सात साल के बच्चे ने स्कूल के बाहर मेरा हाथ पकड़कर कहा—“मैडम, क्या आप मुझे घर तक छोड़ देंगी? कोई मेरी बात पर विश्वास नहीं करता।”
लेकिन जब उसने घर का दरवाज़ा खोला और अंदर का सच दिखाया, तो मुझे समझ आया कि वह इतने दिनों से किसी ऐसे इंसान का इंतज़ार क्यों कर रहा था, जो उसकी बात सुन सके।
दिल्ली के सेंट जोसेफ पब्लिक स्कूल के बाहर खड़ा वह शांत बच्चा बिल्कुल वैसा ही लग रहा था जैसे कोई और बच्चा, जो स्कूल खत्म होने के बाद अपने माता-पिता का इंतज़ार कर रहा हो।
लेकिन तभी उसने मेरी ओर देखा और कहा—
“मैडम… क्या आप मेरे साथ घर तक चलेंगी?”
पहले मुझे लगा कि शायद वह अपना सामान भूल गया है, उसका वाहन नहीं आया या अकेले घर जाने से डर रहा है।
लेकिन उसने अपने बैग की पट्टियों को कसकर पकड़ लिया और आवाज़ धीमी कर दी।
“मेरे घर में कुछ ठीक नहीं है।”
मैं उसके करीब झुकी।
“क्या हुआ?”
उसने सिर हिलाया।
“यहाँ नहीं।”
उसकी आँखें स्कूल के बाहर खड़े बच्चों और माता-पिता की भीड़ की तरफ चली गईं।
“आपको खुद देखना होगा।”
उसका नाम था आरव ग्रेंजर।
वह सात साल का था, अपनी उम्र के हिसाब से छोटा, बिखरे हुए हल्के भूरे बाल उसकी आँखों पर गिर रहे थे और उसके पुराने जूते ऐसे लग रहे थे जैसे उन्होंने जरूरत से कहीं ज्यादा रास्ते तय किए हों।
वह लखनऊ, उत्तर प्रदेश में स्कूल के मुख्य द्वार के पास खड़ा था।
चारों ओर परिवार अपने बच्चों से मिल रहे थे।
बच्चे हँस रहे थे।
माता-पिता उन्हें पुकार रहे थे।
शिक्षक हाथ हिला रहे थे।
लेकिन आरव बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
वह खेल नहीं रहा था।
वह किसी का उत्साह से इंतज़ार भी नहीं कर रहा था।
वह ऐसा बच्चा लग रहा था जिसने बहुत पहले ही यह उम्मीद छोड़ दी थी कि कोई उसकी ओर ध्यान देगा।
मैं लगभग ग्यारह वर्षों से सामुदायिक सुरक्षा और बाल सहायता कार्यक्रमों के साथ काम कर रही थी। मुश्किल परिस्थितियों में मैंने कई बच्चों से मुलाकात की थी।
कुछ डरे हुए होते थे।
कुछ उलझन में।
कुछ को सिर्फ किसी भरोसेमंद व्यक्ति की जरूरत होती थी।
लेकिन आरव अलग था।
वह किसी का ध्यान अपनी ओर खींचना नहीं चाहता था।
वह सिर्फ किसी ऐसे इंसान को ढूँढ़ रहा था जो आखिरकार उसकी बात पर विश्वास करे।
मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई।
“आज कुछ हुआ है?”
उसने सिर हिलाया।
“आज नहीं।”
“घर में कुछ हुआ है?”
उसका चेहरा तुरंत बदल गया।
“मैंने लोगों को बताने की कोशिश की।”
मेरी चिंता बढ़ गई।
“किसे बताया?”
“मेरी टीचर को। अपनी बुआ को। पापा को।”
“उन्होंने क्या कहा?”
आरव ने जमीन की तरफ देखा।
“उन्होंने कहा कि मैं बहुत ज्यादा चिंता करता हूँ।”
वह कुछ पल चुप रहा।
“मेरी टीचर ने कहा कि कुछ घर बस थोड़े बिखरे हुए होते हैं।”
फिर उसने कहा—
“बुआ ने कहा कि दादी हमेशा से ऐसी ही रही हैं।”
एक और खामोशी।
“पापा ने कहा कि वह बाद में सब संभाल लेंगे।”
एक सात साल के बच्चे को “बाद में” शब्द इतनी निराशा के साथ बोलते सुनना मेरे लिए अनदेखा करना संभव नहीं था।
सात साल के बच्चे को मदद माँगने के बाद यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसकी बारी हमेशा बाद में आएगी।
मैंने स्कूल कार्यालय से बात की, अपने वरिष्ठ अधिकारी को सूचित किया और पुष्टि की कि मैं आरव को उसके घर तक छोड़ सकती हूँ।
उसका घर स्कूल से कुछ ही गलियों की दूरी पर था।
लेकिन उस छोटी-सी यात्रा के दौरान मैंने उसके बारे में कई बातें नोटिस कीं।
वह हर गुजरती गाड़ी को देखता।
घरों की गिनती करता।
फुटपाथ की दरारों से बचकर चलता।
आसपास की हर छोटी चीज़ पर ध्यान देता।
यह वही तरह की सतर्कता थी जो अक्सर उन बच्चों में दिखाई देती है जिन्हें लगता है कि उन्हें खुद अपनी सुरक्षा करनी होगी।
रास्ते के बीच मैंने पूछा—
“आरव, तुमने मुझे ही क्यों चुना?”
कई सेकंड तक वह चुपचाप चलता रहा।
फिर बोला—
“मैंने आपको पहले देखा था।”
“कब?”
“दो हफ्ते पहले।”
मैंने उसकी ओर देखा।
“क्या हुआ था?”
“पार्क के बाहर एक लड़की रो रही थी। उसके घरवाले आपस में लड़ रहे थे।”
उसने मेरी ओर देखा।
“आप उसके पास बैठी थीं और उसकी बात सुन रही थीं।”
वह कुछ पल रुका।
“आपने उससे रोना बंद करने के लिए नहीं कहा था।”
मेरे सीने में कुछ कस गया।
दो हफ्तों से यह बच्चा मुझे देख रहा था।
इंतज़ार कर रहा था।
यह तय करने की कोशिश कर रहा था कि क्या मैं इतनी सुरक्षित हूँ कि वह अपना सच मुझे बता सके।
किसी बच्चे को मदद माँगने से पहले बड़ों का परीक्षण नहीं करना चाहिए।
जब हम उसके घर वाली गली में पहुँचे तो आरव एक छोटे से मकान के सामने रुक गया।
उसका हाथ दरवाज़े की कुंडी की तरफ बढ़ा।
फिर उसने मेरी ओर देखा।
“वादा कीजिए कि देखने से पहले आप नहीं जाएँगी।”
मैंने सिर हिलाया।
“वादा।”
उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।
और जैसे ही मैंने अंदर कदम रखा, मुझे समझ आने लगा कि आरव इतने दिनों से क्यों चाहता था कि कोई उसकी बात पर विश्वास करे।
बंद पेंट्री के पीछे छिपे वे खत, जिन्हें आरव के पिता कभी नहीं चाहते थे कि वह पढ़े
मैं थोड़ा और अंदर गई।
“तुम्हारी दादी घर पर हैं?”
“जब मैं स्कूल गया था तब थीं।”
“क्या वह आमतौर पर तुम्हें बाहर लेने आती हैं?”
“कभी-कभी।”
उसने दरवाज़ा बंद किया और आवाज़ धीमी कर ली।
“लेकिन मैं आपको यह दिखाने के लिए नहीं लाया।”
उसकी बात सुनकर मैं रुक गई।
रसोई की दीवार पर पिछले साल का एक कैलेंडर टंगा था।
नीली स्याही से लगभग हर तारीख पर निशान लगा था।
सिर्फ 14 अक्टूबर को तीन बार गोल घेरा गया था।
कैलेंडर के नीचे एक छोटी मेज थी जिस पर कई अनखुले डाक के लिफाफे पड़े थे।
कुछ पर लाल रंग की चेतावनियाँ छपी थीं।
कुछ ऐसे लग रहे थे जैसे जन्मदिन के कार्ड हों जिन्हें कभी भेजा ही नहीं गया।
आरव उनके पास से गुजर गया।
“इधर।”
वह मुझे रसोई के पीछे ले गया।
एक कुर्सी पर कंबल रखे थे और उसके बगल में खाली अचार के जारों का ढेर था।
फ्रिज लगातार आवाज़ कर रहा था।
चूल्हे पर एक केतली रखी थी।
और उसके पास दो साफ कप रखे थे।
यह छोटी-सी बात मेरे ध्यान में आ गई।
दो कप।
एक के तल में सूखी हुई चाय थी।
दूसरे में अभी भी थोड़ी गर्माहट थी।
मैंने पूछा—
“आज सुबह तुम्हारी दादी के पास कोई आया था?”
आरव ने सिर हिलाया।
“वह कहती हैं कि यहाँ कोई नहीं आता।”
रसोई के बिल्कुल पीछे एक ऊँची पेंट्री अलमारी थी।
वह सामान्य दिखाई देती थी।
लेकिन आरव ने एक टंगे हुए एप्रन के पीछे हाथ डाला और पीतल की एक छोटी चाबी निकाल ली।
उसने चाबी एक ऐसे ताले में लगाई जिसे मैंने पहले देखा तक नहीं था।
फिर पूरी पेंट्री हल्की-सी पीछे की ओर खिसक गई।
वह अलमारी नहीं थी।
वह एक संकरा दरवाज़ा था जिसे अलमारी जैसा बनाया गया था।
आरव ने उसे खोलने से पहले मेरी ओर देखा।
“यही है वह चीज़ जिस पर कोई विश्वास नहीं करता।”
दरवाज़े के पीछे एक छोटा कमरा था।
बाकी घर के विपरीत, वह कमरा लगभग पूरी तरह व्यवस्थित था।
एक तरफ एक छोटा बिस्तर था, जिस पर हल्के पीले रंग की रजाई बिछी थी।
कुर्सी पर एक स्वेटर करीने से रखा था।
एक पतली शेल्फ पर किताबें सजी थीं।
खिड़की के पास काँच के गिलास में ताज़े गेंदा और चमेली के फूल रखे थे।
फर्श पर धूल तक नहीं थी।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई इस कमरे की लगातार देखभाल करता हो।
बिस्तर पर दर्जनों खत रखे थे।
कुछ खोले जा चुके थे।
ज्यादातर बंद थे।
और उन सभी पर एक ही नाम लिखा था—
आरव ग्रेंजर।
मैंने किसी चीज़ को छुए बिना आगे कदम बढ़ाया।
सबसे पुराने लिफाफे फीके पड़ चुके थे।
उनके कोने समय के साथ मुलायम हो गए थे।
नए लिफाफे बिल्कुल सफेद और साफ थे।
जन्मदिन के कार्ड साल के हिसाब से रखे थे।
बगल में छोटे-छोटे पैकेट रखे थे।
हर पैकेट पर भेजने वाले का नाम एक ही था—
एलिना ग्रेंजर।
मैंने आरव की तरफ देखा।
“एलिना कौन है?”
उसके होंठ खुले, लेकिन वह कुछ पल बोल नहीं पाया।
फिर उसने कहा—
“मेरी माँ।”
कमरे की खामोशी अचानक और गहरी हो गई।
“तुम्हारी माँ अब कहाँ हैं?”
आरव ने खतों की तरफ देखा।
“पापा कहते हैं कि जब मैं छोटा था तभी उनकी मौत हो गई।”
मैं उसके पास बैठ गई।
“क्या तुम्हें पूरा यकीन है कि उन्होंने यही कहा?”
“उन्होंने कहा कि माँ चली गई थीं और वापस नहीं आ सकती थीं।”
आरव ने निगलते हुए कहा—
“फिर दादी ने कहा कि जो लोग मर जाते हैं, वे वापस नहीं आते। मैंने पापा से पूछा कि क्या माँ मर गई हैं, तो उन्होंने कहा कि इस बारे में बात न करना ही बेहतर है।”
उसने सबसे नए लिफाफे की ओर इशारा किया।
“यह पिछले हफ्ते आया था।”
लिफाफे पर डाक की मुहर साफ दिखाई दे रही थी।
29 जुलाई।
सिर्फ आठ दिन पहले।
मेरे भीतर एक भारी बेचैनी उठी।
“क्या तुमने इनमें से कोई खत खोला?”
“एक।”
उसने नजरें झुका लीं।
“मुझे नहीं खोलना चाहिए था।”
“तुम मुसीबत में नहीं हो।”
आरव ने मेरी ओर देखा।
“उसमें लिखा था कि माँ को वह गाना अभी भी याद है जो वह मुझे तब गाया करती थीं जब मैं सो नहीं पाता था।”
उसकी आवाज़ और धीमी हो गई।
“मुझे वह गाना याद है… लेकिन मुझे उनका चेहरा याद नहीं।”
मैंने शेल्फ पर रखी एक तस्वीर देखी।
एक जवान महिला अपनी गोद में हरे कंबल में लिपटा बच्चा लिए हुए थी।
उसके हल्के भूरे बाल थे।
और उसकी आँखें बिल्कुल आरव जैसी थीं—गहरी और गंभीर।
किसी ने तस्वीर को बिस्तर की ओर मोड़कर रखा था, जैसे उस बिस्तर पर सोने वाला व्यक्ति उसे देखना चाहता हो।
“क्या तुम्हारी दादी को पता है कि तुम्हें यह कमरा मिल गया?”
“शायद।”
“तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?”
“उन्होंने चाबी बदल दी थी।”
“पहले कहाँ रहती थी?”
“नीले चीनी के डिब्बे में।”
वह रुका।
“खत पढ़ने के बाद चाबी गायब हो गई। फिर मुझे वह एप्रन के पीछे मिली।”
आरव खिड़की के पास चला गया।
“तीन रात पहले मैंने यहाँ किसी को बात करते सुना।”
“क्या सुना?”
“बातें।”
“क्या वह तुम्हारी दादी हो सकती थीं?”
“एक आवाज़ दादी की थी।”
“दूसरी?”
उसने तस्वीर की तरफ देखा।
“एक औरत की।”
मैं खिड़की के पास गई।
वह पिछवाड़े की ओर खुलती थी, जहाँ ऊँची झाड़ियाँ उगी हुई थीं।
कुंडी पुरानी थी, लेकिन बंद थी।
कोई दूसरा रास्ता साफ दिखाई नहीं दे रहा था।
“क्या तुमने उस महिला को देखा?”
“नहीं। दादी ने मुझे ऊपर जाने को कहा।”
“उन्होंने क्या कहा?”
“उन्होंने कहा कि वह रेडियो सुन रही थीं।”
आरव ने ताज़े फूलों की ओर देखा।
“लेकिन रेडियो फूल नहीं लाता।”
वह सही था।
मैंने बाहर जाकर अपने वरिष्ठ अधिकारी को फोन किया।
मैंने बिना कोई निष्कर्ष निकाले पूरी स्थिति समझाई।
एक बच्चा स्कूल से एक ऐसे घर में आया था जहाँ उस समय कोई जिम्मेदार अभिभावक मौजूद नहीं था।
घर के कुछ रास्ते सामान से बाधित थे।
और इस बात का जवाब नहीं था कि हाल में यहाँ कौन आया था।
मेरे वरिष्ठ अधिकारी ने परिवार सहायता विभाग से संपर्क किया और कहा कि जब तक आरव के पिता या दादी से संपर्क न हो जाए, मैं उसके साथ रहूँ।
जब मैं कमरे में वापस आई तो आरव बिस्तर के किनारे बैठा था।
उसने कोई दूसरा खत नहीं खोला था।
बस रजाई पर हाथ रखे हुए था।
“क्या तुम्हें लगता है कि माँ जिंदा हैं?”
बच्चे कुछ सवाल जानकारी के लिए पूछते हैं।
और कुछ सवाल इसलिए पूछते हैं क्योंकि उस सवाल का जवाब उनकी जिंदगी को दो हिस्सों में बाँट देगा—जवाब से पहले और जवाब के बाद।
मैंने कहा—
“मुझे लगता है कि कुछ बड़ों को तुम्हें सच बताना जरूरी है। और जब तक वे ऐसा नहीं करते, मैं यहीं रहूँगी।”
उसने मुझे ध्यान से देखा।
“आपने वादा किया था कि देखने से पहले नहीं जाएँगी।”
“मैंने देखा।”
“तो अब आप जा सकती हैं।”
“अभी नहीं।”
उसके कंधे थोड़े ढीले पड़े।
जब से मैं उससे मिली थी, पहली बार उसके चेहरे पर निराश होने का डर थोड़ा कम दिखाई दिया।
मैंने उसके पिता के नंबर पर फोन किया।
चौथी घंटी पर किसी पुरुष ने फोन उठाया।
“हेलो?”
“मैं अधिकारी मीरा शर्मा बोल रही हूँ। मैं आपकी माँ के घर पर आरव के साथ हूँ।”
दूसरी तरफ कुछ सेकंड की तेज खामोशी हुई।
“क्यों?”
“आरव स्कूल के बाहर मेरे पास आया था और उसने मदद माँगी।”
“क्या उसे चोट लगी है?”
“नहीं।”
“मेरी माँ?”
“वह यहाँ नहीं हैं।”
कुछ और खामोशी।
“वह तो घर पर होनी चाहिए थीं।”
“आपको यहाँ आना होगा।”
“क्या हुआ है?”
मैंने पेंट्री की तरफ देखा।
“कुछ चीज़ों पर हमें आमने-सामने बात करनी चाहिए।”
उसकी आवाज़ बदल गई।
गुस्से में नहीं।
डर में।
“क्या उसने आपको कमरा दिखाया?”
मैं कुछ क्षण चुप रही।
“आपको उस कमरे के बारे में पता है?”
“मुझे पता है कि वह मौजूद है।”
“तो कृपया घर आ जाइए, श्री ग्रेंजर।”
“मैं अभी निकल रहा हूँ।”
फोन कट गया।
आरव दरवाज़े पर खड़ा था।
“उन्हें पता है।”
“उन्हें कमरे के बारे में पता है।”
“उन्हें सब पता है।”
उसकी आवाज़ में सात साल के बच्चे की जगह किसी बहुत बड़े इंसान की थकान थी।
लगभग बीस मिनट बाद एक कार घर के बाहर आकर तेजी से रुकी।
डेनियल ग्रेंजर बिना दस्तक दिए अंदर आया।
उसकी उम्र लगभग पैंतीस वर्ष थी।
उसने पहले आरव को सिर से पैर तक देखा और फिर मेरी तरफ।
“क्या हुआ?”
“आरव सुरक्षित है।”
डेनियल ने उसके कंधों पर दोनों हाथ रख दिए।
“तुम स्कूल से किसी के साथ घर नहीं आ सकते। पहले मुझे फोन करना चाहिए था।”
“मैंने स्कूल को बताया था।”
“बात वह नहीं है।”
मैंने कहा—
“उसने सही प्रक्रिया अपनाई। स्कूल ने दिए गए नंबरों पर फोन किया। आपकी माँ का फोन नहीं उठा और काम के दौरान आपका फोन उपलब्ध नहीं था।”
डेनियल ने आँखें बंद कीं।
“मेरा फोन लॉकर में था।”
आरव अपने पिता के हाथों से बाहर निकल गया।
“मुझे किसी ऐसे इंसान की जरूरत थी जो मेरी बात पर विश्वास करे।”
डेनियल ने उसे देखा।
“मैं तुम पर विश्वास करता हूँ।”
“नहीं करते।”
आवाज़ ऊँची नहीं थी।
इसीलिए वह ज्यादा भारी लगी।
आरव ने पेंट्री की ओर इशारा किया।
“आपने कहा था वहाँ कुछ नहीं है।”
डेनियल का चेहरा सफेद पड़ गया।
“मैंने कहा था वहाँ सामान रखा है।”
“आपने कहा था माँ चली गई हैं।”
“वह चली गई थीं।”
“वहाँ खत हैं।”
डेनियल ने छिपे हुए कमरे की तरफ देखा।
कुछ सेकंड तक वह बिल्कुल नहीं हिला।
फिर वह अंदर चला गया।
मैं कुछ दूरी पर उसके पीछे गई।
डेनियल बिस्तर के पास खड़ा होकर खतों को देखने लगा।
“ये क्या हैं?”
“आप बताइए।”
“मैंने इन्हें कभी नहीं देखा।”
“लेकिन आपको कमरे के बारे में पता था।”
“मेरी माँ ने इसे तब बनाया था जब एलिना चली गई थी। उन्होंने कहा था कि जब एलिना वापस आएगी तो उसके लिए जगह तैयार रहे।”
उसने एक खत उठाया लेकिन खोला नहीं।
“वह वर्षों से इस कमरे में नहीं आई।”
“फूल ताज़े हैं।”
उसका हाथ खत पर और कस गया।
“मेरी माँ हर जगह फूल रखती हैं।”
“रसोई में दो चाय के कप थे।”
डेनियल ने मेरी ओर देखा।
“वह कहाँ है?”
“हमें नहीं पता।”
उसने खत को बिल्कुल उसी जगह रख दिया जहाँ से उठाया था।
पहली बार मैंने उसकी घबराहट के पीछे कुछ और देखा।
पहचान।
वह इस कमरे को नहीं पहचान रहा था।
वह लिखावट पहचान रहा था।
“आप जानते हैं कि ये खत किसने भेजे हैं।”
डेनियल ने दरवाज़े की ओर देखा, जहाँ आरव खड़ा था।
“मैं यह बात उसके सामने नहीं करना चाहता।”
“आपने वर्षों से उसके सामने यह बात नहीं की।”
उसका जबड़ा कस गया।
“आप नहीं जानतीं कि क्या हुआ था।”
“सही है। मैं नहीं जानती।”
मैंने बाहर खड़े आरव की तरफ देखा।
“लेकिन वह जानता है कि उसके आसपास के बड़े लोग उससे कुछ छिपा रहे हैं। यही अनिश्चितता उसे स्कूल के बाहर एक अजनबी से मदद माँगने तक ले आई।”
“मैं अजनबी नहीं था,” आरव ने कहा।
डेनियल मुड़ा।
आरव ने आगे कहा—
“मैंने उन्हें किसी की मदद करते देखा था।”
उसके पिता के चेहरे से जैसे सारा गुस्सा एक साथ निकल गया।
वह कमरे में रखी कुर्सी पर बैठ गया।
काफी देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर डेनियल ने तस्वीर उठा ली।
“एलिना मरी नहीं थी।”
आरव बिल्कुल स्थिर हो गया।
डेनियल ने तस्वीर में महिला की ओर देखा।
“तुम्हारे जन्म के बाद वह बहुत बीमार हो गई थी। ऐसी बीमारी नहीं जो किसी दूसरे से लग जाए। वह बहुत दुखी और डरी हुई थी। कभी-कभी उसे अपने ही विचारों पर भरोसा नहीं रहता था।”
आरव एक कदम अंदर आया।
“वह कहाँ गई?”
“वह चली गई।”
“क्यों?”
“उसे लगा कि उसके बिना तुम ज्यादा सुरक्षित रहोगे।”
“क्या मैं सुरक्षित था?”
डेनियल की आँखें झुक गईं।
यह सवाल आरोप नहीं था।
आरव ने उसे बिल्कुल मासूमियत से पूछा था।
और इसी वजह से वह और कठिन हो गया।
“मैंने तुम्हें सुरक्षित रखने की कोशिश की,” डेनियल ने कहा।
“मैंने यह नहीं पूछा था।”
डेनियल ने गहरी साँस ली।
“कुछ चीज़ें सुरक्षित थीं। कुछ चीज़ें बहुत अकेली।”
आरव ने खतों की ओर देखा।
“क्या माँ ने मुझे खत लिखे?”
“मुझे नहीं पता।”
“आपको पता था कि उन पर उनका नाम है।”
“मैंने उनकी लिखावट पहचानी।”
“क्या आपने मुझे बताया कि वह जिंदा हैं?”
डेनियल ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।
“मैंने कहा था कि वह चली गई हैं। जब तुमने पूछा कि क्या वह मर चुकी हैं, तब मुझे साफ जवाब देना चाहिए था। मैंने ऐसा नहीं किया।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं डर गया था।”
आरव ने उसे देखा।
“बड़ों को शब्दों से डरना नहीं चाहिए।”
डेनियल ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“नहीं। लेकिन हम डरते हैं।”
तभी बाहर कार रुकने की आवाज़ आई।
कुछ देर बाद दरवाज़े का ताला घूमा।
सविता ग्रेंजर अंदर आईं।
वह दुबली महिला थीं, जिनके चाँदी जैसे बाल ढीले से बंधे हुए थे।
उन्होंने आरव को देखते ही मुस्कुराकर कहा—
“अरे, आरव बेटा।”
फिर उनकी नजर मुझ पर गई।
फिर खुले हुए पेंट्री के दरवाज़े पर।
उनके हाथ से सब्जियों का थैला गिर गया।
आलू और सेब फर्श पर लुढ़क गए।
आरव उन्हें उठाने दौड़ा, लेकिन मैंने पहले उसे रोक दिया।
“उन्हें अभी रहने दो।”
सविता ने दूसरा थैला मेज पर रखा।
“तुम्हें वह कमरा खोलने का कोई अधिकार नहीं था।”
आरव ने सिर झुका लिया।
“मुझे चाबी मिली थी।”
“मैं तुमसे बात नहीं कर रही थी।”
उनकी नजर डेनियल पर थी।
“तुमने इसे बंद किया था,” डेनियल ने कहा।
“कुछ चीज़ों को सुरक्षित रखने के लिए।”
“क्या?”
“यादें।”
“ये खत यादें नहीं हैं। ये अभी लिखे गए हैं।”
सविता का चेहरा बदल गया।
बहुत थोड़ा।
लेकिन साफ।
उन्हें पता था।
डेनियल ने भी देख लिया।
“आप उससे बात कर रही थीं।”
सविता कमरे की ओर बढ़ीं और खतों को समेटने लगीं।
“उसने पहले मुझे लिखा था।”
“कब?”
“कुछ समय पहले।”
“कितने समय से?”
उन्होंने जवाब नहीं दिया।
डेनियल की आवाज़ कठोर हो गई।
“माँ, कितने समय से?”
“चौदह महीने।”
कमरे में वह संख्या जैसे जम गई।
डेनियल अपनी माँ को देखता रहा।
“आप चौदह महीनों से एलिना के संपर्क में थीं?”
“वह बेहतर हो रही थी।”
“यह फैसला आपका नहीं था।”
“उसने मुझसे फैसला करने को नहीं कहा था। उसने मुझसे सिर्फ सुनने को कहा था।”
“वह उसे छोड़कर चली गई थी।”
सविता के हाथ रुक गए।
“वह इसलिए गई थी क्योंकि उसे लगता था कि वह खुद के लिए खतरा बन रही है, डेनियल। उसने तुमसे मदद माँगी थी।”
“मैंने उसे मदद दिलाई।”
“तुमने उसे एक शर्त दी।”
“मेरे पास एक बच्चा था जिसकी रक्षा करनी थी।”
“और वह उसकी माँ भी थी।”
दोनों वर्षों से दबे विवाद को पहली बार खुलकर बोल रहे थे।
आरव मेज पर बैठा था और एक पुराने विज्ञापन के पीछे चित्र बना रहा था।
मैं उसके पास बैठ गई।
उसने कई घर बनाए थे।
हर घर में एक दरवाज़ा था।
और हर दरवाज़ा खुला हुआ था।
मैंने पूछा—
“क्या तुम चाहते हो कि आज रात अपने पिता के साथ जाओ?”
उसने चित्र बनाते हुए कहा—
“हाँ।”
“क्या तुम्हें उनके साथ सुरक्षित महसूस होता है?”
“हाँ।”
“और दादी के साथ?”
आरव ने सविता की ओर देखा।
“हाँ।”
“क्या इस घर में और कुछ है जो तुम चाहते थे कि कोई देखे?”
उसने पेंसिल रोक दी।
कुछ पल के लिए मुझे लगा कि शायद घर में कोई और छिपा हुआ कमरा है।
कोई और रहस्य।
लेकिन उसने खतों की ओर इशारा किया।
“मैं चाहता था कि कोई बताए कि ये असली हैं या नहीं।”
“ये असली हैं।”
“क्या इनमें लिखा सब सच है?”
“जरूरी नहीं। खत उस वक्त की भावनाएँ बताते हैं जब उन्हें लिखा गया था। इसलिए बड़ों को इन्हें ध्यान से पढ़ना होगा और तुम्हें समझाना होगा।”
आरव ने सिर हिलाया।
“क्या मैं इन्हें पढ़ सकता हूँ?”
डेनियल ने उसकी ओर देखा।
“कुछ खत ऐसे हो सकते हैं जिन्हें समझना तुम्हारे लिए मुश्किल हो।”
“तो?”
डेनियल ने गहरी साँस ली।
“लेकिन वे तुम्हारे लिए लिखे गए हैं।”
“तो हाँ?”
“हाँ। हम इन्हें साथ पढ़ेंगे।”
“सारे?”
डेनियल ने सिर हिलाया।
“सारे।”
आरव ने पेंसिल रख दी।
“क्या आप मुझे बताएँगे कि इनमें कुछ झूठ है?”
डेनियल ने उसकी ओर देखा।
“मैं तुम्हें बताऊँगा कि मुझे क्या याद है।”
आरव ने पूछा—
“और दादी बताएँगी कि उन्हें क्या याद है।”
सविता की आँखों में आँसू आ गए।
“हाँ।”
“और माँ?”
डेनियल फिर चुप हो गया।
“वह हिस्सा थोड़ा समय लेगा।”
“क्योंकि वह बीमार हैं?”
“क्योंकि मुझे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि वह तैयार हैं।”
आरव ने उसकी ओर देखा।
“आपका मतलब है कि वह तैयार हैं या आप तैयार हैं?”
कमरे में किसी ने सांस तक नहीं ली।
डेनियल ने अपने बेटे को देखा।
फिर थकी हुई मुस्कान दी।
“दोनों।”
उस दिन परिवार सहायता विभाग की अधिकारी नेहा वर्मा भी घर पहुँचीं।
उन्होंने शांत तरीके से घर की जाँच की।
रसोई।
दरवाज़े।
खिड़कियाँ।
आरव के सोने की जगह।
उन्होंने सविता से बिलों और उनकी दिनचर्या के बारे में भी बात की।
सविता ने माना कि उन्होंने कुछ जरूरी अपॉइंटमेंट भूलने शुरू कर दिए थे।
दो बिजली के बिल भी समय पर जमा नहीं हुए थे।
डेनियल ने बाद में उन्हें चुका दिया था।
“मैं असहाय नहीं हूँ,” सविता ने कहा।
नेहा ने शांत स्वर में जवाब दिया—
“किसी ने आपको असहाय नहीं कहा। लेकिन एक सात साल के बच्चे और पूरे घर की जिम्मेदारी अकेले उठाना बहुत ज्यादा हो सकता है।”
सविता ने गलियारे में रखे सामान को देखा।
पहली बार शायद उन्हें वह संग्रह नहीं, बल्कि बोझ दिखाई दिया।
डेनियल ने कहा—
“स्कूल के बाद आरव के लिए दूसरी व्यवस्था करनी होगी।”
सविता का चेहरा उतर गया।
“तुम उसे मुझसे दूर ले जाओगे।”
“मैं उसे दूर नहीं कर रहा। मैं यह सुनिश्चित कर रहा हूँ कि आपको मदद मिले।”
“तुम अभी कह रहे हो।”
“माँ।”
“तुमने कहा था कि एलिना को भी मदद चाहिए।”
डेनियल चुप हो गया।
आरव मेज पर बैठा चित्र बना रहा था।
मैं उसके पास गई।
“क्या तुम चाहते हो कि आज रात पापा के साथ जाओ?”
“हाँ।”
“दादी के साथ सुरक्षित महसूस करते हो?”
“हाँ।”
“और क्या तुम चाहते हो कि खत पढ़े जाएँ?”
“हाँ।”
डेनियल ने उस शाम सारे खत एक डिब्बे में रखने शुरू कर दिए।
सबसे नीचे एक नीला लिफाफा मिला।
दूसरों से अलग।
वह डेनियल के नाम था।
डाक की मुहर थी—
3 अगस्त।
सिर्फ चार दिन पहले।
सविता ने उसे देखा तो उनके चेहरे का रंग बदल गया।
“मुझे नहीं पता था कि यह वहाँ है।”
डेनियल ने लिफाफा खोला।
अंदर एक पत्र और एक तस्वीर थी।
पत्र पढ़ते-पढ़ते उसके हाथ काँपने लगे।
तस्वीर में एलिना खड़ी थी।
पीछे लखनऊ का केंद्रीय पुस्तकालय दिखाई दे रहा था।
उसके गले में पुस्तकालय का पहचान पत्र था।
आरव ने अपना बैग खोला।
उसमें एक मुड़ा हुआ क्रीम रंग का कागज था।
“यह मुझे कल मिला।”
“कहाँ?”
“पुस्तकालय में।”
डेनियल ने कागज खोला।
ऊपर लिखा था—
“आरव के लिए—क्योंकि कुछ कहानियाँ घर लौटने का लंबा रास्ता तय करती हैं।”
डेनियल की आँखें फैल गईं।
“तुम्हारी मुलाकात उससे हुई?”
आरव ने सिर हिलाया।
“वह मुझे एक किताब ढूँढ़ने में मदद कर रही थीं।”
“क्या उन्होंने अपना नाम बताया?”
“नहीं।”
“और क्या कहा?”
आरव ने तस्वीर में महिला को देखा।
“उन्होंने कहा कि वह उम्मीद कर रही थीं कि मैं वापस आऊँगा।”
डेनियल कुर्सी पर बैठ गया।
एलिना सिर्फ लखनऊ वापस नहीं आई थी।
वह अपने बेटे से मिल भी चुकी थी।
और उसके पत्र की आखिरी पंक्तियाँ उस रात के बारे में थीं जब वह सात साल पहले घर छोड़कर गई थी।
वही तारीख।
14 अक्टूबर।
कैलेंडर पर तीन बार घेरा गया दिन।
डेनियल ने पढ़ना शुरू किया।
“मैं 14 अक्टूबर को उपचार केंद्र से बाहर आने के बाद घर पहुँची थी। मेरे पास डॉक्टर का पत्र था, रहने की जगह थी और निगरानी में मुलाकात की पूरी योजना थी। मुझे लगा था कि मैं तुमसे बात करने के लिए तैयार हूँ।”
डेनियल रुक गया।
आरव ने पूछा—
“फिर क्या हुआ?”
उसने अगली पंक्ति पढ़ी।
“तुम्हारे पिता दरवाज़े पर मिले। उन्होंने कहा कि तुमने स्थायी अभिरक्षा के लिए आवेदन कर दिया है और तुम मुझसे कोई संपर्क नहीं चाहते। उन्होंने मुझे एक हस्ताक्षरित समझौता दिखाया। उस पर तुम्हारा नाम था।”
डेनियल का चेहरा बदल गया।
“मैंने कभी ऐसा कोई कागज साइन नहीं किया।”
आरव ने उसकी ओर देखा।
डेनियल ने पत्र आगे पढ़ा।
“मैं उस समय इतनी कमजोर थी कि लड़ नहीं सकी। मैंने उस कागज पर विश्वास कर लिया। मुझे लगा कि तुमने फैसला कर लिया है और तुम्हारे और आरव के लिए दूर रहना ही आखिरी अच्छी चीज़ है जो मैं कर सकती हूँ।”
सविता ने आँखें बंद कर लीं।
आरव ने पूछा—
“क्या पापा ने वह कागज साइन किया था?”
“नहीं।”
डेनियल ने तुरंत जवाब दिया।
“मैंने कभी तुम्हारी माँ से दूर रहने का कोई कागज साइन नहीं किया।”
“क्या आपको भूल हो सकती है?”
“नहीं।”
डेनियल ने दोनों हाथ मेज पर रख दिए।
“मुझे अपने सारे कागज याद हैं। अस्थायी अभिरक्षा, मेडिकल अनुमति, बीमा के दस्तावेज़… लेकिन मैंने कभी अपनी माँ को तुमसे दूर रखने वाला कोई कागज साइन नहीं किया।”
सविता ने धीरे से कहा—
“तुम्हारे दादा कुछ कागज संभालते थे।”
डेनियल ने उनकी ओर देखा।
“क्या?”
“तुम्हारे पिता।”
रघुवीर ग्रेंजर।
डेनियल के पिता।
आरव के दादा।
तीन साल पहले उनकी मृत्यु हो चुकी थी।
आरव ने उनके बारे में हमेशा यही सुना था कि उन्हें मछली पकड़ना पसंद था, वह हर काम के लिए समय से पहले पहुँचते थे और मानते थे कि हर औजार इस्तेमाल के बाद उसी जगह रखा जाना चाहिए जहाँ से उठाया गया हो।
अब उनका नाम एक बिल्कुल अलग कहानी से जुड़ रहा था।
“दादाजी ने क्या किया?” आरव ने पूछा।
सविता ने धीरे से सिर हिलाया।
“मुझे नहीं पता।”
“आपने कहा कि वह कागज संभालते थे।”
डेनियल ने थकी हुई हँसी हँसी।
“पापा को मदद करना पसंद था।”
सविता ने उसे देखा।
“उन्हें फैसला करना पसंद था।”
“माँ।”
“वह मानते थे कि वह परिवार की रक्षा कर रहे हैं।”
“किससे?”
“अनिश्चितता से।”
“यह एक जैसी बात नहीं है।”
सविता ने धीरे से कहा—
“नहीं।”
एलिना ने अपने साथ लाए कुछ पुराने खत मेज पर रख दिए।
“ये खत वापस लौट आए थे।”
हर लिफाफे पर एक ही मुहर लगी थी—
“इस पते पर अब कोई नहीं रहता।”
डेनियल ने सबसे पुराना खत उठाया।
उसकी तारीख अक्टूबर के कुछ सप्ताह बाद की थी।
“मैं तो उसी घर में पाँच साल और रहा।”
एलिना ने सिर हिलाया।
“मुझे लगा तुम्हीं उन्हें वापस भेज रहे हो।”
“मैंने कभी देखे ही नहीं।”
एक लिफाफा खुला हुआ था।
उसमें एलिना का एक पत्र था।
नीचे किसी ने नीली स्याही से लिखा था—
“दोबारा पत्र मत लिखना।”
डेनियल ने उस वाक्य को देखा।
“यह मेरी लिखावट नहीं है।”
“नहीं,” सविता ने कहा।
सभी की नजर उनकी ओर उठी।
उन्होंने काँपते हुए कहा—
“मैं इस स्याही को पहचानती हूँ।”
उन्होंने बताया कि रघुवीर के पास एक धातु का छोटा डिब्बा था जिसमें वह अपनी फाउंटेन पेन रखते थे।
“वह कहाँ है?” डेनियल ने पूछा।
“बिस्तर के नीचे।”
डेनियल ने तुरंत कमरे में जाकर बिस्तर के नीचे हाथ डाला।
वहाँ एक छोटा धातु का डिब्बा मिला।
उसमें तीन पुराने फाउंटेन पेन थे।
सूखी हुई नीली स्याही की एक शीशी।
कुछ रसीदें।
और धागे से बंधे कई कागज।
सबसे ऊपर उस समझौते की खाली प्रति थी जो एलिना को मिली थी।
उसके नीचे डेनियल के पुराने दस्तावेज़ों से ली गई उसके हस्ताक्षरों की प्रतियाँ थीं।
और सबसे नीचे एक बंद लिफाफा।
उस पर रघुवीर की लिखावट में लिखा था—
“लीला के लिए। इसे तब तक सुरक्षित रखना जब तक डेनियल तैयार न हो।”
लीला डेनियल की छोटी बहन थी।
आरव की बुआ।
वही बुआ जिसने आरव से कहा था कि दादी हमेशा से ऐसी ही रही हैं।
डेनियल ने तुरंत उसे फोन किया।
लेकिन फोन करने से पहले ही बाहर एक कार आकर रुकी।
कुछ ही सेकंड बाद लीला घर में दाखिल हुई।
वह अस्पताल की ड्यूटी से सीधे आई थी।
उसने धातु का डिब्बा देखा और वहीं रुक गई।
डेनियल ने लिफाफा उठाया।
“तुम जानती हो यह क्या है?”
लीला ने लिफाफे को देखा।
फिर एलिना को।
कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे वह वापस चली जाएगी।
लेकिन उसने दरवाज़ा बंद किया।
“हाँ।”
डेनियल ने लिफाफा खोला।
उसने पहली पंक्ति पढ़ी।
फिर अपनी बहन की ओर देखा।
“इसमें लिखा है कि तुम 14 अक्टूबर की रात वहाँ थीं।”
लीला की आँखें भर आईं।
“हाँ।”
“तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?”
“पापा ने मुझसे वादा लिया था।”
“क्या उन्होंने यह समझौता जाली बनाया?”
लीला ने एलिना की ओर देखा।
फिर आरव की ओर।
और अंत में धीरे से सिर हिलाया।
“नहीं।”
डेनियल ने पत्र नीचे कर दिया।
“यहाँ मेरे हस्ताक्षरों की प्रतियाँ हैं।”
“मुझे पता है।”
“कागज पापा की लिखावट में है।”
“मुझे यह भी पता है।”
“तो तुम कहना क्या चाहती हो?”
लीला ने कुर्सी का सहारा लिया।
“मैं कह रही हूँ कि पापा ने कागज तैयार किए थे।”
उसने काँपती साँस ली।
“लेकिन एलिना वह इंसान नहीं थी जिसे वह आरव से दूर रखना चाहते थे।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
डेनियल ने उसे घूरकर देखा।
“तो किसे?”
लीला की नजर उस तस्वीर पर गई जिसमें एलिना नवजात आरव को हरे कंबल में पकड़े हुए थी।
उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“उस औरत को… जो अस्पताल में यह दावा करते हुए आई थी कि वह आरव की दादी है।”
सविता का चेहरा अचानक बिल्कुल सफेद पड़ गया।
और उसी क्षण कमरे में मौजूद हर व्यक्ति ने एक ही असंभव बात समझ ली—
लीला उनकी बात सविता के बारे में नहीं कर रही थी।
