PART 2
शांति सबसे पहले खड़ी हुई।
उसकी पहली हरकत सफाई देने की नहीं थी।
उसने खाने का डिब्बा उठाकर ढक्कन बंद कर दिया।
जैसे उसे डर हो कि मैं खाना वापस ले जाऊँगा।
वह छोटा सा काम मेरे भीतर कहीं अटक गया।
मैं दरवाज़े के पास ही खड़ा रहा।
मेरे हाथ में पुरानी तस्वीर थी।
सामने नीला बक्सा।
बगल में वह लाल पहिए वाली लकड़ी की रेलगाड़ी।
मैंने शांति की तरफ देखा—
—यह सब क्या है?
शांति ने होंठ खोले, मगर आवाज नहीं निकली।
बूढ़े आदमी ने चौकी के किनारे हाथ रखा और धीरे-धीरे खड़ा होने की कोशिश की।
मैं अनजाने में आगे बढ़ा।
उसने मेरा हाथ नहीं पकड़ा।
वह खुद खड़ा हुआ।
फिर करीब से मेरे चेहरे को देखने लगा।
उसकी नजर पहले मेरी आँखों पर गई।
फिर माथे पर।
फिर ठुड्डी पर।
उसने बहुत धीमे कहा—
—देवेंद्र की चाल है।
बूढ़ी औरत ने रजाई ठीक की।
उसकी आँखें मुझ पर थीं।
वह बोली—
—लेकिन आँखें मीरा की हैं।
मैंने तस्वीर मेज पर रख दी।
मेरी आवाज थोड़ी तेज हो गई—
—आप लोग मेरे माता-पिता को कैसे जानते थे?
शांति ने तुरंत मेरी तरफ देखा।
शायद उसे लगा मैं नाराज़ हूँ।
मैं था भी।
लेकिन अब मुझे समझ नहीं आ रहा था कि किससे।
उससे?
खुद से?
अपने पिता से?
उस बंद लिफाफे से?
शांति मेरे और नीले बक्से के बीच आ गई।
उसने कहा—
—पहले आप एक बात सुन लीजिए।
मैंने जवाब दिया—
—पहले तुम बताओ कि मेरे घर से खाना क्यों ले जाती थीं।
कमरे में फिर चुप्पी हो गई।
शांति ने सिर झुका लिया।
उसने किसी बहाने की कोशिश नहीं की।
वह बोली—
—क्योंकि महीने के आखिर तक मेरे पास इनके लिए ठीक खाना खरीदने के पैसे नहीं बचते थे।
मैंने पूछा—
—तुम्हें तनख्वाह कम मिलती है?
उसने तुरंत सिर उठाया—
—नहीं।
यह जवाब सीधा था।
शांति ने अपने थैले से एक मुड़ा हुआ कागज निकाला।
दवाइयों की पर्ची।
फिर दूसरा।
किराए की रसीद।
फिर बिजली का बिल।
उसने उन्हें मेरे सामने नहीं फैलाया।
बस हाथ में पकड़े रखा।
उसने कहा—
—बाबा की दवाइयों में करीब ₹8,700 चले जाते हैं। अम्मा की दवाइयाँ अलग। किराया ₹4,500 है। बाकी में घर चलता है।
मैंने पूछा—
—मुझसे कहा क्यों नहीं?
उसने मेरी तरफ कुछ सेकंड देखा।
फिर कमरे की जमीन पर नजर कर ली।
उसने कहा—
—पहले महीने जब मैंने आपकी रसोई में एक बची हुई रोटी दूसरी कामवाली को देते देखा था, आपने कहा था घर की चीज़ बिना पूछे बाहर नहीं जाएगी।
मुझे वह शाम याद आ गई।
करीब दस महीने पहले।
एक नई लड़की ने दो संतरे अपने थैले में रख लिए थे।
उसने बताया था कि उसके बेटे को बुखार था।
मैंने संतरे वापस रखवा दिए थे।
फिर रसोई में काम करने वाले चार लोगों के सामने कहा था कि नियम सबके लिए बराबर होगा।
उस दिन मुझे अपने फैसले पर गर्व था।
आज वही वाक्य इस छोटे कमरे में मेरे सामने रखा था।
बिना आवाज के।
मैंने शांति से पूछा—
—तो तुमने चोरी करना सही समझा?
वह तुरंत बोली—
—नहीं।
उसने लंबी सफाई नहीं दी।
बस इतना ही।
फिर उसने धीरे से जोड़ा—
—हर रात सोचती थी अगली बार नहीं लूँगी।
बूढ़ी औरत ने बीच में कुछ कहना चाहा।
शांति ने हाथ उठाकर रोक दिया।
उसने मेरी तरफ देखा—
—गलत मैंने किया है। नौकरी से निकालना हो तो निकाल दीजिए। लेकिन पहले वह चिट्ठी पढ़ लीजिए।
उसने नीले बक्से पर हाथ रखा।
मैंने बूढ़े आदमी की तरफ देखा—
—आपका नाम?
उसने कहा—
—हरिराम।
बूढ़ी औरत की तरफ इशारा किया—
—कमला।
फिर शांति की तरफ देखा—
—और यह हमारी बेटी है।
मैंने तस्वीर दोबारा उठाई।
माँ हरिराम और कमला के बीच खड़ी थीं।
उनका हाथ कमला के कंधे पर था।
ऐसा हाथ जो किसी परिचित पर औपचारिकता से नहीं रखा जाता।
परिवार की तस्वीर जैसा लग रहा था।
मैंने पूछा—
—माँ आपको कैसे जानती थीं?
कमला काकी ने जवाब देने के बजाय मेरी तरफ हाथ बढ़ाया।
मैं आगे गया।
उन्होंने मेरी कलाई नहीं, मेरी घड़ी पकड़ी।
मेरी घड़ी के पीछे पिता के नाम के शुरुआती अक्षर खुदे थे।
“द. म.”
उन्होंने अंगूठा उन अक्षरों पर फेरा।
फिर हाथ छोड़ दिया।
हरिराम ने नीले बक्से की छोटी चाबी अपनी बनियान की जेब से निकाली।
ताला खुला।
ढक्कन उठाते ही पुराने कागजों की हल्की सी गंध आई।
ऊपर दो तस्वीरें थीं।
नीचे कपड़े में लिपटे कागज।
एक बैंक की पुरानी पुस्तिका।
और वही बंद लिफाफा।
हरिराम ने लिफाफा मेरी तरफ बढ़ाया।
मैंने उसे हाथ में लिया।
पीछे मोम की छोटी सी सील थी।
टूटी नहीं थी।
मेरे पिता को गुज़रे 18 महीने हो चुके थे।
फिर भी मैं उनकी लिखावट तुरंत पहचान गया।
कंपनी के शुरुआती दिनों में वह हर महत्वपूर्ण कागज पर इसी तरह मोटे अक्षरों में नाम लिखते थे।
मैंने लिफाफे के किनारे उंगली रखी।
फिर रुक गया।
मैंने शांति की तरफ देखा—
—तुमने यह पढ़ा है?
उसने सिर हिलाया—
—नहीं।
—तुम्हें पता है इसमें क्या है?
—थोड़ा।
—किसने बताया?
शांति की नजर कमला काकी पर गई।
कमला ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।
उन्होंने कहा—
—तेरी माँ ने।
मेरे हाथ वहीं रुक गए।
माँ को गुज़रे नौ साल हो चुके थे।
मैंने कुर्सी खींची और बैठ गया।
लिफाफा खोला।
अंदर चार पन्ने थे।
पहला पन्ना पिता की लिखावट में था।
सबसे ऊपर तारीख थी।
“8 नवंबर 2016।”
नीचे लिखा था—
“अर्जुन,
अगर यह चिट्ठी तुम्हारे हाथ मेरे रहते नहीं पहुँची, तो इसका मतलब मैं वह बात खुद नहीं बता पाया जिससे मैं कई साल भागता रहा।”
मैं आगे पढ़ता गया।
शब्द छोटे थे।
सीधे।
मेरे पिता वैसे ही लिखते थे जैसे बात करते थे।
कम शब्द।
कोई सजावट नहीं।
उन्होंने लिखा था कि मेरी माँ मीरा के माता-पिता की मृत्यु तब हो गई थी जब वह 11 साल की थीं।
माँ के दूर के रिश्तेदारों ने उन्हें कुछ महीने रखा।
फिर पढ़ाई छुड़ाने की बात शुरू हो गई।
उसी मोहल्ले में हरिराम और कमला रहते थे।
हरिराम तब एक छोटी कैंटीन में खाना बनाते थे।
कमला घरों में सिलाई करती थीं।
उनकी अपनी बेटी शांति छह साल की थी।
उन्होंने माँ को अपने घर में रख लिया।
कागजों में गोद लेने की कोई प्रक्रिया नहीं हुई।
कोई बड़ा फैसला घोषित नहीं हुआ।
बस एक दिन मीरा उनके साथ रहने लगीं।
फिर वहीं बड़ी हुईं।
शांति उन्हें “दीदी” कहती थी।
कमला ने उनके स्कूल की फीस भरी।
हरिराम सुबह 5 बजे काम पर जाने से पहले दोनों लड़कियों के लिए खाना बनाते।
मेरी माँ ने मुझे कभी यह बात नहीं बताई थी।
मेरी उंगली कागज पर रुक गई।
मैंने कमला की तरफ देखा।
उनके चेहरे पर वह उम्मीद नहीं थी जो किसी बड़े रहस्य के खुलने के बाद होती है।
वे बस मुझे देख रही थीं।
जैसे पता लगाना चाहती हों कि मैं चिट्ठी बंद करके उठ जाऊँगा या आगे पढ़ूँगा।
मैंने दूसरा पन्ना पलटा।
1997 में मेरे पिता ने अपने परिवार के खिलाफ जाकर माँ से शादी की थी।
यह हिस्सा मैं जानता था।
मुझे बताया गया था कि दादाजी को माँ का साधारण परिवार पसंद नहीं था।
चिट्ठी में पहली बार पता चला कि बात सिर्फ पैसे की नहीं थी।
दादाजी को यह स्वीकार नहीं था कि उनकी बहू के पास “दिखाने लायक परिवार” नहीं था।
पिता घर छोड़कर माँ के साथ गुरुग्राम के पुराने हिस्से में किराए के कमरे में रहने लगे।
उनके पास उस समय अपनी कंपनी नहीं थी।
सिर्फ बिजली के सामान की छोटी दुकान शुरू करने की योजना थी।
पहले छह महीने किराया हरिराम ने दिया।
कमला काकी माँ के लिए खाना भेजती रहीं।
फिर दुकान शुरू करने के लिए ₹46,000 कम पड़ गए।
हरिराम ने अपनी वर्षों की बचत निकाल दी।
कमला ने दो छोटी सोने की चूड़ियाँ बेच दीं।
उन्होंने कोई ब्याज नहीं माँगा।
कोई हिस्सा नहीं माँगा।
पिता ने लिखा था—
“मल्होत्रा इलेक्ट्रिकल्स की पहली दुकान मेरे नाम पर थी, लेकिन उसकी पहली शटर की चाबी हरिराम ने मुझे दी थी।”
मैंने पन्ना नीचे रखा।
मेरी कंपनी आज 17 शहरों में काम करती थी।
हमारे लगभग 2,300 कर्मचारी थे।
मेरे कार्यालय की 21वीं मंजिल पर पिता की बड़ी तस्वीर लगी थी।
हर साल स्थापना दिवस पर मैं उनके संघर्ष की कहानी सुनाता था।
मैं कहता था कि उन्होंने सब कुछ शून्य से बनाया।
उस छोटे कमरे में बैठकर पहली बार “शून्य” का आकार बदल गया।
शांति चुपचाप कमला काकी की थाली उठा रही थी।
अभी भी थोड़ी सब्ज़ी बची थी।
उसने उसे वापस डिब्बे में रखा।
मैंने तीसरा पन्ना उठाया।
पिता ने लिखा था कि सफलता आने के बाद उन्होंने हरिराम और कमला को शहर में घर दिलाने की कोशिश की।
उन्होंने मना कर दिया।
पैसे देने चाहे।
उन्होंने कम लिए।
बार-बार कहा कि उन्होंने बेटी की मदद की थी, निवेश नहीं किया था।
फिर पिता ने एक पारिवारिक सहायता निधि बनाई।
हर महीने एक तय रकम उसमें जाती।
उसके लाभार्थी हरिराम और कमला थे।
पिता ने लिखा था—
“यह दान नहीं है। मैंने कंपनी के शुरुआती लाभ से उनका हिस्सा अलग माना है। कागज उसी बक्से में हैं।”
मैंने तुरंत नीले बक्से की तरफ देखा।
कपड़े में लिपटे कागज।
मैंने उन्हें खोला।
ऊपर पिता के हस्ताक्षर थे।
नीचे एक लेखाकार के।
फिर पुराना बैंक दस्तावेज।
निधि 2004 में बनी थी।
राशि समय के साथ बढ़ती रही।
आखिरी दर्ज मासिक भुगतान ₹38,000 था।
मैंने तारीख देखी।
मेरे पिता के गुजरने के करीब दो महीने बाद तक भुगतान हुआ था।
फिर बंद।
मैंने सिर उठाया।
शांति ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन मेरे दिमाग में आठ महीने पुरानी एक बैठक खुल गई।
पिता के निधन के बाद मैंने कंपनी और परिवार के खातों को अलग करने का आदेश दिया था।
मेरे वित्त विभाग ने करीब 63 पुराने व्यक्तिगत भुगतान चिन्हित किए थे।
किसी में फूल भेजने का स्थायी खर्च था।
किसी में पुराने क्लब की फीस।
किसी में ड्राइवर की विधवा को सहायता।
किसी में ऐसी निधियाँ जिनके दस्तावेज पुराने थे।
मैंने पूरी सूची पढ़ी भी नहीं थी।
एक बैठक में मैंने कहा था—
—जिस खर्च का साफ व्यावसायिक कारण नहीं है, बंद कर दीजिए।
मेरे सामने 19 पन्ने रखे गए थे।
मैंने आखिरी पन्ने पर हस्ताक्षर किए थे।
मुझे उस वक्त लगा था कि मैं कंपनी को व्यवस्थित कर रहा हूँ।
मेरे हस्ताक्षर के नीचे शायद इस निधि का नाम भी था।
मैंने कागज पकड़ने का तरीका बदल दिया।
जिसे मैं चोर समझकर पीछा कर रहा था, वही औरत पिछले छह महीने से अपनी तनख्वाह काटकर उन लोगों को खिला रही थी जिनकी मदद से मेरे माता-पिता ने अपना जीवन शुरू किया था।
और उनकी रसोई खाली होने की एक वजह मेरे अपने हस्ताक्षर थे।
मैंने कुछ नहीं कहा।
किसी ने भी नहीं कहा।
बाहर किसी साइकिल की घंटी बजी।
फिर पास वाली झोपड़ी से प्रेशर कुकर की सीटी आई।
पीले बल्ब के नीचे लाल पहिए वाली छोटी रेलगाड़ी अब भी पड़ी थी।
मेरी नजर उस पर जाकर रुक गई।
मैंने उसे उठाया।
लकड़ी हल्की थी।
पीछे काले पेन से कुछ लिखा था।
“अर्जुन — 3 साल।”
मैंने जैसे ही पढ़ा, मेरे अंदर कोई बहुत पुरानी चीज़ हिली।
कोई साफ याद नहीं।
बस छोटे-छोटे टुकड़े।
मिट्टी का आँगन।
गरम रोटी की खुशबू।
किसी लड़की की आवाज जो मुझे “गुड्डू” कहकर बुलाती थी।
एक लाल पहिया जिसे मैं बार-बार घुमाता था।
मैंने शांति की तरफ देखा।
वह करीब 47 साल की थी।
पहली बार मैंने उसके चेहरे को कामवाली की तरह नहीं देखा।
उसकी दाईं भौं के ऊपर छोटा सा निशान था।
अचानक मुझे एक पुरानी पारिवारिक तस्वीर याद आई जिसमें मैं किसी किशोर लड़की की गोद में बैठा था।
मैंने धीमे से पूछा—
—मैं यहाँ आया करता था?
शांति ने सिर हिलाया।
उसकी आँखें जमीन पर थीं।
उसने कहा—
—जब आप छोटे थे।
मैं रेलगाड़ी हाथ में लिए बैठा रहा।
शांति ने आगे कहा—
—मीरा दीदी आपको कभी-कभी लाती थीं। फिर जब आप पाँच साल के हुए, आना कम हो गया।
—क्यों?
शांति ने जवाब देने से पहले कमला काकी की तरफ देखा।
कमला ने सिर झुका लिया।
शांति बोली—
—घर में परेशानी होती थी।
मुझे समझने के लिए ज्यादा शब्दों की जरूरत नहीं पड़ी।
दादाजी।
परिवार का नाम।
समाज।
मेरी माँ का वह हिस्सा जिसे बड़े घर में जगह नहीं मिली थी।
मैंने आखिरी पन्ना खोला।
यह पिता की लिखावट नहीं थी।
माँ की थी।
तारीख पिता के पत्र से तीन साल पहले की थी।
“अर्जुन,
हरिराम और कमला ने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं उनके घर में बाहर से आई थी। शांति मेरी छोटी बहन रही है, चाहे कागज कुछ भी कहते हों।
मैंने तुमसे यह बात छिपाई।
उस समय मुझे लगा था कि इससे घर में शांति रहेगी।
बाद में समझ आया कि कुछ बातें छिपाने से खत्म नहीं होतीं। बस अगली पीढ़ी उन्हें बिना समझे दोहराती है।
अगर तुम कभी उनसे मिलो, तो मेरे कारण उनसे नजर मत चुराना।”
बस इतना।
आगे कोई लंबा संदेश नहीं था।
कोई आदेश नहीं।
कोई भावुक आखिरी पंक्ति नहीं।
मैंने पन्ना मोड़ा भी नहीं।
उसे गोद में खुला रहने दिया।
कमला काकी ने अपनी थाली उठाने की कोशिश की।
मैं तुरंत खड़ा हुआ।
उन्होंने मेरा हाथ हटा दिया।
फिर खुद थाली उठाकर शांति को दी।
यह छोटा सा इशारा बहुत कुछ बता रहा था।
उन्हें मेरी मदद की आदत नहीं थी।
शायद चाहिए भी नहीं थी।
मैंने शांति से पूछा—
—निधि बंद होने के बाद तुमने किसी से संपर्क किया?
उसने कहा—
—तीन बार।
उसने अपने पुराने फोन में कुछ संदेश दिखाए।
परिवार कार्यालय का सामान्य नंबर।
पहला जवाब आया था कि दस्तावेज जांचे जा रहे हैं।
दूसरा कि लाभार्थियों का विवरण अधूरा है।
तीसरे का कोई जवाब नहीं।
मैंने पूछा—
—मुझे क्यों नहीं बताया?
शांति ने एक सेकंड के लिए हँसने जैसा चेहरा बनाया, मगर हँसी नहीं आई।
उसने कहा—
—आपसे कैसे मिलती?
मैं जवाब नहीं दे पाया।
वह रोज़ मेरे घर में होती थी।
मुझसे पाँच मीटर की दूरी पर।
फिर भी उसके लिए मुझसे “मिलना” संभव नहीं था।
यही शायद मेरे घर की सबसे महंगी दूरी थी।
मैंने फोन निकाला।
रात 10:47 हो रही थी।
मैंने अपने वित्त प्रमुख नीरज को फोन किया।
उसने दूसरी घंटी पर उठाया।
मैंने कहा—
—2004 की देवेंद्र मल्होत्रा पारिवारिक सहायता निधि का रिकॉर्ड निकालो।
वह कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला—
—अभी?
मैंने नीले बक्से में पड़े दस्तावेज देखे।
—अभी।
उसने लैपटॉप खोलने के लिए दस मिनट माँगे।
मैं बाहर गली में आ गया।
पहली बार मैंने आसपास ठीक से देखा।
करीब 20 कदम दूर नाली के ऊपर टूटी पटिया रखी थी।
एक घर के सामने साइकिल उलटी पड़ी थी।
एक दुकान बंद हो रही थी।
मेरी गाड़ी उस इलाके की सड़क पर दूर खड़ी चमक रही थी।
वह यहाँ अजीब लग रही थी।
फोन बजा।
नीरज था।
उसकी आवाज अब सामान्य नहीं थी।
उसने कहा कि निधि कंपनी के मुख्य खातों से अलग थी, लेकिन वर्षों से उसका प्रशासन परिवार कार्यालय करता था।
पिता के निधन के बाद दस्तावेज नवीनीकरण लंबित रहे।
फिर मेरी लागत-सफाई वाली सूची में इसे निष्क्रिय खाते के रूप में डाल दिया गया।
मैंने पूछा—
—किसने मंजूर किया?
थोड़ी चुप्पी हुई।
फिर उसने कहा—
—अंतिम मंजूरी आपकी थी।
मैंने आँखें बंद नहीं कीं।
बहाना नहीं बनाया।
बस पूछा—
—कितना बकाया है?
नीरज ने कहा कि पूरा हिसाब सुबह तक लगेगा।
मैंने कहा—
—रात में प्रारंभिक हिसाब लगाओ। सुबह नौ बजे कानूनी और लेखा विभाग के साथ बैठेंगे।
मैंने फोन काट दिया।
अंदर लौटा।
शांति खड़ी हो चुकी थी।
उसने अपना थैला कंधे पर डाला।
उसने कहा—
—अब मैं चलूँ?
मैंने उसे देखा—
—कहाँ?
—घर।
मुझे पहली बार एहसास हुआ कि यह उसका घर भी नहीं था।
वह अपने माता-पिता को खाना देकर करीब सात किलोमीटर दूर किराए के कमरे में जाती थी।
सुबह फिर मेरे घर।
मैंने कहा—
—मैं छोड़ देता हूँ।
उसने तुरंत मना किया—
—बस मिल जाएगी।
मैंने दोबारा जोर नहीं दिया।
उस रात मुझे अपने पैसे का इस्तेमाल करके हर बात तुरंत ठीक कर देने का मन हुआ।
यही मेरा तरीका था।
समस्या देखो।
रकम तय करो।
आदेश दो।
समस्या खत्म।
लेकिन नीले बक्से के सामने मुझे समझ आ गया था कि हर चीज़ खरीदकर वापस नहीं रखी जा सकती।
मैंने कमला काकी से सिर्फ इतना पूछा—
—कल फिर आ सकता हूँ?
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
फिर बोलीं—
—अगर खाना वापस लेने नहीं आ रहे तो आ जाना।
शांति ने पहली बार हल्की सी मुस्कान दबाई।
मैंने भी कुछ नहीं कहा।
घर पहुँचा तो रात 12 बजे से ऊपर हो चुके थे।
सिमरन बैठक में मेरा इंतजार कर रही थी।
उसने पूछा—
—पकड़ा?
मैंने चाबी मेज पर रखी।
—हाँ।
वह सीधी बैठ गई।
—कितना ले जाती थी?
मैंने उसकी तरफ देखा।
—चार रोटियाँ।
सिमरन के चेहरे पर झुंझलाहट आई।
—मैं रकम नहीं पूछ रही।
मैंने तस्वीर उसके सामने रख दी।
वह चुप हो गई।
उसने पिता को पहचाना।
माँ को भी।
फिर मेरी तरफ देखा।
मैंने कहा—
—कल सुबह मेरे साथ चलना।
वह पूछना चाहती थी।
मैंने बाकी कुछ नहीं बताया।
सुबह 8:55 बजे मैं कार्यालय पहुँचा।
नीरज, हमारे पुराने लेखाकार श्रीधर और कानूनी विभाग की प्रमुख रश्मि पहले से बैठक कक्ष में थे।
मेज पर सात फाइलें थीं।
नीले बक्से के दस्तावेज मैंने बीच में रखे।
करीब 40 मिनट तक सिर्फ तारीखें देखी गईं।
पुराने बैंक रिकॉर्ड।
पिता के निर्देश।
निधि की शर्तें।
फिर श्रीधर ने चश्मा उतारा।
वह पिता के साथ 22 साल काम कर चुके थे।
उन्होंने दस्तावेज की आखिरी पंक्ति पर उंगली रखी।
उन्होंने कहा—
—यह सहायता नहीं थी।
मैंने उनकी तरफ देखा।
उन्होंने दूसरा पन्ना आगे किया।
पिता ने निधि बनाते समय कंपनी के शुरुआती निजी लाभ का 1.25 प्रतिशत हिस्सा इस खाते में डालने का स्थायी निर्देश दिया था।
बाद में रकम निश्चित मासिक भुगतान में बदल दी गई थी, लेकिन मूल दस्तावेज रद्द नहीं हुआ था।
निधि बंद नहीं की जा सकती थी।
सिर्फ लाभार्थियों की पुष्टि बाकी थी।
मेरे विभाग ने उसे सामान्य व्यक्तिगत खर्च मान लिया था।
और मैंने जांचे बिना हस्ताक्षर कर दिए थे।
रश्मि ने सीधी बात कही—
—राशि वापस जारी करनी होगी। बकाया समेत।
मैंने पूछा—
—कितना?
नीरज ने टैबलेट घुमाया।
छह महीने का बकाया, ब्याज और खाते में रुकी पुरानी राशि जोड़कर ₹4,86,320।
लेकिन असली बात दूसरी थी।
निधि के खाते में वर्षों से जमा एक आरक्षित रकम भी थी जिसे हरिराम और कमला ने कभी छुआ नहीं था।
₹31 लाख से ज्यादा।
मैं स्क्रीन देखता रहा।
वे टूटी झोपड़ी में आधी रोटी बाँट रहे थे।
और उनके नाम पर ₹31 लाख पड़े थे।
सिर्फ इसलिए कि दस्तावेज गलत जगह पड़े रहे।
किसी ने फोन वापस नहीं किया।
और जिस आदमी के एक हस्ताक्षर से सब खुल सकता था, वह उनके घर की कामवाली को चोरी करते पकड़ने में व्यस्त था।
मैंने कहा—
—आज ही प्रक्रिया पूरी करो।
फिर रुका।
—लेकिन पैसा सीधे उनके खाते में डालने से पहले उनसे पूछना। कोई फैसला उनकी जगह हम नहीं करेंगे।
श्रीधर ने पहली बार मेरी तरफ देखा और हल्का सा सिर हिलाया।
उस दोपहर 1 बजे मैंने घर के पूरे स्टाफ को बैठक वाले कमरे में बुलाया।
सिमरन भी वहीं थी।
शांति दरवाज़े के पास खड़ी रही।
उसने शायद सोच लिया था कि अब वही होने वाला है जिसका उसे डर था।
मैंने कोई लंबा भाषण तैयार नहीं किया था।
मैं उसके सामने जाकर खड़ा हुआ।
फिर मैंने कहा—
—कल मैं शांति के पीछे गया था क्योंकि मुझे लगा यह घर से खाना चुरा रही है।
चार लोग एक-दूसरे को देखने लगे।
मैंने आगे कहा—
—उसने बिना पूछे खाना लिया। वह गलत था।
शांति की नजर नीचे हो गई।
मैंने कहा—
—लेकिन उससे पहले मैंने भी गलती की। मैंने उसे समझे बिना चोर मान लिया।
कमरे में बिल्कुल आवाज नहीं थी।
मैंने शांति की तरफ देखा।
—मैंने तुम्हें निकालने का फैसला रास्ते में ही कर लिया था। तुम्हारी बात सुने बिना।
वह मेरी तरफ देखने लगी।
मैंने दोनों हाथ सामने जोड़ दिए।
—मुझे माफ करना।
मेरे घर में काम करने वाले लोगों ने मुझे शायद पहली बार किसी कर्मचारी से माफी माँगते देखा।
मुझे नहीं पता उनमें से किसे ज्यादा असहजता हुई।
उन्हें।
या मुझे।
लेकिन अगले दिन से घर के नियम बदल गए।
कोई भी बचा हुआ ठीक खाना फेंका नहीं जाता।
शाम को रसोई प्रभारी उसकी सूची बनाता।
जिस कर्मचारी को जरूरत हो, वह नाम लिखकर ले सकता था।
किसी को कारण बताना जरूरी नहीं था।
मैंने रसोई में रखे उस पुराने कागज को हटवा दिया जिस पर लिखा था—
“घर की कोई वस्तु बाहर नहीं जाएगी।”
उसकी जगह सिर्फ एक रजिस्टर रखा गया।
शांति ने फिर भी तीन दिन तक कुछ नहीं लिया।
चौथे दिन मैंने देखा उसने दो डिब्बे पैक किए और खुले तौर पर रजिस्टर में लिखा—
“चार रोटियाँ, दाल, दो केले।”
उसने कागज बंद नहीं किया।
थैला नहीं छिपाया।
शाम को मैं और सिमरन उसके साथ हरिराम और कमला के पास गए।
इस बार मैं अपनी बड़ी गाड़ी गली के बाहर ही छोड़कर पैदल गया।
सिमरन ने रास्ते में सिर्फ एक सवाल पूछा—
—उन्होंने तुम्हारी माँ को पाला था?
मैंने सिर हिलाया।
उसने आगे कुछ नहीं पूछा।
कमला काकी ने हमें देखते ही सिमरन के लिए प्लास्टिक की कुर्सी निकाली।
सिमरन बैठी नहीं।
पहले उसने उनके पैर छुए।
कमला कुछ पल उसे देखती रहीं।
फिर सिर पर हाथ रख दिया।
नीरज और बैंक का एक अधिकारी अगले दिन आए।
दस्तावेज पूरे किए गए।
हरिराम ने ₹31 लाख की बात सुनकर पहली प्रतिक्रिया यही दी—
—हमें इतना क्या करना है?
नीरज मेरी तरफ देखने लगा।
मैंने जवाब नहीं दिया।
फैसला उनका था।
आखिर उन्होंने बकाया राशि स्वीकार की।
आरक्षित रकम का बड़ा हिस्सा सुरक्षित जमा में रखा।
कुछ पैसे से उसी इलाके के पास दो कमरों का साफ घर किराए पर लिया, क्योंकि कमला काकी अपनी पुरानी बस्ती से दूर नहीं जाना चाहती थीं।
हरिराम ने नया पलंग खरीदा।
कमला ने नई अलमारी लेने से मना कर दिया।
शांति ने सबसे पहले नया गैस चूल्हा लिया।
और उस लाल पहिए वाली रेलगाड़ी को नए घर की सबसे ऊँची शेल्फ पर रख दिया।
करीब तीन हफ्ते बाद मैं फिर गया।
कमला रसोई में बैठी आटा गूँध रही थीं।
मैंने कहा—
—आपको काम नहीं करना चाहिए।
उन्होंने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने बहुत बेकार बात कही हो।
फिर बोलीं—
—रोटी खुद बना सकती हूँ अभी।
बस।
मैं चुप हो गया।
उसी शाम उन्होंने मेरे लिए गरम रोटी बनाई।
घी बहुत ज्यादा था।
मैंने बिना शिकायत खाई।
शांति सामने बैठी थी।
मैंने पूछा—
—तुम मेरे घर में काम करने कैसे आई थीं?
उसने बताया कि जिस एजेंसी ने उसे भेजा था, उसमें मेरे घर का नाम नहीं दिया गया था।
सिर्फ इलाका और तनख्वाह बताई गई थी।
पहले दिन जब उसने बैठक में माँ की तस्वीर देखी, तभी वह समझ गई।
मैंने पूछा—
—तब बताया क्यों नहीं?
उसने कहा—
—अम्मा ने मना किया था।
कमला ने रसोई से आवाज लगाई—
—मैंने यह नहीं कहा था हमेशा मत बताना।
शांति हँस पड़ी।
शायद पहली बार मैंने उसकी खुली हँसी सुनी।
फिर उसने मेरी तरफ देखा—
—और मुझे लगा आप पहचानेंगे नहीं।
मैंने लाल रेलगाड़ी की तरफ देखा।
वह सही थी।
मैं नहीं पहचानता।
मैं अपने घर में उसके बनाए खाने का स्वाद पहचानता था।
अपनी शर्ट कहाँ रखी है, इसके लिए उसे आवाज देता था।
सुबह कौन सी चाय चाहिए, उसे बिना बताए पता था।
फिर भी मैं उसे नहीं पहचानता था।
दो महीने बाद कंपनी का स्थापना दिवस आया।
हर साल की तरह करीब 300 लोग मुख्य कार्यालय के सभागार में बैठे थे।
पहली पंक्ति में बड़े अधिकारी।
पीछे पुराने कर्मचारी।
मंच पर पिता की तस्वीर।
मेरी प्रस्तुति तैयार थी।
वही पुरानी कहानी।
“एक आदमी, एक सपना, छोटी दुकान से बड़ी कंपनी तक।”
मैंने प्रस्तुति शुरू नहीं की।
मैंने स्क्रीन पर 1999 वाली पुरानी तस्वीर लगवाई।
पिता।
माँ।
हरिराम।
कमला।
मैंने पूरी निजी कहानी नहीं बताई।
माँ की बात उनकी थी।
लेकिन मैंने कंपनी की शुरुआत वाली बात सही कर दी।
मैंने कहा—
—हम हर साल कहते आए हैं कि देवेंद्र मल्होत्रा ने यह कंपनी अकेले शुरू की थी। यह अधूरी बात है।
सभागार चुप था।
मैंने हरिराम और कमला का नाम लिया।
बताया कि पहली दुकान के किराए और शुरुआती रकम में उनकी मदद थी।
बताया कि वर्षों पुराना संस्थापक सहायता खाता प्रशासनिक गलती के कारण बंद हो गया था।
और यह भी बताया कि अंतिम मंजूरी मेरे हस्ताक्षर से हुई थी।
नीरज पहली पंक्ति में बैठा था।
उसने नजर नहीं हटाई।
मैंने किसी कर्मचारी पर दोष नहीं डाला।
कागज मेरे सामने आया था।
हस्ताक्षर मेरे थे।
मैंने वही कहा।
स्थापना दिवस के बाद कंपनी के पुराने इतिहास वाले बोर्ड पर एक बदलाव हुआ।
पिता की तस्वीर अकेली नहीं हटाई गई।
उसके बगल में 1999 की वह तस्वीर लगा दी गई।
नीचे सिर्फ एक पंक्ति लिखी गई—
“हमारी पहली शुरुआत के लोग।”
कुछ दिनों बाद मैं हरिराम और कमला को वह बोर्ड दिखाने ले गया।
कमला ने अपनी तस्वीर देखकर कहा—
—मेरे बाल कितने खराब लग रहे हैं।
सिमरन हँस पड़ी।
हरिराम ने बोर्ड से ज्यादा रुचि नीचे लगी पुरानी दुकान की तस्वीर में दिखाई।
शांति थोड़ी दूरी पर खड़ी थी।
मैंने उससे पूछा—
—तुम्हारी तस्वीर क्यों नहीं है?
उसने जवाब दिया—
—मैं फोटो खींच रही थी।
मैंने पहली बार 1999 वाली तस्वीर को इस तरह देखा।
जिस इंसान ने वह तस्वीर ली थी, वह फ्रेम में नहीं था।
फिर भी पूरी कहानी में मौजूद था।
कुछ रिश्ते शायद ऐसे ही होते हैं।
वे तस्वीर के बीच खड़े नहीं होते।
नाम की पट्टिका नहीं माँगते।
बस जरूरत के समय खाना लेकर पहुँच जाते हैं।
शांति ने मेरे घर की नौकरी नहीं छोड़ी।
मैंने उसे ज्यादा तनख्वाह देने की कोशिश की।
उसने कहा कि सालाना बढ़ोतरी जितनी बनती है उतनी दे दूँ।
अलग से कुछ नहीं।
मैंने उसकी बात मानी।
छह महीने बाद उसने खुद नौकरी छोड़ दी।
उसने बस्ती के पास एक छोटी भोजन सेवा शुरू की।
सिमरन ने शुरुआती बर्तन दिलवाने की कोशिश की।
शांति ने पैसे लौटाए।
फिर सिमरन ने उसके पहले 60 खाने के डिब्बों का पूरा भुगतान करके कार्यालय में मँगवा लिया।
शांति ने वह रकम स्वीकार कर ली।
क्योंकि वह मदद नहीं थी।
काम का भुगतान था।
उस दिन हमारे कार्यालय में दाल, चावल, सब्ज़ी और चार तरह की चटनी आई।
नीरज ने दो डिब्बे लिए।
मैंने भी।
डिब्बे के ढक्कन पर छोटी सी पर्ची लगी थी।
“शांति भोजन सेवा।”
नीचे एक फोन नंबर।
कोई बड़ी कंपनी नहीं।
कोई चमकदार निशान नहीं।
लेकिन छह महीने में उसके यहाँ पाँच महिलाएँ काम करने लगीं।
कमला काकी कभी-कभी सब्ज़ी काटने बैठ जातीं।
हरिराम पैसे गिनने की कोशिश करते और दो बार जोड़ गलत कर देते।
शांति उन्हें फिर भी हिसाब की कॉपी पकड़ा देती।
करीब एक साल बाद मेरी बेटी अनाया ने स्कूल के लिए परिवार पर परियोजना बनाई।
उसने मुझसे पुरानी तस्वीरें माँगीं।
मैंने उसे 1999 वाली तस्वीर दिखाई।
उसने चारों लोगों के नाम पूछे।
मैंने बताए।
फिर उसने पूछा—
—शांति आंटी कहाँ हैं?
मैंने कहा—
—तस्वीर वही खींच रही थीं।
अनाया ने कुछ सोचा।
फिर अपनी परियोजना में तस्वीर के नीचे पाँच नाम लिखे।
आखिरी नाम था—
“शांति आंटी — तस्वीर के पीछे।”
मैंने उसे ठीक नहीं किया।
उस रात रसोई में चार रोटियाँ बची थीं।
पहले जैसी ही।
रसोई की वही सफेद रोशनी।
वही स्टील का डिब्बा।
शांति अब हमारे यहाँ काम नहीं करती थी, लेकिन अगले दिन मैं हरिराम और कमला से मिलने जाने वाला था।
मैंने खुद चारों रोटियाँ डिब्बे में रखीं।
थोड़ी दाल अलग डाली।
सिमरन ने फ्रिज खोला और दो केले निकालकर मेरे सामने रख दिए।
मैंने उसे देखा।
उसने कुछ नहीं कहा।
मैंने केले भी रख लिए।
फिर डिब्बे का ढक्कन बंद किया।
इस बार किसी ने खाना छिपाया नहीं।
और पहली बार मुझे लगा कि मेरे घर से बाहर जाती हुई चार रोटियाँ कुछ कम नहीं कर रही थीं।
वे वह चीज़ वापस ला रही थीं जिसे हमने बहुत साल पहले कागजों, नियमों और बड़े घरों के बीच कहीं खो दिया था।
