PART 1
“नैना बहू, जरा इधर आना।”
मैंने गैस धीमी की और हाथ पोंछते हुए कमरे में गई।
सासू मां, यानी शारदा जी, अपनी बेटी काव्या के साथ मंदिर जाने के लिए तैयार हो रही थीं। दोनों की साड़ियां बिस्तर पर रखी थीं।
शारदा जी ने मेरी तरफ देखे बिना कहा,
“इन दोनों साड़ियों पर फिर से प्रेस कर दो। एक भी सिलवट नहीं दिखनी चाहिए।”
मैंने साड़ी हाथ में ली। वह पहले ही प्रेस की हुई थी।
“मां जी, बस थोड़ी सी सिलवट है। नाश्ता गैस पर है। पांच मिनट बाद कर दूं?”
उन्होंने तुरंत मेरी तरफ देखा।
“पांच मिनट बाद क्यों?”
मैं चुप रही।
“सुबह से कर क्या रही हो?”
मेरे मुंह से बस इतना निकला,
“नाश्ता बना रही थी।”
काव्या दर्पण के सामने बाल ठीक करते हुए हंस पड़ी।
“भाभी, चार पराठे बनाने में पूरी सुबह लगती है क्या?”
मैंने जवाब नहीं दिया।
मुझे पता था, जवाब दूंगी तो बात बढ़ेगी। चुप रहूंगी तो शायद जल्दी खत्म हो जाएगी।
यही सोचते-सोचते शादी के दो साल निकल गए थे।
मैं साड़ी लेकर प्रेस करने लगी।
पीछे से शारदा जी बोलीं,
“किनारे ठीक से करना। पिछली बार भी पूजा में मेरी साड़ी खराब लग रही थी।”
मेरी आंखें भर आईं।
उसी समय मेरे पति आदित्य कमरे में आए।
उन्होंने मुझे देखा और तुरंत पास आ गए।
“नैना, क्या हुआ?”
मैंने सिर हिला दिया।
“कुछ नहीं।”
“फिर रो क्यों रही हो?”
मैं कुछ कहती, उससे पहले शारदा जी बोल पड़ीं,
“मुझसे पूछ। महारानी को दो साड़ियां प्रेस करने को कह दिया, इसलिए दुखी हैं।”
काव्या ने कहा,
“भैया, भाभी हर छोटी बात दिल पर ले लेती हैं।”
आदित्य ने मेरी तरफ देखा।
मैं चाहती थी कि वह कुछ बोले।
सिर्फ इतना कह दे कि मुझसे इस तरह बात मत किया करो।
लेकिन वह कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बाहर चला गया।
उसके जाते ही मेरे अंदर कुछ बैठ गया।
शारदा जी ने शायद मेरे चेहरे पर वह बात पढ़ ली थी।
उन्होंने कहा,
“पति को देखकर आंसू बहाने से घर नहीं चलता।”
मैंने प्रेस बंद की और दोनों साड़ियां उन्हें दे दीं।
“हो गईं, मां जी।”
“और हमारे लौटने तक खाना तैयार रखना। कचौड़ी, पकोड़े, आलू दम, दाल मखनी, चावल और हलवा।”
मैंने पहली बार उनकी तरफ सीधे देखा।
इतना खाना तीन लोगों के लिए था।
मैंने पूछा,
“कोई मेहमान आ रहे हैं?”
“तुम्हें जितना कहा है उतना करो।”
“जी।”
वे दोनों चली गईं।
मैं रसोई में वापस आई।
आदित्य बालकनी में फोन देख रहा था।
मैं उसके पास गई।
“आपने कुछ कहा क्यों नहीं?”
उसने फोन नीचे किया।
“अभी मां मंदिर जा रही थीं। मैं झगड़ा नहीं चाहता था।”
“मैं भी झगड़ा नहीं चाहती।”
“तो थोड़ी देर शांत रहो।”
मैं उसे देखती रह गई।
“कब तक?”
उसने जवाब नहीं दिया।
मैं वापस रसोई में चली गई।
आटा गूंथते हुए बार-बार यही सोच रही थी कि शायद गलती मेरी ही है।
फिर मुझे खुद पर गुस्सा आया।
हर बार मैं यही क्यों सोचती हूं?
मैंने सुबह से किसी से गलत तरीके से बात नहीं की थी। मैंने नाश्ता बनाया था। घर साफ किया था। फिर भी मुझे ऐसा महसूस कराया जा रहा था जैसे मैं हर समय कुछ गलत कर रही हूं।
करीब तीन घंटे में मैंने सब तैयार कर दिया।
शारदा जी और काव्या लौटीं तो मैं मेज लगा रही थी।
काव्या ने बैठते ही कचौड़ी उठाई।
एक टुकड़ा खाया और बोली,
“मां, ये तो बिल्कुल क्रिस्पी नहीं है।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
अभी दस मिनट पहले ही कचौड़ियां निकाली थीं।
शारदा जी ने दाल चखी।
“नमक कम है।”
“मैं नमक ले आती हूं।”
“अब ऊपर से डालने का क्या फायदा?”
मैं वापस बैठ गई।
काव्या ने हलवा चखा।
“भाभी, इतना घी कौन डालता है?”
मैंने धीरे से कहा,
“काव्या, कल तुमने ही कहा था कि हलवा थोड़ा रिच होना चाहिए।”
उसका चेहरा बदल गया।
“तो अब मेरी गलती है?”
“मैंने ऐसा नहीं कहा।”
शारदा जी ने चम्मच रख दिया।
“बहस करना बहुत सीख गई हो।”
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
आदित्य सामने बैठा सब सुन रहा था।
मैंने उसकी तरफ देखा।
इस बार उसने नजर नहीं हटाई।
शारदा जी ने अपनी थाली में दाल, चावल और आलू मिला दिया। दो-तीन निवाले खाने के बाद उन्होंने थाली मेरी तरफ सरका दी।
“ले।”
मैंने समझा नहीं।
“क्या?”
“इसे खा ले।”
मैंने थाली देखी।
फिर उनकी तरफ।
“मां जी, मैं अपनी थाली लगा लूंगी।”
उनका स्वर और सख्त हो गया।
“खाना खराब बनाया है तो यही खा। फेंकना क्यों?”
काव्या ने धीरे से कहा,
“खा लीजिए ना भाभी। इतनी बड़ी बात क्या है?”
मेरी आंखों में फिर पानी आ गया।
लेकिन इस बार मैंने थाली नहीं उठाई।
मैंने साफ कहा,
“मैं नहीं खाऊंगी।”
कमरे में चुप्पी हो गई।
शारदा जी कुर्सी से सीधी होकर बैठ गईं।
“क्या कहा?”
“मैं अपनी थाली में खाना खाऊंगी।”
उन्होंने आदित्य की तरफ देखा।
“सुन रहा है अपनी पत्नी को?”
मुझे लगा अब वही होगा जो हर बार होता था।
आदित्य मुझे शांत रहने को कहेगा।
मगर इस बार वह उठ खड़ा हुआ।
उसने मां की छोड़ी हुई थाली उठाई।
मेरी तरफ देखा और कहा,
“नैना, आज तुम्हें मां की इसी थाली से खाना होगा…”
मेरे पैरों के नीचे से जैसे भरोसा हट गया।
लेकिन अगले ही पल उसने जो किया, उसके लिए वहां कोई तैयार नहीं था।
तभी…

PART 2
आदित्य ने वह थाली मेरे सामने रखने के बजाय अपने सामने रख ली।
उसने कुर्सी खींची और बैठ गया।
मैं कुछ समझ नहीं पाई।
शारदा जी ने पूछा,
“ये क्या कर रहा है?”
आदित्य ने उनकी थाली से एक निवाला खाया।
फिर मेरी तरफ देखा।
“नैना, तुम बैठो।”
काव्या ने कहा,
“भैया, आपको क्या हो गया?”
आदित्य ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने दूसरा निवाला खाया।
शारदा जी ने उसका हाथ रोक दिया।
“छोड़ इसे। तेरे लिए दूसरी थाली लगा देती हूं।”
आदित्य ने उनका हाथ धीरे से हटा दिया।
“क्यों?”
“क्या क्यों?”
“मेरे लिए दूसरी थाली क्यों?”
शारदा जी चुप हो गईं।
आदित्य ने पूछा,
“अगर इस थाली से खाना अपमान की बात नहीं है, तो मुझे दूसरी थाली की जरूरत क्यों है?”
काव्या का चेहरा उतर गया।
“भैया, बात को इतना बड़ा मत बनाओ।”
“मैं बड़ा नहीं बना रहा।”
उसने थाली की तरफ इशारा किया।
“बस वही कर रहा हूं जो तुम दोनों नैना से करवाना चाहती थीं।”
शारदा जी ने कहा,
“वह मेरी बहू है।”
“और मैं आपका बेटा हूं।”
“दोनों बातें अलग हैं।”
“क्यों?”
उनके पास तुरंत जवाब नहीं था।
मैं वहीं खड़ी थी।
मेरे मन में गुस्सा भी था और डर भी।
मैं आदित्य से खुश होना चाहती थी, लेकिन सुबह की उसकी चुप्पी याद थी।
क्या यह सिर्फ आज की बात थी?
क्या खाना खत्म होते ही सब पहले जैसा हो जाता?
मैंने कुर्सी नहीं खींची।
आदित्य ने मेरी तरफ देखा।
“बैठो।”
मैंने कहा,
“पहले मुझे एक बात बताइए।”
“क्या?”
“सुबह आप चले क्यों गए थे?”
उसका चेहरा गंभीर हो गया।
काव्या बीच में बोली,
“अब पति-पत्नी की बातें हमारे सामने होंगी?”
मैंने पहली बार उसे बिना डरे देखा।
“जब पति-पत्नी की बातों में सुबह से आप बोल रही हैं, तो अब सुन भी सकती हैं।”
काव्या चुप हो गई।
मेरे हाथ कांप रहे थे।
ऐसा जवाब मैंने उसे पहले कभी नहीं दिया था।
शारदा जी ने मेज पर हाथ रखा।
“नैना, जुबान संभालकर।”
मैंने कहा,
“मैं गलत शब्द नहीं बोल रही, मां जी।”
“बहुत बदल गई हो।”
“शायद।”
मैं खुद अपने जवाब से हैरान थी।
आदित्य उठा।
उसने पानी पिया।
फिर बोला,
“सुबह मैं इसलिए बाहर गया था क्योंकि मुझे लगा था कि मैं फिर हमेशा की तरह चुप हो जाऊंगा।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“और अब?”
“अब नहीं।”
शारदा जी हंस दीं।
“एक थाली के लिए मां से लड़ने लगेगा?”
आदित्य ने कहा,
“बात थाली की नहीं है।”
“फिर किस बात की है?”
“हर दिन की।”
कमरे में फिर सन्नाटा हो गया।
उसने एक-एक बात गिनानी शुरू नहीं की।
बस बोला,
“सुबह साड़ी। फिर खाना। फिर हर चीज में कमी। और आखिर में ये।”
शारदा जी ने कहा,
“हर सास बहू को काम सिखाती है।”
मैंने उनकी तरफ देखा।
यह वही वाक्य था जो मैं दो साल से सुन रही थी।
आदित्य ने पूछा,
“काव्या की शादी के बाद अगर उसकी सास उसे ऐसे सिखाए तो?”
काव्या तुरंत बोली,
“मुझे बीच में क्यों ला रहे हो?”
“क्योंकि जो नैना के लिए सामान्य है, वही तुम्हारे लिए भी सामान्य होना चाहिए।”
“मैं किसी की ऐसी बातें नहीं सुनूंगी।”
आदित्य ने सिर हिलाया।
“बस।”
काव्या चुप हुई।
“यही बात है।”
शारदा जी कुर्सी से उठीं।
“मुझे अब खाना नहीं खाना।”
मैंने आदत से मजबूर होकर कहा,
“मां जी, मैं दूसरी दाल गर्म कर देती हूं।”
आदित्य ने तुरंत मेरी तरफ देखा।
“नहीं।”
मैं रुक गई।
उसने कहा,
“तुम बैठकर खाना खाओ।”
“लेकिन…”
“नैना, खाना खाओ।”
उसकी आवाज सख्त नहीं थी।
मैंने अपनी थाली लगाई।
पहला निवाला लेते समय मुझे अजीब लग रहा था।
दो साल में पहली बार सबके नाराज होने के बावजूद मैं मेज पर बैठकर खा रही थी।
शारदा जी अपने कमरे में चली गईं।
काव्या भी पीछे चली गई।
कुछ देर बाद मैंने आदित्य से पूछा,
“अब क्या होगा?”
उसने कहा,
“जो होना चाहिए था।”
“मतलब?”
“आज शाम हम बात करेंगे।”
“किससे?”
“सबसे।”
मुझे डर लगा।
मैंने कहा,
“मुझे कोई तमाशा नहीं चाहिए।”
“मुझे भी नहीं।”
“फिर?”
“कुछ नियम तय होंगे।”
मैं हंस भी नहीं पाई।
“इस घर में मेरे लिए नियम पहले से तय हैं।”
“इसीलिए नए नियम चाहिए।”
उस दिन दोपहर में घर बहुत शांत रहा।
मैंने रसोई साफ की।
आदित्य ने खुद अपनी प्लेट सिंक में रखी।
यह छोटी सी बात थी, लेकिन शारदा जी कमरे के दरवाजे से उसे देख रही थीं।
उन्होंने कहा,
“अब बर्तन भी धोएगा?”
आदित्य रुका।
“जरूरत पड़ी तो।”
“पत्नी ने अच्छा सिखाया है।”
मैंने फिर वही पुराना डर महसूस किया।
अब दोष मेरे ऊपर आने वाला था।
मैंने बोलना चाहा, लेकिन आदित्य ने पहले कहा,
“नैना ने मुझे कुछ नहीं सिखाया। यही समस्या है। उसे बोलने की जरूरत पड़नी ही नहीं चाहिए थी।”
शारदा जी अंदर चली गईं।
मैंने धीरे से पूछा,
“आपको मां से ऐसे बात करके बुरा नहीं लग रहा?”
उसने कहा,
“लग रहा है।”
“फिर?”
“तुम्हें दो साल से कैसा लग रहा था?”
मैं चुप हो गई।
शाम करीब छह बजे दरवाजे की घंटी बजी।
मैंने दरवाजा खोला।
सामने एक महिला और एक आदमी खड़े थे।
महिला ने पूछा,
“आदित्य जी घर पर हैं?”
मैंने हां कहा।
आदित्य बाहर आया।
मैंने पूछा,
“कौन हैं?”
“अंदर आने दो।”
दोनों सोफे पर बैठ गए।
शारदा जी भी कमरे से बाहर आ गईं।
काव्या ने पूछा,
“कौन हैं ये लोग?”
आदित्य ने कहा,
“मिसेज मेहरा हमारे नए फ्लैट की मकान मालकिन हैं। और ये उनके मैनेजर हैं।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“नया फ्लैट?”
मेरे मुंह से अपने आप निकला।
शारदा जी का चेहरा बदल गया।
“कौन सा फ्लैट?”
आदित्य ने कहा,
“मैं और नैना अगले हफ्ते यहां से जा रहे हैं।”
मैं कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।
उसने मुझे इस बारे में कुछ नहीं बताया था।
मेरे अंदर खुशी से पहले गुस्सा आया।
“आपने मुझसे पूछा?”
आदित्य चुप हो गया।
मिसेज मेहरा ने स्थिति समझी और बोलीं,
“हम बाद में आ सकते हैं।”
मैंने कहा,
“एक मिनट।”
मैं आदित्य को रसोई में ले गई।
“ये क्या है?”
“मैं कुछ दिनों से फ्लैट देख रहा था।”
“मुझसे बिना पूछे?”
“मैं तुम्हें सरप्राइज देना चाहता था।”
“मुझे सरप्राइज नहीं चाहिए।”
वह चुप रहा।
मैंने पहली बार उसे साफ-साफ कहा,
“मैं आपकी मां की अनुमति पर नहीं जीना चाहती। लेकिन मैं आपके फैसलों पर भी नहीं जीना चाहती।”
उसने मेरी तरफ देखा।
“ठीक कह रही हो।”
“फ्लैट पसंद करना मेरा भी फैसला होगा।”
“ठीक है।”
“और मैं सिर्फ इसलिए घर नहीं छोड़ूंगी क्योंकि यहां मेरे साथ गलत व्यवहार हुआ। अगर हम जाएंगे तो इसलिए कि हम दोनों अलग रहना चाहते हैं।”
उसने सिर हिलाया।
“ठीक है।”
मैंने पूछा,
“आप सच में समझ रहे हैं या अभी मामला शांत करने के लिए हां बोल रहे हैं?”
उसने कहा,
“कल तुम फ्लैट देख लेना। पसंद नहीं आया तो नहीं लेंगे।”
मेरे अंदर का तनाव थोड़ा कम हुआ।
हम बाहर आए।
आदित्य ने मिसेज मेहरा से कहा,
“कल नैना फ्लैट देखकर फैसला करेगी।”
शारदा जी ने अचानक कहा,
“कोई कहीं नहीं जाएगा।”
आदित्य ने उनकी तरफ देखा।
“मां…”
“मैंने कह दिया।”
काव्या ने भी कहा,
“भैया, एक छोटी सी बात पर घर छोड़ना कौन सी समझदारी है?”
मैंने पूछा,
“छोटी सी बात?”
काव्या मेरी तरफ घूमी।
“हां। मां ने एक थाली से खाने को ही तो कहा था।”
मैंने कहा,
“सिर्फ आज की बात होती तो शायद छोटी होती।”
वह चुप हो गई।
शारदा जी बोलीं,
“मैंने इसे बेटी की तरह रखा।”
मेरे अंदर कुछ टूटने के बजाय इस बार साफ हो गया।
मैंने शांत स्वर में पूछा,
“काव्या से आप सुबह छह बजे उठकर पूरे घर का नाश्ता बनवाती हैं?”
“वह यहां मेहमान है।”
“जब वह शादी से पहले यहां रहती थी तब?”
शारदा जी ने जवाब नहीं दिया।
मैंने दूसरा सवाल किया,
“क्या आपने कभी काव्या को अपनी छोड़ी हुई थाली से खाना खाने को कहा?”
“तुलना मत करो।”
“फिर मुझे बेटी मत कहिए।”
आदित्य ने मेरी तरफ देखा।
मुझे डर था कि मैंने सीमा पार कर दी है।
लेकिन अब पीछे हटने का मन नहीं था।
शारदा जी की आंखें भर आईं।
उन्होंने आदित्य से कहा,
“देख लिया? आज पत्नी के लिए मां को जवाब दे रहा है। कल यही तुझे मुझसे अलग कर देगी।”
मैंने तुरंत कहा,
“नहीं।”
सब मेरी तरफ देखने लगे।
“मैं किसी बेटे को उसकी मां से अलग नहीं करना चाहती।”
मैंने आदित्य से कहा,
“आप मां से मिलेंगे। उनका ध्यान रखेंगे। जो जिम्मेदारी आपकी है, निभाएंगे। लेकिन मैं रोज अपमान सहकर यह साबित नहीं करूंगी कि मैं अच्छी बहू हूं।”
शारदा जी ने कहा,
“तो चली जा।”
आदित्य ने तुरंत कहा,
“मां।”
“तू चुप रह।”
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
“अगर इतनी तकलीफ है तो अभी चली जा।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
मेरे पास मायके जाने का विकल्प था।
लेकिन मैं गुस्से में फैसला नहीं करना चाहती थी।
मिसेज मेहरा उठीं।
“हम कल बात कर लेंगे।”
आदित्य उन्हें बाहर छोड़ने गया।
काव्या मेरे पास आई।
धीरे से बोली,
“तुम यही चाहती थीं ना?”
“क्या?”
“भैया को अलग करना।”
मैंने कहा,
“नहीं।”
“झूठ मत बोलो।”
“अगर यही चाहती तो दो साल इंतजार क्यों करती?”
वह कुछ पल मुझे देखती रही।
फिर बोली,
“मां अकेली पड़ जाएंगी।”
“तुम भी उनकी बेटी हो।”
उसका चेहरा सख्त हो गया।
“मेरी शादी होने वाली है।”
“तो?”
“मैं यहां कैसे रह सकती हूं?”
मैंने पहली बार उस बात को साफ देखा जो इतने समय से सामने थी।
घर की सारी जिम्मेदारी बहू की थी।
बेटी के लिए अपना जीवन था।
बेटे के लिए अपना काम था।
और मुझसे उम्मीद थी कि मैं इसे परिवार कहकर स्वीकार कर लूं।
आदित्य वापस आया।
उस रात हमने खाना नहीं बनाया।
उसने बाहर से साधारण खाना मंगाया।
शारदा जी ने खाने से मना कर दिया।
मैं उनके कमरे में गई।
“मां जी, खाना रख दूं?”
उन्होंने मेरी तरफ नहीं देखा।
“जरूरत नहीं।”
मैं वापस मुड़ी।
उन्होंने पीछे से कहा,
“बहुत खुश होगी।”
मैं रुक गई।
“नहीं।”
“मेरा बेटा घर छोड़ रहा है।”
मैंने उनकी तरफ देखा।
“मैंने उसे जाने के लिए नहीं कहा।”
“पर जा तो तेरे लिए रहा है।”
“शायद वह हमारे लिए जा रहा है।”
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
मैं बाहर आ गई।
अगली सुबह घर का माहौल और भारी था।
मैंने चाय बनाई।
शारदा जी की चाय उनके सामने रखी।
उन्होंने कप उठाया, लेकिन कुछ बोलीं नहीं।
काव्या फोन पर किसी से धीमे स्वर में बात कर रही थी।
आदित्य ऑफिस जाने के लिए तैयार हुआ।
उसने कहा,
“शाम को छह बजे फ्लैट देखने चलेंगे।”
मैंने हां कहा।
शारदा जी ने सुन लिया।
लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
शाम को हम गुरुग्राम के सेक्टर 57 में वह फ्लैट देखने गए।
दो बेडरूम का साधारण फ्लैट था।
मुझे पसंद आया।
बालकनी छोटी थी। रसोई ठीक थी। ऑफिस से भी ज्यादा दूर नहीं था।
मैंने आदित्य से पूछा,
“किराया?”
उसने बताया।
मैंने हिसाब लगाया।
“हम दोनों मिलकर संभाल सकते हैं।”
वह बोला,
“तुम्हें देने की जरूरत नहीं।”
मैंने तुरंत कहा,
“फिर वही बात।”
वह रुक गया।
“ठीक है। मिलकर।”
मैं मुस्कराई नहीं।
लेकिन मुझे अच्छा लगा कि उसने बात समझी।
हमने फ्लैट लेने का फैसला कर लिया।
घर लौटे तो मुख्य दरवाजे के बाहर दो जोड़ी चप्पलें रखी थीं।
अंदर काव्या के होने वाले ससुराल वाले बैठे थे।
उसकी शादी तीन महीने बाद तय थी।
मुझे देखते ही काव्या उठी।
उसके चेहरे पर घबराहट थी।
शारदा जी ने कहा,
“आ गए?”
आदित्य ने पूछा,
“अंकल-आंटी अचानक?”
काव्या की होने वाली सास, सीमा जी, ने कहा,
“कुछ जरूरी बात करनी थी।”
मैं पानी रखने लगी।
सीमा जी ने मुझे बैठने को कहा।
“आप भी बैठिए।”
शारदा जी तुरंत बोलीं,
“अरे बहू को काम करने दीजिए।”
सीमा जी ने उनकी तरफ देखा।
“काम बाद में हो जाएगा।”
मैं बैठ गई।
काव्या ने मुझे ऐसी नजर से देखा जैसे मेरी वजह से कुछ होने वाला हो।
सीमा जी ने सीधे पूछा,
“काव्या, शादी के बाद नौकरी जारी रखोगी?”
काव्या ने कहा,
“जी।”
“ठीक है। घर के काम का क्या सोचा है?”
काव्या ने थोड़ा हंसकर कहा,
“हम दोनों मैनेज कर लेंगे।”
सीमा जी ने सिर हिलाया।
“यही हम भी चाहते हैं।”
शारदा जी के चेहरे पर राहत आई।
लेकिन सीमा जी ने अगली बात कही,
“कल मंदिर में आपकी कुछ बातें सुन ली थीं।”
कमरे में चुप्पी छा गई।
शारदा जी ने पूछा,
“कौन सी बातें?”
“आप अपनी सहेली से बहू के बारे में बात कर रही थीं।”
मैंने शारदा जी की तरफ देखा।
सीमा जी ने कहा,
“मैं किसी के घर के मामले में दखल नहीं देना चाहती। लेकिन काव्या हमारी बहू बनेगी। इसलिए एक बात पहले साफ करना जरूरी है।”
काव्या परेशान हो गई।
“आंटी, क्या हुआ?”
सीमा जी ने कहा,
“हमारे घर में बहू और बेटी के लिए अलग नियम नहीं होंगे।”
शारदा जी ने तुरंत कहा,
“बिल्कुल। हम भी यही मानते हैं।”
सीमा जी कुछ पल उन्हें देखती रहीं।
फिर पूछा,
“सच?”
शारदा जी चुप हो गईं।
सीमा जी ने आगे कोई भाषण नहीं दिया।
सिर्फ बोलीं,
“मैं चाहती हूं काव्या हमारे बेटे के साथ बराबरी से रहे। इसलिए मुझे यह भी उम्मीद है कि वह अपनी भाभी के साथ वैसा व्यवहार नहीं करेगी जिसे वह खुद अपने लिए स्वीकार नहीं कर सकती।”
काव्या का चेहरा उतर गया।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मुझे उस समय उसे नीचा दिखाकर कोई खुशी नहीं मिलती।
क्योंकि मुझे पता था, बात अगर बदले की बन गई तो असली समस्या वहीं रह जाएगी।
सीमा जी और उनके पति कुछ देर बाद चले गए।
दरवाजा बंद होते ही काव्या मेरी तरफ मुड़ी।
“तुमने उन्हें बताया?”
मैं हैरान रह गई।
“मैंने?”
“और कौन बताएगा?”
आदित्य ने कहा,
“नैना हमारे साथ फ्लैट देखने गई थी। वह मंदिर में कब पहुंच गई?”
काव्या चुप हो गई।
शारदा जी ने उसे डांटा,
“बस कर।”
काव्या कमरे में चली गई।
मैं भी अपने कमरे में आ गई।
मुझे लगा मामला यहीं खत्म होगा।
लेकिन असली बात दो दिन बाद सामने आई।
हम सामान पैक कर रहे थे।
मैं कपड़े डिब्बे में रख रही थी कि शारदा जी कमरे में आईं।
उनके हाथ में एक पुरानी फाइल थी।
उन्होंने दरवाजा बंद किया।
“नैना।”
मैं खड़ी हो गई।
“जी?”
उन्होंने फाइल बिस्तर पर रखी।
“मुझे तुमसे बात करनी है।”
उनका स्वर पहली बार सामान्य था।
मैंने कुर्सी खींच दी।
लेकिन वह बैठीं नहीं।
उन्होंने पूछा,
“आदित्य ने फ्लैट का एडवांस दे दिया?”
“कल देना है।”
उन्होंने तुरंत कहा,
“मत देना।”
मैंने उन्हें देखा।
“क्यों?”
उन्होंने फाइल खोली।
अंदर घर से जुड़े कुछ कागज थे।
मुझे समझ नहीं आया।
“ये क्या है?”
उन्होंने कहा,
“यह घर तुम्हारे ससुर ने खरीदा था।”
“मुझे पता है।”
“पूरी बात नहीं पता।”
उन्होंने एक दस्तावेज मेरी तरफ बढ़ाया।
मैंने पढ़ना शुरू किया।
कुछ कानूनी शब्द मेरी समझ से बाहर थे।
लेकिन तीन नाम साफ दिखाई दे रहे थे।
शारदा देवी।
आदित्य शर्मा।
और तीसरा नाम पढ़कर मैं रुक गई।
नैना शर्मा।
मैंने उनकी तरफ देखा।
“मेरा नाम?”
उन्होंने कुर्सी पकड़कर बैठते हुए कहा,
“तुम्हारी शादी के छह महीने बाद तुम्हारे पापा जी ने घर का हिस्सा तुम्हारे और आदित्य के नाम कर दिया था।”
मेरे हाथ से कागज लगभग छूट गया।
“लेकिन क्यों?”
“उन्होंने कहा था कि जिस घर को बहू संभाल रही है, उसमें उसका अधिकार भी होना चाहिए।”
मैं कुछ नहीं बोल पाई।
मेरे ससुर का एक साल पहले देहांत हुआ था।
उन्होंने मुझसे कभी इस बारे में कुछ नहीं कहा था।
मैंने पूछा,
“आदित्य को पता है?”
“नहीं।”
“आपने बताया क्यों नहीं?”
शारदा जी की नजर नीचे चली गई।
“मुझे अच्छा नहीं लगा था।”
जवाब बहुत छोटा था।
लेकिन मेरे लिए काफी था।
मैंने पूछा,
“तो आपने कागज छिपा दिए?”
उन्होंने कहा,
“हां।”
मुझे गुस्सा आया।
बहुत गुस्सा।
लेकिन मैंने आवाज ऊंची नहीं की।
“मां जी, यह सिर्फ कागज छिपाना नहीं था।”
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
“मुझे पता है।”
“आप मुझे इस घर में ऐसे रखती रहीं जैसे मैं यहां सिर्फ आपकी अनुमति से हूं।”
वह चुप रहीं।
“जबकि आपको पता था कि पापा जी क्या चाहते थे।”
उनकी आंखें भर आईं।
“मुझे डर था।”
मैंने पूछा,
“किस बात का?”
“कि घर पर मेरा नियंत्रण खत्म हो जाएगा।”
मैंने पहली बार उन्हें इतनी साफ बात कहते सुना।
कोई बहाना नहीं।
कोई आरोप नहीं।
सिर्फ सच।
उन्होंने कहा,
“पहले मुझे लगता था घर मेरा है, इसलिए मेरी चलेगी। फिर कागज बने तो मुझे लगा तुम धीरे-धीरे सब अपने हाथ में ले लोगी।”
मैंने कहा,
“मैंने कभी घर मांगा ही नहीं।”
“मुझे अब समझ आ रहा है।”
“अब क्यों?”
उन्होंने जवाब देने में समय लिया।
“उस दिन जब आदित्य मेरी थाली से खाने लगा, मुझे पहली बार अपनी बात खुद पर लागू होती दिखी।”
मैं चुप रही।
उन्होंने कहा,
“और कल काव्या रो रही थी कि अगर उसके ससुराल वाले उसके साथ अलग व्यवहार करेंगे तो वह वहां नहीं रह पाएगी।”
मैंने पूछा,
“फिर?”
“मैंने उससे पूछा कि नैना क्यों रहे?”
कमरे में चुप्पी थी।
कुछ देर बाद मैंने कहा,
“इन कागजों से पिछले दो साल ठीक नहीं हो जाएंगे।”
“मुझे पता है।”
“और सिर्फ सॉरी बोलने से भी नहीं।”
उन्होंने सिर हिलाया।
“वह भी पता है।”
उसी समय आदित्य कमरे में आया।
“क्या हुआ?”
उसने मेरे हाथ में कागज देखा।
फिर मां की तरफ।
“ये क्या है?”
मैंने दस्तावेज उसकी तरफ बढ़ा दिया।
उसने पढ़ा।
उसका चेहरा बदल गया।
“मां, आपको इसके बारे में पता था?”
शारदा जी ने कहा,
“हां।”
“और आपने मुझे नहीं बताया?”
“नहीं।”
आदित्य नाराज हो गया।
“इतनी बड़ी बात—”
मैंने उसे बीच में रोक दिया।
“आवाज धीमी रखिए।”
वह मेरी तरफ देखने लगा।
मैंने कहा,
“गुस्सा करने से बात साफ नहीं होगी।”
शारदा जी उठीं।
“घर मत छोड़ो।”
आदित्य ने तुरंत कहा,
“मां, बात घर की हिस्सेदारी की नहीं है।”
“मुझे पता है।”
उनका जवाब सुनकर वह भी रुक गया।
शारदा जी मेरी तरफ मुड़ीं।
“मैं यह नहीं कह रही कि घर तुम्हारा है इसलिए मत जाओ।”
उन्होंने कुछ सेकंड रुककर कहा,
“मैं कह रही हूं कि अगर तुम रहना चाहो तो मैं अपना व्यवहार बदलने की कोशिश करूंगी। अगर नहीं रहना चाहो तो मैं रोकूंगी नहीं।”
मैंने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया।
मुझे उन पर भरोसा करने की जल्दी नहीं थी।
बदलाव एक बातचीत से साबित नहीं होता।
मैंने कहा,
“हम फ्लैट लेंगे।”
आदित्य ने मेरी तरफ देखा।
शारदा जी का चेहरा थोड़ा उतर गया।
मैंने आगे कहा,
“कम से कम छह महीने अलग रहेंगे।”
“छह महीने?”
“हां।”
“फिर?”
“फिर देखेंगे।”
उन्होंने सिर हिलाया।
मुझे लगा बात खत्म हो गई।
लेकिन उसी शाम काव्या घर आई और उसने पैकिंग के डिब्बे देखे।
“आप लोग सच में जा रहे हो?”
मैंने कहा,
“हां।”
वह कुछ देर चुप रही।
फिर मेरे पास आई।
“भाभी, एक बात बोलूं?”
“बोलो।”
“मैंने आपके साथ कई बार गलत तरीके से बात की।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
उसने नजर नहीं मिलाई।
“मुझे लगता था मां ऐसा बोलती हैं तो ठीक ही होगा। और मुझे अच्छा भी लगता था कि घर में मुझसे कोई काम नहीं कहता।”
यह पहली बार था जब उसने अपनी जिम्मेदारी मानी थी।
मैंने कहा,
“ठीक है।”
वह हैरान हुई।
“बस?”
“अभी मैं इतना ही कह सकती हूं।”
“आप मुझे माफ नहीं करोगी?”
“शायद कर दूंगी। लेकिन तुरंत सामान्य नहीं हो सकती।”
उसने धीरे से सिर हिलाया।
फिर चली गई।
एक हफ्ते बाद मैं और आदित्य नए फ्लैट में आ गए।
पहली सुबह मेरी आंख छह बजे खुली।
मैं आदत से तुरंत उठ बैठी।
फिर याद आया कि मुझे किसी के लिए चाय बनाने की जल्दी नहीं थी।
आदित्य भी जाग गया।
“सो जाओ।”
मैंने कहा,
“नींद खुल गई।”
“चाय?”
मैं उठने लगी।
उसने कहा,
“मैं बना देता हूं।”
मैंने उसे देखा।
“बनानी आती है?”
“आज पता चल जाएगा।”
मैं हंस पड़ी।
वह रसोई में गया।
दस मिनट बाद चाय लेकर आया।
मैंने एक घूंट लिया।
“चीनी ज्यादा है।”
उसने कप वापस लेने का नाटक किया।
“मत पीना।”
मैंने कप पकड़ लिया।
“इतनी भी खराब नहीं।”
हम दोनों हंस दिए।
लेकिन जिंदगी अचानक पूरी तरह आसान नहीं हुई।
कई बार मैं छोटी बात पर डर जाती थी कि कोई नाराज हो जाएगा।
कई बार आदित्य बिना पूछे फैसला कर देता और फिर उसे याद दिलाना पड़ता कि अलग घर लेने का मतलब सिर्फ पता बदलना नहीं था।
हम दोनों सीख रहे थे।
शारदा जी हर रविवार फोन करतीं।
पहले वह सिर्फ आदित्य से बात करती थीं।
फिर धीरे-धीरे मुझसे भी पूछने लगीं,
“कैसी हो?”
मैं छोटे जवाब देती।
एक रविवार उन्होंने पूछा,
“अगले हफ्ते घर आओगे?”
मैंने आदित्य की तरफ देखा।
उसने फैसला मेरे ऊपर छोड़ दिया।
मैंने कहा,
“आ जाएंगे।”
हम रविवार को गए।
मेज पर खाना लगा था।
इस बार खाना शारदा जी और काव्या ने मिलकर बनाया था।
मैं बैठी तो शारदा जी ने मेरे सामने नई थाली रखी।
उन्होंने खुद खाना परोसा।
किसी ने उस दिन पुरानी बात नहीं छेड़ी।
खाना खत्म होने के बाद मैं अपनी प्लेट उठाने लगी।
शारदा जी ने कहा,
“रख दो।”
मैं रुक गई।
“क्यों?”
उन्होंने काव्या की तरफ देखा।
“आज बर्तन काव्या करेगी।”
काव्या ने तुरंत कहा,
“मां!”
मैंने सोचा फिर बहस होगी।
लेकिन काव्या ने मुझे देखा और हंसते हुए कहा,
“ठीक है। आज मेरी बारी है।”
मैंने प्लेट रख दी।
मुझे पहली बार लगा कि शायद बदलाव सच में शुरू हुआ है।
छह महीने बाद हमारे किराए के समझौते को आगे बढ़ाने का समय आया।
आदित्य ने पूछा,
“क्या करना है?”
मैंने कहा,
“यहीं रहेंगे।”
वह थोड़ा हैरान हुआ।
“घर वापस नहीं?”
“मिलने जाएंगे। रहेंगे यहां।”
“पक्का?”
“हां।”
उसने बिना बहस किए सिर हिला दिया।
उसी रात शारदा जी का फोन आया।
उन्होंने कहा,
“कल घर आ सकती हो? जरूरी काम है।”
अगले दिन हम पहुंचे।
ड्राइंग रूम में वही फाइल रखी थी।
साथ में एक वकील बैठे थे।
मैंने आदित्य की तरफ देखा।
उसे भी कुछ पता नहीं था।
वकील ने कुछ दस्तावेज हमारे सामने रखे।
शारदा जी ने कहा,
“मैंने अपने हिस्से को लेकर फैसला किया है।”
मैंने तुरंत कहा,
“मां जी, मुझे और हिस्सा नहीं चाहिए।”
उन्होंने कहा,
“तुम्हें नहीं दे रही।”
मैं चुप हो गई।
काव्या भी वहीं बैठी थी।
शारदा जी ने दस्तावेज उसकी तरफ बढ़ाए।
“मेरा हिस्सा काव्या के नाम होगा।”
आदित्य ने कहा,
“ठीक है।”
मैंने भी सिर हिलाया।
शारदा जी ने मेरी तरफ देखा।
“तुम्हें बुरा नहीं लगा?”
“क्यों लगेगा? वह आपकी बेटी है।”
उनके चेहरे पर पहली बार हल्की मुस्कान आई।
फिर वकील ने दूसरा कागज निकाला।
“एक और दस्तावेज है।”
मैंने पूछा,
“क्या?”
उन्होंने बताया कि घर बेचने या किसी बड़े फैसले के लिए तीनों हिस्सेदारों की सहमति जरूरी होगी।
यानी मैं, आदित्य और काव्या।
मैंने शारदा जी की तरफ देखा।
उन्होंने कहा,
“घर किसी एक का नहीं रहेगा। किसी एक की नहीं चलेगी।”
काव्या ने धीरे से कहा,
“मां की भी नहीं।”
शारदा जी ने उसे घूरा।
फिर खुद हंस पड़ीं।
मुझे भी हंसी आ गई।
मैंने उस दिन एक बात समझी।
उस दोपहर मेज पर सरकाई गई वह थाली हमारी समस्या नहीं थी।
वह सिर्फ वह पल था जब समस्या इतनी साफ हो गई कि अब कोई उसे सामान्य कहकर टाल नहीं सकता था।
लेकिन मुझे सबसे बड़ा झटका घर के कागजों से भी नहीं लगा।
वकील जाते समय एक छोटा लिफाफा मेरे हाथ में देकर बोले,
“यह आपके ससुर ने मेरे पास छोड़ा था। निर्देश था कि संपत्ति की पूरी जानकारी आपको मिलने के बाद ही यह दिया जाए।”
मैंने वहीं लिफाफा खोला।
अंदर सिर्फ कुछ पंक्तियां थीं।
उन्होंने लिखा था कि घर में हिस्सा देना उनका अंतिम फैसला नहीं था।
उन्होंने मेरे नाम से एक अलग सावधि जमा भी शुरू की थी।
वह रकम मेरे लिए नहीं थी।
दस्तावेज में साफ लिखा था कि उसका इस्तेमाल मैं अपनी पढ़ाई या अपना काम दोबारा शुरू करने के लिए कर सकती हूं।
मेरी आंखें भर आईं।
शादी के बाद मैंने अपनी अधूरी एमबीए की पढ़ाई छोड़ दी थी।
मैंने कभी ससुर जी से इसकी शिकायत नहीं की थी।
फिर भी उन्हें याद था।
आदित्य ने कागज पढ़ा और मेरी तरफ देखा।
“तुम पढ़ाई पूरी करना चाहती हो?”
इस बार उसने यह नहीं कहा कि मैं तुम्हारा एडमिशन करवा दूंगा।
उसने सिर्फ पूछा।
मैंने कहा,
“हां।”
शारदा जी सामने बैठी थीं।
कुछ महीने पहले शायद वह कहतीं कि पहले घर देखो।
लेकिन इस बार उन्होंने सिर्फ इतना कहा,
“फॉर्म कब भरना है?”
मैंने उनकी तरफ देखा।
“अगले महीने।”
उन्होंने सिर हिलाया।
“तो भर देना।”
मैंने कागज वापस लिफाफे में रखा।
उस दिन हम अपने फ्लैट लौट आए।
मैंने घर का अपना हिस्सा नहीं बेचा।
हम वापस वहां रहने भी नहीं गए।
काव्या की शादी हुई और उसने नौकरी जारी रखी।
शारदा जी अब भी कई बार पुरानी आदत में कुछ कह देती थीं। फर्क इतना था कि अब मैं चुप नहीं रहती थी और वह हर जवाब को बदतमीजी नहीं मानती थीं।
आदित्य भी बदल गया था, लेकिन मैं यह नहीं कहूंगी कि वह एक दिन में बदल गया।
कई बार हमें बहस करनी पड़ी।
कई बार मुझे उसे याद दिलाना पड़ा कि मेरा साथ देने का मतलब मेरे लिए फैसले लेना नहीं है।
और कई बार उसने मुझे याद दिलाया कि हर असहमति अपमान नहीं होती।
करीब एक साल बाद मेरी एमबीए की पढ़ाई दोबारा शुरू हो गई।
पहले दिन क्लास के लिए निकलते समय शारदा जी का फोन आया।
“नैना।”
“जी मां जी?”
“पहला दिन है ना?”
“हां।”
“नाश्ता किया?”
मैं हंस दी।
“कर लिया।”
कुछ सेकंड चुप्पी रही।
फिर उन्होंने कहा,
“अच्छे से जाना।”
“जी।”
फोन रखने से पहले उन्होंने एक और बात कही।
“और शाम को समय मिले तो फोन कर देना। बताना कैसा रहा।”
मैंने कहा,
“कर दूंगी।”
फोन कट गया।
मैं दरवाजा बंद करके बाहर निकली।
मेरी जिंदगी उस दिन नहीं बदली थी जब आदित्य ने अपनी मां की छोड़ी हुई थाली उठा ली थी।
वह सिर्फ शुरुआत थी।
असल बदलाव तब आया जब मैंने पहली बार साफ कहा था कि मैं वह थाली नहीं उठाऊंगी।
और सबसे अनपेक्षित बात यह थी कि जिस घर में मुझे लंबे समय तक लगा था कि मेरी कोई जगह नहीं है, उसी घर के कागजों में मेरा नाम पहले से मौजूद था।
मुझे बस उसके बारे में बताया नहीं गया था।
अब मुझे किसी कागज से अपनी जगह साबित नहीं करनी थी।
यह बात मैं खुद तय कर चुकी थी।
