PART 2
सबसे पहले बड़ी मौसी आईं। उनके पीछे उनके पति, मामा के चचेरे भाई रघुवीर और मोहल्ले के सेवानिवृत्त शिक्षक वर्मा जी थे।
पूनम भाभी को भी बुलाया गया था, क्योंकि वह मामी की चीख सुनकर सबसे पहले नीचे पहुँची थीं।
मैं दरवाज़े के पास रखी लकड़ी की कुर्सी पर बैठा था। किसी ने मुझे पानी तक नहीं पूछा। मेज के दूसरी ओर मामी बैठी थीं। उन्होंने कपड़े बदल लिए थे। उनके दाएँ हाथ पर सफेद पट्टी बँधी थी।
सुबह वहाँ कोई निशान नहीं था।
मामा कमरे में आते-जाते रहे। एक बार उनकी नजर मुझ पर पड़ी, मगर वह तुरंत दूसरी ओर देखने लगे।
महेश ने भूरी फाइल खोली और कहा—
—पहले दीदी पूरी बात बताएँगी। कोई बीच में नहीं बोलेगा।
मामी ने सिर पर पल्लू रखा। उन्होंने बोलने से पहले 2 बार होंठ दबाए, जैसे शब्द निकालना कठिन हो रहा हो।
फिर उन्होंने कहा—
—मैं नहा रही थी। दीपक बिना बुलाए अंदर आ गया। मैंने बाहर जाने को कहा तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। मैं चिल्लाई, तब यह पीछे हटा।
मेरी उँगलियाँ मुट्ठी में दब गईं।
उन्होंने सुबह कहा था कि मैंने उन्हें गलत नजर से देखा। अब हाथ पकड़ने की बात जुड़ गई थी।
मौसी ने पूछा—
—दरवाज़े की कुंडी खुली क्यों थी?
मामी ने तुरंत जवाब दिया—
—मैंने तौलिया लेने के लिए खोली थी।
मैंने सिर उठाया।
उन्होंने मुझे बाल्टी उठाने के लिए बुलाया था। पूनम भाभी के सामने भी यही बात कही थी। अब तौलिया आ गया था।
महेश ने मामी की तरफ देखा। बस आधे पल के लिए। फिर उसने कुर्सी आगे खिसकाई।
उसने कठोर आवाज में कहा—
—ऐसे समय में छोटी बात भूल सकती हैं। असली बात यह है कि दीपक अंदर गया था।
मैंने कहा—
—मैं चौखट के बाहर था।
महेश हँस पड़ा।
उसने फाइल से एक कागज निकालकर मेरी तरफ बढ़ाया।
—यही लिखकर पुलिस को दे देना। देखते हैं कौन मानता है।
मैंने कागज हाथ में नहीं लिया।
ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था कि मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूँ, भविष्य में इस परिवार की संपत्ति पर कोई दावा नहीं करूँगा और उसी रात घर छोड़ दूँगा।
नीचे मेरा नाम पहले से लिखा था। केवल हस्ताक्षर की जगह खाली थी।
कागज के कोने में तारीख छपी थी—पिछले बुधवार की।
आज शुक्रवार था।
मैंने पूछा—
—यह कागज 2 दिन पहले कैसे बना?
महेश का हाथ फाइल पर ठहर गया।
उसने पन्ना पलटते हुए कहा—
—वकील के पास ऐसे नमूने रहते हैं। तारीख गलती से रह गई होगी।
वर्मा जी ने अपना चश्मा ठीक किया।
उन्होंने कागज माँगा। महेश ने नहीं दिया।
मामा ने आगे बढ़कर फाइल से पन्ना निकाल लिया। उन्होंने तारीख देखी। उनकी भौंहों के बीच की रेखा गहरी हो गई।
मामी ने धीमे स्वर में कहा—
—भैया ने पहले से मकान के कागज बनवाए थे। इसका आज की घटना से कोई संबंध नहीं है।
मैंने पूछा—
—मकान के कागज क्यों?
इस बार मामा ने मेरी तरफ देखा।
उन्हें भी उत्तर चाहिए था।
महेश ने दूसरा पन्ना निकाला। वह नीचे वाली दुकान मामी के नाम करने का मसौदा था। उस पर मामा का पूरा नाम, मकान की संख्या और दुकान का क्षेत्रफल दर्ज था।
मामा ने कागज पढ़कर पूछा—
—तुम्हें मेरे मकान की नाप किसने बताई?
मामी ने पल्लू के नीचे से महेश को देखा।
महेश ने जवाब दिया—
—नगर निगम के अभिलेख में सब रहता है।
रघुवीर ने मेज पर उँगली रखी।
उन्होंने कहा—
—नगर निगम के अभिलेख में पीछे बने नए कमरे का क्षेत्रफल नहीं है। वह इसमें कैसे लिखा है?
कमरे में बैठे लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
पीछे वाला कमरा 8 महीने पहले बना था। उसकी नाप केवल घर के नक्शे और मामा की नीली डायरी में लिखी थी। वह डायरी उनकी अलमारी में रहती थी।
मामा उठे और अपने कमरे में चले गए।
कुछ देर बाद वह खाली हाथ लौटे।
उन्होंने मामी से पूछा—
—मेरी नीली डायरी कहाँ है?
मामी ने निगाहें झुका लीं।
महेश अचानक ऊँची आवाज में बोला—
—यहाँ एक औरत की इज्जत की बात हो रही है और आप लोग मकान नाप रहे हैं!
मामा उसके पास आकर रुक गए।
उन्होंने कहा—
—इज्जत की बात के साथ तैयार कागज क्यों रखा है, यह भी जानना पड़ेगा।
महेश कुर्सी से उठ गया।
उसने मुझे देखकर कहा—
—सारी चाल इसकी है। यह परिवार को आपस में लड़ाना चाहता है।
मैं भी खड़ा हो गया।
मेरी हथेली में कैमरे की छोटी पट्टी अब तक बंद थी। उसके किनारे ने त्वचा पर गहरी रेखा बना दी थी।
मैंने कहा—
—मैं एक बात दिखाना चाहता हूँ।
मामी ने अपनी कुर्सी कसकर पकड़ ली।
महेश मेरी ओर बढ़ा।
उसने कहा—
—इसके पास कुछ नहीं है। सुबह से फोन लेकर घूम रहा होगा। आजकल आवाज और तस्वीर बदलने में कितना समय लगता है?
मैंने हाथ खोला।
काली पट्टी मेरी हथेली पर पड़ी थी।
पूनम भाभी ने उसे पहचान लिया।
उन्होंने ऊपर देखकर पूछा—
—यह उस कैमरे की पट्टी है?
मैंने सिर हिला दिया।
मामी ने जल्दी से कहा—
—वह कैमरा 3 महीने से बंद है।
मैंने उनकी ओर देखा।
—आपको कैसे पता?
वह चुप हो गईं।
मामा ने बताया कि कैमरा नानी की देखभाल के लिए लगाया गया था। नानी गाँव चली गईं तो मोबाइल पर उसका चित्र देखना बंद कर दिया गया। किसी ने उसे उतारा नहीं था।
महेश ने पट्टी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया। मैंने उसे पीछे कर लिया।
मैंने कहा—
—इसे सबके सामने देखा जाएगा।
वर्मा जी ने पूछा—
—देखोगे कैसे?
मैंने बताया कि गली के कोने पर इमरान की बिजली के सामान की दुकान में इस आकार की पट्टी चलाने वाला यंत्र था। इमरान ने ही वह कैमरा लगाया था।
महेश ने तुरंत विरोध किया—
—अब बाहर का आदमी परिवार की बात देखेगा?
मैंने कहा—
—आप 2 पड़ोसियों को पहले ही बुला चुके हैं। अब आपको परिवार की चिंता क्यों हो रही है?
उसका चेहरा तन गया।
मामा ने अपने कर्मचारी राजू को इमरान की दुकान पर भेजा। दुकान बंद हो चुकी थी। राजू ने उसे घर से बुलाया।
हमें 25 मिनट इंतजार करना पड़ा।
वे 25 मिनट मेरे लिए पूरे दिन से लंबे थे।
मामी बीच-बीच में रोती रहीं। मौसी उनके कंधे पर हाथ रखतीं, फिर भूरी फाइल की ओर देखने लगतीं। मामा खिड़की के पास खड़े रहे।
बाहर गली में 14 या 15 लोग जमा हो चुके थे। खबर फैल गई थी कि मामा के भांजे ने घर में गलत हरकत की है।
कुछ लोग मुझे दरवाज़े से देख रहे थे।
मुझे माँ का चेहरा याद आया।
वह हमेशा कहती थीं कि मामा का घर अपना समझना, मगर किसी चीज पर अधिकार मत जताना। मैंने 6 साल तक उनके शब्द पकड़े रखे। कार्यशाला में बिना मजदूरी माँगे हिसाब किया। दुकान के पुराने कर्ज की सूची बनाई। मामा के बीमार पड़ने पर 19 दिन सुबह सबसे पहले ताला खोला।
अब उसी घर से बाहर जाने के लिए मेरे सामने पहले से तैयार कागज पड़ा था।
एक पल को लगा, मुझे पट्टी फेंककर चले जाना चाहिए। यदि उसमें कुछ दर्ज न हुआ तो मेरे पास लौटने के लिए कोई जगह नहीं थी।
तभी मामी ने अपने दाएँ हाथ की पट्टी ठीक करने के लिए बायाँ हाथ उठाया। उनके पल्लू के कोने में नीले रंग का महीन धागा अटका था।
मेरी नजर नहाने की जगह के कुंडे पर अटके धागे की ओर चली गई।
सुबह वह वहीं था।
अब उसी रंग का धागा उनके पल्लू में था।
मेरे भीतर दौड़ रही घबराहट अचानक रुक गई। जैसे कोई बिखरा हुआ वाक्य अपना अंतिम शब्द पा गया हो।
इमरान 7 बजकर 18 मिनट पर आया। उसके हाथ में छोटा यंत्र और तारों का थैला था।
उसने पट्टी लेकर पहले उसे रोशनी के सामने देखा।
फिर बोला—
—इसमें कुछ दर्ज है। कितना है, जोड़ने पर पता चलेगा।
मामी उठ खड़ी हुईं।
उन्होंने मामा से कहा—
—मुझे तमाशा नहीं बनना। आपको मुझ पर भरोसा है तो इसे रोकिए।
मामा ने पहली बार सीधे उनकी आँखों में देखा।
उन्होंने कहा—
—भरोसा था, इसलिए दीपक को घर छोड़ने को कह दिया। अब यह देखना जरूरी है कि मैंने ठीक किया या नहीं।
इमरान ने यंत्र को बैठक के टीवी से जोड़ा। काली स्क्रीन पर कई खाने दिखाई दिए। तारीख आज की थी। पहला समय सुबह 9 बजकर 12 मिनट था।
मामी ने फिर कहा—
—यह सब बनाया हुआ हो सकता है।
इमरान ने उनकी ओर देखे बिना कहा—
—पट्टी कैमरे से निकलने के बाद मेरे हाथ में आई है। बीच में कोई नई चीज जोड़ने का समय नहीं मिला।
महेश ने व्यंग्य किया—
—तुम बड़े जानकार हो गए?
इमरान ने तार ठीक किया।
—कैमरा मैंने लगाया था। इतना जानता हूँ।
पहली तस्वीर खुली।
कैमरे का कोण बैठक से नहाने की जगह तक जाने वाला पूरा गलियारा दिखा रहा था। अंदर का हिस्सा दिखाई नहीं देता था। केवल दरवाज़ा और उसके बाहर का फर्श दिख रहा था।
समय सुबह 10 बजकर 31 मिनट।
मामी रसोई से निकलीं। उन्होंने गलियारे में खड़े होकर कैमरे की तरफ देखा। फिर एक स्टूल लाकर उसके नीचे रखा।
महेश ने तुरंत कहा—
—बस, कैमरा बंद करने गई होंगी। घर की औरत को संकोच होता है।
चित्र में मामी स्टूल पर चढ़ीं। उन्होंने कैमरे के सामने उँगली घुमाई। फिर नीचे उतरकर अपने मोबाइल पर किसी को फोन लगाया।
कैमरे में आवाज भी दर्ज हो रही थी।
मामी की आवाज बैठक में गूँजी—
—लाल रोशनी नहीं दिख रही। लगता है बंद है।
फोन से महेश की आवाज आई—
—ठीक है। वह कितने बजे लौटेगा?
कमरे में बैठे सभी लोग स्थिर हो गए।
चित्र में मामी ने कहा—
—उसकी छुट्टी है। बोला था 11 बजे तक आएगा।
महेश की आवाज आई—
—कागज तैयार हैं। बस उसे इतना डरा देना कि बिना पढ़े हस्ताक्षर कर दे।
मामा का हाथ खिड़की की चौखट पर जम गया।
मामी टीवी की ओर बढ़ीं।
उन्होंने कहा—
—इसे बंद करो!
रघुवीर उनके सामने आ गए। उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। केवल टीवी और मामी के बीच खड़े हो गए।
चित्र चलता रहा।
मामी ने फोन पर पूछा—
—अगर उसने मना कर दिया तो?
महेश बोला—
—कह देना कि उसने नहाते समय तुम्हारा हाथ पकड़ा। पड़ोस वाली को आवाज देकर बुला लेना। जीजा समाज के डर से उसी समय उसे निकाल देंगे।
मामी कुछ क्षण चुप रहीं।
फिर उन्होंने कहा—
—और नीचे वाली दुकान?
महेश हँसा—
—पहले दीपक से अधिकार छोड़ने वाला कागज लिखवाओ। फिर जीजा से दुकान तुम्हारे नाम। मेरा पैसा मिलते ही मैं कागज वापस कर दूँगा।
चित्र में मामी ने फोन काट दिया।
कमरे में किसी की साँस तक सुनाई दे रही थी।
उसी क्षण वहाँ बैठे हर आदमी ने समझ लिया—मैं मामी के कमरे में नहीं गया था; मुझे बुलाकर फँसाया गया था।
मामा ने खिड़की छोड़ दी।
टीवी पर समय 10 बजकर 43 मिनट हुआ।
मामी नहाने की जगह के दरवाज़े के पास गईं। उन्होंने नीले कपड़े का एक टुकड़ा पीतल के कुंडे में दबाया और उसे जोर से खींचा। कपड़े का किनारा खुल गया। एक धागा कुंडे में रह गया।
वही नीला धागा।
उन्होंने उस कपड़े को अपने पल्लू में लगाया। फिर दाएँ हाथ पर सफेद पट्टी बाँधकर आईने में देखा। कुछ सोचकर पट्टी उतार दी और मेज की दराज में रख दी।
सुबह घटना के समय उनके हाथ पर कोई पट्टी नहीं थी। शाम को लोगों के आने से पहले उन्होंने वही पट्टी बाँध ली थी।
चित्र आगे बढ़ा।
सुबह 10 बजकर 58 मिनट पर मैं मुख्य दरवाज़े से अंदर आया। मेरे हाथ में सब्जी का छोटा थैला था। मैं सीधे अपने कमरे में गया।
मामी ने नहाने की जगह से आवाज दी—
—दीपक, जरा बाहर रखी नीली बाल्टी देना।
मैं गलियारे में आया। बाल्टी उठाई और दरवाज़े के पास रख दी।
चित्र साफ था। मेरे दोनों पैर चौखट से लगभग एक हाथ बाहर थे।
दरवाज़ा भीतर से खुला। मामी सामने आईं। मैं तुरंत चेहरा दूसरी तरफ घुमाकर पीछे हटा।
उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा—
—अभी समझौते के कागज पर हस्ताक्षर कर दे। नहीं तो मैं ऐसी आवाज लगाऊँगी कि तू इस गली में सिर उठाकर नहीं चल सकेगा।
चित्र में मैंने कहा—
—कौन से कागज?
मामी बोलीं—
—मकान से कोई अधिकार नहीं माँगेगा। लिखकर देगा।
मैंने जवाब दिया—
—मैंने कभी अधिकार माँगा ही नहीं। और इस तरह कोई कागज नहीं लिखूँगा।
मामी ने दरवाज़े को थोड़ा और खोला।
फिर बोलीं—
—इस घर में मेरी बात ही सच मानी जाएगी। तुम्हारी सफाई कोई नहीं सुनेगा।
अगले ही पल उनकी चीख दर्ज हुई।
टीवी के सामने खड़ी असली मामी ने अपना चेहरा पल्लू से ढक लिया।
रिकॉर्डिंग में पूनम भाभी सीढ़ियों से उतरती दिखाई दीं। मैं दीवार के पास खड़ा था। मामी मुझसे लगभग 5 हाथ दूर थीं।
मैंने उन्हें छुआ तक नहीं था।
इमरान ने चित्र रोक दिया।
कोई कुछ नहीं बोला।
पूनम भाभी ने धीरे से अपनी कुर्सी पीछे की। सुबह उन्होंने मामी को सहारा दिया था। अब उन्होंने दोनों हाथ अपनी गोद में रख लिए।
मामा टीवी के सामने आए। उनकी आँखें चित्र पर थीं, मगर वहाँ अब स्थिर गलियारा था।
उन्होंने पूछा—
—आगे भी कुछ है?
इमरान ने कहा—
—दोपहर की हलचल भी दर्ज है।
महेश दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगा।
रघुवीर ने केवल कुंडी लगा दी।
महेश पलटा और मामी पर बरस पड़ा—
—यह सब तुम्हारी योजना थी। मैंने तो सिर्फ कागज बनवाए थे!
मामी ने पल्लू हटा दिया।
उन्होंने कहा—
—मेरा पैसा तुमने लिया था। तुमने कहा था दुकान मेरे नाम करा दो, वरना ₹8 लाख के लिए मुझे सबके सामने खड़ा कर दोगे।
महेश ने उँगली उठाई—
—मैंने तुम्हें दीपक पर ऐसा आरोप लगाने को नहीं कहा था।
इमरान ने अगली दर्ज आवाज चला दी।
दोपहर 12 बजकर 26 मिनट पर गलियारे में मामी अकेली खड़ी थीं। वह महेश से फोन पर बात कर रही थीं।
महेश की आवाज साफ थी—
—शाम तक रोती रहना। हाथ पर पट्टी बाँध लेना। जीजा नरम पड़ें तो कहना कि दीपक पहले भी घूरता था। बात जितनी गंदी होगी, लोग उतनी जल्दी मानेंगे।
मामी ने पूछा था—
—अगर कैमरा चल गया तो?
महेश ने उत्तर दिया था—
—उसकी बिजली मैंने पिछली बार निकाल दी थी। चिंता मत करो।
इमरान ने टीवी बंद कर दिया।
महेश अब कुछ नहीं बोला।
उसने 2 महीने पहले घर की तारें ठीक करने के बहाने कैमरे का जोड़ निकाला था। उसे नहीं मालूम था कि कैमरे में 6 घंटे चलने वाली छोटी बैटरी थी। सुबह बिजली आने पर उसकी बैटरी अपने आप भर गई थी। लाल रोशनी बहुत हल्की थी, इसलिए मामी ने उसे नहीं देखा।
मामा ने मेज से भूरी फाइल उठाई। उसमें नीचे वाली दुकान के मसौदे के अलावा मेरे नाम से तैयार झूठी स्वीकारोक्ति, मकान का नक्शा और उनकी नीली डायरी के 3 फटे पन्ने थे।
उन्होंने वे पन्ने एक-एक करके मेज पर रखे।
फिर मामी से पूछा—
—तुमने मेरी अलमारी खोली थी?
मामी ने कोई जवाब नहीं दिया।
मामा ने महेश की तरफ देखा।
—तुम्हें ₹8 लाख किस बात के चाहिए?
महेश ने कहा—
—दीदी ने अपने लिए उधार लिया था।
मामी ने तुरंत सिर उठाया।
—झूठ! तुम्हारी कपड़े की दुकान का घाटा भरने के लिए लिया था। तुमने कहा था 4 महीने में लौटा दोगे।
महेश ने कहा—
—तो मेरे नाम दुकान करने को क्यों तैयार हुई थीं?
मामी की आवाज अटक गई।
मेज पर पड़े कागजों ने बाकी उत्तर दे दिया था।
मामी ने घर बचाने के लिए मुझे फँसाने का दावा किया था। वास्तव में वह मामा की दुकान अपने भाई को देकर अपने छिपाए हुए उधार को दबाना चाहती थीं।
उन दोनों ने एक-दूसरे को बचाने के लिए योजना बनाई थी।
रिकॉर्डिंग चलते ही दोनों ने एक-दूसरे का नाम लेकर उसे पूरा खोल दिया।
बाहर खड़े लोगों में फुसफुसाहट शुरू हुई। वर्मा जी दरवाज़े तक गए और उसे पूरा खोल दिया।
उन्होंने गली में खड़े लोगों से कहा—
—जिन्होंने आरोप सुना है, वे सच भी सुन लें। लड़का निर्दोष है। उसे बुलाकर फँसाया गया था।
मामी कुर्सी पर बैठ गईं।
सुबह जिन औरतों ने मुझे देखकर रास्ता बदला था, वे अब बैठक के दरवाज़े पर खड़ी थीं। पूनम भाभी उनके पास गईं।
उन्होंने कहा—
—मैं चीख सुनकर पहुँची थी। मैंने घटना नहीं देखी थी। मैंने जो आगे कहा, वह मामी की बात मानकर कहा था।
मेरे कानों में पूरे दिन की आवाजें घूम रही थीं।
गलत नजर।
हाथ पकड़ना।
पुलिस।
घर छोड़ना।
मैं चाहता तो चिल्ला सकता था। महेश को उसी भाषा में उत्तर दे सकता था जिसमें उसने मुझे अपराधी कहा था। मगर मेरे मुँह से कोई शब्द नहीं निकला।
मैंने केवल भूरी फाइल उठाकर मामा को दे दी।
मामा ने मेरी ओर देखा।
उन्होंने कहा—
—मैंने तुझे सुने बिना घर छोड़ने को कह दिया।
मैंने उनके पैरों की तरफ देखा। सुबह खुला हुआ चप्पल का फीता अब भी ढीला था।
उन्होंने फिर कहा—
—दीपक, मेरी तरफ देख।
मैंने सिर उठाया।
मामा मेरे सामने दोनों हाथ जोड़कर खड़े थे।
कमरे में बैठे 11 लोगों के सामने।
मैंने उनके हाथ नीचे कर दिए।
मैंने कहा—
—आप मेरे मामा हैं। हाथ मत जोड़िए। लेकिन आज जो हुआ, उसे कल यह कहकर मत भूल जाइएगा कि घर की बात थी।
मामा ने धीरे से सिर हिलाया।
उन्होंने महेश से कहा—
—तुम अभी इस घर से जाओ। नीली डायरी के जो पन्ने लिए हैं, वे सब कल तक वापस पहुँचेंगे। उसके बाद मेरा तुमसे कोई लेन-देन नहीं होगा।
महेश ने मामी की तरफ देखा। शायद उसे उम्मीद थी कि वह उसे रोकेंगी।
मामी ने चेहरा फेर लिया।
वह बाहर निकला तो गली में खड़े लोग अपने आप दोनों ओर हट गए। सुबह वही रास्ता मुझे छोटा लग रहा था। अब महेश के लिए उसमें कोई जगह नहीं बची थी।
मामा ने मामी से पूछा—
—और तुम क्या कहना चाहती हो?
मामी रोते हुए उनके पैरों के पास बैठने लगीं। मामा एक कदम पीछे हट गए।
उन्होंने कहा—
—बैठक में बैठकर बोलो। यहाँ जितने लोगों के सामने दीपक पर आरोप लगाया है, उतने ही लोगों के सामने सच बोलो।
मामी कुर्सी पर वापस बैठीं।
काफी देर बाद उन्होंने मेरी तरफ देखा।
उनकी आवाज मुश्किल से निकली—
—दीपक नहाने की जगह के अंदर नहीं आया था। उसने मेरा हाथ नहीं पकड़ा। मैंने उसे बुलाया था। मैंने झूठ बोला।
बाहर खड़े लोगों तक उनकी आवाज पहुँच गई।
वर्मा जी ने अपने मोबाइल से मोहल्ले के उस समूह में संदेश भेजा जहाँ दोपहर से मेरे बारे में बातें चल रही थीं। उन्होंने लिखा कि आरोप झूठा था और घर के कैमरे से पूरी घटना साफ हो गई है।
पूनम भाभी ने उसी संदेश के नीचे लिखा कि वह इसकी प्रत्यक्ष साक्षी हैं।
हर संदेश के साथ मेरा नाम उसी गति से साफ होने लगा, जिस गति से दोपहर में खराब हुआ था।
मामा ने मामी से कहा—
—आज रात तुम ऊपर वाले कमरे में रहो। सुबह अपनी माँ के घर चली जाना। आगे की बात दोनों परिवारों और सलाहकार के सामने होगी। इस समय मैं तुम्हारे साथ अकेले कोई फैसला नहीं करूँगा।
मामी ने पूछा—
—आप मुझे घर से निकाल रहे हैं?
मामा ने जवाब दिया—
—मैं तुम्हें वही सजा नहीं दूँगा जो तुमने दीपक के लिए तैयार की थी। तुम्हारा सामान यहीं रहेगा। तुम्हें समय मिलेगा। लेकिन जब तक मैं समझ नहीं लेता कि मैं तुम्हारे साथ सुरक्षित हूँ या नहीं, तुम इस घर के कागजों और कार्यशाला के हिसाब से दूर रहोगी।
मामी की नजर नीचे वाली दुकान के दरवाज़े पर गई।
जिस दुकान के लिए उन्होंने पूरा खेल रचा था, उसकी चाबी मामा ने अपनी जेब से निकाली और रघुवीर को दे दी।
रात 10 बजे तक सभी लोग चले गए।
मैं अपने कमरे में गया। लोहे का संदूक खुला पड़ा था। सुबह मामी ने मेरे कपड़े धोने के बहाने उसकी चाबी माँगी थी। भीतर कपड़ों के नीचे रखी माँ की डाकघर वाली पुस्तिका बाहर पड़ी थी।
उसके बीच एक खाली कागज रखा था जिस पर मेरे पुराने हस्ताक्षर की नकल करने की कोशिश की गई थी।
मैं उसे लेकर मामा के पास गया।
वह बैठक में अकेले बैठे थे।
मैंने कागज मेज पर रख दिया।
उन्होंने हस्ताक्षर देखे। फिर आँखें बंद कर लीं।
मैं कुछ देर खड़ा रहा।
मामा ने पूछा—
—क्या तू अब भी यह घर छोड़ना चाहता है?
मैंने कहा—
—हाँ।
उन्होंने तुरंत मेरी तरफ देखा।
मैंने आगे कहा—
—भागकर नहीं। अपने पैरों पर रहने के लिए। आज अगर कैमरा नहीं चलता तो मैं चाहे जितना सच बोलता, इस घर में मेरी आवाज छोटी रहती। मुझे ऐसी जगह बनानी है जहाँ मेरी रोटी किसी के विश्वास पर निर्भर न हो।
मामा ने मुझे रोकने की कोशिश नहीं की।
अगली सुबह मामी का बड़ा बैग सीढ़ियों के पास रखा था। उनकी माँ और बड़ी बहन उन्हें लेने आई थीं। बाहर कोई शोर नहीं हुआ।
जाते समय मामी मेरे कमरे के सामने रुकीं।
उन्होंने कहा—
—मुझे लगा था तुम्हारे रहते यह मकान कभी मेरा नहीं होगा।
मैंने संदूक बंद करते हुए कहा—
—मैंने मकान माँगा ही नहीं था।
उन्होंने दीवार की तरफ देखा।
यही बात उनके लिए सबसे भारी थी।
जिस अधिकार को बचाने के लिए उन्होंने मुझे बदनाम किया, वह अधिकार उनसे किसी ने माँगा ही नहीं था।
मामी चली गईं।
मामा ने उसी दिन कार्यशाला और मकान के कागज बैंक की सुरक्षित पेटी में रख दिए। अलमारी का ताला बदल दिया गया। महेश के आने पर रोक लगा दी गई।
तीसरे दिन मामा मुझे एक छोटे कमरे को देखने ले गए। वह कार्यशाला से डेढ़ किलोमीटर दूर था। किराया ₹4,800 था। खिड़की से सामने पीपल का पेड़ दिखाई देता था और भीतर एक लोहे की चारपाई रखने भर की जगह थी।
मामा ने मकान मालिक को अग्रिम रकम देने के लिए जेब से पैसे निकाले।
मैंने उनका हाथ रोक दिया।
मैंने डाकघर से ₹12,000 निकाले थे।
मैंने कहा—
—पहली बार अपना कमरा ले रहा हूँ। इसकी पहली रकम भी मेरी होगी।
मामा ने पैसे वापस रख लिए।
वह कमरे की दीवार पर लगी सफेदी को देखते रहे। शायद उन्हें घर का खाली होने वाला कमरा याद आ रहा था।
मैंने शाम तक अपना संदूक वहाँ पहुँचा दिया।
मामा रोज की तरह कार्यशाला जाते रहे। मैं भी काम पर जाता था, मगर अब मेरा हिसाब अलग था। पहले मैं जो अतिरिक्त काम करता, उसका कोई लेखा नहीं बनता था। अब मामा ने मेरे लिए निश्चित वेतन तय किया।
पहले महीने उन्होंने ₹24,000 मेरे खाते में भेजे।
मैंने ₹6,000 वापस कर दिए।
उन्होंने फोन किया—
—कम क्यों रखे?
मैंने कहा—
—मेरे काम का वेतन ₹18,000 तय हुआ था।
कुछ पल बाद उन्होंने कहा—
—ठीक है। बाकी मैं तेरे नाम से बचत में डाल देता हूँ।
मैंने उत्तर दिया—
—वह भी मेरे काम के हिसाब से होगा। रिश्ते के हिसाब से नहीं।
मामा ने पहली बार हल्की हँसी के साथ कहा—
—अब तू हिसाब सिखाएगा मुझे?
मैं भी हँस दिया।
लेकिन हमने हिसाब लिखना शुरू कर दिया।
अगले 4 महीनों में कार्यशाला का पुराना बकाया कम हुआ। मैंने पास की 3 दुकानों से नया काम लिया। मामा ने मुझे किसी संपत्ति का हिस्सा नहीं दिया। उन्होंने उससे अधिक जरूरी चीज दी—मेरे काम पर मेरा नाम।
नई रसीदों पर कार्यशाला के नाम के नीचे लिखा जाने लगा—
“संचालन: श्यामलाल और दीपक।”
मामी के विषय में घर में कम बात होती थी।
दोनों परिवारों की 3 बैठकें हुईं। पहली में मामी ने महेश के उधार का हिसाब बताया। दूसरी में बैंक के लेन-देन सामने आए। तीसरी में उन्होंने लिखकर स्वीकार किया कि आरोप झूठा था और उन्होंने संपत्ति के कागज लेने के लिए दबाव बनाया था।
मामा ने उस लिखित स्वीकार को छिपाया नहीं। उसकी एक प्रति मेरे पास रखी गई।
मामी को वापस घर आने की अनुमति तुरंत नहीं मिली। उन्हें अपने नाम के गहने और निजी सामान दे दिए गए, मगर मकान, दुकान और कार्यशाला के अभिलेखों से उनका सीधा अधिकार हटा दिया गया। आगे का वैवाहिक फैसला शांतिपूर्वक करने के लिए दोनों ने अलग रहने का निर्णय लिया।
महेश ने ₹8 लाख लौटाने के लिए अपनी दुकान का माल बेचा। जिस नीचे वाली दुकान को वह बिना कीमत दिए पाना चाहता था, उसी के सामने से वह रोज गुजरता था। शटर पर अब नया ताला लगा था।
करीब 7 महीने बाद मैं अपने पुराने घर गया।
मामा ने नहाने की जगह के बाहर वाला कैमरा उतार दिया था। दीवार पर केवल 2 छोटे छेद रह गए थे। पीतल का कुंडा भी बदला जा चुका था।
मैंने ऊपर देखा तो मामा बोले—
—उसे सँभालकर रखा है।
मैंने पूछा—
—क्यों?
उन्होंने कहा—
—याद रखने के लिए कि कभी-कभी घर की दीवार नहीं, एक छोटी लाल रोशनी सच को बाहर जाने से रोकती है।
मैंने कोई उत्तर नहीं दिया।
मेज पर चाय के 2 गिलास रखे थे। मामा ने एक मेरी तरफ बढ़ाया। उनकी नीली डायरी भी वहीं थी। उसके फटे पन्ने वापस जुड़ चुके थे, मगर जोड़ की रेखाएँ साफ दिखाई देती थीं।
कुछ चीजें जुड़ने के बाद भी पहले जैसी नहीं होतीं।
फिर भी उनका इस्तेमाल बंद नहीं होता।
मैंने डायरी खोली और उस दिन का हिसाब लिखा। मामा ने नीचे हस्ताक्षर किए। इस बार मेरे हस्ताक्षर की नकल किसी खाली कागज पर नहीं थी।
वे मेरे अपने काम के नीचे थे।
