राखी की सुबह मैंने कहा मैं मायके नहीं जाऊँगी, पूजा हँसी—भाभी को रिश्ते निभाने नहीं आते, लेकिन शाम तक उसी घर में उसकी आवाज़ सबसे पहले काँपी//

PART 2

मैं मम्मी जी के पास पहुँची तो उनकी आँखें खुली थीं, लेकिन वे सीधे बैठ नहीं पा रही थीं।

मैंने उनके कंधे के पीछे हाथ लगाया।

—मम्मी जी, मेरी तरफ देखिए।

पूजा का फोन अब भी जुड़ा हुआ था।

उधर मेरी माँ बार-बार पूछ रही थीं—

—नैना? क्या हुआ? आवाज क्यों नहीं आ रही?

मैंने बिना पीछे देखे कहा—

—पूजा, फोन काटो।

इस बार मेरी आवाज सुनकर उसने बहस नहीं की।

कमरे में रखी छोटी मशीन मैंने दराज से निकाली और मम्मी जी का दबाव देखा।

स्क्रीन पर संख्या आते ही मेरी उँगलियाँ रुक गईं।

अरविंद मेरे पीछे खड़े थे।

—क्या हुआ?

मैंने जवाब देने के बजाय मम्मी जी के पैरों के नीचे तकिया रखा।

पापा जी पानी लेने बढ़े तो मैंने रोक दिया।

—अभी ज्यादा पानी एक साथ मत दीजिए।

अरविंद फिर बोले—

—नैना, बताओ तो सही।

मैंने फोन उठाकर डॉक्टर राघव को लगाया।

उन्होंने दूसरी घंटी पर फोन उठा लिया।

—हाँ, नैना?

मैंने संख्या बताई।

उधर कुछ सेकंड शांति रही।

फिर उन्होंने दो छोटे निर्देश दिए।

मैंने वही किया।

कमरे में खड़े चार लोग मुझे देख रहे थे।

अब किसी को राखी याद नहीं थी।

पाँच मिनट बाद मम्मी जी ने आँखें पूरी तरह खोलीं।

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।

—मैं ठीक हूँ।

मैंने कहा—

—अभी कुछ मत बोलिए।

पूजा दरवाजे के पास खड़ी थी।

उसके चेहरे से सुबह वाली हँसी गायब हो चुकी थी।

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।

करीब ग्यारह बजकर बीस मिनट पर डॉक्टर राघव घर आए।

वे पिछले बारह वर्षों से हमारे परिवार के डॉक्टर थे।

आते ही उन्होंने सबसे पहले मम्मी जी को देखा। फिर दवाइयों की सूची जाँची।

मैं कमरे के कोने में खड़ी थी।

उन्होंने अरविंद की तरफ देखा—

—आज इन्हें अकेला नहीं छोड़ना है।

अरविंद ने तुरंत कहा—

—जी, हम सब घर पर हैं।

डॉक्टर की नजर मुझ पर आई।

एक पल के लिए।

फिर उन्होंने केवल सिर हिलाया।

पूजा ने शायद वह छोटा-सा इशारा पकड़ लिया।

वह आगे बढ़ी—

—डॉक्टर साहब, क्या बात ज्यादा गंभीर है?

उन्होंने मम्मी जी की तरफ देखकर कहा—

—अभी स्थिति संभली हुई है। दवा और निगरानी जरूरी है।

—लेकिन भाभी सुबह से ऐसा व्यवहार कर रही हैं जैसे कोई बहुत बड़ी बात हो गई हो।

कमरे में अचानक चुप्पी छा गई।

मैंने पूजा की तरफ देखा।

डॉक्टर ने उसकी बात का सीधा उत्तर नहीं दिया।

उन्होंने नीली फाइल उठाई।

उसी के नीचे क्रीम रंग का लिफाफा था।

मेरे सीने में हल्का-सा झटका लगा।

उन्होंने वह लिफाफा देखा, फिर मुझे।

—यह अभी तक बंद है?

—जी।

पूजा तुरंत बोली—

—देखा? मैंने कहा था न कोई बात हमसे छिपाई जा रही है।

मैंने डॉक्टर से कहा—

—अभी रहने दीजिए।

डॉक्टर ने बिना सवाल किए लिफाफा वापस रख दिया।

यही बात शायद पूजा को सबसे ज्यादा चुभी।

उसे लगा जैसे कमरे में सभी को कुछ पता है, सिर्फ उसे नहीं।

डॉक्टर चले गए।

दोपहर बारह बजे तक मम्मी जी सो गईं।

पापा जी उनके पास बैठ गए।

मैं रसोई में दाल गर्म करने लगी।

अरविंद मेरे पीछे आए।

दरवाजा बंद नहीं किया, लेकिन आवाज धीमी रखी।

—नैना, आखिर चल क्या रहा है?

मैंने गैस कम की।

—कुछ नहीं।

—कृपया वही जवाब मत दो।

मैंने उनकी तरफ देखा।

—तो क्या सुनना चाहते हो?

—वह लिफाफा क्यों छिपा रही हो?

मैंने कुछ क्षण उन्हें देखा।

सुबह से पहली बार मुझे लगा कि शायद मैं सच बता दूँ।

लेकिन तभी बैठक से पूजा की आवाज आई।

वह किसी से फोन पर बात कर रही थी।

—हाँ मामी, भाभी मायके नहीं गईं। अब डॉक्टर की रिपोर्ट भी छिपा रही हैं। पता नहीं क्या साबित करना चाहती हैं।

मैंने अरविंद की आँखों में देखा।

—यही कारण है।

—क्या?

—इस घर में आधी बात पाँच मिनट में रिश्तेदारों तक पहुँच जाती है।

उन्होंने नजरें हटा लीं।

मैंने दाल में चम्मच घुमाया।

—मम्मी जी को अभी शांति चाहिए। डर नहीं।

अरविंद ने धीरे कहा—

—तो कम-से-कम मुझे बता सकती थीं।

मैंने उनकी तरफ देखे बिना कहा—

—रात को तुम्हें तीन बार उठाया था।

उनकी आँखें मेरी तरफ आईं।

—कब?

मैंने जवाब नहीं दिया।

सिर्फ गैस बंद कर दी।

मेरी चुप्पी इस बार आरोप नहीं थी।

बस थकान थी।

सुबह तीन बजकर दस मिनट की घड़ी मेरी आँखों में अब भी चल रही थी।

रात को मम्मी जी के कमरे से हल्की-सी आवाज आई थी।

मैं पानी लेने उठी थी।

दरवाजा खुला तो वे बिस्तर के किनारे बैठी थीं। उनका हाथ मेज पर था और चेहरा बिल्कुल सफेद लग रहा था।

मैंने अरविंद को आवाज दी थी।

एक बार।

फिर दूसरी बार।

वह नहीं जागे।

मैंने पूजा के कमरे का दरवाजा भी खटखटाया था।

कोई उत्तर नहीं आया।

मैं उस रात किसी को दोष नहीं देना चाहती थी।

किसी की नींद गहरी हो सकती है।

लेकिन उसके बाद जो हुआ था, उसी वजह से मैं उस सुबह मायके नहीं गई थी।

और उसी वजह से वह क्रीम रंग का लिफाफा बंद था।

दोपहर के करीब डेढ़ बजे मुख्य दरवाजे की घंटी बजी।

पूजा ने जाकर दरवाजा खोला।

अगले ही पल उसकी आवाज आई—

—अरे! आप?

मैं रसोई से बाहर आई।

दरवाजे पर मेरी माँ खड़ी थीं।

हाथ में राखी की छोटी थाली थी।

उनके पीछे पापा थे।

माँ ने मुझे देखते ही कहा—

—तुम नहीं आई तो हमने सोचा हम ही आ जाएँ।

मैं कुछ बोल नहीं पाई।

उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन आँखों के नीचे की सूजन बता रही थी कि सुबह पूजा का फोन उन्हें अच्छा नहीं लगा था।

मैं उनके पैर छूने झुकी।

उन्होंने सिर पर हाथ रखा।

—मोहित कहाँ है?

मेरे मुँह से अचानक निकल गया।

माँ ने मेरी तरफ अजीब तरह से देखा।

—तुझे नहीं बताया? सुबह से बाहर गया है। कहा था जरूरी काम है।

मैं एक पल के लिए स्थिर रह गई।

—अभी तक नहीं आया?

—नहीं।

पूजा शायद अब भी सुबह की बात छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी।

वह मेरी माँ के पास बैठते हुए बोली—

—आंटी, मैंने तो भाभी से बहुत कहा। हम सब थे घर पर। दो घंटे के लिए चली जातीं तो क्या हो जाता?

माँ ने मेरी तरफ देखा।

मैंने सोचा वह भी यही कहेंगी।

पर उन्होंने सिर्फ पूछा—

—कमला जी कैसी हैं?

—सो रही हैं।

माँ ने थाली मेज पर रख दी।

—तो पहले उन्हें देखने चलूँगी।

उस एक वाक्य ने मेरे भीतर कुछ नरम कर दिया।

शायद माँ नाराज थीं।

लेकिन उस समय उन्होंने अपनी नाराजगी को मुझसे बड़ा नहीं बनाया।

हम दोनों मम्मी जी के कमरे में गए।

मम्मी जी ने उन्हें देखकर उठने की कोशिश की।

माँ ने तुरंत हाथ पकड़ लिया—

—आप लेटी रहिए।

दोनों महिलाएँ कुछ सेकंड एक-दूसरे को देखती रहीं।

फिर मम्मी जी ने कहा—

—मेरी वजह से नैना नहीं आ पाई।

माँ ने धीमे से उत्तर दिया—

—त्योहार फिर आ जाएगा। तबीयत पहले है।

दरवाजे पर खड़ी पूजा चुप थी।

लेकिन ज्यादा देर नहीं।

चाय के समय उसने फिर वही बात छेड़ दी।

इस बार पापा जी, मेरे पिता, अरविंद और मेरी माँ सब सामने बैठे थे।

पूजा ने कहा—

—मैं सिर्फ इतना कह रही हूँ कि भाभी बात को जरूरत से ज्यादा बढ़ा रही हैं। डॉक्टर भी कह गए हैं स्थिति संभली हुई है।

मेरे पिता ने मेरी तरफ देखा।

मैंने कप में चाय डाली।

पूजा आगे बोली—

—और वह कोई लिफाफा भी छिपा रही हैं। मम्मी की रिपोर्ट है शायद।

मेरी माँ का हाथ रुक गया।

—कौन-सा लिफाफा?

मैंने तुरंत कहा—

—कुछ नहीं माँ।

पूजा ने जवाब दिया—

—यही तो। किसी को कुछ बताना ही नहीं है।

अरविंद ने इस बार उसे रोका—

—पूजा, रहने दो।

वह पलटी—

—क्यों रहने दूँ? सुबह से घर में ऐसा माहौल है जैसे सिर्फ भाभी को मम्मी की चिंता है। हम सब क्या हैं?

मैंने चाय का कप मेज पर रखा।

—मैंने ऐसा कभी नहीं कहा।

—कहने की जरूरत भी नहीं। तुम्हारे व्यवहार से दिख रहा है।

मैंने उसकी आँखों में देखा।

मैं बहुत कुछ कह सकती थी।

रात के बारे में।

तीन बजकर दस मिनट के बारे में।

उसके बंद कमरे के बारे में।

अरविंद को जगाने की कोशिश के बारे में।

लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि सच किसी को नीचा दिखाने के लिए बताया जाए तो वह भी आधा गलत लगने लगता है।

मैंने बस इतना कहा—

—मम्मी जी आराम कर रही हैं। आवाज धीमी रखो।

पूजा ने होंठ भींच लिए।

तभी फिर घंटी बजी।

इस बार अरविंद ने दरवाजा खोला।

मैंने बैठक से बाहर देखा।

और मेरी साँस कुछ पल के लिए रुक गई।

मोहित खड़ा था।

सफेद कुर्ते की बाँहें कोहनी तक मुड़ी हुई थीं। बाल बिखरे थे। हाथ में कागज का एक छोटा पैकेट और दवा की थैली थी।

माँ तुरंत उठीं—

—तू कहाँ था सुबह से?

मोहित की नजर सबसे पहले मुझ पर गई।

फिर उसने माँ को देखा।

—काम था।

—कौन-सा काम? फोन तक नहीं उठाया।

उसने जवाब देने से पहले मेरी तरफ देखा।

मैंने बहुत हल्के से सिर हिलाया।

मत बताना।

वह समझ गया।

—बस, जरूरी था।

पूजा ने शायद हमारे बीच वह इशारा देख लिया।

उसने तुरंत पूछा—

—आप दोनों को क्या पता है जो बाकी किसी को नहीं पता?

मोहित ने थैली मेरी तरफ बढ़ाई।

—दीदी, डॉक्टर राघव ने यह दवा भी मँगाई थी।

कमरा शांत हो गया।

अरविंद की गर्दन धीरे से मेरी तरफ मुड़ी।

पूजा ने पूछा—

—आपको डॉक्टर राघव के बारे में कैसे पता?

मोहित ने मेरी तरफ देखा।

मैंने कुछ नहीं कहा।

मेरी माँ अब बिल्कुल सीधे बैठी थीं।

—मोहित?

उसने साँस छोड़ी।

फिर वह मेरे पास आया।

उसकी दाहिनी कलाई मेरी आँखों के सामने आई।

लाल और सुनहरी राखी बँधी थी।

वही राखी जिसे मैंने रात के बाद भोर में अपने काँपते हाथों से बाँधा था।

पूजा की नजर भी उसी कलाई पर टिक गई।

उसने कुछ नहीं कहा।

मोहित ने दवा की थैली मेज पर रखी।

—माँ, दीदी आज राखी बाँधना नहीं भूली थीं।

मेरी माँ की आँखें मेरी तरफ उठीं।

मैंने नजरें नीचे कर लीं।

मोहित ने धीरे-धीरे बताया—

—सुबह चार बजकर बारह मिनट पर दीदी का फोन आया था।

अरविंद की उँगलियाँ कप के चारों ओर कस गईं।

—चार बजकर बारह?

मोहित ने सिर हिलाया।

—कमला आंटी की तबीयत रात में अचानक बिगड़ी थी। जीजाजी का फोन नहीं लगा। दीदी ने मुझे बुलाया क्योंकि कार बाहर निकालने में मदद चाहिए थी।

पूजा का चेहरा बदलने लगा।

मोहित ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।

—मैं चार बजकर छब्बीस मिनट पर यहाँ पहुँचा। हम दोनों कमला आंटी को पास वाले चौबीस घंटे खुले उपचार केंद्र ले गए।

मेरी माँ ने होंठ पर हाथ रख लिया।

अरविंद ने मेरी ओर देखा—

—तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?

मैंने पहली बार कहा—

—तुम सो रहे थे।

बस।

मैंने इसके आगे कुछ नहीं कहा।

मोहित ने अपनी कलाई देखी।

—केंद्र में डॉक्टर ने कहा कुछ समय निगरानी रखनी होगी। सुबह होने लगी थी। मैंने दीदी से कहा घर चलकर राखी बाँध देना। इन्होंने कहा माँ उठ जाएँगी तो सवाल करेंगी।

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

—तो उपचार केंद्र के बाहर वाली चाय की दुकान के पास इन्होंने मुझे राखी बाँध दी।

कमरे में किसी ने आवाज नहीं की।

माँ की नजर मेरी उँगलियों पर थी।

शायद वे कल्पना कर रही थीं कि जिस समय घर में मिठाई सज रही थी, उनकी बेटी किसी सफेद दीवार वाले उपचार केंद्र के बाहर भाई की कलाई पर राखी बाँध रही थी।

मोहित ने आगे कहा—

—मैंने कहा था मैं पूरे दिन रुक जाता हूँ। दीदी ने मना कर दिया। बोलीं मम्मी को पता चला तो त्योहार खराब हो जाएगा। कमला आंटी को भी पूरी बात नहीं बताई गई।

अब सबकी नजर नीली फाइल की तरफ गई।

वही फाइल।

वही क्रीम रंग का बंद लिफाफा।

मुझे अचानक महसूस हुआ कि कमरे में पंखे की आवाज कितनी तेज है।

पूजा की आवाज बहुत धीमी निकली—

—उस लिफाफे में…?

मैं उठी।

कमरे में गई।

मम्मी जी जाग चुकी थीं।

मैंने उनसे पूछा—

—कैसा लग रहा है?

—ठीक हूँ।

मैंने नीली फाइल उठाई।

क्रीम लिफाफा मेरे हाथ में था।

मम्मी जी ने उसे देखा।

—यह क्या है?

मैं उनके पास बैठ गई।

—रात की जाँच के कागज।

उनकी आँखें फैल गईं।

—रात?

मेरे पास अब छिपाने को कुछ नहीं था।

मैं उन्हें सहारा देकर बैठक में लाई।

माँ ने तुरंत उनके लिए जगह बनाई।

मम्मी जी बैठीं।

मैंने लिफाफा मेज पर रख दिया।

—इसे मैंने इसलिए बंद रखा था क्योंकि डॉक्टर ने कहा था डर और तनाव से बचाइए। मम्मी जी सुबह से मुझे मायके भेज रही थीं। अगर इन्हें पता चलता कि रात की हालत देखकर डॉक्टर ने चौबीस घंटे निगरानी की बात कही है, तो ये खुद को दोष देतीं।

मैंने लिफाफा उनकी तरफ बढ़ाया।

—अब आप सब देख सकते हैं।

अरविंद ने उसे खोला।

अंदर तीन चीजें थीं।

पहली, उपचार केंद्र की पर्ची।

समय—तीन बजकर इक्यावन मिनट।

दूसरी, डॉक्टर राघव का लिखा निर्देश।

अगले चौबीस घंटे रोगी को अकेला न छोड़ा जाए। दवा समय पर दी जाए। चक्कर, अत्यधिक कमजोरी या प्रतिक्रिया धीमी हो तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता ली जाए।

तीसरी, भुगतान की पर्ची।

भुगतान करने वाले के नाम में मेरा नाम था।

लेकिन अरविंद की नजर पैसे पर नहीं रुकी।

वह पर्ची के नीचे लगी छोटी-सी प्रवेश पर्ची देख रहे थे।

“साथ आए व्यक्ति—मोहित शर्मा।”

आने का समय—चार बजकर उनतीस मिनट।

उनकी उँगली वहीं रुक गई।

पूजा ने धीरे से पूछा—

—भाभी… आपने सुबह बताया क्यों नहीं?

मैंने उसकी तरफ देखा।

—किसे?

वह चुप।

मैंने पूछा—

—जब मैंने कहा था कि मैं आज घर पर रहूँगी, क्या किसी ने पूछा था कि क्यों?

अरविंद ने सिर उठाया।

मैंने उनकी ओर देखा।

—तुमने भी नहीं।

उनके होंठ खुले, लेकिन शब्द नहीं निकले।

मैंने आगे कुछ नहीं कहा।

जरूरत नहीं थी।

मम्मी जी की आँखों से आँसू निकल आए।

मैंने तुरंत पास जाकर उनका हाथ पकड़ा।

उन्होंने मेरा हाथ कस लिया—

—तू रात भर मेरे साथ थी?

मैंने कहा—

—हाँ।

—और सुबह मैं तुझे बार-बार मायके भेज रही थी?

मैं हल्का-सा मुस्कुराई।

—इसीलिए तो नहीं बताया था।

उन्होंने अपना दूसरा हाथ मेरे सिर पर रख दिया।

कमरे में बैठे लोग चुप थे।

कई बार किसी परिवार में सच कोई धमाका नहीं करता।

वह सिर्फ कमरे की सारी कुर्सियों की दिशा बदल देता है।

उस शाम भी ऐसा ही हुआ।

पापा जी पहली बार उठकर रसोई में गए और मेरे लिए चाय बनाकर लाए।

मेरे पिता मोहित की कलाई देख रहे थे।

माँ मेरे पास आकर बैठीं।

उन्होंने मेरी साड़ी का पल्लू ठीक किया।

बचपन से जब भी वे मुझसे कुछ कहना चाहती थीं और शब्द नहीं मिलते थे, यही करती थीं।

थोड़ी देर बाद उन्होंने धीरे पूछा—

—सुबह मैंने फोन पर तुझे दुखी कर दिया था?

मैंने सिर हिलाया—

—नहीं।

उन्होंने तुरंत कहा—

—झूठ।

मैं हँस पड़ी।

उनकी आँखें भर आईं।

—मुझे लगा तू बदल गई है।

मैंने उनके कंधे पर सिर रख दिया।

—मैं कहाँ बदलूँगी माँ?

मोहित सामने बैठा राखी घुमा रहा था।

उसने मुस्कुराकर कहा—

—हाँ, सिर्फ जगह बदल गई है। आदेश देना अभी भी नहीं छोड़ा। सुबह उपचार केंद्र में भी मुझे कह रही थी, “सीधे बैठ, राखी टेढ़ी हो रही है।”

सबके चेहरे पर पहली बार हल्की हँसी आई।

सिर्फ पूजा नहीं हँसी।

वह बालकनी के पास जाकर खड़ी हो गई।

मैंने उसे देखा, लेकिन उसके पीछे नहीं गई।

कुछ बातें सामने वाले को खुद तक पहुँचने में समय लेती हैं।

शाम छह बजे मम्मी जी का दबाव दोबारा देखा गया।

इस बार ठीक था।

डॉक्टर ने फोन पर कहा कि चिंता की बात नहीं लग रही, लेकिन रात तक निगरानी रखनी होगी।

घर का तनाव धीरे-धीरे उतर रहा था।

मेरे माता-पिता जाने के लिए उठे।

माँ ने मम्मी जी के पैर छुए।

मम्मी जी ने उनका हाथ पकड़ लिया—

—बहन जी, इस बार आपकी बेटी को मैंने रोक लिया।

माँ ने मेरी तरफ देखकर कहा—

—नहीं। इसे किसी ने नहीं रोका। यह खुद रुकना जानती है।

मम्मी जी की नजर नीचे हो गई।

उन्होंने कुछ नहीं कहा।

दरवाजे तक छोड़ते समय मोहित मेरे पास रुका।

—दीदी।

—हूँ?

उसने अपनी राखी दिखाई।

—अगले साल घर आना।

मैंने कहा—

—तू अगले साल भी सुबह चार बजे आ जाना।

वह हँस पड़ा।

—बिल्कुल नहीं।

माँ-पापा चले गए।

मैं अंदर मुड़ी तो पूजा वहीं खड़ी थी।

उसने शायद मेरा इंतजार किया था।

कुछ सेकंड हम दोनों चुप रहे।

फिर उसने धीरे कहा—

—भाभी।

मैं रुकी।

उसने आँखें ऊपर नहीं उठाईं।

—मैंने सुबह बहुत कुछ कहा।

मैंने कुछ नहीं कहा।

वह आगे बोली—

—मुझे लगा आप मम्मी की बीमारी को बहाना बना रही हैं।

इस बार मैंने जवाब दिया—

—मुझे पता है।

—और मैंने आपके मायके फोन करके…

उसकी आवाज रुक गई।

मैंने इंतजार किया।

वह पहली बार मेरी तरफ देखी।

—मुझसे गलती हुई।

उसके लिए शायद यह कहना आसान नहीं था।

मैंने भी इसे आसान बनाने की कोशिश नहीं की।

माफी तभी पूरी लगती है जब आदमी अपनी कही बात का वजन खुद उठाए।

कुछ क्षण बाद मैंने कहा—

—अगली बार किसी के निर्णय पर फैसला देने से पहले एक सवाल पूछ लेना।

उसने सिर हिलाया।

—क्यों?

मैं मुस्कुराई।

—बस वही सवाल।

उसकी आँखें भर आईं।

उसने अचानक मुझे गले नहीं लगाया।

मैंने भी कोई फिल्मी बात नहीं की।

वह चुपचाप रसोई में गई।

करीब दस मिनट बाद वह मम्मी जी के लिए दलिया लेकर निकली।

कटोरी उसके हाथ में थोड़ी काँप रही थी।

मैंने कुछ नहीं कहा।

रात आठ बजे अरविंद छत पर मिले।

मैं कपड़े उतार रही थी।

उन्होंने पीछे से आवाज दी—

—नैना।

मैंने कपड़ा मोड़ा।

वह पास आए।

—मुझे तुमसे माफी माँगनी है।

मैंने काम जारी रखा।

—किस बात की?

—इस बात की कि मैंने पूछा नहीं।

मेरे हाथ रुक गए।

उन्होंने नीचे देखते हुए कहा—

—सुबह मैं सिर्फ यही सोच रहा था कि तुम जिद कर रही हो। रात को तुमने मुझे जगाया और मैं नहीं उठा। फिर सुबह भी मैंने तुम्हारी बात सुनने के बजाय तुम्हें समझाना शुरू कर दिया।

मैंने कुछ नहीं कहा।

हवा में कपड़े की रस्सी हल्की हिल रही थी।

उन्होंने कहा—

—अगर मोहित नहीं आता तो शायद मुझे आज भी पता नहीं चलता।

मैं उनकी तरफ मुड़ी।

—यही बात मुझे सबसे ज्यादा परेशान करती है।

उन्होंने मेरी तरफ देखा।

—क्या?

—कि मेरी बात सही साबित करने के लिए किसी तीसरे आदमी का आना जरूरी क्यों था?

उनकी आँखें कुछ पल स्थिर रहीं।

मैंने धीरे कहा—

—मैंने सुबह कहा था मम्मी जी को अकेला नहीं छोड़ सकती। वह पर्याप्त होना चाहिए था।

उन्होंने कोई सफाई नहीं दी।

अच्छा लगा।

उन्होंने बस सिर हिलाया।

—हाँ।

इतना ही।

फिर उन्होंने मेरे हाथ से आधे कपड़े ले लिए और बिना कुछ बोले मोड़ने लगे।

उस रात मम्मी जी के कमरे में एक अतिरिक्त गद्दा लगाया गया।

इस बार पूजा ने खुद कहा—

—भाभी, आप सो जाओ। पहले दो घंटे मैं बैठती हूँ।

मैंने उसे देखा।

—दवा एक बजे है।

—मैं लगा लूँगी समय।

वह सच में बैठी।

रात बारह बजकर पचपन मिनट पर मैं पानी पीने उठी तो देखा पूजा मम्मी जी के सिरहाने बैठी थी। फोन उसके हाथ में था, लेकिन स्क्रीन बंद थी।

वह केवल माँ को देख रही थी।

मैं वापस कमरे की तरफ मुड़ी।

पीछे से उसकी आवाज आई—

—भाभी।

मैंने पलटकर देखा।

उसने बहुत धीरे कहा—

—आपके भाई की राखी अच्छी है।

मैं मुस्कुराई।

—मैंने चुनी थी।

वह भी मुस्कुरा दी।

अगली सुबह बुखार थोड़ा कम था।

मम्मी जी ने पहली बार पूरी कटोरी खिचड़ी खाई।

नाश्ते के बाद उन्होंने सबको बैठक में बुलाया।

मैंने सोचा दवा के बारे में कुछ कहेंगी।

लेकिन उन्होंने अलमारी से मेरी राखी की खाली थाली उठाई।

उसे मेरे सामने रख दिया।

फिर पूजा की तरफ देखा।

—कल मैंने एक बात सीखी।

मैं तुरंत बोली—

—मम्मी जी, रहने दीजिए।

उन्होंने मेरी बात अनसुनी कर दी।

लेकिन उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया।

उन्होंने सिर्फ अरविंद से कहा—

—अगले साल राखी से एक दिन पहले नैना को खुद उसके मायके छोड़कर आना।

फिर पूजा से—

—और तू मेरे पास रहेगी।

पूजा ने तुरंत कहा—

—ठीक है।

मम्मी जी ने मेरी तरफ देखा।

—इस बार बहू ने दोनों घर संभाल लिए। अगली बार दोनों घर मिलकर इसे त्योहार मनाने देंगे।

मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था।

मैंने थाली उठा ली।

उसमें थोड़े सूखे चावल अब भी चिपके हुए थे।

एक दिन पहले यही खाली थाली देखकर सबको लगा था मैंने एक रिश्ता छोड़ दिया है।

अब उसी थाली के पास मोहित की भेजी तस्वीर पड़ी थी।

उसकी कलाई पर लाल-सुनहरी राखी थी।

पीछे सफेद उपचार केंद्र की दीवार दिखाई दे रही थी।

तस्वीर में मैं नहीं थी।

सिर्फ मेरा हाथ था।

उस सुबह मुझे पहली बार लगा, शायद हर रिश्ते को निभाने के लिए हर बार तस्वीर में दिखाई देना जरूरी नहीं होता।

कुछ महीने बाद जब मम्मी जी पूरी तरह ठीक हो गईं, पूजा फिर कानपुर लौट गई।

जाने से पहले उसने मेरे कमरे में एक छोटा पैकेट रखा।

मैंने खोलकर देखा।

अंदर दो राखियाँ थीं।

साथ में एक छोटी पर्ची।

उसने सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—

“अगले साल एक मोहित भैया के लिए, और एक उस बहन के लिए जिसने मुझे रिश्तों का मतलब बिना भाषण दिए समझा दिया।”

मैं उस पर्ची को लेकर बाहर आई।

पूजा कार में बैठ चुकी थी।

मैंने दूर से उसे दिखाया।

उसने कान पकड़कर मुस्कुराते हुए सिर झुका दिया।

मैं हँस पड़ी।

मम्मी जी बरामदे की कुर्सी पर बैठी थीं।

उन्होंने पूछा—

—क्या लिखा है?

मैंने पर्ची मोड़कर अपनी मुट्ठी में रख ली।

—कुछ नहीं।

वह तुरंत बोलीं—

—अब फिर कुछ छिपा रही है?

इस बार पूरा घर हँस पड़ा।

और शायद उसी दिन हमारे घर में राखी का त्योहार सचमुच पूरा हुआ—एक दिन देर से, बिना बड़ी पूजा, बिना तस्वीरों और बिना किसी को यह साबित किए कि किसने किसके लिए कितना किया।

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