम इंटरनेट पर खोजे।
डिमेंशिया के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाइयाँ।
अब कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।
छिपे हुए कपड़े।
अनजान परफ्यूम।
स्नेहा के आँसू।
बार-बार आने वाले फोन।
डिमेंशिया की दवाइयाँ।
आखिर इन सबका संबंध क्या था?
इसलिए एक सुबह आरव ने उसका पीछा करने का फैसला किया।
कबीर को स्कूल छोड़ने के बाद उसने देखा कि स्नेहा की कार किस दिशा में जाती है।
लेकिन वह नोएडा के अपने ऑफिस की तरफ नहीं गई।
वह दिल्ली की तरफ बढ़ी और फिर पुराने इलाकों से होती हुई गाज़ियाबाद की एक शांत कॉलोनी में पहुँच गई।
वहाँ पुराने अपार्टमेंट और जर्जर मकान कतार में खड़े थे।
स्नेहा ने एक पुराने अपार्टमेंट के सामने कार रोकी।
उसने डिक्की खोली और एक बैग बाहर निकाला।
आरव ने अपनी कार कुछ दूरी पर रोक दी।
वह वहीं बैठा रहा।
एक घंटा और दस मिनट बीत गए।
आखिरकार स्नेहा बाहर आई।
अब उसने दूसरी शर्ट पहन रखी थी।
वह सिर झुकाकर धीरे-धीरे अपनी कार की तरफ बढ़ी।
कार में बैठने से पहले उसने चारों ओर देखा।
फिर उसने वही बैग खोला और अपनी शर्ट बदल ली।
उसके बाद उसने वही सस्ता फूलों वाला परफ्यूम निकाला और अपनी गर्दन तथा बाजुओं पर छिड़क लिया।
आरव के अंदर जैसे कुछ टूट गया।
उसने मन ही मन सोचा—
क्या वह सचमुच किसी और के साथ थी?
उस रात आरव ने उसका इंतज़ार रसोई में अँधेरे के बीच किया।
स्नेहा ने लाइट जलाई और उसे सामने देखकर चौंक गई।
“तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”
आरव ने उसकी आँखों में देखा।
“आज मैं तुम्हारा पीछा करके आया था।”
स्नेहा चुप रही।
“मैं जानना चाहता हूँ कि उस अपार्टमेंट में कौन रहता है।”
कई सेकंड तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
स्नेहा रोई नहीं।
उसने अपना बचाव करने की कोशिश भी नहीं की।
उसने बस मेज से अपनी कार की चाबी उठाई।
“मेरे साथ चलो।”
आरव ने हैरानी से पूछा—
“कहाँ?”
स्नेहा ने उसकी ओर देखा।
“उस जगह… जहाँ तुम इतने दिनों से सोच रहे हो कि मैं तुम्हें धोखा देने जाती हूँ।”
उसने दरवाज़ा खोल दिया।
“जब तुम उस दरवाज़े के अंदर कदम रखोगे, तब समझ जाओगे कि मैं घर आने से पहले अपने कपड़े क्यों बदलती हूँ।”
आरव उसके पीछे चल पड़ा।
लेकिन उसे अभी यह नहीं पता था कि उस दरवाज़े के पीछे जो सच उसका इंतज़ार कर रहा था…
वह किसी अफेयर से कहीं ज़्यादा भयावह था।
भाग 2
रात के सन्नाटे में आरव स्नेहा के पीछे-पीछे चल रहा था। उसके कदम भारी थे, मानो वह किसी फाँसी की तरफ जा रहा हो। स्नेहा चुप थी। उसने न तो कोई सफाई दी और न ही कोई बहाना बनाया। उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी—जैसे वह इस पल का इंतज़ार सालों से कर रही हो।
कार में बैठते ही स्नेहा ने इग्निशन चालू किया। आरव बगल में बैठा था, उसका दिल धड़क रहा था। वह सोच रहा था—क्या वह सच में किसी और से मिलने जा रही है? क्या वह उसे उस आदमी से मिलवाएगी? या फिर कोई और राज़ है?
“स्नेहा… मुझे बता दो। मैं बड़ा आदमी हूँ, सब कुछ सुन सकता हूँ।” आरव ने धीमी आवाज़ में कहा।
स्नेहा ने उसकी तरफ देखा भी नहीं। उसने बस इतना कहा— “तुम सब कुछ देखोगे, आरव। शब्दों में नहीं, बल्कि आँखों से। क्योंकि कुछ सच्चाइयाँ इतनी गहरी होती हैं कि उन्हें बयान नहीं किया जा सकता, उन्हें महसूस किया जाता है।”
गाज़ियाबाद की उस पुरानी कॉलोनी में रात का सन्नाटा और भी गहरा था। सड़कों पर कोई नहीं था। एक-दो आवारा कुत्ते भौंक रहे थे, और कहीं दूर मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आ रही थी।
स्नेहा ने कार उसी पुराने अपार्टमेंट के सामने रोकी जहाँ वह रोज़ आती थी। इमारत चार-पाँच मंज़िला थी, जिसका पेंट उतर चुका था। नीचे एक टूटी-फूटी बेंच पड़ी थी, और दीवारों पर स्याही के निशान बने हुए थे—जैसे कोई पुरानी कहानी खुद को दीवारों पर लिख रही हो।
स्नेहा ने कार की चाबी निकाली और बाहर निकली। आरव ने भी ऐसा ही किया।
“चलो,” स्नेहा ने कहा, और वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ी।
आरव ने पीछे देखा—कोई नहीं था। शायद इस इमारत में कोई रहता भी नहीं था। हर मंज़िल पर खिड़कियाँ बंद थीं, बालकनियाँ खाली पड़ी थीं, जैसे यह इमारत किसी ज़माने में जीवित रही हो और अब बस खामोशी से साँस ले रही हो।
स्नेहा तीसरी मंज़िल पर रुकी। सामने एक पुराना दरवाज़ा था—लकड़ी का, जिस पर कई जगह खरोंचें थीं। उस पर ताला नहीं था, बल्कि एक पुरानी कुंडी लगी थी। स्नेहा ने धीरे से उसे खोला।
दरवाज़ा खुलते ही अंदर से गंध आई—कीटाणुनाशक, पुरानी दवाइयाँ, और हल्की सी मिट्टी की खुशबू। अंदर अंधेरा था, सिवाय एक छोटी सी रात की लाइट के जो कोने में धीमी रोशनी फैला रही थी।
आरव ने अंदर कदम रखा। उसने चारों ओर देखा—फर्श साफ़ था, लेकिन दीवारों पर पुरानी तस्वीरें लगी थीं। कुछ फीकी पड़ चुकी थीं, कुछ में लोगों के चेहरे धुंधले पड़ गए थे। एक कोने में एक छोटी मेज़ थी, जिस पर दवाइयों की शीशियाँ, एक गिलास पानी, और एक मुरझाया हुआ गुलाब रखा था।
और फिर उसकी नज़र पलंग पर पड़ी।
उस पलंग पर एक बूढ़ी औरत लेटी हुई थी। उसके बाल सफ़ेद थे, चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ था, और आँखें बंद थीं। वह हिल नहीं रही थी। उसकी साँस बहुत हल्की थी—शायद ही चल रही थी।
आरव ठिठक गया। “ये… कौन हैं?” उसने फुसफुसाते हुए पूछा।
स्नेहा ने उस औरत के पास जाकर उसका हाथ पकड़ा। “ये मेरी माँ हैं,” उसने धीरे से कहा। “मेरी असली माँ… जिसे मैंने 20 साल पहले खो दिया था।”
आरव का मुँह खुला रह गया। “क्या? तुम्हारी माँ? लेकिन तुम तो कहती थीं कि…”
“हाँ, मैंने कहा था कि मेरी माँ मर चुकी हैं,” स्नेहा ने कहा, उसकी आवाज़ में एक दर्द था, “क्योंकि मुझे यही सिखाया गया था। यही मुझे बताया गया था—कि वह चली गई हैं। लेकिन सच यह है कि… वह यहाँ है। यहाँ, इस कमरे में, पिछले 8 सालों से। और मैं उसे हर रोज़ देखती हूँ।”
आरव का सिर घूम गया। “लेकिन क्यों? क्यों छिपाया? और ये दवाइयाँ… डिमेंशिया की?”
स्नेहा ने उस बूढ़ी औरत के बालों को सहलाया। “हाँ। उसे डिमेंशिया है—अल्ज़ाइमर। पिछले 10 सालों से। पहले पता नहीं था, लेकिन जब पता चला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह मुझे पहचानती तक नहीं थी। मैं उसके लिए एक अजनबी थी।”
“लेकिन तुम… तुम इसे मुझसे क्यों छिपा रही थीं?” आरव की आवाज़ काँप रही थी।
स्नेहा ने गहरी साँस ली। “क्योंकि मुझे डर था, आरव। तुम्हारे परिवार ने मुझसे कहा था—जब हमारी शादी हुई—कि मेरे परिवार का कोई ‘बोझ’ नहीं होना चाहिए। तुम्हारी माँ ने साफ कहा था, ‘स्नेहा, हमारे घर में किसी बीमार या बूढ़े की देखभाल की गुंजाइश नहीं है। अगर तुम्हारी माँ जिंदा है, तो उसे कहीं और रखो।’ और मैं… मैंने तुमसे झूठ बोला। मैंने कहा कि वह नहीं रही। क्योंकि मुझे डर था कि तुम मुझे छोड़ दोगे, या तुम्हारा परिवार मुझे निकाल देगा।”
आरव को ऐसा लगा जैसे कोई उसके सीने पर हथौड़ा मार रहा हो। “तुमने मुझसे झूठ बोला… 8 सालों तक?”
स्नेहा ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वह बह नहीं रहे थे। “क्योंकि मैं तुमसे प्यार करती थी, आरव। और मैं जानती थी कि अगर मैं सच बताऊँगी, तो तुम्हारी माँ हमारी शादी तोड़ने की कोशिश करेगी। तुम्हारा परिवार मुझे अपमानित करेगा। और मैं… मैं अकेली थी। मेरे पास कोई नहीं था। बस वहाँ—मेरी माँ—जो मुझे पहचानती भी नहीं थी, लेकिन जिसे मैं छोड़ नहीं सकती थी।”
आरव दीवार से सहारा लेकर बैठ गया। “तो ये कपड़े… ये परफ्यूम…?”
“ये कपड़े वहाँ के क्लिनिक के हैं जहाँ मैं उसे दिन में नहलाती-धुलाती हूँ,” स्नेहा ने समझाया। “वहाँ कीटाणुनाशक की गंध बहुत तेज़ होती है। अगर मैं वही गंध लेकर घर आती, तो तुम या तुम्हारी माँ पूछते—‘ये क्या गंध है?’ इसलिए मैं कपड़े बदलती हूँ। और ये परफ्यूम… यह उस क्लिनिक की नर्स ने मुझे दिया था। उसने कहा, ‘गंध से पता न चले।’ हाँ, यह सस्ता है, मुझे पता है। लेकिन यह काम करता है।”
आरव ने अपना सिर पकड़ लिया। “और ये आँसू? कार में रोना?”
स्नेहा की आँखों से आखिरकार एक आँसू गिरा। “क्योंकि हर दिन मैं उसे देखती हूँ। उसकी यादें धीरे-धीरे मिट रही हैं। वह मेरा नाम भूल गई है। वह मुझे अपनी बेटी नहीं पहचानती। वह बस कहती है, ‘बहुत अच्छी नर्स हो तुम,’ और फिर सो जाती है। और मैं कार में बैठकर रोती हूँ क्योंकि मुझे पता है कि एक दिन वह पूरी तरह से… चली जाएगी। और मैं उसे रोज़ ऐसे विदा कर रही हूँ।”
आरव उठा और स्नेहा के पास गया। उसने उसका हाथ पकड़ा। “तुमने ये सब अकेले क्यों सहा? मैं तुम्हारा पति हूँ! मुझे बताना चाहिए था!”
स्नेहा ने उसका हाथ झटका। “क्योंकि तुम्हारी माँ ने मुझे साफ कह दिया था—‘अगर तुम्हारी माँ जिंदा है, तो उसे कहीं और रखो, वरना हमारे घर में जगह नहीं है।’ और तुम… तुम हमेशा अपनी माँ की बात मानते हो, आरव। तुमने कभी मेरी बात नहीं सुनी। तुमने कभी ये नहीं पूछा कि मैं क्यों देर से आती हूँ, क्यों थकी रहती हूँ, क्यों रोती हूँ। तुम बस अपने लैपटॉप में खोए रहते थे।”
आरव का सिर झुक गया। “मैं… मुझे माफ कर दो, स्नेहा। मुझे नहीं पता था।”
“पता नहीं था?” स्नेहा ने तीखी आवाज़ में कहा। “तुमने कभी पूछा ही नहीं। तुम्हारी दुनिया में बस तुम्हारा काम, तुम्हारी माँ, तुम्हारी सोसाइटी थी। मैं कहाँ थी, मुझे क्या चाहिए, मुझे किस चीज़ की ज़रूरत है—ये कभी तुम्हारे लिए मायने नहीं रखा।”
बूढ़ी औरत ने करवट बदली और धीरे से बड़बड़ाया, “पानी… पानी…”
स्नेहा तुरंत उठी और गिलास में पानी लेकर उसके पास गई। उसने माँ का सिर उठाकर धीरे-धीरे पानी पिलाया। औरत ने आँखें खोलीं—उसकी आँखें धुंधली थीं—और वह स्नेहा को देखकर मुस्कुराई। “बहुत अच्छी हो तुम… मेरी बिटिया कहाँ है?” उसने बड़बड़ाया और फिर आँखें बंद कर लीं।
स्नेहा ने उसे धीरे से सुलाया और वापस आरव के पास आई। “देखा? वह मुझे नहीं पहचानती। लेकिन मैं उसे पहचानती हूँ। और मैं उसे छोड़ नहीं सकती।”
आरव की आँखों में भी आँसू आ गए। “तुम… तुम हर दिन यहाँ आती हो? ऑफिस के बाद?”
“हाँ। सुबह आठ बजे निकलती हूँ, पहले उसे नहलाती-धुलाती हूँ, खाना खिलाती हूँ, दवाइयाँ देती हूँ। फिर ऑफिस जाती हूँ। शाम को वापस आती हूँ, कपड़े बदलती हूँ, उसे रात की दवा देती हूँ, और फिर घर जाती हूँ। और रास्ते में… कार में… रोती हूँ।”
“और ये ‘प्रिया आंटी’?” आरव ने पूछा।
“वो नर्स हैं जो दिन में यहाँ रहती हैं, जब मैं ऑफिस में होती हूँ। उन्होंने मुझे कई साल पहले ये क्लिनिक ढूँढ़ने में मदद की थी। वही मुझे फोन करके बताती हैं कि माँ कैसी हैं, क्या खाया, क्या दवा ली।”
आरव खड़ा हुआ। उसने स्नेहा की तरफ देखा—उसकी पत्नी, जो 8 सालों से इस बोझ को अकेले उठा रही थी, जो हर दिन दोहरी जिंदगी जी रही थी, जो एक तरफ माँ की देखभाल कर रही थी, दूसरी तरफ एक ऐसे पति के साथ रह रही थी जिसने कभी उसका दर्द नहीं समझा।
“स्नेहा… मैं अब से तुम्हारे साथ रहूँगा। मैं भी आऊँगा यहाँ। मैं तुम्हारी मदद करूँगा।”
स्नेहा ने उसे देखा। “तुम्हारी माँ को क्या बताओगे?”
आरव ने गहरी साँस ली। “मैं उसे सच बताऊँगा। अब ये राज़ नहीं रहना चाहिए।”
स्नेहा ने सिर हिलाया। “नहीं, आरव। ऐसा मत करो। तुम्हारी माँ इसे बर्दाश्त नहीं करेगी। वह मुझे और नीचा दिखाएगी। वह कहेगी कि मैंने तुम्हें गलत रास्ते पर डाल दिया।”
“मैं उसे समझाऊँगा। या नहीं समझाऊँगा—लेकिन मैं तुम्हारे साथ हूँ। अब मैं नहीं चाहता कि तुम अकेली रोओ।”
उस रात वे देर तक वहाँ रुके। स्नेहा ने माँ को दूसरी दवा दी, उनका माथा चूमा, और फिर आरव के साथ बाहर आई।
कार में बैठते ही आरव ने स्नेहा का हाथ पकड़ा। “मुझे बहुत ग्लानि हो रही है… कि मैं इतने सालों से तुम्हारी पीड़ा को नहीं देख पाया।”
स्नेहा ने उसका हाथ दबाया। “तुम अब देख रहे हो। यही मायने रखता है।”
भाग 3
अगली सुबह जब आरव की आँख खुली, तो स्नेहा पहले ही निकल चुकी थी। उसने मेज़ पर एक नोट छोड़ा था—
“माँ को दवा देनी है। कबीर का स्कूल बैग तैयार है। रसोई में नाश्ता है। —स्नेहा”
आरव ने नोट पढ़ा और फिर उसे मोड़कर अपनी जेब में रख लिया। उसने सोचा—यह औरत कितनी मजबूत है। कितनी मुश्किलों को अकेले झेल रही है, और कितनी शांति से।
उस सुबह उसने कबीर को स्कूल छोड़ा। रास्ते में कबीर ने पूछा, “पापा, माँ क्यों रोती थीं?”
आरव ने उसके बालों में हाथ फेरा। “बेटा, माँ बहुत मजबूत हैं। वह किसी की देखभाल करती हैं। और कभी-कभी, जब हम किसी से बहुत प्यार करते हैं, तो हम उनके लिए रोते हैं।”
कबीर थोड़ा समझा, थोड़ा नहीं, लेकिन उसने सिर हिला दिया।
आरव ने उस दिन काम छोड़ दिया। वह स्नेहा के क्लिनिक गया—गाज़ियाबाद की उस पुरानी इमारत में। उसने स्नेहा को वहाँ काम करते देखा: वह माँ को नहला रही थी, उनके बाल सुखा रही थी, उन्हें चम्मच से खाना खिला रही थी। माँ कुछ बड़बड़ा रही थीं—कुछ बेमानी बातें—लेकिन स्नेहा हर बात का जवाब प्यार से दे रही थी, जैसे वह कोई बच्ची हो।
आरव दरवाजे पर खड़ा रहा और सब देखता रहा। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
जब स्नेहा बाहर आई, तो उसे देखकर चौंक गई। “तुम यहाँ?”
“मैंने कहा न मैं तुम्हारे साथ रहूँगा।” आरव ने हाथ आगे बढ़ाए। “मुझे भी सिखाओ कि क्या करना है।”
स्नेहा ने उसे देखा—उसकी आँखों में पहली बार एक नई रोशनी थी, जैसे उसे विश्वास ही नहीं हो रहा हो कि आरव वाकई उसका साथ दे रहा है।
उस दिन आरव ने सीखा—कैसे बिस्तर बदलना है, कैसे दवा देनी है, कैसे माँ को खाना खिलाना है, कैसे उनकी बातें सुननी हैं जो अक्सर अधूरी होती हैं। उसने सीखा कि इस कमरे में समय की एक अलग परिभाषा है—यहाँ घड़ियाँ नहीं, बल्कि यादें चलती हैं।
शाम को जब वे घर लौटे, तो रात के खाने के दौरान आरव की माँ—सुधा जी—ने पूछा, “आज दोनों साथ क्यों आए? स्नेहा, तुम्हारा ऑफिस स्कीम बदल गया?”
स्नेहा ने आरव की तरफ देखा। आरव ने गहरी साँस ली। “माँ, हमें तुमसे कुछ बात करनी है।”
सुधा जी ने चश्मा ऊपर किया। “क्या बात?”
आरव ने सारी बात बताई—कैसे स्नेहा की माँ जिंदा है, कैसे वह बीमार है, कैसे स्नेहा उसकी देखभाल कर रही है, और कैसे उन्होंने यह राज़ 8 सालों से छुपाया।
जैसे ही उसने बात पूरी की, सुधा जी का चेहरा लाल हो गया। उन्होंने चम्मच मेज़ पर पटक दिया। “तुम्हारी माँ जिंदा है? और तुमने हमसे झूठ बोला? हमारे घर में एक बीमार औरत की देखभाल—और वह भी तुम्हारी माँ? तुम्हें शर्म नहीं आती, स्नेहा?”
स्नेहा ने अपना सिर झुका लिया। “मुझे माफी चाहिए, माँ जी। लेकिन मैं उसे छोड़ नहीं सकती थी।”
“तो तुम हमें छोड़ सकती थीं?” सुधा जी गुस्से से बोलीं। “ये हमारा परिवार है, स्नेहा। इसका कोई बोझ नहीं होना चाहिए। और तुमने हमें धोखा दिया!”
इस पर आरव ने माँ को रोकते हुए कहा, “बस करो, माँ। स्नेहा ने कोई धोखा नहीं दिया। उसने अपनी माँ की देखभाल की, जो उसका फ़र्ज़ है। और अगर यहाँ किसी ने धोखा दिया, तो वह मैं हूँ, जिसने 8 सालों से अपनी पत्नी को नहीं देखा। मैं जानता हूँ, तुम्हारा मानना है कि बीमार बुज़ुर्ग बोझ होते हैं, लेकिन वे नहीं होते, माँ। वे हमारी ज़िम्मेदारी हैं। और मैं अब इस ज़िम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ूँगा।”
सुधा जी ने गुस्से में मेज़ उठानी चाही, लेकिन आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया। “माँ, अगर तुम हमारे साथ रहना चाहती हो, तो इस बात को समझो। नहीं तो हम अलग रह सकते हैं। मैंने अपनी पत्नी को 8 सालों तक अकेला छोड़ा—अब नहीं छोड़ूँगा।”
सुधा जी ने उसे घूरा, फिर बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गईं। पूरी रात घर में सन्नाटा रहा।
अगले कुछ हफ्तों में बहुत कुछ बदला। सुधा जी पहले तो किनारा करती रहीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने देखा कि आरव-स्नेहा किस तरह मिलकर सब काम कर रहे हैं—स्नेहा सुबह जाती है, आरव शाम को। कभी आरव माँ को किताब पढ़कर सुनाता है तो कभी स्नेहा उन्हें पुराने गाने सुनाती है।
एक दिन सुधा जी खुद गाज़ियाबाद गईं। वह उस बूढ़ी औरत के पास बैठीं। उस औरत ने अपनी धुंधली आँखों से सुधा को देखा और मुस्कुराई—“तुम अच्छी लगती हो।” सुधा जी की आँखें नम हो गईं। उन्हें एहसास हुआ—यह कोई बोझ नहीं है। यह एक इंसान है, जो कभी किसी की माँ थी, कभी किसी की बेटी थी, और अब बस स्मृतियों के सहारे जी रही है।
उस रात सुधा जी ने स्नेहा के कमरे में आकर कहा—“बेटा, मैंने गलत किया। तुम बहुत बड़ी हो। और मैं तुम्हारी माँ की देखभाल में तुम्हारा साथ दूँगी।”
स्नेहा ने सुधा जी के पैर छूए। दोनों रोईं, लेकिन अब वे आँसू दर्द के नहीं, बल्कि राहत के थे।
कुछ महीनों बाद, स्नेहा की माँ का स्वास्थ्य और बिगड़ गया। डॉक्टर ने कहा—अब बहुत दिन नहीं। उस आखिरी दिन, स्नेहा, आरव, कबीर और सुधा जी—सभी उस कमरे में थे। माँ ने आँखें खोलीं और स्नेहा को देखा। पहली बार उसकी आँखों में पहचान की चमक थी। उसने कहा—“बिटिया… तू आ गई?”
स्नेहा ने उसका हाथ पकड़ा। “हाँ, माँ। मैं हूँ।”
बूढ़ी औरत ने मुस्कुराकर कहा—“बहुत अच्छी बेटी है तू… मुझे तुझ पर नाज़ है।” और फिर उसने आँखें बंद कर लीं—हमेशा के लिए।
स्नेहा के आँसू बह निकले, लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी। आरव ने उसे गले लगाया, कबीर ने उसकी साड़ी पकड़ी, और सुधा जी ने उसका सिर अपनी गोद में रखा।
कुछ हफ्तों बाद, आरव और स्नेहा ने माँ की याद में एक छोटा सा बाग लगाया—जहाँ गुलाब खिलते थे, उनके पसंदीदा फूल। और जब भी स्नेहा कार में बैठती, वह अब रोती नहीं थी। वह मुस्कुराती थी, क्योंकि उसे पता था—माँ अब कहीं और नहीं, बल्कि उसके दिल में रहती हैं, और उनका साथ अब उसका परिवार है।
आरव ने एक दिन कबीर से कहा—“बेटा, तुम्हारी माँ सबसे मजबूत इंसान हैं। और मैंने उनसे सीखा कि सच्चा प्यार बिना शर्त होता है—चाहे वह माँ हो, पत्नी हो, या दोस्त।”
कबीर ने मुस्कुराकर कहा—“मुझे पता है, पापा। वह मेरी सुपरहीरो हैं।”
अंत
