कौशल्या का हाथ फोन की स्क्रीन पर पूरी तरह स्थिर था।
हॉल में खड़े 12 मेहमान सांस साधे देख रहे थे।
कंचन सिंघानिया ने हाथ में वाइन का ग्लास उठाया और एक तीखी हंसी हंसी।
“क्या हुआ कौशल्या जी? अब क्या भोपाल पुलिस को फोन करके कहेंगी कि समधन ने खाना नहीं खाने दिया?”
विजय सिंघानिया ने अपनी टाई ढीली की और धीमी आवाज़ में कहा, “कंचन, बात को यहीं खत्म करो।”
“क्यों खत्म करूं?” कंचन की आवाज़ और तेज़ हो गई।
“इस औरत को समझ आना चाहिए कि जब 41 करोड़ रुपये का वारिस मेरा दामाद बन चुका है, तो इस अनपढ़ दर्ज़न की हमारे बीच कोई जगह नहीं है।”
निखिल ने फिर से अपनी नज़रें झुका लीं।
उसने मां की तरफ देखा तक नहीं।
कौशल्या ने फोन का स्क्रीन अनलॉक किया।
उसने सीधे एक नंबर पर केवल एक टेक्स्ट मैसेज भेजा: “कमरे में आ जाइए।”
कंचन ने तिरस्कार से देखा।
“किसको बुला रही हो? अपनी उस बस्ती के मोहल्ले वालों को?”
कौशल्या ने पहली बार कंचन की आंखों में सीधे देखा।
उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था।
“तुम्हारी इस झूठी शान की नींव हिलाने वालों को।”
विला के भारी सागौन के दरवाज़े पर अचानक 2 बार दस्तक हुई।
नौकर ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, 3 लोग हॉल में दाखिल हुए।
सबसे आगे भोपाल हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट आलोक बाजपेयी थे।
उनके साथ एक लेडी लीगल ऑफिसर और शहर के जाने-माने फॉरेंसिक सीए विकास मेहता थे।
विकास मेहता के हाथ में 2 बड़े काले लेदर फोल्डर थे।
विजय सिंघानिया अपनी कुर्सी से झटके से खड़ा हो गया।
“मिस्टर बाजपेयी? आप यहां बिना इजाज़त कैसे घुस आए? यह मेरी प्राइवेट प्रॉपर्टी है!”
एडवोकेट बाजपेयी ने अपनी जेब से कोर्ट का नोटिस निकाला और मेज़ पर रख दिया।
“मिस्टर सिंघानिया, जब धोखाधड़ी, जाली दस्तावेज़ और 8 करोड़ की हेराफेरी का मामला हो, तो कोई भी जगह प्राइवेट नहीं रहती।”
कंचन का चेहरा तमतमा गया।
“कैसी धोखाधड़ी? किस हेराफेरी की बात कर रहे हैं आप?”
कौशल्या ने अपना फोन उठाया।
उसने फोन का स्पीकर ऑन किया और मेज़ के ठीक बीच में रख दिया।
एक ऑडियो फाइल प्ले हुई।
पूरे हॉल में कंचन सिंघानिया की साफ आवाज़ गूंज उठी:
“अगर वह बुढ़िया कागज़ों पर साइन नहीं करती, तो मोहल्ले के 3-4 गवाहों को 50-50 हज़ार देकर लिखवा लेंगे कि वह पागल है। दिन-रात मशीन चलाती है, दिमाग खराब हो चुका है। कोर्ट 2 मिनट में बच्चे की कस्टडी से उसे बाहर कर देगा।”
फिर रिकॉर्डिंग में विजय सिंघानिया की आवाज़ आई:
“और निखिल? अगर उसने सवाल उठाया तो?”
कंचन की आवाज़ में ज़हरीला घमंड था:
“निखिल हमारी इस हवेली, हमारी गाड़ियों और तान्या के सामने भीगी बिल्ली है। 41 करोड़ उसके बाप के हैं, लेकिन अक्ल उसमें 2 कौड़ी की नहीं है। जो हम कहेंगे, वही करेगा।”
ऑडियो बंद हो गया।
कमरे में ऐसा सन्नाटा पसर गया कि दीवार पर टिकी घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े जैसी लग रही थी।
तान्या ने अपनी मां की तरफ देखा।
उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
“मॉम… यह क्या है? आपने सच में यह सब प्लान किया था?”
कंचन हकलाने लगी।
“तान्या… यह सब एडिटेड है! यह औरत हमें फंसा रही है!”
“एडिटेड?” एडवोकेट बाजपेयी मुस्कुराए।
उन्होंने सीए विकास मेहता को इशारा किया।
विकास मेहता ने पहला काला फोल्डर खोला और पन्नों को निखिल के सामने फैला दिया।
“मिस्टर निखिल, आपके पिता हरीश जी के बैंक खाते से पिछले 90 दिनों में कुल 8 करोड़ रुपये ट्रांसफर हुए।”
“पहला ट्रांसफर: 3 करोड़ 50 लाख रुपये, ‘सिंघानिया हाइट्स’ प्रोजेक्ट के नाम पर।”
“सच्चाई यह है कि यह प्रोजेक्ट पिछले 2 साल से दिवालिया घोषित है और इस पर 12 करोड़ का बैंक लोन डिफॉल्ट चल रहा है।”
“दूसरा ट्रांसफर: 2 करोड़ 90 लाख रुपये, ‘केएस लॉजिस्टिक्स’ को।”
“यह कंपनी कागज़ों पर विजय सिंघानिया के भाई की है, जो 18 महीने पहले बंद हो चुकी थी। उस पैसे से विजय जी की निजी देनदारियां चुकाई गईं।”
“और तीसरा ट्रांसफर: 1 करोड़ 60 लाख रुपये, कंचन सिंघानिया के चैरिटेबल ट्रस्ट को, जहां से 24 घंटे के अंदर 1 करोड़ 20 लाख रुपये कंचन जी के पर्सनल फिक्स्ड डिपॉजिट में ट्रांसफर कर दिए गए।”
निखिल के सामने रखे कागज़ात पर बैंक के आधिकारिक मुहर और ट्रांजैक्शन आईडी साफ चमक रहे थे।
निखिल की सांसें तेज़ हो गईं।
उसने अपने ससुर विजय सिंघानिया की तरफ देखा।
“पापा… यह क्या है? आपने मुझसे कहा था कि यह पैसा नए प्रोजेक्ट में 24 परसेंट के मुनाफे पर इन्वेस्ट हो रहा है!”
विजय सिंघानिया ने पानी का घूंट भरा और नज़रें फेर लीं।
“बिजनेस में रोलिंग होती है निखिल। परिवार में इतना हिसाब नहीं देखा जाता।”
“परिवार?” निखिल की आवाज़ पहली बार फट पड़ी।
“मेरे 8 करोड़ रुपये आपने अपनी पुरानी उधारी चुकाने में लगा दिए और आप इसे परिवार कह रहे हैं?”
कंचन चिल्लाई, “निखिल, अपनी ज़बान संभालो! भूल गए कि तुम हमारे घर में किस हैसियत से आए थे?”
तभी कौशल्या अपनी जगह से उठी।
उसने अपने झोले से एक मुड़ा-तुड़ा, पीला पड़ चुका लिफाफा निकाला।
उसने वह लिफाफा सीधे निखिल के सामने फेंक दिया।
“यह तुम्हारे पिता की वो आखिरी चिट्ठी है, जिसे तुमने 4 महीने तक मुझसे छिपाकर रखा।”
निखिल के हाथ कांपने लगे।
उसने कांपती उंगलियों से उस लिफाफे को छुआ।
कौशल्या की आवाज़ में न गुस्सा था, न आंसू।
सिर्फ एक पत्थर जैसी कठोर सच्चाई थी।
“तुम्हारे पिता ने चिट्ठी में लिखा था कि जब इंसान के पास अचानक बहुत सारा पैसा आता है, तो वह सबसे पहले उस ज़मीन को भूलता है जिस पर वह खड़ा था।”
“उसने तुमसे भीख मांगी थी कि अपनी मां को बेसहारा मत छोड़ना।”
“लेकिन तुमने क्या किया निखिल?”
हॉल में बैठे 12 मेहमानों में से कई ने शर्म से अपनी गर्दन झुका ली।
कौशल्या एक-एक कदम आगे बढ़ी।
“जब शादी में मुझे सबसे पीछे की लाइन में बैठाया गया, तुम चुप रहे।”
“जब मुझे अपने पोते को छूने के लिए अप्वाइंटमेंट लेना पड़ा, तुम चुप रहे।”
“जब मेरे हाथ का बुना स्वेटर कचरे में फेंक दिया गया, तुम चुप रहे।”
“जब इन्होंने मुझे मानसिक रूप से पागल साबित करने के कागज़ तुम्हारे हाथ में दिए, तब भी तुम चुप रहे।”
कौशल्या ने उस थूक से भरी थाली की तरफ इशारा किया।
“और आज, जब 12 लोगों के सामने तुम्हारी इस सास ने मेरे सम्मान पर थूका, तब तुमने मुझसे कहा कि मां तमाशा मत करना?”
निखिल की आंखों से आंसू छलक पड़े।
वह कुर्सी से उठकर घुटनों के बल फर्श पर गिर पड़ा।
“मां… मुझे माफ कर दो मां… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई… मैं इनके दिखावे में अंधा हो गया था…”
कौशल्या 2 कदम पीछे हट गई।
उसने निखिल को अपने पैर छूने नहीं दिए।
“गलती वो होती है निखिल जो अनजाने में हो।”
“तुमने अपनी मां के आत्मसम्मान की बोली लगाई ताकि तुम इस हवेली के सोफे पर टिके रह सको।”
“तुमने अपनी मां को इसलिए खोने दिया क्योंकि तुम इन दौलतमंदों की नज़रों में छोटा नहीं दिखना चाहते थे।”
तान्या आगे आई।
उसकी आंखों में गहरा पछतावा था।
“मां जी… मुझे इस साज़िश का सच में नहीं पता था… लेकिन मैं अपनी मां की इस हरकत के लिए आपसे हाथ जोड़कर माफी मांगती हूं।”
तान्या ने मुड़कर कंचन को देखा।
“मॉम, आज मुझे आपके ऊपर शर्म आ रही है।”
“जिस औरत ने अकेले अपने दम पर अपने बेटे को इस मुकाम तक पहुंचाया, आपने उनके साथ यह किया?”
कंचन का घमंड अब टूटकर बिखर रहा था।
एडवोकेट बाजपेयी ने विजय सिंघानिया के सामने दूसरा नोटिस रखा।
“धारा 420, 406, 467 और 468 के तहत हमने आर्थिक अपराध शाखा में औपचारिक शिकायत दर्ज करा दी है।”
“कोर्ट ने आपके सभी बैंक खातों और प्रोजेक्ट्स के एसेट्स को अटैच करने का अंतरिम आदेश जारी कर दिया है।”
“अगर 48 घंटे के अंदर वह 8 करोड़ रुपये रिकवर नहीं हुए, तो विजय जी और कंचन जी, दोनों की गिरफ्तारी तय है।”
विजय सिंघानिया का पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था।
वह सोफे पर ढह गया।
12 मेहमान चुपचाप एक-एक करके उठकर बिना कुछ कहे बाहर निकल गए।
हॉल में सिर्फ टूटा हुआ कांच, खुली हुई फाइलें और बिखर चुके रिश्ते बचे थे।
कौशल्या ने अपना सादा सूती थैला कंधे पर डाला।
वह दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगी।
निखिल रोते हुए उसके पीछे भागा।
“मां! मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ! मैं यह शहर, यह सब कुछ छोड़कर तुम्हारे साथ भोपाल चलूंगा!”
कौशल्या दरवाज़े की चौखट पर रुकी।
उसने मुड़कर देखा।
“निखिल, भोपाल की उस कोठरी में एक सिलाई करने वाली औरत रहती है जो अपनी मेहनत की रोटी खाती है।”
“उसके पास 41 करोड़ का कोई वारिस नहीं है।”
“जिस दिन तुम्हें यह समझ आ जाए कि किसी की औकात उसकी दौलत से नहीं, उसके चरित्र से होती है, उस दिन शायद तुम इंसान बन पाओगे।”
“लेकिन आज, तुम सिर्फ एक कायर बेटे हो।”
कौशल्या बिना पीछे मुड़े विला की सीढ़ियों से नीचे उतर गई।
अगले 6 महीनों में बहुत कुछ बदल गया।
विजय सिंघानिया की संपत्तियां नीलाम होने की कगार पर आ गईं।
कानूनी मुकदमों और बाज़ार के दबाव में आकर उन्हें अपनी 2 बड़ी ज़मीनें बेचकर निखिल के 8 करोड़ रुपये चुकाने पड़े।
कंचन सिंघानिया का एनजीओ बंद हो गया और सोसाइटी में उनका रसूख मिट्टी में मिल गया।
तान्या ने अपने माता-पिता के घर से दूरी बना ली।
उसने निखिल से साफ कह दिया कि जब तक वह अपनी मां से किए गए गुनाहों का प्रायश्चित नहीं करता, वह उसे कभी दिल से स्वीकार नहीं करेगी।
निखिल ने अपनी ऊंची लाइफस्टाइल छोड़ दी।
उसने अपने पिता की विरासत के बाकी 33 करोड़ रुपये एक इंडिपेंडेंट ट्रस्ट में डाल दिए, जिसका संचालन एक स्वतंत्र बोर्ड को सौंप दिया गया।
उसने भोपाल में एक छोटा सा फ्लैट किराए पर लिया और एक साधारण कंसल्टेंसी फर्म में नौकरी शुरू कर दी।
हर रविवार सुबह वह भोपाल के पुराने बाज़ार में उसी तंग गली के बाहर खड़ा रहता था।
दुकान के बाहर से वह खिड़की के अंदर देखता।
अंदर कौशल्या देवी उसी पुरानी सिलाई मशीन पर बैठी कपड़े सिल रही होती थीं।
निखिल चुपचाप 1 घंटे तक बाहर खड़ा रहता।
वह कभी अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था।
वह सिर्फ देखता कि उसकी मां के चेहरे पर किसी हार का साया नहीं था।
एक दिन, रविवार को, तान्या 2 साल के रेयांश को लेकर उस दुकान पर पहुंची।
दरवाज़ा खुला था।
रेयांश दौड़कर अंदर गया और कौशल्या के घुटनों से लिपट गया।
“दादी!”
कौशल्या के हाथ मशीन से रुक गए।
उसने बच्चे को उठाया और अपनी गोदी में बैठा लिया।
उसकी आंखों से पहली बार 2 बूंद आंसू गिरे और बच्चे के गाल पर फिसल गए।
दुकान के बाहर सड़क पर खड़ा निखिल यह सब देख रहा था।
कौशल्या ने खिड़की से बाहर देखा।
मां और बेटे की नज़रें 2 सेकंड के लिए मिलीं।
कौशल्या ने खिड़की का पर्दा नहीं गिराया।
उसने दरवाज़ा बंद भी नहीं किया।
लेकिन उसने उसे अंदर भी नहीं बुलाया।
उसने निखिल को यह सिखा दिया था कि टूटे हुए विश्वास को वापस पाने में सिर्फ एक माफी काफी नहीं होती।
उसके लिए पूरी ज़िंदगी अपनी अकड़ और अहंकार को मिटाना पड़ता है।
और उस दिन भोपाल की उस छोटी सी दुकान में सिलाई मशीन की आवाज़ के बीच कौशल्या की वह बात गूंज रही थी:
किसी को माफ करना आसान हो सकता है, लेकिन अपने आत्मसम्मान का सौदा करके कभी कोई रिश्ता नहीं बचाया जा सकता।
