एक नन बार-बार गर्भवती होती रही, लेकिन जब उसके आखिरी बच्चे का जन्म हुआ, तो एक चौंकाने वाली बात ने सब कुछ बदल दिया…
सिस्टर आशा साल-दर-साल रहस्यमय तरीके से गर्भवती होती जा रही थी, जबकि वह गोवा के एक पुराने कैथोलिक कॉन्वेंट की चारदीवारी के भीतर रहती थी—एक ऐसी जगह जहाँ किसी भी पुरुष का प्रवेश सख्त वर्जित था।
और हर बार की तरह इस बार भी मदर करुणा के मन में बेचैनी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई थी।
लेकिन सब कुछ तब बदल गया जब युवा नन ने अपने उस बच्चे को जन्म दिया, जिसे शायद वह अपना आखिरी बच्चा समझ रही थी।
एक ऐसी खौफनाक सच्चाई सामने आने लगी, जो यह समझा सकती थी कि आखिर इतने वर्षों से ये असंभव गर्भधारण बार-बार कैसे हो रहे थे।
और मदर करुणा जिस सच को छूने वाली थीं, वह उन्हें सीधे एक ताबूत तक ले जाने वाला था।
“मदर… मुझे लगता है कि मैं फिर से गर्भवती हूँ।”
सिस्टर आशा की कांपती हुई आवाज़ ने उस सुबह कॉन्वेंट की शांत हवा को चीर दिया।
उसकी बाँहों में कुछ ही महीनों का एक बच्चा सो रहा था। उसके पास ही दो साल से भी कम उम्र का एक छोटा बच्चा उसकी सफेद धार्मिक पोशाक को पकड़े खड़ा था और बड़ी उत्सुक आँखों से मदर करुणा को देख रहा था।
कुछ क्षण पहले तक मदर करुणा बिल्कुल शांत थीं। वह कॉन्वेंट के हिसाब-किताब और रोज़मर्रा के काम में व्यस्त थीं।
लेकिन जैसे ही उन्होंने वे शब्द सुने, ऐसा लगा मानो उनका दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया हो।
उन्होंने अपने सीने पर हाथ रखा और अविश्वास से युवा नन की ओर देखा।
“गर्भवती? फिर से?”
उनकी आवाज़ मुश्किल से निकली।
“हाँ, मदर। बिल्कुल पहले जैसा ही हो रहा है। मितली, चक्कर… और अब मेरा शरीर भी बदलने लगा है।”
आशा के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी।
जैसे वह किसी असामान्य बात के बारे में नहीं, बल्कि किसी साधारण खुशी के बारे में बात कर रही हो।
मदर करुणा ने गहरी साँस ली।
उन्होंने आशा के चेहरे को ध्यान से देखा, जैसे उन्हें वहाँ डर, भ्रम या संदेह में से कुछ भी दिखाई दे जाए।
“क्या तुम्हें पूरा यकीन है?”
उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की कि शायद यह केवल कोई गलतफहमी हो।
“हाँ, मदर। मैं इन लक्षणों को पहचानती हूँ। पहली दो बार भी मुझे बिल्कुल ऐसा ही महसूस हुआ था। इस बार भी सब कुछ वैसा ही है।”
आशा ने अपनी बाँहों में सोए बच्चे की ओर देखा।
“हमारे घर में एक और नन्ही जान खुशी लेकर आने वाली है।”
लेकिन उसकी शांत मुस्कान ने मदर करुणा को शांत नहीं किया।
बल्कि उनका चेहरा और भी पीला पड़ गया।
“लेकिन यह कैसे संभव है, सिस्टर आशा?”
उन्होंने धीमी आवाज़ में पूछा।
“तुम जानती हो, यह तीसरी बार है। तुम यहाँ रहती हो। इस कॉन्वेंट में किसी पुरुष को प्रवेश की अनुमति नहीं है। फिर तुम बार-बार गर्भवती कैसे हो सकती हो?”
आशा ने वही शांत उत्तर दिया जो वह पहले भी दे चुकी थी।
“मदर, मैं कसम खाती हूँ, मुझे नहीं पता। मुझे नहीं मालूम यह कैसे होता है। मैं केवल इतना जानती हूँ कि यह होता है। पहले भी हुआ था।”
उसने धीरे से अपने सीने पर हाथ रखा।
“मैं पवित्र हूँ। आप जानती हैं।”
मदर करुणा ने सिर हिलाया और कमरे में टहलने लगीं।
“लेकिन इसका कोई अर्थ नहीं बनता। एक स्त्री गर्भवती होने के लिए…”
वह आगे नहीं बोलीं।
आशा ने शांत स्वर में कहा,
“मैं जानती हूँ, मदर।”
उसके चेहरे पर अजीब-सी चमक थी।
“लेकिन शायद मैं दूसरी औरतों जैसी नहीं हूँ। शायद ईश्वर ने मुझे एक और उपहार दिया है।”
मदर करुणा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
उनकी पलकों के पीछे आँसू जमा हो गए।
यह रहस्य नया नहीं था।
और यही बात उसे इतना भयावह बना रही थी।
तीन वर्षों में यह तीसरी बार था जब सिस्टर आशा गर्भवती होने का दावा कर रही थी।
तीन वर्षों में तीसरी बार।
एक ऐसे कॉन्वेंट के भीतर जहाँ पुरुषों का प्रवेश वर्जित था।
जहाँ मुख्य द्वार हमेशा बंद रहता था।
जहाँ रात होते ही हर दरवाज़े पर ताला लगा दिया जाता था।
मदर करुणा ने आखिरकार खुद को संभाला।
“अगर यह सचमुच ईश्वर की इच्छा है,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “तो हमें इसे स्वीकार करना होगा।”
फिर उनका चेहरा गंभीर हो गया।
“लेकिन आज ही मैं डॉ. काव्या को बुलाऊँगी। हमें तुरंत इस गर्भावस्था की पुष्टि करनी होगी।”
आशा ने सिर हिलाया।
“बिल्कुल, मदर।”
उसने अपनी बाँहों में सोए बच्चे को थोड़ा ऊपर किया।
फिर पास खड़े छोटे आरव के सिर पर प्यार से हाथ फेरा।
“मैं विहान के लिए दूध तैयार करने जा रही हूँ। उसे भूख लगी होगी।”
और वह कमरे से बाहर चली गई।
उसके कदम शांत और स्थिर थे।
जैसे दुनिया में कुछ भी असामान्य न हुआ हो।
लेकिन मदर करुणा जानती थीं—
कुछ भी सामान्य नहीं था।
वह पहली गर्भावस्था को याद कर रही थीं।
जब आशा कॉन्वेंट के छोटे से बगीचे में बेहोश होकर गिर गई थी।
जब उसे होश आया था, उसकी आँखों में आँसू थे।
उसने कहा था कि उसने किसी बच्चे की धड़कन सुनी थी।
फिर दूसरी गर्भावस्था हुई।
पहले बच्चे के ठीक से चलना सीखने से पहले ही आशा फिर गर्भवती हो गई।
हर बार उसने कहा—
उसने अपनी शपथ नहीं तोड़ी।
हर बार कॉन्वेंट में किसी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश का कोई प्रमाण नहीं मिला।
न कोई टूटा हुआ ताला।
न कोई अनजान पदचिह्न।
न किसी पुरुष की आवाज़।
सिर्फ एक बढ़ता हुआ पेट।
फिर एक बच्चा।
और फिर वही सवाल—
आखिर यह हो कैसे रहा था?
मदर करुणा कुछ देर तक अकेली खड़ी रहीं।
फिर उनकी नजर फर्श पर गई।
कुर्सी के पैर के पास एक छोटी-सी सफेद पट्टी पड़ी थी।
उन्होंने धीरे से उसे उठाया।
वह धागा नहीं था।
वह मेडिकल टेप था।
ताज़ा।
साफ।
और उसमें हल्की-सी दवा जैसी गंध थी।
वही गंध जो डॉ. काव्या के मेडिकल बैग से आती थी।
मदर करुणा का दिल तेजी से धड़कने लगा।
उन्होंने टेप को अपनी मेज़ पर रखा और फोन की ओर हाथ बढ़ाया।
लेकिन रिसीवर उठाने से पहले वह रुक गईं।
तीन वर्षों से वह सिस्टर आशा को लोगों की बातों और अफवाहों से बचाती आई थीं।
उन्होंने बिशप के कार्यालय से आने वाले हर सवाल का सावधानी से जवाब दिया था।
उन्होंने दूसरी ननों से कहा था कि कभी-कभी सच्चाई समझने से पहले धैर्य रखना पड़ता है।
उन्होंने दोनों बच्चों का बपतिस्मा चुपचाप करवाया था।
उन्होंने यह सुनिश्चित किया था कि आरव और विहान को शक और तानों के बजाय प्यार मिले।
लेकिन इन सभी फैसलों के नीचे एक ऐसी सच्चाई छिपी थी जिसे मदर करुणा ने खुद से भी स्वीकार नहीं किया था।
वह डरी हुई थीं।
आशा से नहीं।
किसी घोटाले से भी नहीं।
वह इस बात से डरी थीं कि जिस व्यक्ति पर उन्होंने वर्षों से भरोसा किया था, शायद उसी ने इस कॉन्वेंट की दीवारों के भीतर उनसे कोई भयानक सच छिपाया था।
उन्होंने डॉ. काव्या का नंबर मिलाया।
चौथी घंटी के बाद फोन उठा।
“काव्या बोल रही हूँ।”
“मैं मदर करुणा हूँ।”
कुछ पल की चुप्पी।
“मदर? क्या कोई सिस्टर बीमार है?”
“तुम्हें कॉन्वेंट आना होगा।”
“क्या हुआ?”
मदर करुणा ने खुले दरवाज़े की ओर देखा।
गलियारे से कपों की हल्की आवाज़ आ रही थी।
रसोई से बच्चों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं।
और कहीं पास ही सिस्टर आशा धीमे स्वर में अपने बच्चे के लिए गीत गा रही थी।
“उसे लगता है कि वह फिर से गर्भवती है।”
इस बार डॉ. काव्या ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
मदर करुणा की उंगलियाँ फोन के रिसीवर पर कस गईं।
“डॉक्टर?”
“मैंने सुना।”
उसकी आवाज़ में हैरानी नहीं थी।
बल्कि थकान थी।
“तुम हैरान नहीं हुईं।”
“मैं डॉक्टर हूँ। किसी मरीज की जाँच किए बिना प्रतिक्रिया देना उचित नहीं।”
“मैं वह नहीं पूछ रही।”
फिर चुप्पी।
आखिर काव्या ने धीरे से साँस छोड़ी।
“मैं दोपहर से पहले पहुँच सकती हूँ।”
“उससे पहले आओ।”
“मैं कोशिश करूँगी।”
मदर करुणा ने फोन रखने से पहले कहा—
“काव्या?”
“जी?”
“मुझे अपने ऑफिस में कुछ मिला है।”
“क्या?”
“मेडिकल टेप का एक टुकड़ा।”
दूसरी तरफ कुछ बदल गया।
“कहाँ?”
“उस कुर्सी के पास जहाँ आशा बैठी थी।”
“इसका कोई अर्थ भी हो सकता है और नहीं भी।”
“शायद।”
मदर करुणा ने टेप की ओर देखा।
“लेकिन तुम समझती हो कि मैं क्यों पूछ रही हूँ।”
कुछ पल बाद काव्या की आवाज़ आई।
“मैं तुरंत आ रही हूँ।”
फोन कट गया।
मदर करुणा ने धीरे से रिसीवर नीचे रखा।
उसी क्षण कॉन्वेंट की घंटी बजी।
सुबह के समय बजने वाली वही परिचित घंटी।
आमतौर पर वह आवाज़ उनके मन को शांति देती थी।
लेकिन उस दिन हर घंटी जैसे उनसे एक ही सवाल पूछ रही थी—
सच क्या है?
रसोई में सिस्टर आशा लंबी लकड़ी की मेज़ पर बैठी थी।
आरव उसके पास था और विहान उसकी बाँहों में।
खिड़कियों से आती धूप पत्थर की दीवारों पर फैल रही थी।
सिस्टर मीरा चूल्हे के पास खड़ी रोटी काट रही थी।
आरव ने अपनी लकड़ी की चम्मच को घोड़ा बना लिया था।
वह उसे मेज़ पर दौड़ा रहा था।
“दूध के पास घोड़ा नहीं दौड़ाना,” मीरा ने चेतावनी दी।
आरव तुरंत रुक गया।
“घोड़े को प्यास लगी।”
“तो नाश्ते के बाद पानी मिलेगा।”
आशा हँसी और उसके सिर को चूम लिया।
“वह धैर्य सीख रहा है।”
मीरा ने मुस्कुराकर कहा,
“नहीं। वह बातचीत करके अपनी बात मनवाना सीख रहा है।”
विहान आशा के कंधे से लगकर हिला।
वह शांत बच्चा था।
उसकी छोटी उंगलियाँ आशा के वस्त्र की सिलवट पकड़कर बंद हो गईं।
मीरा ने दो रोटियाँ प्लेट में रखीं और आशा के सामने बैठ गई।
“तुम बहुत पीली लग रही हो।”
“मैं ठीक से सो नहीं पाई।”
“बच्चे की वजह से?”
आशा की नजर अनायास अपने पेट पर गई।
अभी कोई स्पष्ट बदलाव नहीं था।
लेकिन उसका हाथ बार-बार वहीं जा रहा था।
जैसे वह किसी ऐसी चीज़ की रक्षा कर रही हो जिसे वह खुद भी देख नहीं सकती थी।
“शायद।”
मीरा ने धीरे से पूछा,
“तुम डर रही हो?”
आशा कुछ क्षण चुप रही।
“नहीं।”
वही जवाब।
हर बार वही जवाब।
लेकिन आज पहली बार वह जवाब खुद आशा को भी सच नहीं लगा।
मीरा ने उसके चेहरे को देखा।
“तुम्हें डरने की अनुमति है।”
“मुझे पता है।”
“मदर करुणा सच पता लगा लेंगी।”
आशा की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई।
“वह वर्षों से कोशिश कर रही हैं।”
“इसका मतलब यह नहीं कि वह असफल हुई हैं।”
आशा ने रसोई के दरवाज़े की ओर देखा।
उस पार कॉन्वेंट का छोटा-सा बगीचा दिखाई देता था।
रोज़मेरी के पौधों और सफेद फूलों के बीच एक पतली पगडंडी थी।
उसके आगे पुराना मेडिकल कक्ष था, जहाँ डॉ. काव्या के आने पर ही अक्सर दरवाज़ा खुलता था।
अचानक आशा के भीतर एक अजीब बेचैनी उठी।
उसे याद आया—
वह कभी वहाँ जागी थी।
या शायद उसे ऐसा लगता था कि वह जागी थी।
एक तेज़ रोशनी।
माथे पर ठंडा कपड़ा।
और किसी की आवाज़—
“तुम सुरक्षित हो।”
लेकिन वह कब हुआ था?
पहली गर्भावस्था के समय?
दूसरी के समय?
या उससे पहले?
जैसे ही उसने याद को पकड़ने की कोशिश की, वह गायब हो गई।
“आशा?”
वह चौंक गई।
“हाँ?”
“तुम कहाँ खो गई थीं?”
“मैं बस सोच रही थी।”
“किस बारे में?”
आशा ने विहान की ओर देखा।
“मुझे नहीं पता।”
मीरा उसके करीब झुकी।
“यह जवाब परेशान करने वाला है।”
आशा की आँखें बच्चे के चेहरे पर टिक गईं।
“मेरी याददाश्त में कुछ खाली जगहें हैं।”
मीरा का हाथ वहीं रुक गया।
“क्या मतलब?”
“कुछ सुबह ऐसी होती हैं जब मैं उठती हूँ और लगता है जैसे कोई बहुत महत्वपूर्ण सपना देखा था।”
“कैसा सपना?”
“कोई कमरा… कोई रोशनी… कोई आवाज़…”
उसने सिर हिलाया।
“लेकिन जैसे ही मैं उसे पकड़ने की कोशिश करती हूँ, सब गायब हो जाता है।”
“यह कब से हो रहा है?”
“कई वर्षों से।”
“तुमने किसी को बताया क्यों नहीं?”
आशा ने हल्का-सा कंधा उचकाया।
“मैंने सोचा थकान होगी। फिर आरव पैदा हुआ। फिर विहान। हमेशा कुछ न कुछ अधिक जरूरी था।”
मीरा की आँखों में चिंता गहरी हो गई।
“तुम्हें मदर करुणा को बताना चाहिए।”
आशा ने धीमे स्वर में कहा,
“वह पहले से ही मुझ पर शक करती हैं।”
“वह तुम पर शक नहीं करतीं।”
आशा ने दरवाज़े की ओर देखा।
“उन्हें मुझ पर नहीं… उस कहानी पर शक है जो मैं उन्हें बता सकती हूँ।”
कुछ पल दोनों चुप रहीं।
फिर आशा ने कहा—
“जब तुम्हारे पास खुद जवाब न हों, तो हर सवाल शक जैसा लगता है।”
डॉ. काव्या सुबह दस बजे से पहले ही कॉन्वेंट पहुँच गईं।
उनकी कार मुख्य द्वार के पास रुकी।
सिस्टर बीना ने दौड़कर गेट खोला।
काव्या अपने हाथ में काला मेडिकल बैग लिए अंदर आईं।
मदर करुणा प्रवेश द्वार पर उनका इंतज़ार कर रही थीं।
“तुम बहुत जल्दी आ गईं।”
“आपकी आवाज़ से लगा कि मामला गंभीर है।”
“है।”
काव्या ने दस्ताने उतारे।
“आशा कहाँ है?”
“रसोई में।”
“क्या मैं उसकी जाँच मेडिकल कक्ष में कर सकती हूँ?”
मदर करुणा ने सिर हिलाया।
दोनों गलियारे से आगे बढ़ीं।
लेकिन मदर करुणा ने ध्यान दिया कि काव्या की आँखें बार-बार इधर-उधर जा रही थीं।
बंद कपड़ों वाले कमरे की ओर।
चैपल की ओर जाने वाले रास्ते की ओर।
और उस संकरी सीढ़ी की ओर जो पुराने अतिथि-कक्षों तक जाती थी।
मदर करुणा रुक गईं।
“तुम कुछ ढूँढ़ रही हो।”
काव्या ने धीरे से कहा,
“मैं बस जगह याद कर रही हूँ।”
“तुम ग्यारह साल से यहाँ आ रही हो।”
“मुझे पता है।”
वे मेडिकल कक्ष के सामने पहुँचीं।
मदर करुणा ने अपनी जेब से रूमाल निकाला।
मेडिकल टेप का छोटा टुकड़ा उसके बीच में रखा था।
काव्या उसे देखते ही कुछ क्षण के लिए बिल्कुल स्थिर हो गई।
“यह तुम्हारा है?”
“यह सामान्य सर्जिकल टेप है।”
“मेरा सवाल वह नहीं था।”
काव्या की नजर उठी।
“यह मेरे पुराने मेडिकल बैग से आया हो सकता है।”
“लेकिन यह नया था।”
“तुम्हें कैसे पता?”
“इस पर चिपकने वाला पदार्थ अभी भी था।”
काव्या ने होंठ भींच लिए।
“पहले आशा की जाँच करने दीजिए। छोटे-छोटे टुकड़ों से कहानी मत बनाइए।”
मदर करुणा ने धीमे से कहा,
“ठीक है।”
लेकिन जैसे ही काव्या ने दरवाज़ा खोला, मदर करुणा ने उसे रोक दिया।
“मैंने इस कॉन्वेंट की हर स्त्री के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी तुम्हें दी है।”
काव्या का हाथ दरवाज़े की कुंडी पर ही रुक गया।
“मुझे पता है।”
“और मैं चाहती हूँ कि मैं तुम पर भरोसा करती रहूँ।”
काव्या ने उनकी ओर देखा।
उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था।
सिर्फ दुख था।
“आप शायद यह जानेंगी,” उसने बहुत धीमे कहा, “कि किसी पर भरोसा करना और उसके बारे में सब कुछ जानना… हमेशा एक ही बात नहीं होती।”
उसी समय कदमों की आवाज़ सुनाई दी।
सिस्टर आशा सामने आ गई।
उसके साथ सिस्टर मीरा थी।
विहान मीरा की बाँहों में सो रहा था और आरव उसका हाथ पकड़े हुए था।
आशा ने डॉक्टर और मदर करुणा की ओर देखा।
“आप इतनी जल्दी आ गईं।”
“मैं यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि तुम ठीक हो,” काव्या ने कहा।
उसने मेडिकल कक्ष का दरवाज़ा खोला।
“चलें?”
जाँच शांत और छोटी थी।
डॉ. काव्या ने आशा से कई सवाल पूछे।
उसकी नब्ज़ देखी।
फिर उसके पेट की सावधानी से जाँच की।
इसके बाद उन्होंने अपने छोटे चमड़े के बैग से एक परीक्षण निकाला।
मदर करुणा खिड़की के पास खड़ी थीं।
मीरा बच्चों के साथ बाहर इंतज़ार कर रही थी।
आशा संकरी खाट के किनारे बैठी डॉक्टर के हाथों को देख रही थी।
“तुम थकी हुई लग रही हो,” काव्या ने कहा।
“मेरे दो छोटे बच्चे हैं।”
“यह बहुत कुछ समझाता है।”
आशा ने धीरे से पूछा,
“क्या तीसरा भी होगा?”
काव्या ने उसकी ओर देखा।
“हम जल्द जान जाएँगे।”
आशा कुछ क्षण उसे देखती रही।
फिर बोली—
“आप पहले से जानती हैं।”
काव्या रुक गई।
“तुम ऐसा क्यों सोचती हो?”
“जब आप अंदर आईं, तब आपके चेहरे पर जो था…”
“वह कोई मेडिकल संकेत नहीं है।”
आशा ने धीरे से कहा,
“नहीं। वह इंसानी संकेत है।”
डॉक्टर ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम अब पहले से ज्यादा चीज़ें नोटिस करने लगी हो।”
“मेरे पास वजह है।”
मदर करुणा खिड़की से मुड़ीं।
“आशा, क्या तुम हमें कुछ बताना चाहती हो?”
युवा नन ने अपने हाथ जोड़ लिए।
“मुझे कुछ चीज़ें याद आने लगी हैं।”
काव्या अचानक स्थिर हो गईं।
“क्या चीज़ें?”
“एक कमरा। एक रोशनी। कभी-कभी एक आवाज़।”
उसने डॉक्टर की ओर देखा।
“मुझे लगता है वह आपकी आवाज़ थी।”
काव्या ने अपना मेडिकल बैग आधा बंद किया, फिर खोल दिया।
“बीमारी के दौरान यादें उलझ सकती हैं।”
“क्या मैं बीमार थी?”
“तुम एक से अधिक बार बेहोश हुई थीं।”
“मेरी पहली गर्भावस्था से पहले?”
काव्या ने कोई उत्तर नहीं दिया।
मदर करुणा आगे बढ़ीं।
“डॉक्टर?”
काव्या की नजर टेस्ट पर गई।
“यह पॉज़िटिव है।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
आशा ने अपनी नजर नीचे कर ली।
उसे जवाब की उम्मीद थी।
फिर भी उसकी पुष्टि ने जैसे उसकी सारी ताकत खींच ली।
मदर करुणा उसके पास बैठ गईं।
“तुम ठीक हो?”
“हाँ।”
आशा की आवाज़ कांप रही थी।
“मैं बस अपनी ही जिंदगी से बार-बार चौंकने से थक गई हूँ।”
मदर करुणा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“हम सच पता लगाएंगे।”
आशा ने उनकी ओर देखा।
“अगर वह सच हमारे एक-दूसरे के बारे में विश्वास को बदल दे… तब भी क्या हम उसे सच कहेंगे?”
मदर करुणा ने उसका हाथ और कसकर पकड़ा।
“हाँ।”
डॉ. काव्या अपने उपकरण वापस बैग में रखने लगीं।
हर धातु की कुंडी की आवाज़ उस कमरे में असामान्य रूप से तेज़ सुनाई दे रही थी।
मदर करुणा ने उसकी ओर देखा।
“काव्या, हमें अकेले में बात करनी है।”
“मुझे उम्मीद थी।”
आशा उठ खड़ी हुई।
“नहीं।”
दोनों ने उसकी ओर देखा।
वह थोड़ी अस्थिर थी, लेकिन उसके चेहरे पर दृढ़ता थी।
“अगर यह मेरे बारे में है, तो मैं भी रहूँगी।”
“यह सुनना कठिन हो सकता है,” काव्या ने कहा।
आशा ने जवाब दिया—
“इससे यह कम मेरा नहीं हो जाता।”
मदर करुणा ने उसके चेहरे में कुछ नया देखा।
उसकी कोमलता अभी भी थी।
लेकिन अब उसके नीचे एक ऐसी दृढ़ता थी जिसे शायद मातृत्व ने जन्म दिया था।
“ठीक है,” मदर करुणा ने कहा। “तुम रहोगी।”
काव्या ने आँखें बंद कीं।
फिर दीवार से लगी लकड़ी की कुर्सी खींचकर बैठ गई।
उसने कहा—
“यह सब तीन साल पहले शुरू नहीं हुआ था।”
कमरे में कोई नहीं बोला।
बाहर आरव की हँसी सुनाई दे रही थी।
काव्या ने अपने मेडिकल बैग पर दोनों हाथ रखे।
“छह साल पहले,” उसने कहा, “आशा ने अपनी अंतिम धार्मिक प्रतिज्ञाएँ लेने से पहले गंभीर बीमारी झेली थी।”
आशा ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“मुझे याद नहीं।”
“मुझे पता है।”
मदर करुणा ने पूछा,
“कौन-सी बीमारी?”
“गंभीर एनीमिया, तेज़ बुखार और अत्यधिक थकान। वह फ्लू के प्रकोप के दौरान सिस्टर मैग्डलीन की देखभाल कर रही थी। आशा आराम करने को तैयार नहीं थी। एक रात वह चैपल के पास बेहोश होकर गिर गई।”
मदर करुणा सोचने लगीं।
“मुझे उसकी बीमारी याद है, लेकिन इतनी गंभीर नहीं।”
“उस समय आप डायोसीज़ की बैठक में गई हुई थीं। तब मदर इंदिरा जीवित थीं।”
मदर इंदिरा का नाम सुनते ही कमरे का वातावरण बदल गया।
मदर इंदिरा ने वर्षों तक उस कॉन्वेंट का नेतृत्व किया था।
वह अनुशासनप्रिय, रहस्यमयी और अत्यंत सम्मानित थीं।
उनकी मृत्यु पाँच वर्ष पहले हुई थी।
उन्हें कॉन्वेंट के पीछे छोटे से कब्रिस्तान में दफनाया गया था।
मदर करुणा ने पूछा—
“मदर इंदिरा ने क्या किया?”
“उन्होंने मुझे आशा का इलाज यहीं करने को कहा।”
“यह तो सामान्य बात है।”
“पूरी तरह नहीं।”
काव्या ने आशा की ओर देखा।
“बुखार के दौरान तुम अपने परिवार के बारे में बोलती रहती थीं।”
“मेरे परिवार के बारे में?”
“तुमने कहा था कि तुम्हारी एक बहन है।”
आशा का चेहरा अचानक बदल गया।
“मेरी बहन?”
“तुम्हारी एक बहन थी,” काव्या ने धीरे से सुधार किया। “कम से कम छह साल पहले।”
आशा अचानक खड़ी हो गई।
“यह सच नहीं हो सकता।”
“बैठो,” मदर करुणा ने कहा।
लेकिन आशा की आँखों में अब केवल अविश्वास नहीं था।
वहाँ डर भी था।
“मेरे माता-पिता बहुत पहले मर गए थे। मेरी परवरिश मेरी मौसी ने की। उन्होंने कहा था कि मेरा कोई भाई या बहन नहीं है।”
“तुम्हारी मौसी का नाम?”
“रोसा वाल्देस।”
काव्या ने धीरे से सिर हिलाया।
“रोसा तुम्हारी मौसी नहीं थी।”
आशा का चेहरा सफेद पड़ गया।
“क्या?”
“वह तुम्हारी माँ की चचेरी बहन थी।”
“तो मेरी बहन…?”
“तुम दोनों को बचपन में अलग कर दिया गया था।”
आशा ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया।
“क्यों?”
“तुम्हारे माता-पिता की मृत्यु के बाद दोनों बच्चों को एक साथ पालना कठिन था। तुम्हें रोसा अपने साथ ले गई। छोटी बच्ची को किसी दूसरे रिश्तेदार ने अपने पास रख लिया।”
“उसने मुझे क्यों नहीं बताया?”
“मैं इसका जवाब नहीं दे सकती।”
“लेकिन आपको पता था?”
“शुरुआत में नहीं।”
काव्या ने अपने बैग से एक पुराना कागज़ निकाला।
“बीमारी के दौरान तुम एक नाम बार-बार बोलती थीं।”
“कौन-सा नाम?”
“अनन्या।”
आशा की साँस अटक गई।
काव्या ने कहा—
“मदर इंदिरा उस नाम को पहचानती थीं।”
“कैसे?”
“क्योंकि अनन्या ने कॉन्वेंट को पत्र लिखा था।”
मदर करुणा ने कागज़ ले लिया।
उस पर पुरानी लिखावट थी।
काव्या ने कहा—
“मैंने इसे वर्षों से संभालकर रखा है।”
आशा ने काँपती आवाज़ में पूछा—
“क्यों?”
“क्योंकि मदर इंदिरा ने मुझसे वादा लिया था कि इसे तुम्हें तभी दूँगी जब तुम्हें अपनी यादें वापस आने लगेंगी।”
मदर करुणा ने कागज़ खोला।
उस पर लिखा था—
प्रिय आना,
मुझे नहीं पता कि अब भी लोग तुम्हें इसी नाम से बुलाते हैं या नहीं।
मुझे बताया गया है कि तुम कॉन्वेंट में चली गई हो और शायद अपने पुराने जीवन को पीछे छोड़ना चाहती हो।
अगर यह तुम्हारी इच्छा है, तो मैं उसका सम्मान करूँगी।
लेकिन मैं चाहती हूँ कि तुम यह जानो—
मैं जीवित हूँ।
मेरा नाम अनन्या है।
और मुझे विश्वास है कि मैं तुम्हारी बहन हूँ।
मैंने वर्षों तक तुम्हें खोजा है।
मैंने रोसा को तब ढूँढ़ा जब वह बीमार हो गई थी।
उसने स्वीकार किया कि हमारे माता-पिता की मृत्यु के बाद हमें अलग कर दिया गया था।
उसने तुमसे कहा कि मैं मर चुकी हूँ।
उसे डर था कि अगर तुम्हें पता चला कि मैं जीवित हूँ, तो तुम उसे छोड़कर मुझे खोजने चली जाओगी।
मैं तुम्हें दोष नहीं देती।
तुम्हें सच्चाई पता ही नहीं थी।
अब मैं शादीशुदा हूँ।
मेरे पति का नाम रोहन है।
हमने कई वर्षों तक बच्चे की कोशिश की, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि शायद हमारे लिए यह संभव न हो।
फिर भी मैं तुमसे कुछ माँगने के लिए यह पत्र नहीं लिख रही।
मैं केवल एक बार तुम्हें देखना चाहती हूँ।
तुम्हें बताना चाहती हूँ कि तुम दुनिया में कभी अकेली नहीं थीं।
तुम्हारी बहन,
अनन्या
मदर करुणा ने पत्र नीचे कर दिया।
आशा की आँखें खाली थीं।
“मेरा नाम आना था?”
“हाँ,” काव्या ने कहा।
“मुझे वह याद क्यों नहीं?”
“तुम बहुत छोटी थीं जब अलग हुईं।”
“क्या मैं उससे दोबारा मिली थी?”
काव्या कुछ क्षण चुप रही।
“हाँ।”
मदर करुणा ने तुरंत पूछा—
“कब?”
“तुम्हारी बीमारी के बाद।”
“कहाँ?”
“पुराने अतिथि-कक्ष में।”
मदर करुणा का चेहरा कठोर हो गया।
“और मुझे किसी ने नहीं बताया?”
“मदर इंदिरा चाहती थीं कि यह तब तक निजी रहे जब तक आशा खुद निर्णय न ले।”
आशा ने बिस्तर का किनारा पकड़ लिया।
“मैंने क्या निर्णय लिया था?”
काव्या की आवाज़ नरम हो गई।
“तुम उसकी मदद करना चाहती थीं।”
“किस बात में?”
डॉक्टर चुप हो गई।
उस एक पल की चुप्पी ने मदर करुणा को मेडिकल टेप की याद दिला दी।
उन्होंने धीरे से कहा—
“अनन्या माँ नहीं बन सकती थी।”
काव्या ने सिर झुका दिया।
आशा दोनों को देखने लगी।
“नहीं…”
“आशा—”
“नहीं।”
उसकी आवाज़ गुस्से से नहीं, बल्कि अविश्वास से भरी थी।
“आप कह रही हैं कि मैंने किसी और के लिए बच्चा पैदा करने के लिए अपनी कोख देने की सहमति दी थी?”
“तुमने उस समय केवल इसके बारे में सोचने की सहमति दी थी।”
“तो आरव और विहान…?”
काव्या ने उसकी ओर देखा।
“जैविक रूप से, उस समय यही योजना थी।”
कमरे में भारी सन्नाटा छा गया।
बाहर से सिस्टर मीरा की आवाज़ में विहान के लिए गाया जा रहा गीत सुनाई दे रहा था।
आशा ने दरवाज़े की ओर देखा।
“तो क्या आरव और विहान अनन्या के बच्चे हैं?”
“नहीं,” काव्या ने धीरे से कहा।
आशा ने उसकी ओर देखा।
“पक्का?”
“हाँ।”
“कैसे?”
“क्योंकि पहला प्रयास छह साल पहले ही समाप्त कर दिया गया था।”
आशा की उंगलियाँ काँप रही थीं।
“मुझे कुछ भी याद नहीं।”
“उसके बाद तुम बहुत डर गई थीं।”
“क्या किसी ने मुझे मजबूर किया?”
“नहीं।”
“फिर?”
“तुम खुद नहीं समझ पा रही थीं कि तुम्हारा निर्णय प्रेम से आया था, अपराधबोध से या अपने परिवार को ठीक करने की इच्छा से।”
मदर करुणा ने दृढ़ स्वर में कहा—
“फिर यह सब वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था।”
“हाँ।”
“लेकिन तीन साल बाद आशा गर्भवती हुई।”
काव्या ने धीरे से कहा—
“हाँ।”
“कैसे?”
डॉक्टर ने अपने बैग से एक पुरानी काली नोटबुक निकाली।
“यह मदर इंदिरा की थी।”
मदर करुणा ने उसे देखा।
“तुम जवाब देने से बच रही हो।”
“मैं कोशिश कर रही हूँ कि आपको पूरी सच्चाई सही क्रम में बताऊँ।”
“सच्चाई को क्रम में मत सजाओ जैसे उस पर तुम्हारा अधिकार हो।”
काव्या का चेहरा बदल गया।
आशा ने धीरे से कहा—
“कृपया।”
मदर करुणा चुप हो गईं।
काव्या ने नोटबुक खोली।
“पहली कोशिश असफल होने के बाद अनन्या और रोहन इस क्षेत्र से चले गए थे। वे कई बार पत्र लिखते रहे।”
“और मैंने जवाब दिए?”
“हाँ।”
“क्या वे पत्र हैं?”
“नहीं।”
काव्या ने एक पन्ना खोला।
“लेकिन मदर इंदिरा ने तुम्हारे एक पत्र की एक पंक्ति लिखकर रखी थी।”
उसने पढ़ा—
“मैं तुम्हें बच्चा देने का वादा नहीं कर सकती, लेकिन मैं नहीं चाहती कि डर यह तय करे कि हम बहनें रहेंगी या नहीं।”
आशा ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ टूटे हुए दृश्य उसकी स्मृति में चमके।
एक मेज़।
एक नीला लिफाफा।
बारिश की आवाज़।
स्याही से काँपता हुआ उसका हाथ।
“मुझे स्याही याद है,” उसने फुसफुसाया।
काव्या आगे झुकी।
“किस रंग की?”
“नीली।”
“और?”
“एक महिला मेरे सामने बैठी थी।”
“अनन्या?”
आशा ने सिर हिलाया।
“उसकी आँखें मेरी जैसी थीं।”
“वह रो रही थी।”
“हाँ।”
“लेकिन वह मुझसे बच्चा नहीं माँग रही थी।”
काव्या की आँखों में राहत दिखाई दी।
“हाँ।”
आशा ने आँखें खोलीं।
“उसने कहा था…”
वह रुक गई।
फिर धीरे से बोली—
“उसने कहा था कि उसने एक बहन पाने के लिए बहुत साल इंतज़ार किया है और वह एक बच्चे के लिए अपनी बहन को खोना नहीं चाहती।”
काव्या ने आँखें बंद कर लीं।
“यही उसने कहा था।”
मदर करुणा ने दोनों को देखा।
“तो फिर आशा गर्भवती कैसे हुई?”
काव्या ने नोटबुक बंद कर दी।
“यही बात है… जिसे मैं भी पूरी तरह नहीं समझती।”
कई वर्षों के रहस्य के बाद एक बात स्पष्ट थी।
पहली चिकित्सीय प्रक्रिया आशा की लिखित सहमति से हुई थी।
लेकिन उसके बाद कोई भी प्रक्रिया उसकी नई सहमति के बिना नहीं होनी चाहिए थी।
फिर भी तीन साल बाद आरव का जन्म हुआ।
फिर विहान।
और अब तीसरी गर्भावस्था।
जब मदर करुणा ने पूछा कि यह कैसे संभव हुआ, काव्या ने स्वीकार किया—
“किसी ने पुराने दस्तावेज़ों का इस्तेमाल किया हो सकता है।”
“किसने?”
काव्या ने उत्तर नहीं दिया।
मदर करुणा की आवाज़ कठोर हो गई।
“मैं अनुमान नहीं चाहती। मुझे नाम चाहिए।”
डॉक्टर ने धीरे से कहा—
“फादर ईश्वर।”
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
फादर ईश्वर वही व्यक्ति था जिसने मदर इंदिरा की मृत्यु के बाद डायोसीज़ के प्रशासन की जिम्मेदारी संभाली थी।
मदर करुणा उन्हें जानती थीं।
वह शांत रहते थे।
व्यवस्थित।
कम ही कॉन्वेंट आते थे।
लेकिन उनके पास पुराने दस्तावेज़ों तक पहुँच थी।
और सबसे खतरनाक बात—
वह उन सभी रहस्यों को जानते थे जिन्हें आशा खुद भूल चुकी थी।
सात सप्ताह पहले आशा के नाम से शहर के एक निजी क्लिनिक में एक अपॉइंटमेंट दर्ज हुआ था।
मदर करुणा ने डॉक्टर काव्या से पूछा—
“क्या आशा वहाँ गई थी?”
“नहीं।”
“फिर कौन गया?”
काव्या ने धीरे से कहा—
“अनन्या।”
“मेरे नाम से?”
“हाँ।”
“क्यों?”
अनन्या ने बताया—
तीन साल पहले आरव के जन्म के बाद उसे एक क्लिनिक का बिल मिला था।
उस पर मरीज का नाम था—
Ana Valdés.
लेकिन बिलिंग पता उसका अपना घर था।
उसने क्लिनिक से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने जानकारी देने से मना कर दिया क्योंकि वह मरीज नहीं थी।
तब उसने पुराने पत्रों और दस्तावेज़ों के साथ जाँच शुरू की।
उसने डायोसीज़ को लिखा।
डॉ. काव्या को लिखा।
फादर ईश्वर को लिखा।
यहाँ तक कि उसने मदर इंदिरा को भी पत्र लिख दिया था—
फिर उसे याद आया कि मदर इंदिरा पाँच साल पहले ही मर चुकी थीं।
लेकिन जब उसने निजी क्लिनिक से पुराने रिकॉर्ड निकलवाने की कोशिश की, तो उसे एक और बात पता चली।
आशा के नाम पर एक और चिकित्सा प्रक्रिया निर्धारित की गई थी।
और वह तारीख उसकी वर्तमान गर्भावस्था से कुछ सप्ताह पहले की थी।
आशा ने काँपती आवाज़ में पूछा—
“लेकिन मैं उस दिन कॉन्वेंट से बाहर गई ही नहीं थी।”
मदर करुणा को वह रात याद आ गई।
उस रात आशा ने शाम की प्रार्थना के बाद चक्कर आने की शिकायत की थी।
वह कुछ देर के लिए बेहोश हुई थी।
और अगली सुबह उसे कुछ भी याद नहीं था।
अब पहली बार मदर करुणा को समझ आया—
शायद आशा की याददाश्त में खाली जगहें केवल बीमारी की वजह से नहीं थीं।
किसी ने उन खाली जगहों का इस्तेमाल किया था।
और अगर ऐसा था…
तो पिछले तीन वर्षों से किसी ने कॉन्वेंट की बंद दीवारों के भीतर एक ऐसा खेल खेला था जिसकी कीमत एक युवा नन की पूरी जिंदगी थी।
लेकिन असली सवाल अभी भी बाकी था—
कौन आशा के नाम पर ये प्रक्रियाएँ कर रहा था?
और क्यों?
क्योंकि मदर करुणा अभी यह नहीं जानती थीं कि इस रहस्य का अगला सुराग उन्हें एक पुराने कमरे, एक खोए हुए दस्तावेज़ और अंततः एक ऐसे ताबूत तक ले जाने वाला था, जिसके अंदर केवल एक लाश नहीं…
बल्कि वर्षों से छिपा हुआ पूरा सच बंद था।
