7 साल बाद घर लौटा तो बूढ़े पिता घुटनों पर बैठकर पोछा लगा रहे थे, और पत्नी सोफे पर बैठकर हँसते हुए हुक्म चला रही थी! //

बाहर दरवाजे पर विक्रमादित्य खड़ा था।

उसके साथ दो अनजान व्यक्ति भी थे, जिनके हाथों में कुछ आधिकारिक फाइलें थीं।

विक्रमादित्य के चेहरे पर एक घमंडी मुस्कान थी, जो मुझे देखते ही गायब हो गई।

“अमित? तुम… तुम कब आए?” विक्रमादित्य की आवाज लड़खड़ाई।

“मैं सही समय पर आ गया विक्रम, शायद तुम लोगों के खेल का आखिरी हिस्सा देखने के लिए,” मैंने ठंडे स्वर में कहा।

मीना ने तुरंत स्थिति को संभालने की कोशिश की।

“विक्रम भाई तो बस घर के कागजातों के सिलसिले में आए हैं, आज हमने एक छोटा सा पारिवारिक कार्यक्रम रखा था।”

विक्रमादित्य के साथ आए एक आदमी ने आगे बढ़कर कहा, “हम संपत्ति पंजीकरण कार्यालय से आए हैं। आज इस 3 मंजिला मकान के मालिकाना हक के हस्तांतरण के कागजात पर हस्ताक्षर होने थे।”

यह सुनते ही मेरा माथा ठनका।

मैंने विक्रमादित्य की तरफ देखा, “किसका मालिकाना हक? किसके नाम पर?”

विक्रमादित्य ने अपनी जेब से कुछ कागज निकाले और बोला, “अमित, तुम तो 7 साल से बाहर थे। फूफा जी की देखभाल और इस घर का रखरखाव मीना और मैंने ही किया है।”

“फूफा जी ने खुद अपनी मर्जी से यह घर मीना के नाम करने का फैसला किया है।”

पिताजी जो अब तक शांत खड़े थे, आगे आए।

“यह झूठ है!” पिताजी की आवाज में बरसों का दबा हुआ दर्द बाहर आया।

“इन लोगों ने मुझे इस अंधेरे स्टोर रूम में बंद करके रखा। मुझे सही से खाना तक नहीं दिया जाता था।”

“अगर मैं विरोध करता, तो मीना मुझे डराती थी कि वह अमित पर झूठा कानूनी मामला दर्ज करवा देगी और उसका जीवन बर्बाद कर देगी।”

मीना चिल्लाई, “बूढ़े आदमी का दिमाग सठिया गया है! अमित, तुम इनकी बातों पर विश्वास कर रहे हो?”

“मैंने 7 साल तुम्हारी सेवा की है, तुम्हारे घर को सँभाला है, और तुम इस बूढ़े के बहकावे में आ रहे हो?”

सुनीता देवी ने भी रोने का नाटक शुरू कर दिया, “हमने अपनी बेटी तुम्हारे भरोसे छोड़ी थी, और तुम हमारे ऊपर यह आरोप लगा रहे हो?”

मैंने जेब से वह लाल धागे वाला लिफाफा निकाला।

“इस लिफाफे में क्या है, मीना? तुम इसे देखने के लिए इतनी बेचैन क्यों थी?”

विक्रमादित्य ने आगे बढ़कर लिफाफा छीनने का प्रयास किया, लेकिन मैंने उसे पीछे धकेल दिया।

“छूना भी मत!” मैंने चेतावनी दी।

तभी दरवाजे पर एक और गाड़ी आकर रुकी।

गाड़ी से 60 वर्षीय वकील शर्मा जी उतरे, जो हमारे परिवार के पुराने और वफादार कानूनी सलाहकार थे।

उनके हाथ में एक बड़ा काला बैग था।

शर्मा जी को देखते ही विक्रमादित्य और मीना के चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ गया।

शर्मा जी ने कमरे में प्रवेश किया और सीधे पिताजी के पास जाकर उनके हाथ जोड़े।

“केदारनाथ जी, मैं क्षमा चाहता हूँ कि मुझे आने में थोड़ी देर हो गई।”

फिर शर्मा जी मेरी तरफ मुड़े, “अमित, बेटा, तुम बहुत सही समय पर आए हो। अगर तुम आज नहीं आते, तो ये लोग तुम्हारे पिता की पूरी जिंदगी की कमाई हड़प लेते।”

मैंने पूछा, “शर्मा जी, यह सब क्या चल रहा है? मुझे हर एक बात सच-सच जाननी है।”

शर्मा जी ने अपने बैग से एक फाइल निकाली और मेज पर रख दी।

“7 साल पहले जब तुम विदेश गए थे, तो तुमने हर महीने 2 लाख रुपये भेजने का इंतजाम किया था।”

“कुल मिलाकर इन 7 वर्षों में तुमने लगभग 1.68 करोड़ रुपये मीना के बैंक खाते में भेजे।”

“इसके अलावा तुमने पिताजी के चिकित्सा बीमा और रखरखाव के लिए 50 लाख रुपये अलग से भेजे थे।”

मीना बीच में ही चिल्लाने लगी, “हाँ, भेजे थे! और वह सारा पैसा घर के खर्च और पिताजी के इलाज में इस्तेमाल हुआ!”

शर्मा जी ने मुस्कुराते हुए फाइल से बैंक विवरण की प्रतियां निकालीं।

“यह बैंक का पूरा विवरण है, मीना जी।”


“तुम्हारे खाते में हर महीने आने वाले 2 लाख रुपये में से केवल 10,000 रुपये घर के राशन के लिए निकाले जाते थे।”

“बाकी का सारा पैसा विक्रमादित्य के नए व्यवसाय खाते में स्थानांतरित किया जाता था।”

“पिछले 3 सालों में तुमने अपने भाई विक्रमादित्य को 1.20 करोड़ रुपये स्थानांतरित किए हैं, जिससे उसने शहर के दूसरे कोने में एक 4 बीएचके फ्लैट खरीदा है।”

यह सुनते ही मीना की माँ सुनीता देवी हकलाने लगीं, “यह… यह सब व्यवसाय के निवेश के लिए था, हम पैसा डुबोने वाले नहीं थे…”

“और पिताजी के इलाज के 3 लाख रुपये?” मैंने पूछा।

शर्मा जी ने एक और कागज सामने रखा।

“पिताजी का कभी किसी बड़े अस्पताल में इलाज ही नहीं हुआ।”

“उन्हें केवल 150 रुपये की साधारण दर्द निवारक दवाइयाँ दी जाती थीं।”

“जब भी पिताजी बीमार पड़ते, मीना उनसे खाली कागजों पर अंगूठे के निशान लेने की धमकी देती थी।”

पिताजी की आँखों से आँसू बहने लगे।

वे बोले, “अमित, जब भी मैं तुमसे दूरभाष पर बात करने की कोशिश करता, मीना फोन का तार काट देती थी या मेरे सिर पर मोबाइल रखकर खड़ी हो जाती थी।”

“यह मुझे वही बोलने को मजबूर करती थी जो यह चाहती थी।”

“अगर मैं तुम्हारी तरफ एक शब्द भी बोलने की कोशिश करता, तो यह मुझे दो दिनों तक खाना नहीं देती थी।”

मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।

मैं 7 साल तक दिन-रात मेहनत करता रहा, हर महीने लाख रुपये भेजता रहा, यह सोचकर कि मेरा परिवार खुश है।

और यहाँ मेरे पिता को एक-एक रोटी के लिए तरसाया जा रहा था।

मैंने मीना की तरफ देखा। उसकी आँखों में अब कोई पश्चाताप नहीं था, केवल पकड़े जाने का डर था।

“अमित, मेरी बात सुनो…” मीना ने मेरा हाथ पकड़ने की कोशिश की।

मैंने उसका हाथ झटका।

“उस लिफाफे में क्या है, शर्मा जी?” मैंने पूछा।

शर्मा जी ने कहा, “वह लिफाफा पिताजी ने मेरे पास जमा कराए गए दस्तावेजों की रसीद और डायरी है।”

“पिताजी ने पिछले 4 सालों का एक-एक दिन का हिसाब अपनी डायरी में लिखा है।”

“हर तारीख, हर घटना, किस दिन उन्हें खाना नहीं दिया गया, किस दिन विक्रमादित्य ने उनसे संपत्ति के कागजात पर हस्ताक्षर कराने के लिए मारपीट की धमकी दी—सब कुछ उस डायरी में दर्ज है।”

“और इतना ही नहीं, पिताजी ने अपने कमरे के छोटे से कोने में एक छोटा डिजिटल रिकॉर्डर छिपाकर रखा था।”

शर्मा जी ने बैग से एक पेनड्राइव निकाली और उसे मेज पर रखे लैपटॉप से जोड़ दिया।

कमरे में एक आवाज गूँज उठी।

रिकॉर्डिंग में मीना की स्पष्ट आवाज सुनाई दे रही थी:

“सुनो बूढ़े, चुपचाप इस वसीयत पर हस्ताक्षर कर दो! अमित अब कभी वापस नहीं आएगा, उसने विदेश में अपना जीवन बसा लिया है।”

“अगर तुमने हस्ताक्षर नहीं किए, तो मैं तुम्हें इस घर के बाहर निकाल दूंगी और पुलिस में शिकायत दर्ज करा दूंगी कि तुम मुझे प्रताड़ित करते हो।”

और फिर विक्रमादित्य की आवाज आई:

“बहन, एक बार कागजात बन जाएँ, फिर इस बूढ़े को किसी वृद्धाश्रम में फेंक देंगे। अमित को बोल देंगे कि बीमारी से मौत हो गई।”

रिकॉर्डिंग सुनकर कमरे में सन्नाटा छा गया।

पंजीकरण कार्यालय से आए दोनों अधिकारी शर्मिंदा होकर पीछे हट गए।

“हम इस प्रकार की धोखाधड़ी का हिस्सा नहीं बन सकते,” एक अधिकारी ने कहा और तुरंत अपने कागजात समेटकर बाहर निकल गए।

विक्रमादित्य का चेहरा पीला पड़ चुका था।

उसने धीरे से खिसकने की कोशिश की, लेकिन मैंने दरवाजे का रास्ता रोक लिया।

“कहाँ जा रहे हो विक्रम?” मैंने ठंडे स्वर में पूछा।

“अमित… भाई, हम आपस में बैठकर बात कर सकते हैं ना? परिवार का मामला है,” विक्रमादित्य की हिम्मत पूरी तरह टूट चुकी थी।

“परिवार?” मैंने पूछा।

“तुमने मेरे पिता को नौकरों की तरह फर्श रगड़ने पर मजबूर किया, उन्हें स्टोर रूम में रखा, और तुम इसे परिवार कहते हो?”

मीना तुरंत घुटनों के बल मेरे सामने गिर पड़ी।

“अमित, मुझे माफ कर दो! मेरी माँ और भाई ने मुझे बहकाया था!”

“मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, मुझे एक मौका दे दो! मैं सब ठीक कर दूंगी!”

सुनीता देवी चिल्लाई, “मीना, तू इसके सामने क्यों झुक रही है? इसका आधा घर तेरा है!”

शर्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “सुनीता जी, कानून इतना सीधा नहीं है।”

“वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत, किसी भी बुजुर्ग व्यक्ति को प्रताड़ित करना और उनकी संपत्ति हड़पने का प्रयास करना एक गैर-जमानती अपराध है।”

“इसके अलावा, अमित के भेजे गए 1.68 करोड़ रुपये का गबन और धोखाधड़ी का मामला अलग से चलेगा।”

तभी बाहर पुलिस की गाड़ी का सायरन सुनाई दिया।

मैंने पहले ही शर्मा जी के आने से पूर्व पुलिस को सूचित कर दिया था।

कमरे में दो पुलिस अधिकारी दाखिल हुए।

शर्मा जी ने पेनड्राइव, बैंक के कागजात और पिताजी की लिखित शिकायत पुलिस निरीक्षक को सौंप दी।

निरीक्षक ने रिकॉर्डिंग सुनी और कागजात देखे।

उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

“इतने बुजुर्ग व्यक्ति के साथ ऐसा अत्याचार?” निरीक्षक ने विक्रमादित्य और मीना की तरफ देखते हुए कहा।

निरीक्षक ने तुरंत महिला पुलिसकर्मी को आगे बढ़ाया।

“मीना देवी, विक्रमादित्य और सुनीता देवी, आप तीनों को वरिष्ठ नागरिक प्रताड़ना, धोखाधड़ी और गबन के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है।”

मीना रोने लगी और मेरी तरफ हाथ जोड़ने लगी, “अमित! मुझे बचा लो! मैं जेल नहीं जाना चाहती!”

मैंने अपनी नज़रें फेर लीं।

“7 साल तक तुमने मेरे पिता की लाचारी का फायदा उठाया। अब कानून तुम्हारा हिसाब करेगा।”

पुलिस तीनों को हथकड़ी लगाकर बाहर ले गई।

घर में पूरी तरह शांति छा गई।

मैं अपने पिता के पास गया और उनके पैरों में बैठ गया।

“मुझे माफ कर दीजिए बाबा… मैं पैसों के पीछे भागता रहा और यहाँ आप पर अत्याचार होता रहा।”

पिताजी ने मेरे सिर पर हाथ रखा।

उनकी आँखों में अब शांति थी।

“तेरा कोई दोष नहीं था बेटा। तूने तो हमारे अच्छे जीवन के लिए ही पसीना बहाया था।”

“बस मुझे खुशी है कि तू सही समय पर आ गया।”

मैंने पिताजी को उठाकर उनके उस बड़े कमरे में बैठाया, जिसे मैंने उनके लिए बनवाया था।

विक्रमादित्य का सारा सामान बाहर फिंकवा दिया गया।

अगले 3 महीनों में, शर्मा जी की मदद से मैंने कानूनी प्रक्रिया पूरी की।

मीना और उसके भाई पर धोखाधड़ी और प्रताड़ना का मामला सिद्ध हो गया।

अदालत के आदेश पर विक्रमादित्य का खरीदा हुआ 4 बीएचके फ्लैट और मीना के बैंक खाते में जमा सारा पैसा जब्त कर लिया गया।

वह पूरा पैसा पिताजी के नाम पर एक सुरक्षित जमा खाते में स्थानांतरित कर दिया गया।

मीना को तलाक का कानूनी नोटिस भेज दिया गया, और अदालत ने उसके किसी भी प्रकार के भरण-पोषण के दावे को खारिज कर दिया।

मैंने विदेश की अपनी नौकरी हमेशा के लिए छोड़ दी।

मैंने अपने शहर में ही एक छोटा व्यवसाय शुरू किया ताकि मैं हर दिन अपने पिता के साथ रह सकूँ।

आज मेरा घर फिर से जगमगा रहा था।

पिताजी अब अपने बड़े कमरे में आराम से बैठते हैं, ढलती शाम में चाय पीते हैं और पड़ोसियों के साथ हँसते-बोलते हैं।

उनके चेहरे पर अब किसी का डर नहीं था, केवल अपने बेटे का सहारा और सुकून था।

सच्चा धन विदेश का पैसा नहीं था, बल्कि अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा और उनके चेहरे की शांति थी।

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