80 साल के बूढ़े को शूटिंग रेंज से बाहर फेंका, सबने उसे मामूली सफाईकर्मी माना… लेकिन जब ब्रिगेडियर ने सैल्यूट ठोका, पूरा कैंप दहल गया! //

कैप्टन रघुवीर ने बलदेव की तरफ देखा और अपने दो जवानों को इशारा किया।

“इस बूढ़े को उठाकर मेन गेट के बाहर फेंको।”

जवान आगे बढ़े ही थे कि अचानक रेंज के पीछे गाड़ियों के सायरन की आवाज गूंज उठी।

धूल उड़ाती हुई तीन काली जिप्सी बेहद तेज रफ्तार में फायरिंग लाइन के ठीक पीछे आकर रुकीं।

सबसे पहली गाड़ी का दरवाजा खुला।

उसमें से ब्रिगेडियर हरदेव सिंह बाहर निकले।

उनके पीछे दो कर्नल और मिलिट्री पुलिस के जवान थे।

हरदेव सिंह का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था।

रघुवीर ने तुरंत सीधे खड़े होकर सैल्यूट किया।

“जय हिंद सर! आप अचानक यहां? हम बस इस सिरफिरे बूढ़े को बाहर निकाल ही रहे थे…”

ब्रिगेडियर हरदेव सिंह ने रघुवीर की बात पूरी भी नहीं होने दी।

हरदेव सिंह ने रघुवीर के चेहरे के ठीक सामने जोर से चिल्लाकर कहा, “चुप रहो, कैप्टन!”

हरदेव सिंह ने रघुवीर को धकेलते हुए किनारे किया और तेजी से आगे बढ़े।

सामने रेत पर बलदेव सिंह भाटी खड़ा था, जो अपनी धोती से धूल साफ कर रहा था।

ब्रिगेडियर हरदेव सिंह ने अपनी टोपी उतारी।

उन्होंने अपनी पीठ एकदम सीधी की और बलदेव के सामने जाकर सबसे ऊंचा और सख्त सैल्यूट ठोका।

वहां मौजूद पूरी स्नाइपर टीम की सांसें अटक गईं।

कैप्टन रघुवीर की आंखें फटी की फटी रह गईं।

एक ब्रिगेडियर, एक मामूली सफाईकर्मी बूढ़े को सैल्यूट कर रहा था?

हरदेव सिंह की आवाज भारी हो गई, “सर! सूबेदार मेजर (रिटायर्ड) बलदेव सिंह भाटी सर! लोंगवाला के हीरो!”

“मुझसे भारी भूल हो गई सर, मुझे पता नहीं था कि आप इस सेक्टर में हैं।”

रघुवीर का पूरा शरीर कांपने लगा।

उसने हकलाते हुए कहा, “सर… यह… यह तो सिर्फ घास काटने वाले बलदेव काका हैं…”

ब्रिगेडियर हरदेव सिंह मुड़े और उनकी आंखों में गुस्सा था।

“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई इन्हें ‘मामूली’ कहने की?”

“1971 की लड़ाई में जब दुश्मन के टैंक हमारी सीमा में घुस आए थे, तब इस इंसान ने बिना किसी आधुनिक स्कोप के अकेले 12 दुश्मन स्नाइपरों को खत्म किया था!”

“इन्हें भारतीय सेना का सर्वोच्च स्नाइपर सम्मान मिला हुआ है!”

“जिस ज़मीन पर तुम खड़े हो, वह इनकी बहादुरी की वजह से आज भारत का हिस्सा है!”

रघुवीर के पैरों तले जमीन खिसक गई।

उसकी सारी अकड़, उसका अहंकार एक पल में चकनाचूर हो गया।

ब्रिगेडियर ने रघुवीर की तरफ देखा और कड़क आवाज में कहा, “तुम अपनी नई बंदूकों और कंप्यूटरों पर घमंड कर रहे थे न?”

“अब तुम देखोगे कि असली स्नाइपर किसे कहते हैं।”

हरदेव सिंह बलदेव की तरफ मुड़े और बेहद सम्मान से बोले, “उस्ताद जी, यह नई पीढ़ी मानती है कि मशीनें इंसान से ज्यादा समझदार हैं।”

“क्या आप इन्हें बताएंगे कि 1,800 मीटर पर निशाना कैसे लगाया जाता है?”

बलदेव ने धीरे से अपनी पुरानी राइफल उठाई।

उसने ब्रिगेडियर की तरफ देखा और हल्का सा मुस्कुराया।

“हरदेव बेटा, बंदूक कोई भी हो, नजर और इरादा सच्चा होना चाहिए।”


बलदेव फायरिंग लाइन की तरफ बढ़ा।

उसने कोई डिजिटल विंड मीटर नहीं इस्तेमाल किया।

उसने कोई बैलिस्टिक टैबलेट नहीं खोला।

उसने सिर्फ अपनी उंगली उठाई, थोड़ा सा थूक लगाया और हवा की नमी को महसूस किया।

फिर उसने नीचे से थोड़ी सी रेत उठाई और हवा में छोड़ दी।

रेत के कण तीन अलग-अलग कोणों पर उड़े।

बलदेव ने कहा, “रघुवीर बेटा, देख ले।”

“पहली 500 मीटर पर हवा दाईं तरफ बह रही है।”

“1,000 मीटर पर हवा टीले से टकराकर उल्टी घूम रही है।”

“और target के पास हवा नीचे की तरफ गिर रही है।”

“तेरा कंप्यूटर सिर्फ तेरी जगह की हवा नाप रहा है, रास्ते की हवा नहीं।”

रघुवीर के पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं थे।

बलदेव जमीन पर पेट के बल लेट गया।

80 साल की उम्र में भी उसकी पीठ एकदम सीधी थी।

उसने अपनी पुरानी 7.62 एमएम राइफल को मजबूती से थामा।

उसके हाथों की झुर्रियां गायब हो गईं, जैसे उसकी पूरी ताकत उसकी उंगलियों में आ गई हो।

उसने राइफल का पुराना लोहे का निशाना (आयरन साइट) सेट किया।

उसने अपनी सांस रोकी।

पूरी रेंज में इतना सन्नाटा छा गया कि सिर्फ हवा की सरसराहट सुनाई दे रही थी।

3 सेकंड… 5 सेकंड…

अचानक एक भारी आवाज गूंजी!

धांय!

पुरानी राइफल से धुआं निकला।

1,800 मीटर दूर रखी लोहे की छोटी प्लेट पर एक जोरदार आवाज हुई—’टन्न!’

लोहे की प्लेट के ठीक बीचों-बीच छेद हो चुका था और वह जमीन पर गिर गई।

दूरबीन से देख रहे कबीर ने चिल्लाकर कहा, “बुलआई! बिल्कुल सटीक निशाना!”

वहां मौजूद सभी जवानों की आंखें चौंधिया गईं।

जिस लक्ष्य को आधुनिक तकनीक से लैस पूरी टीम 4 घंटे में नहीं भेद पाई थी, उसे एक 80 साल के बुजुर्ग ने बिना किसी स्कोप के एक झटके में गिरा दिया था।

सारे जवान ताली बजाने लगे।

कैप्टन रघुवीर का सिर शर्म से झुक गया।

वह धीरे-धीरे आगे आया और बलदेव के पैरों के पास झुक गया।

रघुवीर की आंखों में आंसू थे।

“मुझे माफ कर दीजिए, सर…”

“मुझे अपनी आधुनिक तकनीक और अपने पद पर बहुत घमंड हो गया था।”

“मैंने आपका अपमान किया… मुझे सजा दीजिए, सर।”

बलदेव अपनी जगह से उठा।

उसने अपनी राइफल को दोबारा कपड़े में लपेटा।

उसने रघुवीर के कंधे पर हाथ रखा और बेहद शांत आवाज में कहा, “उठो बेटा।”

“तकनीक बुरी चीज नहीं है, लेकिन तकनीक पर अंधा भरोसा करना खतरनाक है।”

“हथियार चाहे कितना भी महंगा हो, उसे चलाने वाले का अनुभव और उसका संयम सबसे बड़ा हथियार होता है।”

“अपनी मशीनों पर भरोसा करो, लेकिन अपनी आंखों और प्रकृति को पढ़ना कभी मत भूलो।”

ब्रिगेडियर हरदेव सिंह ने तुरंत आदेश जारी किया।

“कैप्टन रघुवीर सिंह, आपकी इस बदतमीजी के लिए आपको इस यूनिट से तुरंत हटाकर रिफ्रेशर कोर्स के लिए भेजा जाता है।”

“और आज से इस स्नाइपर स्कूल के मुख्य संरक्षक सूबेदार मेजर बलदेव सिंह भाटी होंगे।”

बलदेव ने धीरे से मुस्कुराते हुए मना कर दिया।

“नहीं हरदेव, मेरी उम्र अब सिर्फ पौधों को पानी देने की है।”

“लेकिन जब भी इन बच्चों को रास्ते की जरूरत होगी, यह बूढ़ा यहीं मिलेगा।”

बलदेव ने अपनी लोहे की बाल्टी उठाई, उसमें पानी भरा और वापस पौधों की तरफ चला गया।

रघुवीर और पूरी स्नाइपर टीम उसे तब तक सैल्यूट करती रही जब तक वह रेत के टीलों के पीछे गायब नहीं हो गया।

उस दिन पोखरण की रेंज पर सबने सीख लिया था कि असली पहचान कपड़ों या पद से नहीं, बल्कि इंसान के तजुर्बे और उसके चरित्र से होती है।

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