भाग २
जया बुआ ने पापा की कलाई पकड़ ली।
उनका स्वर मुश्किल से निकला—
—भैया, आज त्योहार है। पुरानी बात रहने दो।
पापा ने उनकी ओर देखा, पर संचिका से हाथ नहीं हटाया।
उन्होंने शांत स्वर में कहा—
—पुरानी बात होती तो छोड़ देता। यह बात हर साल तुम्हारे लिफाफे के साथ हमारे घर आती रही है।
निर्मला बुआ दरवाजे के पास खड़ी थीं। अजय फूफा ने उनका थैला वापस खाट पर रख दिया।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
—बैठ जाओ, निर्मला।
निर्मला बुआ ने उनका हाथ हटा दिया—
—आप बीच में मत बोलिए। माँ के कंगन गए थे। किसी ने आज तक हिसाब नहीं दिया।
पापा ने पूछा—
—और तुमने हिसाब माँगा किससे?
निर्मला बुआ ने जया बुआ की तरफ उँगली कर दी—
—जिसे अलमारी के पास देखा गया था।
जया बुआ ने नजरें नीचे कर लीं।
मुझे गुस्सा आया। मैं चाहती थी कि वह पहली बार तेज आवाज में जवाब दें। निर्मला बुआ को रोकें। उन १२ वर्षों का एक-एक दिन उनके सामने रख दें।
लेकिन जया बुआ चुप थीं।
मैं तब उनकी चुप्पी को कमजोरी समझ रही थी।
श्याम अपनी माँ के पास जाकर खड़ा हो गया। उसका जबड़ा कसा हुआ था। उसने संचिका की तरफ देखते हुए कहा—
—यह मुझे पिछले महीने मिली थी।
सबकी नजर उसकी ओर चली गई।
श्याम ने खिड़की के पास रखे पुराने नीले संदूक की ओर इशारा किया—
—वर्षा में छत टपक रही थी। कपड़े निकालते समय नीचे की तह खुल गई। उसके भीतर यह रखी थी।
निर्मला बुआ ने तीखे स्वर में पूछा—
—तुम्हारी माँ के संदूक से मिली है। इससे क्या सिद्ध होता है?
श्याम ने उनकी ओर देखा, फिर चुपचाप पीछे हट गया।
पापा ने जिल्द की गाँठ खोल दी।
सबसे ऊपर १२ वर्ष पुरानी एक तस्वीर थी। वही अस्पताल वाली तस्वीर, जिसकी दूसरी प्रति दीवार पर लगी थी।
उसके नीचे रितु दीदी के उपचार के कागज थे।
पापा ने पहला कागज रितु दीदी को दिया।
उनका नाम, आयु और उपचार की तारीख साफ लिखी थी। तब वह ११ वर्ष की थीं। तत्काल प्रक्रिया के लिए दोपहर १२ बजे से पहले २ लाख ४० हजार रुपये जमा करने थे।
रितु दीदी ने कागज पढ़ा। उनके माथे पर हल्की सिलवट आई।
उन्होंने अपनी माँ की तरफ देखकर पूछा—
—माँ, आपने बताया था कि यह पैसा अस्पताल की सहायता निधि से आया था।
निर्मला बुआ ने धीरे से कहा—
—मुझे भी यही बताया गया था।
पापा ने अगला कागज निकाला।
वह सासाराम के एक पुराने सुनार की रसीद थी। दो सोने के कंगन और एक हार उसके पास रखकर १ लाख ९० हजार रुपये लिए गए थे।
सामान देने वाले के नाम की जगह लिखा था—“सावित्री देवी और जया।”
सावित्री देवी हमारी दादी का नाम था।
निर्मला बुआ ने रसीद छीनकर अपने हाथ में ले ली। उन्होंने तारीख देखी। फिर अस्पताल का कागज देखा।
दोनों पर एक ही तारीख थी।
१४ अगस्त।
रेखा बुआ अपनी जगह से उठीं और निर्मला बुआ के पीछे जाकर खड़ी हो गईं। सुधा बुआ ने अपने होंठों पर हाथ रख लिया।
जया बुआ ने मेरी तरफ नहीं देखा। वह अपनी खाली कलाइयों को आँचल में छिपाने लगीं।
तभी मेरी नजर उनके दाहिने हाथ पर पड़ी।
वहाँ एक पतला-सा फीका निशान था, जहाँ वर्षों तक कोई कड़ा पहना गया होगा। मुझे उनके विवाह की तस्वीर याद आई। लाल साड़ी में बैठी जया बुआ के गले में चौड़ा हार था और दोनों हाथों में सोने के कड़े।
आज उनके पास उनमें से कुछ भी नहीं था।
पापा ने तीसरा कागज निकाला।
वह अस्पताल की जमा पर्ची थी। १ लाख ९० हजार रुपये नकद और ५० हजार रुपये बचत खाते से जमा किए गए थे।
जमा करने वाले का नाम था—जया देवी।
रितु दीदी ने कागज अपने हाथ में लिया।
उन्होंने हर पंक्ति दो बार पढ़ी। फिर दीवार पर लगी अपनी बचपन की तस्वीर की ओर देखा। जया बुआ उसी जगह खड़ी थीं जहाँ रोगियों के परिजनों को खड़ा किया जाता था।
रितु दीदी के हाथ काँपने लगे।
उन्होंने जया बुआ से पूछा—
—ये पैसे आपने जमा किए थे?
जया बुआ ने उत्तर देने की जगह पापा से कहा—
—बस करो, भैया।
पापा ने पहली बार थोड़ा कठोर होकर कहा—
—नहीं। उस दिन भी तुमने यही कहा था। आज नहीं।
संचिका के नीचे कपड़े में लिपटा एक छोटा लिफाफा रखा था। उसके ऊपर दादी की लिखावट में लिखा था—
“मेरे बच्चों के लिए।”
लिफाफा पहले ही खुल चुका था। उसके किनारे नमी से भूरे पड़ गए थे।
पापा ने भीतर से एक पन्ना निकाला। नीचे दादी के हस्ताक्षर और अँगूठे की छाप थी। गवाह के रूप में अस्पताल के एक कर्मचारी और उसी सुनार के नाम लिखे थे।
पापा ने पन्ना निर्मला बुआ के सामने रख दिया—
—इसे तुम पढ़ोगी।
निर्मला बुआ ने पन्ना लिया, लेकिन शब्द उनके मुँह से नहीं निकले।
रितु दीदी उनके पास आ गईं। उन्होंने माँ के हाथ से पन्ना लिया और पढ़ना शुरू किया—
—“मेरी नातिन रितु के उपचार के लिए पैसों की तुरंत आवश्यकता थी। निर्मला सहायता लेने से मना कर रही थी और अजय के पास पूरी रकम नहीं थी। मैंने अपनी इच्छा से अपने दोनों कंगन जया को दिए हैं।”
रितु दीदी की आवाज रुक गई।
अजय फूफा ने अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।
रितु ने फिर पढ़ा—
—“जया ने अपने विवाह का हार और अपनी जमा पूँजी भी इसमें मिला दी है। उससे कहा है कि अभी निर्मला को न बताए। बच्ची के उपचार के समय उसके मन पर कोई बोझ नहीं पड़ना चाहिए। मेरे कंगन चोरी नहीं हुए हैं। वे मेरी इच्छा से मेरी नातिन के काम आए हैं।”
आखिरी पंक्ति के नीचे स्याही फैली हुई थी—
“अगर मैं स्वयं न बता सकूँ तो यह पत्र मेरे सभी बच्चों को दिखा देना।”
रितु दीदी आगे नहीं पढ़ पाईं।
पापा ने वह पन्ना उनसे ले लिया।
उस दिन पहली बार हम सबको समझ आया—जया बुआ ने दादी के कंगन नहीं चुराए थे; उन्होंने रितु दीदी का उपचार कराने के लिए अपना नाम चोरों में लिखवा लिया था।
कमरे में कोई नहीं बोला।
बाहर गली में सब्जी वाले की आवाज आ रही थी। छत के पंखे से हर चक्कर पर हल्की चरमराहट होती थी। राखी की थाली में रखा दीपक बुझ चुका था।
निर्मला बुआ धीरे-धीरे खाट पर बैठ गईं।
उनके हाथ में दादी का पत्र था। उन्होंने उसे मोड़ना चाहा, पर उँगलियाँ साथ नहीं दे रही थीं।
कुछ देर बाद उन्होंने जया बुआ से पूछा—
—तूने मुझे बताया क्यों नहीं?
जया बुआ ने उनकी ओर नहीं देखा—
—बताया था।
निर्मला बुआ की गर्दन उठी।
जया बुआ ने अपने आँचल का किनारा मरोड़ते हुए कहा—
—माँ के जाने के तीसरे दिन मैंने कहा था कि कंगन उन्होंने दिए थे। तुमने कहा था कि मैं माँ के नाम का सहारा लेकर अपना अपराध छिपा रही हूँ।
निर्मला बुआ की आँखें बंद हो गईं।
मुझे वह पुराना दिन पूरा याद नहीं था, लेकिन कमरे में बैठे बड़े लोगों के चेहरे बता रहे थे कि उन्हें सब याद आ चुका है।
रेखा बुआ दीवार से टिक गईं।
उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा—
—हमने भी तेरी बात नहीं मानी थी।
जया बुआ ने केवल सिर हिला दिया।
उनके चेहरे पर शिकायत नहीं थी। यही बात अधिक भारी लग रही थी।
सुधा बुआ उनके पास बैठ गईं और पूछा—
—तूने बाद में पत्र क्यों नहीं दिखाया?
श्याम ने उत्तर दिया—
—माँ को पत्र के बारे में पता ही नहीं था।
सबने उसकी ओर देखा।
उसने संदूक के निचले हिस्से का छोटा लकड़ी का पटरा उठाकर दिखाया। उसमें एक छिपी हुई तह थी।
श्याम ने कहा—
—नानी ने शायद जाते समय इसे स्वयं रखा था। माँ उस संदूक में उनके कपड़े रखती थीं। नीचे की तह कभी नहीं खुली।
पापा ने श्याम से पूछा—
—मुझे दूरभाष करने में इतना समय क्यों लगाया?
श्याम ने अपनी माँ की तरफ देखकर कहा—
—माँ ने मना किया था। कह रही थीं कि सच मिलने से बीते वर्ष वापस नहीं आएँगे। फिर मैंने उनका अस्पताल वाला कागज देखा।
जया बुआ एकदम उसकी तरफ मुड़ीं—
—श्याम!
उस एक शब्द में डर था।
निर्मला बुआ ने पूछा—
—कौन-सा अस्पताल का कागज?
श्याम ने संचिका के पीछे से एक और पर्चा निकालकर पापा को दिया।
जया बुआ उठीं और उसे लेने बढ़ीं, लेकिन उनका पैर खाट से टकरा गया। माँ ने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया।
पापा ने पर्चा पढ़ा। उनके चेहरे का रंग बदल गया।
उन्होंने जया बुआ से पूछा—
—यह कब से चल रहा है?
बुआ ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की—
—कुछ नहीं है। कमजोरी है।
श्याम की आवाज भर्रा गई—
—६ महीने से पेट में तकलीफ है। चिकित्सक ने जाँच कराने को कहा था। माँ हर बार पैसे न होने की बात कहकर लौट आती हैं।
देवेंद्र फूफा अब तक चुप बैठे थे। उन्होंने सिर झुकाकर कहा—
—मैंने बहुत समझाया। मेरी कमाई से किराया और घर का खर्च ही निकलता है। जाँच के १८ हजार रुपये बताए थे।
मुझे भोजन की मेज पर रखा पचास का नोट याद आया।
जया बुआ अपने लिए १८ हजार रुपये नहीं जुटा सकी थीं, लेकिन राखी के लिफाफे में पचास रुपये रखना नहीं भूलीं।
निर्मला बुआ ने दादी का पत्र अपनी गोद में रखा और दोनों हाथों से चेहरा ढक लिया।
कोई उनके पास नहीं गया।
कुछ पछतावे ऐसे होते हैं जिनके पहले कुछ मिनट आदमी को अकेले ही सहने पड़ते हैं।
जया बुआ ने पापा से कहा—
—भैया, मैंने तुम्हें इसलिए नहीं बुलाया था। श्याम बच्चा है, घबरा गया।
पापा ने पूछा—
—और तुम क्या चाहती थीं?
बुआ चुप रहीं।
पापा ने फिर पूछा—
—तकलीफ बढ़ती रहती और तुम हर साल लिफाफा भेजती रहतीं?
जया बुआ ने थाली में रखी राखियों को ठीक किया—
—हर घर की अपनी परेशानी होती है। कब तक सबको अपनी बात बताती?
निर्मला बुआ ने हाथ नीचे कर दिए।
वह जया बुआ के सामने आकर फर्श पर बैठ गईं।
जया बुआ पीछे हटने लगीं, लेकिन पीछे दीवार थी।
निर्मला बुआ ने उनकी साड़ी का किनारा पकड़ लिया—
—मैंने १२ वर्ष तक तेरा नाम लेते समय मुँह बनाया। अपने बच्चों को तेरे घर आने से रोका। तेरे भेजे लिफाफे अलग रख दिए। और जिस बच्ची के लिए तूने सब कुछ दिया, उसी के सामने तुझे…
उनकी आवाज टूट गई।
जया बुआ ने जल्दी से कहा—
—रितु ठीक हो गई थी। बात वहीं पूरी हो गई थी।
निर्मला बुआ ने सिर उठाया—
—तेरे लिए नहीं हुई।
जया बुआ ने कोई उत्तर नहीं दिया।
निर्मला बुआ खड़ी हुईं और कमरे में उपस्थित हर व्यक्ति की ओर मुड़ीं। बाहर खड़े दो पड़ोसी भी दरवाजे तक आ चुके थे। शायद गाड़ियों की भीड़ देखकर वहाँ रुक गए थे।
निर्मला बुआ ने दादी का पत्र दोनों हाथों में पकड़ा और कहा—
—मैंने जया पर चोरी का आरोप लगाया था। मैंने उसकी सफाई नहीं सुनी। परिवार में सबसे बड़ी होने का अधिकार लिया, लेकिन बड़ी बहन की जिम्मेदारी नहीं निभाई। माँ के कंगन जया ने नहीं लिए थे। माँ ने उन्हें मेरी बेटी के उपचार के लिए दिया था। जया ने अपना हार और अपनी जमा पूँजी भी उसमें मिला दी थी।
उन्होंने रितु की तरफ देखा—
—आज रितु हमारे सामने खड़ी है तो उसमें जया का हिस्सा है।
रेखा बुआ की आँखों से आँसू बहने लगे। सुधा बुआ ने जया बुआ की हथेली पकड़ ली।
निर्मला बुआ ने आगे कहा—
—मैं सबके सामने जया से क्षमा माँगती हूँ। वह चाहे तो मुझे कभी क्षमा न करे।
इतना कहकर वह जया बुआ के पैरों की तरफ झुकीं।
जया बुआ ने उन्हें बीच में ही पकड़ लिया।
दोनों बहनें कुछ क्षण एक-दूसरे को देखती रहीं। निर्मला बुआ उनसे ७ वर्ष बड़ी थीं, लेकिन उस समय उनका चेहरा किसी गलती पर पकड़ी गई बच्ची जैसा लग रहा था।
जया बुआ ने उनके कंधे पर हाथ रखा—
—मैंने तुझे क्षमा करने के लिए इतने वर्ष इंतजार नहीं किया। मैं तो बस चाहती थी कि एक दिन तू मेरी बात सुन ले।
निर्मला बुआ ने उन्हें गले लगा लिया।
जया बुआ ने पहली बार अपने दोनों हाथ उनकी पीठ पर रखे।
कोई ताली नहीं बजी। किसी ने उस क्षण को हल्का करने के लिए बात नहीं बदली।
वह चुप्पी ही निर्मला बुआ की पूरी सजा थी।
कुछ देर बाद पापा ने राखी की थाली फिर सामने रखी।
उन्होंने जया बुआ से कहा—
—अब राखी बाँधो।
बुआ ने तिलक लगाया। उनकी उँगलियाँ अभी भी काँप रही थीं। उन्होंने पापा की कलाई पर साधारण लाल-पीली राखी बाँधी और मिठाई का छोटा टुकड़ा उनके मुँह में रखा।
पापा ने जेब से कोई बड़ा लिफाफा नहीं निकाला।
उन्होंने केवल नीली जिल्द वाली संचिका जया बुआ को लौटा दी—
—यह तुम्हारा सम्मान है। इसे अब छिपाकर मत रखना।
इसके बाद सुधा, रेखा और निर्मला बुआ ने भी पापा को राखी बाँधीं।
जब निर्मला बुआ की बारी आई, उन्होंने राखी बाँधने से पहले कहा—
—भैया, तुमने हमें यहाँ बुलाकर ठीक किया।
पापा ने उनकी ओर बिना मुस्कुराए देखा—
—मैंने तुम्हें नहीं बुलाया। तुम्हारी माँ का पत्र बुलाकर लाया है।
निर्मला बुआ की नजर झुक गई।
राखी के बाद सबने मिलकर खाना बनाया। घर छोटा था, इसलिए कुछ लोग बरामदे में बैठे और कुछ आँगन में। जया बुआ बार-बार उठकर सबके लिए रोटी लाना चाहती थीं, मगर रितु दीदी ने उन्हें खाट से उतरने नहीं दिया।
रितु ने थाली उनके सामने रखते हुए कहा—
—आज आप बैठेंगी।
जया बुआ ने हँसने की कोशिश की—
—मुझे आदत नहीं है।
रितु ने उनके पास बैठते हुए कहा—
—मुझे भी आपकी सेवा करने की आदत नहीं है। दोनों आज से सीख लेते हैं।
जया बुआ ने पहली रोटी का टुकड़ा तोड़ा, मगर खा नहीं पाईं। शायद इतने लोगों के बीच बैठकर खाना उन्हें सच में सपना लग रहा था।
रात करीब १० बजे उनके पेट में फिर तेज तकलीफ उठी। उन्होंने किसी को बताने की जगह खाट के किनारे को पकड़ लिया।
माँ की नजर उन पर पड़ गई।
उन्होंने बुआ के माथे को छूते हुए पूछा—
—जया, क्या हुआ?
बुआ ने सिर हिलाया—
—कुछ नहीं।
इस बार किसी ने उनका “कुछ नहीं” स्वीकार नहीं किया।
पापा और अजय फूफा उन्हें उसी रात जिला चिकित्सालय ले गए। निर्मला बुआ भी साथ गईं। रितु ने श्याम को घर पर रोककर कहा कि वह चिंता न करे।
जाँच के बाद चिकित्सक ने बताया कि बीमारी का उपचार संभव है, लेकिन लापरवाही नहीं की जा सकती। कुछ जाँच तुरंत होनी थीं और उसके बाद २ महीने नियमित उपचार चलना था।
पापा पैसे जमा करने के लिए उठे तो निर्मला बुआ ने उन्हें रोक दिया।
उन्होंने पर्ची अपने हाथ में लेते हुए कहा—
—पहला अधिकार मेरा है।
पापा ने पूछा—
—अधिकार या प्रायश्चित?
निर्मला बुआ कुछ पल चुप रहीं।
फिर उन्होंने साफ स्वर में कहा—
—दोनों में फर्क आने में समय लगेगा। शुरुआत आज से कर रही हूँ।
पापा पीछे हट गए।
अगले ३ दिन निर्मला बुआ चिकित्सालय में जया बुआ के पास रहीं। रितु ने घर और श्याम को सँभाला। सुधा बुआ देवेंद्र फूफा के साथ उनके काम की स्थिति समझने गईं। रेखा बुआ ने घर की टपकती छत ठीक कराने वाले लोगों को बुलाया।
पहले दिन जया बुआ हर काम का विरोध करती रहीं।
उन्होंने निर्मला बुआ से कहा—
—इतना खर्च मत कर। मैं धीरे-धीरे लौटा दूँगी।
निर्मला बुआ ने उनके पैरों पर चादर ठीक करते हुए कहा—
—पहले ठीक हो जा। हिसाब बाद में करना।
जया बुआ ने चेहरा फेर लिया—
—मैं किसी की दया नहीं चाहती।
निर्मला बुआ के हाथ रुक गए।
उन्होंने कुर्सी खींचकर जया बुआ के सामने रखी और कहा—
—दया मैं उस पर करूँगी जिसने मुझसे कुछ लिया हो। तूने तो दिया है। मैं केवल अपना रिश्ता वापस माँग रही हूँ।
जया बुआ ने उनकी ओर देखा।
निर्मला बुआ ने आगे कुछ नहीं कहा।
उसी शाम उन्होंने जया बुआ के बालों में धीरे-धीरे कंघी की। दोनों के बीच लगभग आधे घंटे तक कोई बात नहीं हुई। कभी-कभी संबंध शब्दों से नहीं लौटते। कोई परिचित हाथ सिर पर ठहर जाए, वहीं से रास्ता खुलता है।
उपचार शुरू होने के १० दिन बाद जया बुआ घर लौटीं। छत अब नहीं टपकती थी। बरामदे की नाली साफ हो चुकी थी। मगर सबसे बड़ा परिवर्तन रसोई या कमरे में नहीं था।
घर के दरवाजे पर जया बुआ के नाम की एक छोटी पट्टी लगी थी—
“जया सिलाई केंद्र।”
जया बुआ वर्षों से पड़ोस की महिलाओं के कपड़े सिलती थीं, मगर उनके पास केवल एक पुरानी मशीन थी। सुधा बुआ ने ३ नई मशीनें रखवा दी थीं। रेखा बुआ ने आसपास के विद्यालयों से गणवेश सिलने का काम दिलाने की बात की थी।
जया बुआ ने पट्टी देखते ही कहा—
—मुझसे पूछे बिना यह सब क्यों किया?
रेखा बुआ घबरा गईं, लेकिन पापा मुस्कुराए।
उन्होंने मेज पर कुछ कागज रखे—
—क्योंकि सहायता नहीं, साझेदारी है। मशीनों की कीमत लिखी है। काम चले तो हर महीने जितना बन पड़े, लौटा देना।
जया बुआ ने कागज उठाकर पूरा पढ़ा।
उन्होंने पूछा—
—और काम नहीं चला तो?
सुधा बुआ ने कहा—
—फिर हम चारों बहनें बैठकर अगला रास्ता निकालेंगी। इस बार किसी एक को अकेला नहीं छोड़ेंगी।
जया बुआ ने तुरंत हाँ नहीं की।
वह भीतर गईं, अपना पुराना नाप वाला फीता लाईं और पहली मशीन के पास रख दिया।
वही उनका उत्तर था।
निर्मला बुआ ने उस दिन कोई मशीन नहीं दी थी। उन्होंने श्याम के लिए छात्रावास और पढ़ाई का खर्च उठाने की बात भी नहीं की। वह समझ चुकी थीं कि हर गलती का समाधान पैसे से करना भी रिश्ते को छोटा कर सकता है।
उन्होंने कुछ अलग किया।
वह हर सुबह ८ बजे जया बुआ को दूरभाष करतीं।
पहले दवा पूछतीं। फिर खाना। उसके बाद ५ मिनट किसी सामान्य बात पर चर्चा करतीं—घर की सब्जी, रितु की पढ़ाई, पुरानी साड़ी या बचपन की कोई घटना।
पहले सप्ताह जया बुआ केवल “हाँ” और “ठीक है” कहती थीं।
दूसरे सप्ताह उन्होंने एक दिन स्वयं पूछा—
—रितु की जाँच कब है?
तीसरे सप्ताह पहली बार उन्होंने निर्मला बुआ को बिना किसी काम के दूरभाष किया।
निर्मला बुआ ने बाद में माँ को बताया कि उस दिन उन्होंने घंटी बजते ही नाम देखा और कुछ क्षण दूरभाष उठाने की हिम्मत नहीं हुई।
उन्हें डर था कि कहीं यह सपना न हो।
सिलाई केंद्र धीरे-धीरे चल पड़ा। पहले महीने २७ गणवेश बने। दूसरे महीने पास के महिला समूह ने ६० थैले बनाने का काम दिया। जया बुआ ने मोहल्ले की दो महिलाओं को अपने साथ रख लिया।
वह हर भुगतान एक पुरानी बही में लिखतीं। मशीनों के लिए तय रकम भी समय पर लौटातीं।
सुधा बुआ ने एक बार कहा—
—रहने दे, कौन-सा हम हिसाब माँग रहे हैं?
जया बुआ ने बही बंद करते हुए कहा—
—तुम नहीं माँग रही हो, इसलिए देना जरूरी है। तभी अगली बार मैं तुम्हारे सामने बराबर बैठ पाऊँगी।
उसके बाद किसी ने रकम माफ करने की बात नहीं की।
श्याम ने उसी वर्ष अपनी परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। उसने पास के राजकीय तकनीकी संस्थान में प्रवेश लिया। शुल्क का पहला भाग जया बुआ ने सिलाई केंद्र की कमाई से भरा।
बाकी रकम पापा ने उधार दी।
श्याम ने रसीद लेकर कहा—
—नौकरी लगने के बाद लौटा दूँगा।
पापा ने उसकी पीठ थपथपाई—
—रुपये मुझे लौटा देना। अपनी माँ के वर्ष किसी को मत लौटाना। उन्हें अब अपने लिए जीने देना।
६ महीने बाद रितु दीदी की शादी तय हुई।
निमंत्रण पत्र पर परिवार की महिलाओं के नाम लिखे जा रहे थे। निर्मला बुआ ने सबसे ऊपर दादी का नाम लिखवाया। उसके ठीक नीचे जया बुआ का नाम था।
कुछ रिश्तेदारों ने पूछा कि छोटी बहन का नाम इतना ऊपर क्यों है।
निर्मला बुआ ने बात छिपाई नहीं।
उन्होंने सबके सामने कहा—
—क्योंकि इस लड़की की शादी तक पहुँचने में उसकी छोटी बुआ का सबसे बड़ा हिस्सा है।
विवाह वाले दिन जया बुआ ने वही पुरानी लाल साड़ी पहनी जिसकी तस्वीर हमारे घर के पुराने संग्रह में थी। साड़ी को उन्होंने स्वयं ठीक किया था। गले में कोई सोने का हार नहीं था। निर्मला बुआ उनके लिए नया हार लाई थीं, मगर जया बुआ ने पहनने से मना कर दिया।
उन्होंने कहा—
—जिसकी भरपाई संबंध से हो गई, उसे सोने से मत तौल।
निर्मला बुआ ने हार वापस डिब्बे में रख दिया।
रितु की विदाई से पहले उसने जया बुआ को कमरे में बुलाया। उसने अपने हाथ में पहना एक पतला कड़ा उतारकर उनकी हथेली पर रखना चाहा।
जया बुआ ने उसकी मुट्ठी बंद कर दी—
—यह तेरी माँ ने दिया है। तू रख।
रितु ने पूछा—
—फिर मैं आपके लिए क्या करूँ?
जया बुआ ने उसके माथे को छूते हुए कहा—
—जब कभी किसी अपने पर आरोप लगे, फैसला करने से पहले उसकी पूरी बात सुन लेना।
रितु ने सिर हिला दिया।
जया बुआ ने आगे कुछ नहीं कहा।
अगला रक्षाबंधन आया तो हमारे घर के दरवाजे पर कोई साधारण लिफाफा नहीं पहुँचा।
सुबह ७ बजे घंटी बजी।
मैंने दरवाजा खोला तो सामने जया बुआ खड़ी थीं। उनके साथ देवेंद्र फूफा और श्याम थे। बुआ ने हल्के पीले रंग की साड़ी पहन रखी थी। चेहरे की सारी रेखाएँ गायब नहीं हुई थीं, लेकिन अब वह उनसे छिप नहीं रही थीं।
उनके हाथ में राखी की छोटी थाली और कपड़े का एक थैला था।
माँ ने थैला लेकर पूछा—
—इस बार क्या लाई हो?
जया बुआ ने हँसकर कहा—
—अपनी कमाई से सबके लिए कपड़े सिले हैं। नाप गलत हो तो वापस नहीं लूँगी।
पापा भीतर से बाहर आए।
जया बुआ ने उन्हें देखते ही थाली नीचे रखी और दोनों हाथ उनकी ओर फैला दिए।
पापा ने छोटी बहन को गले लगा लिया।
कुछ देर बाद निर्मला, सुधा और रेखा बुआ भी अपने परिवारों के साथ पहुँच गईं। इस बार किसी के हाथ में महँगा डिब्बा नहीं था। सब केवल मिठाई और राखियाँ लाए थे।
मेज पर पाँचों बहनों की थालियाँ एक साथ रखी थीं।
पापा ने सबसे पहले जया बुआ की राखी बँधवाई।
राखी बाँधने के बाद उन्होंने जेब से पचास रुपये का वही पुराना नोट निकाला। वह एक पारदर्शी आवरण में सुरक्षित रखा था।
जया बुआ ने उसे पहचान लिया।
उन्होंने पूछा—
—इसे अब तक रखा है?
पापा ने नोट उनकी हथेली पर रखते हुए कहा—
—यह पचास रुपये नहीं थे। यह उस बहन का हिस्सा था, जिसके पास देने के लिए सबसे कम था और जिसने हम सबमें सबसे अधिक दिया।
जया बुआ ने नोट वापस उनकी जेब में रख दिया।
फिर उन्होंने मिठाई उठाकर पापा को खिलाई और अपनी पुरानी जगह पर नहीं, चारों बहनों के बीच जाकर बैठ गईं।
