PART 2
झोपड़ी के बाहर एक साथ 3 गाड़ियों के सायरन बजने लगे।
मयंक ने खिड़की से बाहर देखा।
आगे 108 नंबर की एडवांस लाइफ सपोर्ट एम्बुलेंस खड़ी थी।
उसके ठीक पीछे हजरतगंज थाने की 2 पुलिस जीपें रुकी थीं।
मयंक का चेहरा सफेद पड़ गया।
शालिनी ने चिल्लाकर कहा, “रित्विक, यह क्या पागलपन है?”
रित्विक ने अपनी नजरें शालिनी पर टिकाईं।
उसकी आवाज में कोई घबराहट नहीं थी।
“यह पागलपन नहीं, कानून की शुरुआत है शालिनी।”
दरवाजा खुला और इंस्पेक्टर विक्रम सिंह 4 पुलिसकर्मियों के साथ अंदर दाखिल हुए।
उनके साथ 2 पैरामेडिक्स स्ट्रेचर लेकर अंदर आए।
रित्विक ने पैरामेडिक्स की तरफ इशारा किया।
“मरीज की उम्र 68 वर्ष है, सीवियर निमोनिया और रेस्पिरेटरी फेलियर के लक्षण हैं।”
“इन्हें तुरंत हाई-फ्लो नेजल कैन्युला और आईवी एंटीबायोटिक्स की जरूरत है।”
पैरामेडिक्स ने फुर्ती से दीनानाथ को स्ट्रेचर पर लिटाया।
सुमित्रा रोते हुए उनके साथ चलने लगीं।
शालिनी ने इंस्पेक्टर विक्रम का रास्ता रोका।
“इंस्पेक्टर साहब, यह हमारा घरेलू विवाद है!”
“यह आदमी मुझे धमका रहा है और बिना इजाजत मेरे ससुर को ले जा रहा है!”
मयंक ने भी रौब झाड़ा, “आप जानते नहीं हम कौन हैं, हमारे चाचा विधायक के करीबी हैं!”
इंस्पेक्टर विक्रम ने मयंक को पीछे धकेला।
“अपनी जुबान पर काबू रखो।”
रित्विक ने अपनी जेब से अपना ब्रिटिश मेडिकल काउंसिल का कार्ड और भारतीय पासपोर्ट निकाला।
उसने अपना ओरिजिनल आधार कार्ड भी दिखाया।
“इंस्पेक्टर साहब, मैं डॉक्टर रित्विक हूँ।”
“मैं पिछले 4 साल से लंदन के रॉयल हॉस्पिटल में कंसल्टेंट सर्जन हूँ।”
“यह महिला मेरी पत्नी है और यह उसका भाई है।”
रित्विक ने फोन की स्क्रीन इंस्पेक्टर के सामने की।
“यह देखिए गोमती नगर वाले बंगले की रजिस्ट्री की तारीख।”
“यह तारीख है 14 मार्च 2024।”
रित्विक ने पासपोर्ट का पन्ना खोला।
“14 मार्च 2024 को मैं लंदन में 11 घंटे की एक ओपन सर्जरी कर रहा था।”
“मेरे पासपोर्ट पर 2022 से लेकर कल तक भारत आने का कोई इमिग्रेशन स्टैम्प नहीं है।”
“तो फिर इस रजिस्ट्री पर मेरे ओरिजिनल साइन भारत के सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में कैसे हो सकते हैं?”
इंस्पेक्टर विक्रम ने पासपोर्ट और फोन की स्क्रीन को ध्यान से देखा।
तारीखें और मुहरें साफ गवाही दे रही थीं।
शालिनी के होंठ काँपने लगे।
रित्विक ने दूसरा सबूत निकाला।
वह पुराना प्लास्टिक का डिब्बा उसने इंस्पेक्टर को सौंप दिया।
“इसमें 18 स्टांप पेपर और धमकी भरे पत्र हैं, जो मयंक ने मेरे पिता से जबरन लिखवाए थे।”
“साथ ही मेरे पिता की पेंशन की पासबुक और चेकबुक भी इनके पास से बरामद होगी।”
मयंक ने धीरे से पीछे के दरवाजे से भागने की कोशिश की।
2 कांस्टेबलों ने तुरंत आगे बढ़कर मयंक को दबोच लिया।
मयंक छटपटाने लगा, “छोड़ो मुझे! मैंने कुछ नहीं किया!”
शालिनी जोर से चिल्लाई, “रित्विक, तुम पछताओगे!”
“मैं तुम पर दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का झूठा केस ठोकूँगी!”
रित्विक ने एक और ऑडियो फाइल प्ले की।
फोन के स्पीकर से शालिनी की आवाज गूँजने लगी।
यह वही रिकॉर्डिंग थी जो 10 मिनट पहले रित्विक ने झोपड़ी में आते ही ऑन की थी।
शालिनी की आवाज साफ आ रही थी: ‘यह घर, गाड़ी, बैंक बैलेंस सब अब मेरा है… मैं ऐसा केस बनाऊँगी कि जिंदगी भर जेल में सड़ेगा।’
इंस्पेक्टर विक्रम ने महिला सब-इंस्पेक्टर को इशारा किया।
“धारा 420, 467, 468, 471 और सीनियर सिटिजन एक्ट के तहत इन दोनों को तुरंत कस्टडी में लो।”
महिला पुलिसकर्मी ने शालिनी की कलाई पकड़ी और हथकड़ी लगा दी।
शालिनी का घमंड टूटकर बिखर चुका था।
वह गिड़गिड़ाने लगी, “रित्विक, एक बार मेरी बात सुनो… हम बैठ कर बात कर सकते हैं!”
रित्विक ने मुड़कर उसकी तरफ नहीं देखा।
वह तेजी से कदम बढ़ाते हुए एम्बुलेंस में बैठ गया।
एम्बुलेंस सायरन बजाते हुए सीधे किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के इमरजेंसी वार्ड पहुँची।
दीनानाथ को सीधे आईसीयू 3 में शिफ्ट किया गया।
रित्विक ने खुद स्टेथस्कोप उठाया।
ड्यूटी पर मौजूद सीनियर डॉक्टर ने रित्विक को पहचान लिया।
“डॉक्टर रित्विक? आप यहाँ?”
रित्विक ने हाथ जोड़े, “डॉक्टर वर्मा, ये मेरे बाबूजी हैं।”
डॉक्टर वर्मा ने रिपोर्ट देखी और सिर हिलाया।
“लंग्स में 70 प्रतिशत इन्फेक्शन फैल चुका है।”
“अगर 6 घंटे और देर होती, तो सेप्टिक शॉक की वजह से मल्टी-ऑर्गन फेलियर हो जाता।”
“इन्हें तुरंत 3 यूनिट फ्रेश प्लाज्मा और वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना होगा।”
रित्विक ने तुरंत फॉर्म पर दस्तखत किए।
उसने खुद एप्रन पहना और आईसीयू में पिता के मॉनिटर के पास बैठ गया।
अगले 72 घंटे रित्विक के लिए बेहद भारी थे।
वह कुर्सी से एक पल के लिए भी नहीं हटा।
उसने अपने हाथों से पिता को दवाइयाँ दीं और ऑक्सीजन का स्तर चेक किया।
सुमित्रा बाहर गलियारे में बैठकर प्रार्थना कर रही थीं।
रित्विक बीच-बीच में बाहर आकर माँ को पानी पिलाता और उनका ढांढस बंधाता।
तीसरे दिन की रात को 3 बजकर 15 मिनट पर मॉनिटर की बीप सामान्य रिदम में आ गई।
ऑक्सीजन सैचुरेशन 78 से बढ़कर 96 पर पहुँच गया।
दीनानाथ ने धीरे से अपनी पलकें खोलीं।
कमजोर आवाज में बोले, “पानी…”
रित्विक ने झुककर पिता के माथे को चूमा।
“बाबूजी, मैं आ गया हूँ। अब सब ठीक है।”
दीनानाथ की आँखों से दो बूँद आँसू बहकर तकिए में समा गए।
अगले 15 दिनों में कानून ने अपना काम तेजी से पूरा किया।
रित्विक ने लखनऊ की स्पेशल सीजेएम कोर्ट में सारे पुख्ता सबूत पेश किए।
पहला सबूत: ब्रिटिश एयरवेज की टिकटें और इमिग्रेशन ब्यूरो की प्रमाणित रिपोर्ट, जिससे साबित हुआ कि रजिस्ट्री के दिन रित्विक देश में था ही नहीं।
दूसरा सबूत: स्टेट फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट, जिसने रजिस्ट्री पर किए गए हस्ताक्षरों को 100 प्रतिशत फर्जी करार दिया।
तीसरा सबूत: बैंक ऑफ बड़ौदा के 4 साल के बैंक स्टेटमेंट।
इन स्टेटमेंट से साबित हुआ कि रित्विक ने लंदन से 44,50,000 रुपये भेजे थे।
शालिनी ने उस पैसे से मयंक के लिए एक लग्जरी कैफे खोला था और 18 लाख के सोने के गहने खरीदे थे।
माता-पिता के इलाज पर 4 साल में 4,000 रुपये भी खर्च नहीं किए गए थे।
कोर्ट रूम में जज साहब ने फाइल को मेज पर रखा।
अदालत का फैसला कड़ा और ऐतिहासिक था।
जज ने गोमती नगर वाले बंगले 14/B की फर्जी रजिस्ट्री को तुरंत रद्द कर दिया।
बंगले का पूर्ण मालिकाना हक दीनानाथ और सुमित्रा के नाम वापस दर्ज करने का आदेश दिया गया।
शालिनी और मयंक के सारे बैंक खाते और कैफे की संपत्ति को कुर्क करने के निर्देश जारी हुए।
जालसाजी, बुजुर्गों की हत्या के प्रयास और धोखाधड़ी के जुर्म में अदालत ने दोनों की जमानत याचिका सिरे से खारिज कर दी।
शालिनी और मयंक को 7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।
कोर्ट रूम से बाहर ले जाते वक्त शालिनी ने रित्विक के सामने हाथ जोड़े।
“रित्विक, मुझे माफ कर दो… मुझसे गलती हो गई!”
रित्विक ने उसकी आँखों में देखा।
उसकी आवाज पूरी तरह शांत थी।
“गलती माफ की जा सकती है शालिनी, लेकिन अपनों को घुट-घुट कर मारने की साजिश कभी माफ नहीं होती।”
पुलिस वैन दोनों को लेकर जेल की तरफ रवाना हो गई।
40 दिन बाद अस्पताल से डिस्चार्ज होकर दीनानाथ अपने पैरों पर खड़े हुए।
गोमती नगर के 14/B बंगले के बाहर नगर निगम और पुलिस की मौजूदगी में ताला तोड़ा गया।
घर की पूरी सफाई करवाई गई।
मेन गेट पर रित्विक ने अपने हाथों से काले संगमरमर की नई नेमप्लेट लगाई—”दीनानाथ निवास”।
सुमित्रा ने घर की देहरी पर कदम रखा और आँगन में फिर से तुलसी का पौधा लगाया।
शाम के 5 बज रहे थे।
बरामदे में हल्की धूप खिली थी।
दीनानाथ अपनी पुरानी लकड़ी की आरामकुर्सी पर बैठे थे।
सुमित्रा उनके पास बैठी चाय छान रही थीं।
रित्विक हाथ में एक सीलबंद लिफाफा लेकर आया।
उसने वह लिफाफा अपने पिता की गोद में रख दिया।
दीनानाथ ने चश्मा ठीक करके लिफाफा खोला।
यह लंदन के अस्पताल का रेजिग्नेशन एक्सेप्टेंस लेटर था।
साथ में लखनऊ के सरकारी मेडिकल कॉलेज का जॉइनिंग लेटर था, जहाँ रित्विक को चीफ सर्जन का पद मिला था।
दीनानाथ का गला भर आया।
“रित्विक… तूने लंदन का इतना बड़ा करियर, इतना बड़ा नाम छोड़ दिया?”
“हमारे लिए अपनी इतनी बड़ी जिंदगी दांव पर लगा दी बेटा?”
रित्विक नीचे जमीन पर अपने पिता के पैरों के पास बैठ गया।
उसने अपने दोनों हाथ पिता के घुटनों पर रखे।
“बाबूजी, जब मैं लंदन में लोगों की जान बचाता था, तो मुझे लगता था कि मैं एक कामयाब डॉक्टर हूँ।”
“लेकिन जिस दिन मैंने आपको उस टीन की छत के नीचे देखा, उस दिन मुझे समझ आया कि असली कामयाबी क्या होती है।”
“अगर मैं पूरी दुनिया के लिए डॉक्टर बन जाऊं, लेकिन अपने माँ-बाप के काम न आ सकूँ, तो मेरे इस हुनर पर लानत है।”
“लंदन में मुझे सिर्फ पैसा और शोहरत मिलती।”
“यहाँ मुझे मेरी जमीन और आपका आशीर्वाद मिलता है।”
सुमित्रा ने आगे बढ़कर रित्विक के गालों को छुआ।
दीनानाथ ने गर्म चाय की चुस्की ली।
उन्होंने खुले आसमान की तरफ देखा और फिर अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरा।
दीनानाथ के चेहरे पर एक गहरा सुकून था।
“बेटा, आज हम सच में अपने घर वापस आ गए।”
बरामदे में ढलते सूरज की सुनहरी किरणें फैली थीं, और उस घर में अब सिर्फ सच, सुकून और परिवार का अटूट विश्वास बाकी था।
